Wednesday, 04 February 2026
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मोदी बनाम राहुल होगा 2024

क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प बन पायेंगे? क्या 2024 में कांग्रेस केन्द्र में सरकार बना पायेगी? क्या एन.डी.ए. से बाहर बैठे राजनीतिक दल कांग्रेस के नेतृत्व में इकट्ठा हो पायेंगे? क्या एनडीए में टूटन आयेगी? क्या भाजपा कांग्रेस में कोई तोड़फोड़ कर पायेगी? इस समय यह सारे सवाल राजनीतिक विश्लेषकों के लिये अहम बने हुये हैं। क्योंकि राजनीतिक दलों ने 2024 के चुनाव के लिये अभी से विसात बिछानी शुरू कर दी है। इस समय राजनीतिक परिदृश्य मोदी बनाम राहुल और भाजपा बनाम कांग्रेस होता जा रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है। यह क्यों हो रहा है इसके लिये 2014 से पूर्व और बाद की परिस्थितियों पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।
देश 1947 में आजाद हुआ। 1950 में संविधान लागू हुआ। 1952 में देश में पहला आम चुनाव हुआ। 1952 से मई 1964 तक स्व.पंडित जवाहर लाल नेहरू बारह वर्ष तक देश के प्रधानमंत्री रहे कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन हर चुनाव में जनसंघ और दूसरे दल कांग्रेस को चुनावी चुनौति भी देते रहे। उस समय का मतदाता प्रत्यक्ष रूप से जानता था की आजादी की लड़ाई में किसका क्या योग योगदान रहा है। इतिहास को लेकर जो सवाल आज उठाये जा रहे हैं यह उस समय नहीं थे। क्योंकि उस समय की जनता उस समय का स्वंय ही इतिहास थी। लेकिन उस दौर में भी जब रियासतों के एकीकरण के बाद कृषि सुधारों की बात आयी थी जब भी सी राजगोपालाचार्य जैसे नेताओं ने इन सुधारों का विरोध किया था। इसी विरोध की पृष्ठभूमि थी कि स्व. इन्दिरा गांधी जी को सत्ता संभालने के लिये कांग्रेस में विघटन तक का सामना करना पड़ा। बैंकों के राष्ट्रीयकरण को उस समय सुप्रीम कोर्ट में स्व.प्रो.बलराज मधोक और अन्य ने चुनौती दी थी। जिसे संविधान में संशोधन करके प्रस्तुत किया गया था। 1964 से 1975 तक का राजनीतिक परिदृश्य किस तरह का रहा है यह भी आम आदमी जानता है। इसी काल में कई राज्यों में संबिद्ध सरकारों का भी गठन हुआ था। आपातकाल के बाद कांग्रेस कितना और विपक्ष कितना केन्द्र की सत्ता पर काबिज रहा है यह सब जानते हैं। 2014 तक कांग्रेस और अन्यों के सत्ता काल में ज्यादा अन्तर व्यवहारिक रुप से नहीं रहा है यह एक स्थापित सत्य है।
1948 से आज तक आर.एस.एस. ने देश में अपने को किस तरह स्थापित किया। कितने उसके सहयोगी संगठन बने और कितने उसकी विचारधारा के स्नातक बनकर निकले हैं उसकी पूरी जानकारी भले ही अधिकांश को न रही हो लेकिन 2014 के बाद आयी भाजपा नीत सरकार के व्यवहारिक पक्ष से सबके सामने आ गयी है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुधर्मी देश में इस तरह की विचारधारा की वैचारिक स्वीकारोक्ति कितनी हो सकती हैं यह सामने आ चुका है। क्योंकि विचारधारा के प्रसार के लिए जिस तरह का सामाजिक और आर्थिक परिवेश खड़ा करने का प्रयास किया गया वह अब लगातार अस्वीकार्य होता जा रहा है। 2014 का चुनाव जिन नारों पर लड़ा गया था जो वायदे उस समय किये गये थे वह 2019 के लोकसभा और इस दौरान हुये विधानसभा चुनाव में कैसे बदले गये हैं यह देश देख चुका है। एक भी मुस्लिम को टिकट न देकर भाजपा तो मुस्लिम मुक्त हो सकती है लेकिन देश नहीं। राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित प्रसारित करने में जितना समय और संसाधन लगा दिये गये हैं उन्हीं के कारण आज मोदी का राजनीतिक कद अब हल्का पड़ता जा रहा है। महंगाई और बेरोजगारी ने हर आदमी को सरकार की कथनी और करनी को समझने के मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिस तरह की राजनीतिक वस्तुस्थिति 2014 में कांग्रेस के लिए निर्मित हो गयी थी वहीं आज भाजपा और मोदी की होती जा रही है। विदेशों में बैठे भारतीयों को जिस मोदी ने एक समय हथियार बनाया था अब राहुल भी उसी हथियार का प्रयोग करते जा रहे हैं और इसी से सारी राजनीतिक लड़ाई स्वतः ही मोदी बनाम राहुल होती जा रही है।

