
हिमाचल में इस बार भारी बारिश के कारण जो बाढ़ और भूस्खलन देखने को मिला है उससे यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि यह सब विकास की कीमत की किस्त तो नहीं है। क्योंकि प्रदेश में बारिश के कारण इतनी मौतें पहली बार देखने को मिली है। जो माली नुकसान हुआ है उसका सरकारी आकलन आठ हजार करोड़ है। संभव है यह आंकड़ा और बढ़ेगा। जितनी सड़कें पेयजल योजनाएं और पुल टूटे हैं उन्हें फिर से बनाने में लम्बा समय लगेगा। क्योंकि सरकार पहले ही वित्तीय संकट से गुजर रही है मुख्यमंत्री और उसके सहयोगी मंत्री आपदा स्थलों का दौरा कर आये हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदेश के केंद्रीय मंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी इन क्षेत्रों का दौरा कर आये हैं। प्रदेश के मंत्री ने इस विनाश के लिये अवैध खनन को दोषी ठहराया है तो दूसरे मंत्री ने इस ब्यान को ही बचकाना करार दिया है। इन ब्यानों और दौरों से हटकर कुछ तथ्यों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि थुगान के बाजार में आये पानी में जिस तरह से लकड़ी बड़ी मात्रा में आयी है उस पर नेता प्रतिपक्ष चुप रहे हैं जबकि यह उनका चुनाव क्षेत्र है।
अभी शिमला के कच्चे घाटी क्षेत्र में नगर निगम ने एक पांच मंजिला भवन को गिराने के आदेश पारित किये हैं। क्योंकि यह निर्माण अवैध था। शिमला में कई हजार अवैध निर्माण उच्च न्यायालय तक के संज्ञान में लाये जा चुके हैं। जोकि एनजीटी के आदेशों के बाद बने हैं। स्मरणीय है कि हिमाचल में ग्रामीण एवं नगर नियोजन विभाग 1978 में बना था 1979 में एक अंतरिम प्लान भी जारी हुआ था। जो अब तक फाइनल नहीं हो पाया है। लेकिन अब तक नौ बार रिटेंशन पॉलिसीयां जारी हो चुकी हैं और हर बार अवैध निर्माणों को नियमित किया गया है। हिमाचल उच्च न्यायालय एन.जी.टी. और सर्वोच्च न्यायालय तक अवैधताओं पर सरकारों को फटकार लगाते हुये दोषियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने के निर्देश दे चुके हैं। अदालत ने दोषियों को नामतः चिन्हित भी कर रखा है। लेकिन इसके बावजूद किसी के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई है। हर सरकार ने अवैधताआें को बढ़ावा देने का काम किया है। अभी सरकार के एस.डी.पी. को सर्वोच्च न्यायालय ने अगले आदेशों तक रोक रखा है। यह प्लान अभी तक फाइनल नही है। लेकिन वर्तमान सरकार ने भी अदालत के आदेशों को अंगूठा दिखाते हुये एटिक को रिहाईशी बनाने और बेसमैन्ट को खोलने के आदेश कर रखे हैं। जबकि यह एन.जी.टी. के आदेशों की अवहेलना है।
इस बारिश में जहां-जहां ज्यादा नुकसान हुआ है वह ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें अदालत अवैध निर्माणों का संज्ञान लेकर निर्माणों पर रोक लगाने के आदेश पारित कर चुके हैं। कसौली का गोलीकांड इसका गवाह है। कुल्लू-मनाली के कसोल में तो एक पूर्व मंत्री के होटल में अवैध निर्माण का आरोप लग चुका है और मंत्री सर्वोच्च न्यायालय में अवैध निर्माण को स्वयं गिराने का शपथ पत्र दे चुका है। लेकिन इस शपथ पत्र पर कितना अमल हुआ इसकी कोई रिपोर्ट नहीं है। धर्मशाला में बस अड्डे का अवैध निर्माण भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद टूटा है। जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को लेकर चम्बा से किन्नौर तक कई जगह स्थानीय लोग विरोध जता चुके हैं। चम्बा में रावि पर बनी हैडरेल परियोजना में 65 किलोमीटर तक रावि अपना मूल स्वरूप हो चुकी है। यह जो फोरलेनिंग सड़क परियोजनाएं प्रदेश में चल रही हैं इसका लाभ किस पीढ़ी को मिलेगा यह तो कोई नहीं जानता। लेकिन जितना नुकसान इनसे संसाधनों का हो रहा है उसकी भरपायी कई पीढ़ियों को करनी पड़ेगी यह तय है। कालका-शिमला जब से बन रहा है तब से हर सीजन में इसका नुकसान हो रहा है। अब किरतपुर-मनाली फोरलेन भी उसी नुकसान की चपेट में आ गया है।
