Thursday, 05 February 2026
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आपदा राहत पैकेज पर भी राजनीति क्यों?

प्रदेश में आयी आपदा से आकलनों के अनुसार बारह हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। आपदा में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना और फिर उनके रहने खाने का प्रबन्ध करना पहली प्राथमिकता थी। राज्य सरकार इस प्राथमिकता पर खरी उतरी है और उसके प्रयासों तथा प्रबंधनो की सभी ने प्रशंसा भी की है। इस आपदा में जनता और कई राज्य सरकारों ने सहायता का हाथ भी बढ़ाया है जिसके फलस्वरुप 254 करोड़ आपदा राहत कोष में आये हैं। इस आपदा में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खु ने अपने परिवार की ओर से 51 लाख राहत कोष में देकर जो अपनी संवेदनशीलता का व्यवहारिक परिचय दिया है उसके लिये वह सदैव याद रखे जायेंगे। लेकिन इस अवसर पर केंद्र सरकार की ओर से वायदों से ज्यादा कुछ नहीं मिल पाया है और यह सदन के रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुका है। क्योंकि एन डी आर एफ और एस डी आर एफ में जो कुछ मिला है वह पहले का ही देय था। यहां तक कि जब सदन में इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था तो भाजपा इसमें भी सक्रिय भागीदार नहीं बन पायी।
इस परिदृश्य में आपदा में फंसे लोगों को राहत प्रदान करना यह राज्य सरकार की प्राथमिकता थी। इस प्राथमिकता को राज्य के संसाधनों से पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसके लिये सरकार ने विभागों के बजट में कटौती करके 4500 करोड़ का राहत पैकेज घोषित किया है। जिसमें 3500 करोड़ अपने साधनों और 1000 करोड़ मनरेगा से देने की घोषणा की है। सरकार के इन प्रयासों और पहल का स्वागत करने के बजाये एक भाजपा प्रवक्ता द्वारा यह कहना की शीघ्र ही केंद्र की ओर से प्रदेश को एक बड़ा राहत पैकेज में मिलने वाला है। कांग्रेस ने केंद्र से मिलने वाले इस पैकेज की आहट पाते ही चतुराई से पहले ही अपने पैकेज की घोषणा कर दी है। ताकि केंद्र से मिलने वाले पैकेज को प्रदेश सरकार के राहत पैकेज के नाम पर खर्चा जा सके। ऐसे समय में प्रदेश भाजपा की ऐसी प्रतिक्रिया का स्वागत नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसी प्रतिक्रिया केंद्र का पैकेज आने के बाद उसके खर्च किये जाने के तरीके पर उठनी चाहिये थी यदि उसमें कोई विसंगति होती तो।
इस तरह राहत पैकेज पर जो राजनीति अनचाहे ही खड़ी हो गयी है उसके परिप्रेक्ष्य में यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह आपदा कितनी प्राकृतिक थी और कितनी व्यवस्था की लचरता के कारण थी। इस पर एक खुली बहस हो जानी चाहिये। क्योंकि यह आशंका बहुत प्रबल होती जा रही है कि यह विनाश लीला लम्बी जायेगी। ऐसे में जो विशेषज्ञों की राय एन.जी.टी. के 2016 के फैसले में महत्वपूर्ण रही है उस पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार किया जाना चाहिये। एन.जी.टी. के फैसले के बाद भी हजारों अवैध निर्माण हुए हैं। एन.जी.टी. के निर्देशों पर बनायी गयी शिमला प्लान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। एन.जी.टी. नेे कुछ कार्यालयों को किसी भी दूसरे स्थान पर ले जाने का निर्देश दिया हुआ है क्योंकि शिमला की भार वहन क्षमता ओवर हो चुकी है। बल्कि इस आपदा के बाद पहाड़ी क्षेत्रों की भारवहन क्षमता का अध्ययन करने के निर्देश केंद्र दे चुका है। 2016 में राज्य सरकारे पूरे प्रदेश को प्लानिंग के तहत लाने की बात कर चुकी है। परन्तु यह सब होने के बावजूद यह सरकार भी कार्यालयों को शिमला से शिफ्ट करने के लिये तैयार नहीं है। इसलिये इस आपदा से सबक लेते हुए भविष्य के इन प्रश्नों पर राहत एवं पुनर्वास के साथ ही विचार कर लेना लाभदायक रहेगा। क्योंकि राहत भी आम आदमी का ही पैसा है जिसे गलत नीतियों की भेंट चढ़ाना सही नहीं होगा।