बृजभूषण की बाहूबलिता के आगे बौनी पड़ती भाजपा

अखिल भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों द्वारा लगाये गये यौन शोषण के आरोपों का मामला जिस मोड़ पर पहुंच चुका है उस अब उस पर देश की निगाहें लग चुकी है। क्योंकि जब यौन शोषण के ऐसे ही आरोप एक समय पूर्व विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर के खिलाफ लगे थे तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके खिलाफ कारवाई करने में न संकोच किया था और न ही देरी। लेकिन अब देरी और संकोच दोनों बराबर चले हुये हैं। क्योंकि बृजभूषण छः बार के सांसद हैं बल्कि जब एक बार टाडा मामले में तिहाड़ जेल में बन्द थे तब उनकी पत्नी ने उनके स्थान पर चुनाव लड़ा था और जीत गयी थी। आज तो उनका एक बेटा भी विधायक है। लग्जरी गाड़ियों और हेलीकॉप्टर के मालिक इस बाहूबली सांसद का उत्तर प्रदेश के इलाकों में भारी राजनीतिक प्रभाव और दबदबा है जो भाजपा को उनके खिलाफ कारवाई करने से रोक रहा है। लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और राजस्थान में अब इस प्रकरण से राजनीतिक नुकसान होने का भी डर हो गया है। इस डर के परिप्रेक्ष में माना जा रहा है कि जल्द ही प्रधानमंत्री को इस पर अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ेगी।
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दो वर्ष पहले ही ऐसे आरोपों की एक शिकायत प्रधानमंत्री के पास आ चुकी थी यह स्पष्ट हो चुका है। जब प्रधानमंत्री इन आरोपों पर खामोश रहे तो खेल मंत्री से लेकर अन्य भाजपा नेताओं में यह साहस कैसे हो सकता था कि कोई भी इस पर जुबान खोलता। इन महिला पहलवानों को जन्तर मन्तर के धरना प्रदर्शन से लेकर कैसे सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाकर इस मामले में एफ आई आर दर्ज करवाने तक पहुंचना पड़ा है यह पूरे देश को स्पष्ट हो चुका है। यह एक सामान्य समझ की बात है कि एक महिला को यौन शोषण का आरोप लगाने से पूर्व किस मनोदशा से गुजरना पड़ता है। इन बेटियों को किस मानसिकता के साथ अदालत और धरने प्रदर्शन तक आना पड़ा होगा यह सोचकर ही आम आदमी सिहर उठता है। अब 28 अप्रैल को जो दो एफ.आई.आर. इस प्रकरण में दर्ज हुई है उनका विवरण पढ़कर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन यह एफ.आई.आर. दर्ज होने के बाद भी जब पूरी भाजपा इस प्रकरण पर खामोश रहे तो समझ आ जाता है कि चुनावी लाभ के लिये यह लोग कुछ भी दाव पर लगा सकते हैं। इस व्यक्ति को अभी तक पार्टी से बाहर न कर पाना शीर्ष से लेकर नीचे तक की बहुत सारी कहानी ब्यान कर देता है।
यह सही है कि अदालत एफ.आई.आर. दर्ज करने के निर्देश दे सकती हैं लेकिन किसी को गिरफ्तार करने के नहीं। परन्तु सरकारें नियमों कानूनों के साथ लोकलाज से भी चलती हैं। आज यदि अन्तर्राष्ट्रीय पदक विजेता महिला पहलवानों को भी न्याय मांगने के लिये इस तरह का संघर्ष करना पड़े तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। आज पूरे समाज का दायित्व बन जाता है कि वह इन महिला पहलवानों के साथ खड़ा होकर इनकी लड़ाई लड़े। क्योंकि यह बेटियां पूरे समाज की है। जब यह बेटियां अपने पदक मां गंगा में प्रवाहित करने जा रही थी तब इनकी हताशा और निराशा का अन्दाजा लगाया जा सकता है। इसी के साथ यह सोचने का भी अवसर है कि जो सरकार चुनावी लाभ के लिये ऐसी बेटियों की इज्जत की भी रक्षा करने और उन्हें न्याय दिलाने का साहस न दिखा पाये उसके उन आश्वासनों पर कैसे भरोसा किया जा सकता है कि वह संसद और विधानसभाओं को अपराधियों से मुक्त करवायेगी।