इस परिदृश्य में यह सोचना आवश्यक है कि क्या पहाड़ी क्षेत्रों में भी मैदानों की तर्ज पर सड़क निर्माण किया जा सकता है। यह चेतावनी आ चुकी है कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं। एक समय इन जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पानी नहीं मिल पायेगा। हिमाचल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिये भी यह सोचना पड़ेगा कि जल ताण्डव की जो पहली किश्त आयी है इस की दृष्टि में पर्यटन कितना सुरक्षित व्यवसाय रह पायेगा। प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट में आ गये हैं। ऊना के स्वां में अवैध खनन का संज्ञान तो सर्वोच्च न्यायालय तक ले चुका है। इसके ऊपर जांच भी आदेशित है। इसलिये आज भी समय है कि ठेकेदारी की मानसिकता से बाहर निकल कर वस्तुस्थिति का व्यवहारिक संज्ञान लेकर भविष्य को बचाने का प्रयास किया जाये।


राहुल गांधी को मानहानि मामले में राहत नहीं मिली है। उच्च न्यायालय ने कहा है कि सजा को स्थगित न करने से प्रार्थी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। सजा स्थगित करने के कोई पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने यह भी कहा है कि राहुल गांधी के खिलाफ ऐसे ही दस मामले लंबित हैं। एक शिकायत कैंब्रिज में वीर सावरकर के पोते ने राहुल गांधी के खिलाफ दायर कर रखी है। किसी मामले में प्रार्थी को राहत देना या न देना यह मान्य न्यायधीश का एकाधिकार है। ऐसा करने के लिये संदर्भित मामले के क्या गुण दोष मान्य न्यायधीश के विवेकानुसार उसके सामने हैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है। लेकिन जब न्यायधीश यह तर्क दे कि प्रार्थी के खिलाफ ऐसे दस मामले लंबित हैं और एक मामला तो वीर सावरकर के पोते ने कैंब्रिज में दायर कर रखा है इसलिये यह राहत का हकदार नहीं है तो पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। क्योंकि लंबित मामलों से संदभित मामला कैसे प्रभावित होता है इस पर कुछ नहीं कहा गया है। क्या मान्य न्यायधीश यह मानकर चलें हैं कि लंबित मामलों में भी राहुल गांधी को सजा ही होगी। इसलिये अभी उसे राहत क्यों दी जाये। शायद न्यायिक इतिहास में यह पहला मामला होगा जिसमें प्रार्थी को इसलिये राहत नहीं मिली क्योंकि उसके खिलाफ ऐसे ही दस मामले लंबित हैं।
(Gandhi) is seeking a stay on conviction on absolutely non-existent grounds. Stay on conviction is not a rule. As many as 10 cases are pending against (Gandhi). It is needed to have purity in politics... A complaint has been filed against (Gandhi) by the grandson of Veer Savarkar at Cambridge... Refusal to stay conviction would not result in injustice to the applicant. There are no reasonable grounds to stay conviction. The conviction is just proper and legal.
गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले को गांधी सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते हैं या जेल जाना चाहते हैं यह अगले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जायेगा। लेकिन इस फैसले पर हर आदमी अपने-अपने तौर पर विचार करेगा कि क्या न्याय में ऐसा भी होता है। न चाहते हुये भी यह माना जायेगा कि जज पर राजनीतिक दबाव रहा है। यह कहना कि वीर सावरकर के पोते ने भी आपके खिलाफ मामला दायर कर रखा है अपने में एक लम्बी बहस का विषय बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय इन टिप्पणियों का क्या संज्ञान लेता है यह देखना रोचक होगा। क्योंकि वीर सावरकर के साथ वैचारिक मतभेद होने का यह अर्थ नहीं हो सकता कि उसके परिजन द्वारा आप के खिलाफ मामला दायर किया जाने से आप न्यायिक राहत के पात्र ही नहीं रह जाते हैं इस फैसले के राजनीतिक परिणाम बहुत गंभीर होंगे यह तय है।
क्या महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ वैचारिक मतभेद होने पर उनके खिलाफ टिप्पणी नहीं की जा सकती। ऐसी टिप्पणियां करने वाले के खिलाफ यदि इनका कोई परिजन कोई मामला दायर कर देता है तो क्या ऐसा मामला दायर होने के बाद टिप्पणी करने वाले को अन्य मामलों में भी राहत नहीं मिल सकती। क्या उच्च न्यायालय के इस फैसले से कई सवाल नहीं उठ खड़े होंगे। आज तक प्रधानमंत्री और दूसरे भाजपा नेताओं ने नेहरू, गांधी परिवार के खिलाफ जितनी भी ब्यानबाजी कर रखी है अब वह सारी ब्यानबाजी नये सिरे से चर्चा में आयेगी यह तय है। पूरी न्यायिक व्यवस्था पर एक नई बहस को जन्म देगा यह फैसला। मानहानि बाहर के देशों में एक सिविल अपराध है क्रिमिनल नहीं। क्योंकि सार्वजनिक जीवन में आपका हर व्यवहार वैयक्तिक होने से पहले सार्वजनिक होता है इसलिये सार्वजनिक मंचों से एक दूसरे के खिलाफ आक्षेप लगाये जाते हैं। इसलिये इस फैसले के बाद इस पर भी बहस हो जानी चाहिए कि मानहानि क्रिमिनल मामला होना चाहिये या नहीं। मानहानि को क्रिमिनल अपराध के दायरे में लाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी अंकुश लग जाता है। राहुल गांधी के खिलाफ आये इस फैसले से जो राजनीतिक बहस आगे बढ़ेगी उससे भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को राजनीतिक नुकसान होना तय है। क्योंकि गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को हर आदमी राजनीतिक से प्रेरित मानेगा।





देश का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था और इसके तहत पहला आम चुनाव 1952 को हुआ था। देश की 1952 से पहले की सरकार और संविधान सभा में सभी दलों के सदस्य थे। संविधान सभा के प्रमुख डॉ. अम्बेडकर थे। संविधान के राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत धारा 44 में निर्देश है "The state shall endeavour to secure the citizen uniform civil code throughout the territory of India" देने की आवश्यकता क्यों हुई थी इसके लिये कहा गया है कि the object behind this article is to effect an integration of India by bringing all communities on common platform on matters which are governed by divorce personal laws but do not form the essence of any religion e.g. divorce, maintenance for divorced wife." संविधान के इस उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता उस समय भी मानी गयी थी। लेकिन ऐसा कानून तब बनाया नही गया और इसे भविष्य के लिये छोड़ दिया गया। क्योंकि विस्थापन से उभरी समस्याएं प्राथमिकता थी। यह एक स्थापित सत्य है कि हर धर्म और समाज में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक अपने-अपने संस्कार और मान्यता होती है। हर धर्म अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानता है। इसीलिए भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया था। सब धर्म को एक समान माना गया है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि देश की परिस्थितियां उस समय एक समान नागरिक संहिता लाने की