हिमाचल में 51 शहरी निकायों के चुनाव का ऐलान 17 मई को मतदान
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Created on Thursday, 30 April 2026 18:47
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। राज्य निर्वाचन आयोग हिमाचल प्रदेश ने प्रदेश के 51 शहरी निकायों में चुनाव कार्यक्रम जारी कर दिया है। यह चुनाव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243ZA के तहत कराये जा रहे हैं, जिसके अनुसार शहरी निकायों के चुनाव करवाने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग के पास होती है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन निकायों का आरक्षण रोस्टर सरकार से प्राप्त हो चुका है, उनमें चुनाव प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
इस चुनाव में कुल 51 शहरी निकाय शामिल हैं, जिनमें 4 नगर निगम, 25 नगर परिषद और 22 नगर पंचायत हैं। इन सभी निकायों में कुल 449 पदों पर चुनाव होंगे। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। कुल 195 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखी गई हैं, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी और मजबूत होने की उम्मीद है।
आयोग ने बताया कि मतदाता सूची को पूरी तरह अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। 1 अक्तूबर 2025 को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी, जिसे 13 नवंबर 2025 को अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद 1 अप्रैल 2026 को विशेष पुनरीक्षण किया गया, ताकि अधिक से अधिक पात्र लोगों को मतदान का अधिकार मिल सके।
इन 51 शहरी निकायों में कुल 3,80,859 मतदाता पंजीकृत हैं। इनमें 1,80,963 पुरुष, 1,79,882 महिलाएं और 14 अन्य मतदाता शामिल हैं। खास बात यह है कि 1,808 युवा मतदाता इस बार पहली बार वोट डालेंगे। आयोग ने इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।
मतदान को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए कुल 589 मतदान केंद्र बनाए जाएंगे। जिन केंद्रों पर मतदाताओं की संख्या अधिक होगी, वहां सहायक मतदान केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि जहां संभव हो, महिलाओं के लिए अलग मतदान केंद्र बनाए जाएं और वहां महिला स्टाफ व सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जाए।
मतदाताओं की सुविधा के लिए आयोग द्वारा SMS के माध्यम से मतदान से जुड़ी जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा ‘वोटर सारथी’ ऐप के जरिए मतदाता अपना नाम और मतदान केंद्र की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। आयोग ने कहा कि केवल उन्हीं मतदाताओं को SMS सूचना मिलेगी, जिन्होंने अपना मोबाइल नंबर पंजीकृत कराया है।
मतदान के दिन मतदाताओं को पहचान के लिए फोटो पहचान पत्र के साथ कोई अन्य वैध दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बैंक पासबुक या राशन कार्ड साथ लाना होगा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज होना ही मतदान के लिए जरूरी है।
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। नगर निगम के उम्मीदवार अधिकतम 1 लाख रुपये, नगर परिषद के उम्मीदवार 75 हजार रुपये और नगर पंचायत के उम्मीदवार 50 हजार रुपये तक चुनाव खर्च कर सकेंगे। सभी उम्मीदवारों को चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर अपने खर्च का पूरा विवरण जमा करना होगा। इसके लिए आयोग ने candidate expenditure reporting system (CERS)नामक ऑनलाइन प्रणाली भी उपलब्ध कराई है।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही सभी निकायों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गयी है। आयोग ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित न करें। साथ ही सरकारी संसाधनों का चुनाव प्रचार में उपयोग करने पर भी रोक लगाई गई है।
शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कानून-व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। आयोग ने पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध किए जायें। मतदान और मतगणना से 48 घंटे पहले शराब की बिक्री और वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।