कर्ज़ रेवड़ी और सामाजिक सुरक्षा

क्या कर्ज लेकर सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ वर्गों को रेवड़ीयां बांटना सही है इस सवाल पर अब एक खुली बहस की आवश्यकता हो गई है। आज केन्द्र से लेकर राज्य तक हर सरकार कर्ज में डुबी हुई है। सभी राज्य सरकारें जी.डी.पी. के अनुपात में कर्ज लेने की सीमाएं लांघ चुकी हैं। सभी राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिये चुनावों से पहले रेवडीयां की एक लम्बी सूची जारी कर देती है। लेकिन यह नहीं बताती कि इन्हें पूरा करने के लिये यह आप के नाम पर कर्ज लेगी। जैसे विधानसभा चुनावों के लिये हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने मुफ्ती की सूचियां जारी की। भाजपा सत्ता में थी और अपने शासनकाल में कोई अच्छा परफॉर्म नहीं कर पायी थी। इसलिए जनता ने उसके वायदों पर विश्वास नहीं किया कांग्रेस के प्रलोभन कुछ ज्यादा बड़े और लुभावने थे इसलिए उस पर विश्वास करके सत्ता उसको सौंप दी। लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही सबसे पहले राज्य के नियन्त्रण की हर सेवा और उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ा दिये। मंत्री परिषद की करीब हर बैठक के आगे पीछे यह देखने को मिला है। लेकिन इसी के साथ जो चुनाव से पहले दस गारंटियां प्रदेश की जनता को दी थी उन पर स्टैण्ड में बदलाव आ गया। अब यह कहा जाने लगा है कि गांरटियां पांच वर्ष के कार्यकाल में पूरी की जायेंगी। 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने के लिये तो यह कह दिया है कि पहले दो हजार मेगावाट बिजली पैदा करेंगे फिर मुफ्त बिजली देंगे। निवर्तमान सरकार अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में दो हजार मेगावाट पैदा नहीं कर पायी है तो यह सरकार कितना कर पायेगी यह आने वाला समय बतायेगा। कर्मचारियों को पुरानी पैन्शन बहाल कर दी गयी है। लेकिन इस बहाली के साथ ही कर्मचारियों से बड़े पैमाने पर दिल्ली कूच करने का आहवान भी कर दिया है। क्योंकि एन.पी.एस. में 9200 करोड़ केंद्र के पास जो प्रदेश का जमा है उसे वापस लेना है। यदि किन्ही कारणों से यह पैसा वापस नहीं मिलता तो ओ.पी.एस. कैसे लागू होगा यह एक बड़ा सवाल होगा। कांग्रेस-भाजपा सरकार पर प्रदेश को कर्ज में डूबने के आरोप लगाकर सत्ता में आयी थी। सत्ता में आने पर कर्ज के आंकड़े भी जारी किये गये थे। लेकिन जब केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने सुक्खू सरकार द्वारा 44 करोड़ कर्ज प्रतिदिन लेने के आंकडे जारी किये तो कर्ज पर उठी बहस आगे नहीं बढ़ी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश को कर्ज में डुबोने के लिये दोनों सरकारें एक ही लाइन पर चल रही हैं। लेकिन सुक्खू सरकार कर्ज के साथ सेवाओं और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी लगातार बढ़ाती जा रही है और यही इस समय आम आदमी के सामने एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है। क्योंकि जब कर्ज लेकर और कीमतें बढ़ा कर भी सरकार आम आदमी को राहत न दे पाये तथा न ही गारंटियों को लागू कर पाये तो स्वभाविक रूप से सरकार की प्राथमिकताओं पर नजर जाना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि आज सरकार जिस तरह अपने अनुत्पादक खर्चों पर रोक लगाने को तैयार नहीं तब आम आदमी के सामने सरकार के कर्ज लेने की योजनाओं पर अंकुश लगाने की मांग करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। क्योंकि सामाजिक सुरक्षा तो समाज के हर व्यक्ति को एक बराबर चाहिये इसे वर्गों में नहीं बांटा जा सकता।