 

संविधान की प्रस्तावना से गायब हुए धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद

संसद का विशेष सत्र पुराने भवन में शुरू हुआ और दूसरे ही दिन नये भवन में चला गया। नये भवन में जब सांसदों ने प्रवेश किया तो उन्हें देश के संविधान की एक-एक प्रति दी गयी। संविधान की प्रति को जब खोल कर देखा गया तो उसकी प्रस्तावना से धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद शब्द गायब मिले। कुछ सांसदों ने जब इस ओर इंगित किया तो जवाब मिला कि बाबा साहेब अम्बेडकर के मूल प्रतिवेदन में जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था उसमें इन शब्दों का उल्लेख नहीं है। यह शब्द आपातकाल के दौरान 1976 में लाये गये 42वें संविधान संशोधन से इसमें जोड़ गये हैं। नये संसद भवन में प्रवेश से पहले जो जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था उसमें राष्ट्रपति की ओर से आयोजित राजकीय भोज के जो आमंत्रण पत्र सामने आये थे तो उनमें भी इण्डिया के राष्ट्रपति की जगह भारत का राष्ट्रपति लिखा हुआ था। शब्दों के इस चयन से इण्डिया बनाम भारत का विवाद अनचाहे ही खड़ा हो गया। इसी दौरान सनातन धर्म को लेकर आयी टिप्पणियों पर प्रधानमंत्री ने जिस तर्ज पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और अपने सहयोगी मंत्रियों को इसका कड़ा विरोध करने के निर्देश दिये हैं उससे भी कुछ अलग ही संकेत उभरते हैं।
इसी परिदृश्य में हुए संसद के विशेष सत्र को लेकर जो जो क्यास लगाये जा रहे थे उन सबसे हटकर अन्त में महिला आरक्षण विधेयक सामने आया है। इसमें महिलाओं को संसद और राज्यों की विधानसभाओं में 33% स्थान आरक्षित रखने की सिफारिश की गयी है। संसद के दोनों सदनों में यह विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया है। किसी भी दल ने इसका विरोध नहीं किया है। बल्कि इसमें अन्य पिछड़े वर्गों और मुस्लिम महिलाओं को भी इस संशोधन का लाभार्थी बनाने की मांग की है। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने और ओ.बी.सी. समाज की बदनामी के मुद्दे पर राहुल गांधी की सांसदी छीनने वाली सरकार इन वर्गों की महिलाओं को इस आरक्षण के दायरे में क्यों नहीं ला पायी यह सवाल अपने में गंभीर हो जाता है। यह महिला आरक्षण आने वाले लोकसभा चुनाव में लागू नहीं होगा क्योंकि इससे पहले जन गणना और फिर परिसीमन आयोग बैठेंगे। ऐसे में यह सवाल भी प्रमुख हो जाता है की जो प्रावधान अभी लागू ही नही होना है उसे विशेष सत्र बुलाकर पारित करने का औचित्य क्या है? फिर इस में ओ.बी.सी. और मुस्लिम समाज को लेकर जो सवाल खड़े हो गये हैं उनका निराकरण किया जाना भी आवश्यक होगा जो आने वाले समय का बड़ा सवाल होगा।
इस परिप्रेक्ष में यदि इस सब को इकट्ठा मिलाकर देखें तो साफ दिखाई देता है कि आने वाले चुनावों में नये मुद्दे उछालने के लिये ही इण्डिया बनाम भारत और सनातन की रक्षा करने जैसे विषय खड़े करने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। क्योंकि इण्डिया से भारत करने और संविधान से धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद हटाने के लिये संविधान संशोधनों का मार्ग अपनाने की जगह जो यह भावनात्मक कार्ड उभारने का प्रयास किया गया है इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे। इस आशंका की पुष्टि केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के उस वीडियो से हो जाती है जिसमें वह यह कह रही हैं कि आने वाला चुनाव धर्म और अधर्म के बीच होगा। इसी विशेष सत्र में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने बसपा सांसद दानिश अली के लिये सदन के पटल पर जिस भाषा और तर्ज का इस्तेमाल किया है उसके मायने भी कुछ स्मृति ईरानी के वक्तव्य की ही पुष्टि करते हैं।