इसके अलावा, मतदान के दिन सभी सरकारी और निजी संस्थानों में सवैतनिक अवकाश घोषित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग मतदान में भाग ले सकें।
निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार अधिसूचना 21 अप्रैल 2026 को जारी की गई है। नामांकन पत्र 29 और 30 अप्रैल को दाखिल किए जाएंगे। 2 मई को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 4 मई को नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके बाद चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। मतदान 17 मई 2026 को सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक होगा।
नगर पंचायत और नगर परिषद के चुनावों की मतगणना मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद संबंधित मुख्यालयों में की जाएगी। वहीं नगर निगमों के लिए मतगणना 31 मई 2026 को सुबह 9 बजे से शुरू होगी। आयोग ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे बिना किसी डर या दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग करें और किसी भी प्रकार के प्रलोभन से दूर रहें। साथ ही सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रदेश में होने जा रहे ये शहरी निकाय चुनाव स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। आयोग को उम्मीद है कि सभी के सहयोग से यह चुनाव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और सफलतापूर्वक संपन्न होंगे।
चेस्टर हिल्स: दो रेरा सर्टिफिकेट, एक प्रोजेक्ट और सवालों का जाल
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Created on Thursday, 23 April 2026 12:11
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित “चेस्टर हिल्स” प्रोजेक्ट इन दिनों केवल रियल एस्टेट निवेश का विषय नहीं रहा, बल्कि यह नियामक व्यवस्था, पारदर्शिता और कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गया है। इस पूरे विवाद की जड़ में हैं हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए दो अलग-अलग रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र एक 02 मार्च 2023 से 02 मार्च 2043 तक और दूसरा 17 अक्तूबर 2023 से 17 अक्तूबर 2028 तक। पहला प्रमाणपत्र (Sr. No. 001047) “CHESTER HILLS-2” के नाम से जारी किया गया, जिसमें 20 वर्षों की असामान्य रूप से लंबी वैधता दी गई। दूसरा प्रमाणपत्र (Sr. No. 001077) “CHESTER HILLS PH-4” के नाम से केवल 5 वर्षों के लिए जारी हुआ। दोनों में प्रमोटर और भूमि स्वामी के रूप में M/S Chester Hills और श्री हंसराज ठाकुर का ही नाम है, और प्रोजेक्ट लोकेशन भी ठाकुर निवास, बाईपास रोड, सोलन है।
यहीं से कहानी उलझने लगती है। रेरा अधिनियम, 2016 के तहत किसी भी प्रोजेक्ट को रजिस्ट्रेशन देने से पहले प्राधिकरण को जमीन के स्वामित्व, कानूनी स्थिति, नक्शा स्वीकृति, वित्तीय स्रोत और अन्य सभी आवश्यक अनुमतियों की गहन जांच करनी होती है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब एक ही डेवलपर, एक ही लोकेशन और लगभग समान प्रकृति के प्रोजेक्ट के लिए दो अलग-अलग अवधि और नामों से सर्टिफिकेट जारी किए गए, तो क्या दोनों बार समान स्तर की जांच हुई?
पहले सर्टिफिकेट में 20 साल की अवधि अपने आप में असामान्य है। आमतौर पर रेरा प्रोजेक्ट की अनुमानित निर्माण अवधि के आधार पर 3 से 7 वर्षों तक का समय देता है। ऐसे में 20 वर्षों का रजिस्ट्रेशन यह संकेत देता है कि या तो प्रोजेक्ट को बहुत बड़े मास्टर प्लान के रूप में देखा गया, या फिर नियमों की व्याख्या में ढील बरती गई।
दूसरी ओर, उसी वर्ष अक्तूबर में जारी 5 साल का सर्टिफिकेट यह दर्शाता है कि प्रोजेक्ट को एक नए चरण (Phase-4) के रूप में पेश किया गया। लेकिन क्या यह वास्तव में अलग चरण है या उसी बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा? यदि यह एक ही मास्टर प्रोजेक्ट का हिस्सा है, तो फिर अलग-अलग रजिस्ट्रेशन और अलग-अलग अवधि क्यों?
