Thursday, 05 February 2026
Blue Red Green
Home सम्पादकीय

ShareThis for Joomla!

कांग्रेस को आत्म चिन्तन करना होगा

तीन राज्यों में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित हार के कारणों को कोई आधिकारिक खुलासा अभी तक सामने नहीं आया है। यह हार कांग्रेस ही नहीं बल्कि आम आदमी के लिये भी अप्रत्याशित रही है। इस हार के बाद कांग्रेस ने अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करते हुये कुछ राज्यों के प्रभारीयों में बदलाव किया है। कांग्रेस की हार का पूरे देश पर प्रभाव पड़ा है ।इस नाते इस पर चिन्तन करने का अधिकार और कर्तव्य हर नागरिक का हो जाता है। देश में सत्ता परिवर्तन 2014 में अन्ना आंदोलन से हुआ यह स्पष्ट है। इस आंदोलन में कांग्रेस के दस वर्ष के शासनकाल को भ्रष्टाचार का पर्याय घोषित प्रचारित किया गया। लोकपाल की नियुक्ति मुख्य मांग बनी 2014 के चुनाव में काले धन की वापसी और कुछ अन्य लुभावने वायदे परोसे गये । और सत्ता परिवर्तन हो गया। उसके बाद 2019 के चुनाव में नोटबंदी के फायदे आतंकवाद का खात्मा धारा 370 और तीन तलाक खत्म करना आदि नये चुनावी मुद्दे बन गये। अब 2024 के चुनाव में 370 हटाये जाने पर सुप्रीम कोर्ट की मोहर और राम मंदिर का उद्घाटन नये मुद्दे तैयार हो गये है। लेकिन देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करना देश के आर्थिक संसाधनों को योजनाबद्ध तरीके से निजी क्षेत्र को सौंपना बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई जैसे आम आदमी को प्रभावित करने वाले मुद्दे गौण होते जा रहे हैं । ऐसे दर्जनों मुद्दे हैं जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करते हैं।
सरकार के खिलाफ इतने मुद्दे होने के बावजूद भी सत्ता पक्ष का पहले से ज्यादा ताकतवर होकर हर चुनाव में निकलना अपने में ही कई सवाल खड़े करता है । यह सबसे चिनतनीय विषय हो जाता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। सत्ता पक्ष हर चुनाव में परोक्ष अपरोक्ष रूप से मुफ्ती के नये नये वायदे लेकर चुनाव में आता है और विपक्ष भी उसी तर्ज पर मुफ्ती के वायदे लेकर आज आने लग गया है। हिमाचल में कांग्रेस की दस गारटीयां भाजपा पर भारी पड़ी और उसे सत्ता मिल गयी लेकिन यही गारटीयां पूरी न हो पाना इन राज्यों के चुनाव में हार का एक बड़ा कारण भी बनी। अब रिजर्व बैंक में जिस तरह से राज्यों को ओ पी एस पर चेतावनी दी है उस से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस या कोई भी दूसरा विपक्षी दल इस दिशा में मोदी सरकार का मुकाबला नहीं कर सकता ऐसे में मुफ्ती के वायदों के सहारे मोदी से सत्ता छीन पाना संभव नहीं होगा।
इस समय मोदी सरकार के खिलाफ इतने मुद्दे हैं जिन पर यदि देश को जागृत किया जाये तो इस सरकार को हराना कठिन नहीं है लेकिन क्या कांग्रेस इन मुद्दे को सूचीबद्ध करके अपने ही कार्य कर्ताओं को इस लड़ाई के लिए तैयार कर पा रही है शायद नहीं। कांग्रेस के ही पदाधिकारीयों को यह ज्ञान नहीं है कि 2014 से लेकर आज तक मोदी सरकार ने देश के सामने क्या-क्या परोसा और उनसे कितना पूरा हुआ। हर चुनाव के बाद ईवीएम पर सवाल उठे हैं और इन सवालों की शुरुआत एक समय भाजपा नेतृत्व में ही की है। आज ई वी एम पर उठते सवालों का आकार और प्रकार दोनों बढ़ गये है।। आम आदमी भी अब सवाल उठाने लग पड़ा है। ऐसे में यदि एक जन आंदोलन ई वी एम हटाने से लेकर देश में खड़ा हो जाये और यह कह दिया जाये कि ई वी एम के रहते चुनाव में हिस्सा नहीं लिया जायेगा । एक चुनाव विपक्ष की भागीदारी के बिना ही होने दिया जाने के हालात पैदा कर दिये जाये तो शायद सर्वाेच्च न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही कुछ सोचने पर विवश हो जाये इसी के साथ कांग्रेस ने जिस तरह से संगठन में फेरबदल किया है उसी तर्ज पर जहां उसकी सरकारें हैं वहीं पर उसे ऑपरेशन करने होंगे।