सत्ता के नौ वर्षों पर कुछ सवाल

केन्द्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व भाजपा सत्ता के नौ वर्ष पूरे करने जा रही है। इस अवसर पर देश भर में संपर्क से समर्थन के नाम पर कई आयोजन किये जा रहे हैं। इन आयोजनों में नौ वर्षों की उपलब्धियां जनता के सामने रखी जायेंगी। इन नौ वर्षों में पार्टी ने जो चुनावी सफलतायें हासिल की है उनके आधार पर यह जनधारणा बनाने का प्रयास किया गया कि ‘‘मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है’’ इसी धारणा के कारण मोदी ने नौ वर्षों में केवल अपने ही मन की बात देश को सुनाई। कभी कोई खुली पत्रकार वार्ता तक आयोजित नहीं की। मोदी के किसी भी फैसले पर पार्टी के भीतर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया। यहां तक की करोना जैसी महामारी को भगाने के लिये मोदी के आदेश पर ताली थाली बजाने और दीपक जलाने पर अमल किया गया। इन नौ वर्षों में देश में एक ही राजनीतिक दल की सत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से सहयोगी दलों तक में विभाजन की स्थितियां पैदा कर दी गयी। कांग्रेस मुक्त भारत तो राजनीतिक एजैण्डा बन गया। राजनितिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्रीय जांच एजैन्सियों का खुलकर इस्तेमाल किया गया। विरोध और मतभेद के स्वरों को देशद्रोह करार दे दिया गया। लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस्तित्व प्रश्नित हो उठा। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर संकट के बादल मंडराने लगे। पूर्व केन्द्रीय कानून मन्त्री किरण रिज्जू के ब्यान इसके गवाह है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा शुरू की तो उसे रोकने और असफल बनाने के परोक्ष/अपरोक्ष प्रयास किये गये। यह सब देश देख चुका है। एक मानहानि मामले में किस तेजी के साथ राहुल की सांसदी और आवास छीने गये यह किसी से छुपा नहीं है। इन नौ वर्षों में हिंन्दू-मुस्लिम एजैण्डे को लागू करने के लिये किस तरह अपरोक्ष में उच्च न्यायपालिका का भी प्रयोग हुआ यह मेघालय उच्च न्यायालय के जस्टिस सेन के फैसले से सामने आ जाता है। नोटबन्दी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था को कितना आघात पहुंचा है उसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि बाद में ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों को विशेष आर्थिक पैकेज देने पडे। नोटबन्दी की सफलता का प्रमाण इसी से मिल जाता है कि सात वर्ष बाद ही दो हजार के नोट को चलन से बाहर करना पड़ा है। आज जब भाजपा नौ वर्षों की उपलब्धियां लेकर जनता में जायेगी तो क्या इस नोटबन्दी के लाभों पर कुछ कह पायेगी। क्योंकि जब 2016 में नोटबन्दी की गयी थी तब देश में 17 लाख करोड की करंसी चलन में थी जो 2022 में करीब 34 लाख करोड़ पहुंच गयी। करंसी का इतना फैलाव क्या प्रमाणित करता है। आज जो दो हजार का नोट चलन से बाहर किया जा रहा है इसके मुद्रण पर ही 21,000 करोड का खर्च हुआ है। उसकी भरपाई कहां से होगी यह सवाल जवाब मांगेगा। आज 2014ं के मुकाबले मंहगाई कहां पहुंची है। यह हर उपभोक्ता व्यवहारिक रूप से भोग रहा है। बेरोजगारों सारे दावों के बावजूद कहां खड़ी है इसका जवाब हर बेरोजगार युवा मांग रहा है। क्योंकि जब किसी देश की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तब महंगाई और बेरोजगारी से आम आदमी त्राही-त्राही नहीं करता है। कर्नाटक के चुनाव ने प्रमाणित कर दिया है की महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त गरीब का आंकड़ा सबसे बड़ा है। यह गरीब स्वयं इस सब का भुक्त भोगी है और सताएं बदलने का कारक बनता है।