नही थी तो क्या आज बन गयी हैं। उस समय यह आवश्यकता तलाक और तलाकशुदा औरतों के भरण-पोषण की समस्या के परिदृश्य में सामने आयी थी। आज गैर मुस्लिम समाज के लिये तलाक और भरण-पोषण दोनों के लिये कानून उपलब्ध है। मुस्लिम समाज के लिये भी तीन तलाक समाप्त कर दिया गया है। विवाह तलाक और तलाकशुदा का भरण पोषण सब कानून के दायरे में आ चुका है। इसलिए आज जिस तरह से एक देश एक कानून को जनसभाओं में जनता के बीच रखा जा रहा है यह पूछा जा रहा है कि एक देश में एक कानून होना चाहिए या नही। इससे स्वतः ही राजनीतिक गंध आनी शुरू हो गयी है। यही सन्देश जा रहा है कि यह सब मुस्लिम समाज के खिलाफ किया जा रहा है। क्योंकि यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि कौन से मुद्दे ऐसे हैं जिनके लिये एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। इस प्रस्तावित विधेयक को लाने से पहले आम नागरिक के सामने इसकी अनिवार्यता स्पष्ट की जानी चाहिए। क्योंकि सत्तारूढ़ सरकार और भाजपा के खिलाफ यह धारणा बन चुकी है कि वह मुस्लिम विरोधी है तथा राजनीतिक प्रशासनिक भागीदारी से इस इतने बड़े समाज को बाहर रखना चाहती है।
आज देश के हर जाति और धर्म के संस्कारों में भिन्नता है। अभी हरियाणा की ही कुछ खाप पंचायतों से यह मांग आयी है कि उनके समाज में एक गोत्र और एक ही गांव में शादी वर्जित है और इसे कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों में महिलाओं और शूद्रों का प्रवेश वर्जित है। क्या एक समान नागरिक संहिता लाकर इन सारे सवालों को हल कर लिया जायेगा? क्या इससे इसका जवाब मिल जायेगा कि केदारनाथ के गर्भगृह से लाखों का सोना पीतल कैसे हो गया? इस पर कोई अधिकारिक रूप से स्पष्टीकरण क्यों जारी नहीं किया जा रहा है। भाजपा 2014 में सत्ता में आने से पहले से ही एक देश एक कानून की मांग करती रही है। फिर उसे आज 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इस विधेयक को लाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या इसकी आड़ में महंगाई और बेरोजगारी पर उठते सवालों से बचने का प्रयास किया जायेगा? लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने के सवालों से बचने की कवायद होगा यह विधेयक? हिण्डनवर्ग रिपोर्ट और अदाणी-मोदी के रिश्तों पर उठते सवालों से ऐसे बचा जा सकेगा?





मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले गुजरात के पंद्रह वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे हैं। मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं और संघ की अनुमति सहमति से ही सक्रिय राजनीति में आये हैं। संघ की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक सोच की जानकारी रखने वाले जानते हैं कि संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र मानता और धर्मनिरपेक्षता का पक्षधर नहीं है। उसकी नजर में गैर हिन्दू देश के प्रथम नागरिक नहीं हो सकते। श्रेष्ठ को ही सत्ता का अधिकार है और उसमें भी चयन के स्थान पर मनोनयन होना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये भामाशाही की अवधारणा की तर्ज पर प्राकृतिक संसाधनों पर व्यक्ति का स्वामित्व होना चाहिये। संघ की इस विचारधारा का परिचय उस कथित भारतीय संविधान से मिल जाता है जो डॉ. मोहन भागवत के नाम से वायरल होकर सामने आया है। इसी विचारधारा का परिणाम है कि भाजपा शासित राज्यों में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। आज भाजपा किसी भी मुस्लिम को विधानसभा या लोकसभा के लिये अपना प्रत्याशी नहीं बनाती है। इस सोच का परिणाम है कि इन नौ वर्षों में कुछ लोगों के हाथों में देश की अधिकांश संपत्ति केन्द्रित हो गयी है। भारत बहुधर्मी, बहुजातीय और बहुभाषी देश है। मुस्लिम देश की दूसरी बड़ी जनसंख्या है। इस जनसंख्या को सत्ता में भागीदारी से वंचित रखना क्या व्यवहारिक और संभव हो सकता है शायद नहीं। लोकतन्त्र में मतभेद आवश्यक है। लोकतन्त्र में सत्ता से तीखे सवाल पूछना आवश्यक है।