संसद की सुरक्षा में सेंध-कुछ सवाल

संसद की सुरक्षा में सेंध लगाकर दो युवाओं का सदन के भीतर तक पहुंच जाना और दो का संसद प्रांगण में नारे लगाना एक ऐसी घटना है जिसने हर आदमी का ध्यान अपनी और आकर्षित किया है। क्योंकि देश की सबसे बड़ी सुरक्षित जगह संसद भवन है। यदि कोई व्यक्ति हंगामा करने की नीयत से सारे सुरक्षा प्रबंधनों को लांघकर यहां तक पहुंच जाये तो इसे एक साधारण घटना नहीं माना जा सकता। संसद की सुरक्षा में चूक हुई है और इस पर देश को यह जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ। यदि यह लोग कहीं हथियार लेकर ही गये होते तो परिस्थितियों क्या हो जाती इसकी कल्पना करना भी भयावह लगता। यह लोग बिना हथियारों के अन्दर घुसे उससे यह माना जा सकता है कि इनका मकसद अपनी और ध्यान आकर्षित करने का ही रहा होगा। यह सही है कि इस तरह का तरीका अपनाना अपने में गलत है। यह सभी लोग पकड़े गये हैं उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होकर जांच चल रही है। इस जांच का परिणाम आने तक इस पर और कुछ तकनीकी पक्षों को लेकर कहना सही नहीं होगा। जांच रिपोर्ट आने तक इन लोगों को किसी आतंकी संगठन से जोड़ना भी जायज नहीं होगा।
यह घटना उस समय घटी जब संसद का सत्र चल रहा था। इसलिए इस घटना पर संसद में गृह मंत्री के वक्तव्य की सांसदों द्वारा मांग किया जाना किसी भी तरह नाजायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सांसदों की इस मांग पर उनके आचरण को असंसदीय करार देकर संसद से निलंबित कर देना अपने में ही मामले को और गंभीर बना देता है। यदि सांसद गृह मंत्री से घटना पर वक्तव्य की मांग नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? यदि सांसदों की मांग ही नहीं मानी जा रही है तो किसी अन्य की मांग मान ली जायेगी इसकी अपेक्षा कैसे की जा सकती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों के ‘‘पास’’ एक भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा की संस्तुति पर बनाये गये है इसलिये इस घटना पर प्रधानमंत्री या गृहमंत्री कोई भी ब्यान नहीं दे रहा है। जिस तरह का राजनीतिक वातावरण आज देश के भीतर है उसमें यदि इन लोगों के ‘‘पास’’ कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल के सांसद के माध्यम से बने होते तो परिदृश्य क्या होता? क्या अब तक उस सांसद के खिलाफ भी मामला न बना दिया गया होता? ऐसे सवाल उठने लग पड़े हैं।
अभी पांच राज्यों में हुये विधानसभा चुनावों में जिस तरह की जीत भाजपा को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हासिल हुई है उससे उत्साहित होकर प्रधानमंत्री ने यह घोषित कर दिया कि वही अगली सरकार बनाने जा रहे हैं। इसे प्रधानमंत्री का अतिउत्साह कहा जाये या अभियान पाठक इसका स्वयं निर्णय कर सकते हैं। इन चुनाव परिणामों के बाद ई.वी.एम. मशीनों और चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। चयन प्रक्रिया पर जो सवाल एक समय वरिष्ठतम भाजपा नेता एल.के.आडवाणी ने तब के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर उठाये थे वही सवाल अब उठ रहे हैं। ई.वी.एम. मशीनों की विश्वसनीयता पर भी सबसे पहले सन्देह भाजपा ने ही उठाया था। ई.वी.एम. का मुद्दा नये रूप में सर्वाेच्च न्यायालय में जा रहा है। एक ऐसी स्थिति निर्मित हो गयी है जहां हर चीज स्वतः ही सन्देह के घेरे में आ खड़ी हुई है। लेकिन लोकप्रिय प्रधानमंत्री इन जनसन्देहों को लगातार नजरअन्दाज करते जा रहे हैं।
ऐसे परिदृश्य में क्या देश का शिक्षित बेरोजगार युवा अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये इस तरह के आचरण के लिये बाध्य नहीं हो जायेगा? आज का युवा सरकार की नीतियों का आकलन करने में सक्षम है। वह जानता है कि किस तरह से देश के संसाधन निजी क्षेत्र को सौंपे जा रहे हैं। इन नीतियों से कैसे हर क्षेत्र में रोजगार के साधन कम होते जा रहे हैं। यदि इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो युवाओं का ऐसा आचरण एक राष्ट्रीय मुद्दा बन जायेगा यह तय है।