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—दस्तावेजों की छानबीन। दोनों सर्टिफिकेट में स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रमोटर को किसी अन्य लागू कानून का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीद से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण कानून धारा 118 है, जिसके तहत बाहरी व्यक्तियों को जमीन खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य होता है।
अब सवाल यह है कि जब रेरा ने यह सर्टिफिकेट जारी किए, तब क्या उसने यह सुनिश्चित किया कि जमीन की खरीद पूरी तरह वैध है? क्या यह जांच की गई कि कहीं बाहरी निवेशकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से जमीन का अधिग्रहण तो नहीं हुआ? यदि बाद में इस तरह के आरोप सामने आते हैं, तो यह सीधे-सीधे रेरा की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
दोनों सर्टिफिकेट में एक समान शर्त भी है—प्रोजेक्ट से प्राप्त 70% धनराशि को एक अलग बैंक खाते में जमा करना होगा, ताकि उसका उपयोग केवल निर्माण और जमीन लागत के लिए हो। यह प्रावधान खरीदारों के हितों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि पैसों के लेनदेन को लेकर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भी जांच का विषय बनेगा कि क्या इस शर्त का पालन किया गया या नहीं।
पहले सर्टिफिकेट में कुछ अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ी गई हैं—जैसे कि कुछ मंजिलों को सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित रखना और 15 प्लॉट्स को केवल प्लॉट के रूप में ही बेचना। यह दर्शाता है कि प्रोजेक्ट की संरचना जटिल है और इसमें विभिन्न प्रकार के उपयोग शामिल हैं। ऐसे में रेरा की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह हर पहलू की गहराई से जांच करे।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या यह केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल? रेरा के चेयरपर्सन के हस्ताक्षर इन सर्टिफिकेट्स पर मौजूद हैं, जिससे यह मामला और संवेदनशील हो जाता है। हालांकि केवल हस्ताक्षर होने से किसी की भूमिका संदिग्ध नहीं मानी जा सकती, लेकिन यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो जिम्मेदारी तय होना तय है।
भ्रष्टाचार के आरोपों की बात करें, तो फिलहाल ये आरोप स्तर पर हैं और उनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन दो अलग-अलग सर्टिफिकेट, अलग-अलग अवधि, और समान प्रोजेक्ट लोकेशन—ये सभी तथ्य मिलकर संदेह को जन्म जरूर देते हैं।
आगे चलकर इस मामले में किन-किन लोगों पर गाज गिर सकती है, यह पूरी तरह जांच पर निर्भर करेगा। इसमें डेवलपर, भूमि मालिक, बिचौलिये, और यदि कोई प्रक्रियात्मक चूक पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।
जहां तक बाहरी लोगों से पैसा लेकर प्रोजेक्ट चलाने का सवाल है, रेरा कानून इसे पूरी तरह नहीं रोकता, लेकिन हिमाचल के भूमि कानून इसे सीमित जरूर करते हैं। यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जमीन में निवेश किया है, तो उसकी वैधता की जांच अनिवार्य है।
फिलहाल, चेस्टर हिल्स प्रोजेक्ट एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर कदम, हर दस्तावेज और हर निर्णय की जांच जरूरी हो गई है। यह केवल एक प्रोजेक्ट का मामला नहीं, बल्कि उस सिस्टम की परीक्षा है जो रियल एस्टेट क्षेत्रा को नियंत्रित करता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इन दोनों प्रमाणपत्रों के बीच का रहस्य स्पष्ट हो पाता है या यह मामला और गहराता है। लेकिन इतना तय है कि ‘चेस्टर हिल’ अब एक साधारण परियोजना नहीं, बल्कि रेरा की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता का आईना बन चुका है। यह केवल एक प्रोजेक्ट का विवाद नहीं, बल्कि उस सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा है, जिस पर हजारों निवेशकों का भरोसा टिका होता है।
यह है प्रमाणपत्र
बजट घोषणाओं पर भाजपा सांसदों ने सरकार को घेरा
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Created on Wednesday, 25 March 2026 12:38
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पेश किए गये 54,928 करोड़ रूपये के बजट ने राजनीतिक सरगर्मियां तेज कर दी हैं। विपक्ष ने इस बजट को राज्य की बिगड़ती वित्तीय सेहत का प्रमाण बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाये हैं। बजट के घटे आकार से लेकर वेतन स्थगन, अधूरी गारंटियों और जमीनी स्तर पर न पहुंचने वाली योजनाओं तक भाजपा सांसदों ने सरकार को हर मोर्चे पर घेरने की कोशिश की है।
सबसे कड़ी प्रतिक्रिया राज्यसभा सांसद हर्ष महाजन की ओर से आई, जिन्होंने कहा कि पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रूपये की तुलना में इस बार का बजट 54,928 करोड़ रूपये रह जाना स्पष्ट संकेत है कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है। उन्होंने इसे कांग्रेस सरकार की ‘वित्तीय विफलता’ का सीधा सबूत बताया। महाजन ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए कर्मचारियों का वेतन तक स्थगित करने को मजबूर हुई है, जबकि दूसरी ओर छोटे मानदेय बढ़ाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। उनके शब्दों में, ‘यह बजट विकास का नहीं, बल्कि वित्तीय दिवालियापन का दस्तावेज है।’
उधर, राज्यसभा सांसद डॉ. सिकंदर कुमार ने सरकार की गारंटियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बजट भाषण में 100% गारंटी पूरी करने का दावा दोहराया गया, लेकिन पिछले तीन वर्षों में एक भी प्रमुख गारंटी जमीन पर नहीं उतरी। सिकंदर कुमार का कहना है कि कर्मचारियों के वेतन का 3% से लेकर 50% तक स्थगित करना इस बात का प्रमाण है कि राजकोषीय स्थिति बेहद विकट है। उन्होंने कहा, ‘जब सरकार खुद वेतन नहीं दे पा रही, तो वह विकास के वादे कैसे पूरा करेगी?’
लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप ने बजट को ‘किसान, जवान और गरीब-सभी को धोखा देने वाला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार दूध और फसलों के एमएसपी बढ़ाने की घोषणा जरूर कर रही है, लेकिन किसानों को न तो बाजार में उचित मूल्य मिल रहा है और न ही वास्तविक भुगतान मिल रहा है। कश्यप ने गरीब परिवारों को 300 यूनिट मुफ्रत बिजली देने की घोषणा को भी ‘चुनावी जुमला’ बताया। उनका तंज था, ‘घोषणाओं की खेती हो रही है, लेकिन किसानों के खेत सूखे पड़े हैं।’
वित्तीय अनुशासन और भविष्य की योजना पर भी विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने हिमाचल को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो कोई ठोस आर्थिक रोडमैप है और न ही उन कदमों का जिक्र, जिनसे राजस्व बढ़ाया जा सके। ठाकुर ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘यह बजट नहीं, कांग्रेस का ‘मैनेजमेंट ऑफ फेल्योर’ है।’ उन्होंने यह भी कहा कि वेतन स्थगन जैसे कदम बताता है कि सरकार पूरी तरह से वित्तीय संकट में फंस चुकी है, जबकि जनता को भ्रमित करने के लिए प्रचार आधारित योजनाएं लाई जा रही हैं।
इसी कड़ी में लोकसभा सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज ने कहा कि सरकार खर्च की प्राथमिकताओं को तय करने में असफल रही है। भारद्वाज के अनुसार, वेतन रोकने और योजनाओं की नई घोषणाओं का कोई संतुलन दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि सरकार जनता से बलिदान की अपेक्षा तो कर रही है, लेकिन खुद जवाबदेही से बच रही है। ‘वेतन स्थगन और योजनाओं की भरमार-नीति कहीं नहीं, केवल दिखावा,’ उन्होंने तीखा टिप्पणी करते हुए कहा।
महिलाओं और युवाओं से जुड़े वादों पर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा है। लोकसभा सांसद कंगना रनौत ने महिला सम्मान राशि के वादे को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि 1500 रूपये प्रतिमाह देने की घोषणा तीन वर्षों से सिर्फ कागजों में है और अब फिर से उसी वादे को बजट में दोहराया जा रहा है। कंगना रनौत ने युवाओं के लिए रोजगार योजनाओं को ‘खोखला’ बताते हुए कहा कि सरकार नौकरी देने के बजाये उन्हें केवल प्रशिक्षण और भत्तों के नाम पर बहला रही है। उन्होंने कहा, ‘यह बजट उम्मीद का नहीं, निराशा और धोखे का प्रतीक है।’
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमाचल की आर्थिक चुनौतियां वास्तविक हैं-राजस्व में कमी, केंद्र से मिलने वाले अनुदानों में कटौती और बढ़ते वेतन-पेंशन भार ने सरकार के लिए कठिन परिस्थितियां खड़ी की हैं। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस समाधान प्रस्तुत करने में विफल रही है। बजट में कई नई घोषणाएं की गई हैं, पर विपक्ष का कहना है कि पिछले वादे ही पूरे नहीं हुए, तो नई घोषणाओं पर भरोसा कैसे किया जाए?
बजट पर इस तीखी राजनीतिक जंग के बीच अब आम जनता की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार जमीनी स्तर पर राहत दे पाएगी या विपक्ष के आरोप आने वाले महीनों में और अधिक तेज होंगे। फिलहाल, विपक्ष ने साफ संकेत दे दिया है कि वे बजट को लेकर सरकार को हर मोर्चे पर घेरने के लिए तैयार हैं, जबकि सरकार इस बजट को विकासोन्मुखी और संतुलित बताने में जुटी है।