लेकिन आज सत्ता से मतभेद अपराध बन गया है। अमेरिका में प्रधानमंत्री से सवाल पूछने पर किस तरह एक मुस्लिम पत्रकार को भाजपा के आईटी सैल ने ट्रोल किया है उसकी कड़ी निन्दा राष्ट्रपति जो बाइडेन को करनी पड़ी है। इस तरह भारत में लोकतन्त्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने के जो आरोप लग रहे हैं वह स्वतः ही प्रमाणित हो जाते हैं। इसी के साथ इन नौ वर्षों में महंगाई और बेरोजगारी जिस चरम पर पहुंची है उससे भी आम आदमी त्रस्त हो चुका है। इन्हीं सारी परिस्थितियों ने कांग्रेस को मजबूती प्रदान की है। कांग्रेस नेतृत्व लगातार सत्ता से लड़ता आ रहा है और आज राहुल गांधी से सत्ता डरने लग गयी है। इसी डर के कारण राहुल की सांसदी छीनी गयी है। इसलिये इन नौ वर्षों में जो कुछ घटा है और उसमें जिस तरह कांग्रेस सत्ता के सामने खड़ी रही है उसको बड़े उसको सामने रखते हुये आज विपक्षी एकता में कांग्रेस को बड़े भाई की भूमिका दे दी जानी चाहिये। वैसे तो जो दल अपना राष्ट्रीय दर्जा खो चुके हैं उन्हें इस समय राष्ट्रहित में कांग्रेस में विलय कर जाना चाहिये।





इस समय सरकार के अनावश्यक खर्चो और प्राथमिकताओं पर चर्चा करने से पहले कुछ तथ्यों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि सरकार का कर्ज भार एक लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। 2016 में जब कर्मचारियों के वेतनमान में संशोधन किया गया था तब उसके फलस्वरूप अर्जित हुआ एरियर भी आज तक नहीं दिया जा सका है। एक समय यह प्रदेश नौकरी देने वालों में सिक्कम के बाद देश का दूसरा बड़ा राज्य बन गया था। तब कर्मचारियों की संख्या में कटौती करने के कदम उठाये गये थे। इसके लिए दीपक सानन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन हुआ था। लेकिन आज प्रदेश बेरोजगारी के लिये देश के छः राज्यों की सूची में आ गया है। इस प्रदेश को एक समय बिजली राज्य की संज्ञा देते हुये यह दावा किया गया था कि अकेले बिजली उत्पादन से ही प्रदेश की वितीय आवश्यकताएं पूरी हो जायेंगी। बिजली के नाम पर ही उद्योगों को आमन्त्रित किया गया था। लेकिन आज हिमाचल का प्राइवेट क्षेत्र लोगों को सरकार के बराबर रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पाया है। प्राइवेट क्षेत्र को जितनी सब्सिडी सरकार दे चुकी है उसके ब्याज के बराबर भी प्राइवेट क्षेत्र सरकार को राजस्व नहीं दे पाया है। आज जो कर्ज भार प्रदेश पर है उसका बड़ा हिस्सा तो प्राइवेट सैक्टर को आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवाने में ही निवेशित हुआ है। लेकिन उद्योगों के सहारे किये गये दावों से हकीकत में प्रदेश के आम आदमी को बहुत कुछ नहीं मिल पाया है। इसलिये उद्योगों से उम्मीद करने से पहले उद्योग नीति पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
पिछले चालीस वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में जितना संख्यात्मक विकास प्रदेश में हुआ है उसमें यदि और आंकड़े न जोड़कर इन संस्थानों में गुणात्मक सुधार लाने का प्रयास किया जाये तो उसकी आवश्यकता है न कि बिना अध्यापक के स्कूल और बिना डॉक्टर के अस्पताल की। आज लोगों को मुफ्त बिजली का प्रलोभन देने के बजाये बिजली सस्ती करके सबको उसका बिल भरने योग्य बनाना आवश्यक है। जो गारंटीयां सरकार पूरी करने का प्रयास और दावा कर रही है क्या वह सब कर्ज लेकर किया जाना चाहिये। शायद नहीं। आज गांवों में हर परिवार को डिपों के सस्ते राशन पर आश्रित कर दिया गया है और सस्ते राशन की कीमत कर लेकर चुकाई जा रही है। आज यदि सर्वे किया जाये तो गावों में 80% से ज्यादा खेत बंजर पड़े हुए हैं। इस समय मुफ्ती की मानसिकता को सस्ती में बदलने की आवश्यकता है। यदि दो-तीन वर्ष बजट में नयी घोषणाएं करने के बजाये पुरानी की व्यवहारिकता को परख उसे पूरा करने की मानसिकता सरकार की बन जाये तो बहुत सारी समस्याएं स्वतः ही हल हो जाती हैं। कर्ज लेने की बजाये भारत सरकार की तर्ज पर संपत्तियों के मौद्रीकरण पर विचार किया जाना चाहिये। इसके लिए एक समय पंचायतों से जानकारी मांगी गयी थी उस पर काम किया जाना चाहिये।