गठबंधन के साथ कांग्रेस को अपने राज्यों पर भी नजर रखनी होगी

संसद के विशेष सत्र में क्या घटता है इस पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में एक देश एक चुनाव के लिये गठित कमेटी से चुनावो को लेकर क्यास लगने शुरू हो गये हैं। इन्हीं क्यासों के बीच जी-20 के शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर इण्डिया बनाम भारत का मुद्दा आ गया। इसी मुद्दे के बीच सनातन का मुद्दा आ गया। सनातन को लेकर तमिलनाडु के दो नेताओं के ब्यान से यह मुद्दा उभरा और इसमें सीधे प्रधानमंत्री शामिल हो गये। प्रधानमंत्री ने सनातन पर उठते सवालों का पूरी कड़ाई के साथ जवाब देने का आह्वान किया है। अभी संघ की हुई शीर्ष बैठक में देश का नाम भारत करने की वकालत की है। सनातन पर जो ब्यान उदय निधि स्टालिन और ए राजा के आये हैं उन बयानों से कांग्रेस ने किनारा कर लिया है। शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति द्वारा दिये गये राजकीय भोज का निमंत्रण राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को न दिए जाने पर कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्रीयों का न जाना और केवल एक हिमाचल के मुख्यमंत्री का जाना कांग्रेस के अन्दर की राजनीति पर सवाल उठता है परन्तु इण्डिया के घटक दलों में से कुछ का इसमें शामिल होना और कुछ का गैर हाजिर रहना गठबन्धन के अन्दर की राजनीति पर सवाल उठाता है। इसी बीच इण्डिया गठबन्घन की मुंबई बैठक में राहुल गांधी के पत्रकार सम्मेलन में एनडीटीवी चैनल के ब्यूरो प्रमुख का आने से पहले ही चैनल से त्यागपत्र देना और उसके कारणों के बाहर आने इण्डिया गठबन्धन का नफरती एंकरों के बहिष्कार का फैसला आना अपने में एक महत्वपूर्ण घटना है।
पिछले कुछ ही दिनों में जो यह सब कुछ घटा है यदि उस सबको एक साथ मिलाकर देखा और समझा जाये तो एक बड़ी तस्वीर ऊभर कर सामने आती है। इण्डिया बनाम भारत के मुद्दे पर संघ की टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है कि इस विशेष सत्र में इण्डिया का नाम बदलकर भारत करने का प्रयास अवश्य किया जायेगा। इस नाम बदलने के साथ ही कुछ और भी बदलने का प्रयास किया जा सकता