कर्नाटक परिणाम के अर्थ

कर्नाटक में कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की है। देश इस समय जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों से गुजर रहा है उनमें इस जीत का अर्थ और महत्व दोनों बड़े हो जाते हैं। क्योंकि इस समय लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस्तित्व खतरे में है यह पूरा विपक्ष अपने-अपने तौर पर कह चुका है। केंद्र सरकार किस तरह जांच एजैन्सीयों का दुरुपयोग कर रही है इसका खुलासा चौदह दलों द्वारा इस आश्य की एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने से हो जाता है। भले ही इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया लेकिन जब शीर्ष अदालत ने सीबीआई निदेशक को सरकार द्वारा तीसरी बार सेवा विस्तार देने पर सवाल उठाये तो स्वतः ही इन चौदह दलों की आपत्ति को स्वीकार्यतः मिल गयी। फिर इसी दौरान अदानी प्रकरण पर संसद में उठा गतिरोध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संद्धर्भ में जांच बैठाना तथा सैबी को जांच के लिये अतिरिक्त छः माह का समय देने के आग्रह को अस्वीकार करना राहुल गांधी के मानहानि मामले में हुयी कारवाई पर उठते सवाल इसी के साथ हिन्डन वर्ग रिपोर्ट पर शरद पवार का ब्यान और अदानी का शरद पवार से मिलना तथा गुलाम नबी आजाद का राहुल के खिलाफ मुखर होना यह सब कर्नाटक चुनाव से पूर्व घटना इस चुनाव को एक अलग ही जमीन पर लाकर खड़ा कर देता है।
इस परिदृश्य में हुये कर्नाटक चुनावों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा तथा संघ परिवार के लिये इन चुनावों का अर्थ क्या था। यह चुनाव एक तरह से राहुल बनाम मोदी बन गये थे। क्योंकि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद यह दूसरा चुनाव था। कर्नाटक से पहले हुये हिमाचल के चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा प्रचार में आये थे और असफल रहे। हिमाचल से मिली हार कर्नाटक में भी जारी रही। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि यह हार प्रधानमंत्री मोदी और संघ भाजपा के उस एजैण्डे की है जिसमें कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य रखा गया था। कर्नाटक की हार ने भाजपा के हिन्दू एजैण्डा की भी हवा निकाल दी है। हनुमान चालीसा का पाठ चुनाव प्रचार में इस एजैण्डे की पराकाष्ठा था। इस हार ने 2014 से 2023 तक भाजपा के हर फैसले और घोषणा को आकलन के लिये एक जन चर्चा का विषय बना दिया है। जिसके व्यवहारिक परिणाम अब हर दिन देखने को मिलेंगे। क्योंकि इससे महंगाई और बेरोजगारी पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है।
इसी परिदृश्य में इस जीत ने कांग्रेस की जिम्मेदारियां भी बढ़ा दी हैं। क्योंकि लोकसभा चुनावों तक हिमाचल और कर्नाटक सरकारों की परफॉरमैन्स कांग्रेस के आकलन का आधार बन जायेगी। हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बने पांच महीने से ज्यादा का समय हो गया है। सरकार बदलने का व्यवहारिक संदेश अभी तक जनता में नहीं जा पाया है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि यदि आज हिमाचल में भी किसी भी कारण से पुनः चुनावों की स्थिति पैदा हो जाये तो कांग्रेस के लिये स्थितियां कोई ज्यादा सुखद नहीं होंगी। जो चल रहा है यदि उसमें सुधार न हुआ तो चारों सीटों में जीत मिलना आसान नहीं होगा। यह कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की जिम्मेदारी होगी कि वह सरकार पर सरकारी रिपोर्टों से हटकर भी नजर रखने का प्रयास करे। कर्नाटक की हार के बाद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व ऑपरेशन कमल को बदले हुए कलेवर में अमली शक्ल देने का प्रयास करेगी यह तय है।

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