है। यह और क्या होगा इसका अनुमान लगाना आसान नहीं होगा। इस बदलाव पर जो प्रतिक्रियाएं उभरेगी उन्हें सनातन धर्म का विरोध करार देकर विपक्षी गठबंधन में शामिल हर दल को अपना अपना स्टैण्ड लेने के लिये बाध्य किया जायेगा। इस तरह एक ऐसी बहस का वातावरण खड़ा करने का प्रयास किया जायेगा जिसमें अन्य मुद्दे गौण होकर रह जायेंगे। विपक्षी एकता राज्यों और लोकसभा के चुनावों के मुद्दे पर ही अपनी अपनी हिस्सेदारी के नाम पर बांटने के कगार पर आ जायेगी। क्योंकि कुछ दलों की महत्वाकांक्षा अपने-अपने विस्तार के लिये कांग्रेस को अपने राह की सबसे बड़ी रुकावट मानेंगे। क्योंकि सतारूढ़ भाजपा दलों के इस द्वन्द्व को अवश्य उभारेगी ताकि विपक्षी एकता की गंभीरता को लेकर जनता में सवाल खड़े किये जा सके। सनातन पर आयी कुछ नेताओं की टिप्पणियां इसी परिप्रेक्ष में देखी जा रही है।
दूसरी और आज मोदी सरकार के खिलाफ देश की आर्थिकी को लेकर जितने सवाल हैं यदि वह सारे सवाल पूरी गंभीरता और तथ्यों के साथ देश की जनता के सामने एक साथ लाकर खड़े कर दिये जायें तो इस सरकार के पास कोई आधार ही नहीं बचता है। परन्तु इस समय ऐसे कोई सवाल योजनाबद्ध तरीके से उठाये नहीं जा रहे हैं। इण्डिया गठबन्धन में कांग्रेस सबसे बड़ा दल है। गठबन्धन के प्रति अपनी गंभीरता और प्रतिबद्धता दिखाते हुए राहुल गांधी ने अपने को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होने से लेकर इण्डिया की हर कमेटी से अपने को बाहर रखा है ताकि गठबन्धन की किसी भी असफलता का कारण उन्हें न बना दिया जाये। राहुल का यह फैसला एक बहुत ही सुलझे हुये नेता का फैसला है। लेकिन इसी के साथ कांग्रेस को अपनी राज्य सरकारों पर नजर रखनी होगी। क्योंकि यदि कांग्रेस को अपने ही राज्यों से लोकसभा में सारी सीटें न मिली तो इसका सीधा असर भी राहुल और प्रियंका के नेतृत्व पर ही पड़ेगा। क्योंकि इस समय हाईकमान इन्हें ही माना जा रहा है। हिमाचल को लेकर कांग्रेस के अपने सर्वे में ही यह आ चुका है कि यहां की चारों सीटों पर कांग्रेस कमजोर है। इस कमजोरी की जिम्मेदारी हाईकमान के नाम लगेगी क्योंकि कार्यकर्ताओं की नजर अन्दाजी और नाराजगी वहां तक पहुंचा दी गयी है।

क्या सनातन और भारत पर उठा विवाद हिन्दु राष्ट्र का संकेत है

संसद के विशेष सत्र में क्या होने जा रहा है इस पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई है। क्योंकि इस सत्र का एजेंडा अभी तक देश और विपक्ष के सामने नहीं रखा गया है। इस सत्र में प्रश्न काल नहीं होगा। इससे रहस्य और भी गहरा जाता है। क्योंकि विपक्ष को भी यह बताया गया है की समय आने पर कार्य सूची जारी कर दी जाएगी। ऐसे में अटकलें का दौर बढ़ जाता है। इसलिए पिछले कुछ समय में जो कुछ घटा है उस पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। संसद के पिछले सत्र में सरकार ने जन विश्वास विधेयक पारित किया है। इसमें 42 अधिनियमों की 183 धाराओं को जेल की सजा के प्रावधान से बाहर कर दिया गया है इनमें अब जुर्माने का ही प्रावधान रह गया है। इनमें ई.डी, वन, पर्यावरण, बैंकिंग कर्ज, देशद्रोह आदि उन्नीस मंत्रालयों में संशोधन किया गया है। यह संशोधन जीवन यापन और व्यवसाय को सुगम बनाने के लिये किये गये हैं। समरणीय है कि पिछले नौ वर्षों में सरकार जिन कानून के सहारे विरोधियों को घेरती आयी है सरकारें तक गिरायी गयी उनमें अब यह संशोधन इस कार्यकाल के अन्त में क्यों किये गये?
अभी जब विपक्षी दलों ने इक्ठे होकर इंडिया नाम से एक गठबंधन खड़ा कर लिया और इसमें शामिल हर दल और नेता विपक्षी एकता के लिये कोई भी त्याग करने को तैयार हो गया तो इस गठबंधन की गंभीरता स्वतः ही स्पष्ट हो गयी। यह गठबंधन सामने आने के बाद जी-20 सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्षों के नाम राष्ट्रपति की ओर से जो निमंत्रण पत्र भोज के लिए गया उस पर प्रैजीडैण्ट ऑफ इंडिया की जगह प्रैजीडेण्ट ऑफ भारत लिखा गया। अन्य भी सारी संवद्ध सामग्री पर इंडिया के स्थान पर भारत लिखा गया। इस लिखने से इंडिया और भारत पर विवाद छिड़ गया। भारत लिखने की वकालत शुरू हो गयी। यह वकालत शुरू करने वाले यह भूल गये कि जब स्व.मुलायम सिंह यादव इस आश्य का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश विधानसभा में लाये थे तब भाजपा ने ही इसका विरोध किया था। यही नहीं 2016 में सर्वाेच्च न्यायालय में आयी इस आश्य की याचिका का यह कह कर केंद्र सरकार विरोध कर चुकी है कि अभी ऐसे हालात नहीं पैदा हुये हैं की इण्डिया का नाम भारत कर दिया जाये। इस आश्य का संविधान संशोधन करने की अभी आवश्यकता नहीं है। ऐसे में अब ऐसा क्या हुआ है कि यही सरकार इण्डिया की जगह भारत लिखने पर आ गयी है। स्वभाविक है कि इस आश्य का संविधान संशोधन भी कर दिया जायेगा
जब इण्डिया बनाम भारत का विवाद शुरू हुआ तभी तमिलनाडु के मंत्री उदय निधि का सनातन को लेकर ब्यान आ गया। यह ब्यान किस संद्धर्भ में आया इसकी चर्चा किये बिना ही इसे सनातन धर्म पर हमला करार दे दिया गया। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिये हैं कि वह इस ब्यान का कड़ा विरोध करें। प्रधानमंत्री के इस निर्देश के बाद यह वाक्युद्ध और तेज हो गया है। संभव है कि जी-20 के सम्मेलन के बाद इस विवाद का उग्र रूप भी देखने को मिले। इसी विवाद के बीच एक देश एक चुनाव को लेकर भी पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर दी गयी है और यह चर्चा चल पड़ी है कि शायद चुनाव ही हो जायें। भारत नाम बदला जाये य सारे चुनाव एक साथ करवाये जायें दोनों ही स्थितियों में संविधान में संशोधन करना ही पड़ेगा। एक देश एक चुनाव की संभावनाएं बहुत कम है। क्योंकि जिस तरह से देश में तोड़फोड़ करके सरकारें गिरने की संस्कृति चल निकली है उसके चलते एक चुनाव की व्यवहारिकता बहुत कम रह जाती है। क्योंकि कल यदि कोई सरकार कार्यकाल पूरा किये बिना ही किसी कारण से गिर जाती है तब चुनाव कैसे होगा यह बड़ा सवाल होगा। ऐसे में यही संभावना रह जाती है कि इस विशेष सत्र में हिंदू राष्ट्र की ओर कोई कदम उठाया जाये। क्योंकि .आर.एस.एस. को लेकर एक मामला अदालत में चल ही रहा है और उसके परिणाम भी गंभीर हो सकते हैं। सनातन और भारत पर उठा विवाद इस ओर ज्यादा संकेत कर रहा है।

संसद का विशेष सत्र क्यों

मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर पूरे देश को अटकलों के भंवर में लाकर खड़ा कर दिया है। क्योंकि विशेष सत्र का अर्थ ही यह है कि सरकार कुछ ऐसा विशेष करने जा रही है जिसके लिए नियमित सत्र का इंतजार नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह अटकलें लगना स्वभाविक है कि यह विशेष क्या हो सकता है। लोकसभा का आम चुनाव सामान्य स्थितियों में मई 2024 में होना है। ऐसे में यह देखना और समझना आवश्यक हो जाता है कि मोदी सरकार ने ऐसा कौन सा वायदा परोक्ष/अपरोक्ष में देश के साथ कर रखा है जिसे पूरा करने के लिए विशेष सत्र आहूत करना आवश्यक हो गया है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा मई 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई थी और 2019 के चुनावों में पहले से भी ज्यादा बहुमत हासिल किया यह एक हकीकत है। लेकिन 2014 में भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस लोकपाल की स्थापना के मुद्दे पर सत्ता परिवर्तन हुआ था उसका व्यवहारिक सच यह है कि जिन नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे वह अब भाजपा में जाकर बिना किसी जांच के पाक साफ हो गये हैं। इसलिये भ्रष्टाचार से जुड़ा कोई मुद्दा विशेष सत्र का विषय नहीं हो सकता भले ही 183 अपराधों को जेल की सजा के दायरे से बाहर कर दिया हो।
मोदी सरकार ने जान विश्वास विधायक पारित करके व्यवसाय और जीवन ज्ञापन को सुगम बनाने का प्रयास करने का दावा किया है। क्योंकि मोदी मूल सूत्र मेक इन इंडिया है। इस सूत्र के तहत विदेश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यहां बुलाकर देश के संसाधन उन्हें उपलब्ध करवाकर देश के निर्माण करने के लिए आमंत्रित किया है। इस व्यवसायिक सुगमता के लिये ही यहां के हर संसाधन की प्राइवेट सैक्टर को उपलब्धतता सुनिश्चित करने के लिये बड़े पैमाने पर निजीकरण को बढ़ावा दिया गया है। इससे यह बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे ही संसाधनों से लाभ कमा कर अपने देश में ले जा रहे हैं। क्योंकि सरकार मेड इन इंडिया की बजाये मेक इन इंडिया को सूत्र बनाकर चल रही है। इसलिये इस संद्धर्भ में भी कुछ अप्रत्याशित लाने के लिये यह विशेष सत्र नहीं हो रहा है यह तय है।
मोदी सरकार हर चुनाव में अपना एजेंडा बदलती रही है यह अब तक का रिकॉर्ड रहा है। हर चुनाव नये नारे पर ही लड़ा गया है। इसलिये इस चुनाव के लिये भी कुछ नया लाने का प्रयास रहेगा यह तय है। मोदी सरकार ने विधानसभा से लेकर संसद तक को अपराधियों से मुक्त करवाने और एक देश एक चुनाव की बात भी संसद के संयुक्त सत्र में की थी। इसलिये इस विशेष सत्र में इस आश्य का संशोधन लाये जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। क्योंकि पिछले दोनों चुनावों में विपक्ष बिखरा हुआ था जो कि अब इकट्ठा होता जा रहा है। जिस राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित करने के लिये लाखों का निवेश किया गया था वह राहुल गांधी भारत छोड़ो यात्रा के बाद मोदी से बहुत आगे निकल चुका है। लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि भाजपा संघ परिवार की एक राजनीतिक इकाई है। संघ का मूल सूत्र हिन्दु राष्ट्र की स्थापना है। संघ की सारी ईकाईयां इस दिशा में प्रयासरत रही हैं। इस समय संसद में जो बहुमत मोदी भाजपा को हासिल है इतना बड़ा बहुमत पुनः मिल पाना संभव नहीं है। हिन्दु राष्ट्र को लेकर देश की राजनीतिक प्रतिक्रिया क्या रहेगी इसके लिये दो स्तरों पर प्रयास हुये हैं। मेघालय उच्च न्यायालय के जस्टीस सेन का हिन्दु राष्ट्र को लेकर दिया गया फैसला पहला प्रयास था। भले ही मेघालय उच्च न्यायालय की बड़ी पीठ ने एकल पीठ के फैसले को बाद में पलट दिया है लेकिन यह पलटना तब हुआ जब इस पर सर्वाेच्च न्यायालय में एक याचिका आ गयी। यह फैसला राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक सब स्तरों पर सर्व हो चुकने के बाद पलटा गया है। परन्तु इस पर केंद्र सरकार और संघ की कोई प्रतिक्रिया तक नहीं आयी है। जबकि संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने के नाम से भारत का नया संविधान तक वायरल हो चुका है और इस पर भी संघ और सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। मोदी सरकार आर्थिक क्षेत्र में बुरी तरह असफल रही है। महंगाई और बेरोजगारी ने हर आदमी की कमर तोड़कर रख दी है। इनके अनुपात में आम आदमी की आय नहीं बढ़ी है। बेरोजगार और गरीब के लिये चन्द्रयान की उपलब्धि अपनी महंगाई और बेरोजगारी के बाद आती है। इसलिये संभव है कि सरकार संघ के दबाव में हिन्दु राष्ट्र को लेकर इस विशेष सत्र में फैसला ले लें।

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