ई वी एम पर उठते सवाल घातक होंगे

ई वी एम पर इन चुनावों के बाद भी सवाल उठने शुरू हो गये है। संभव है कि यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय तक भी पहुंच जाये क्योंकि सैकड़ो साक्ष्य जुटा लिये जाने का दावा किया गया है। ई वी एम पर हर चुनाव के बाद सवाल उठते आ रहे हैं। सभी राजनीतिक दल ई वी एम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा चुके हैं। ई वी एम से 2004 से चुनाव करवाये जा रहे हैं और 2009 में चुनाव से ही इस पर सवाल उठने शुरू हो गये थे। वर्ष 2009 में पूर्व उप प्रधानमंत्री वरिष्ठतम भाजपा नेता एल के आडवाणी ने इस पर सवाल उठाये थे। वर्ष 2010 में तो भाजपा नेता जी वी एल नरसिम्हा राव ने तो इस पर डेमोक्रेसी एट रिस्क कैन वीे ट्रस्ट ऑवर ई वी एम मशीन लिख डाली थी। आडवाणी ने इस किताब की भूमिका लिखी है और नितिन गडकरी ने इसका विमोचन किया है। भाजपा नेता पूर्व मंत्री डॉ स्वामी तो इस पर सुप्रीम कोर्ट भी गये थे और तब इसमें वी वी पैट का प्रावधान किया गया था। वर्ष 2016 से 2018 के बीच उन्नीस लाख मशीने गायब हो चुकी है और आर टी आई में यह जानकारी सामने आयी है। निर्वाचन आयोग ने इस तथ्य को स्वीकारा है। इन गायब हुई उन्नीस लाख ई वी एम मशीनों के बारे में आज तक सरकार कुछ नहीं कर पायी है। हर चुनाव में ई वी एम मशीनों को लेकर सैकड़ो शिकायते आती है। ई वी एम हैक होने से लेकर मशीन बदल दिये जाने के आरोप लगते है। दिल्ली विधानसभा में आप विधायक सौरभ भारद्वाज ने तो ई वी एम हैक करके दिखा दी थी। वर्ष 2017 में आप विधायक ने सदन के पटल पर यह प्रदर्शन किया था। इस तरह वर्ष 2009 से लगातार ई वी एम के माध्यम से चुनाव करवाये जाने की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठते आ रहे है। मांग की जा रही है कि ई वी एम के स्थान पर मत पत्रों से ही चुनाव करवाये जाये। लेकिन चुनाव आयोग पर इन सवालों और इस मांग का कोई असर नहीं हो रहा है। उन्नीस लाख ई वी एम मशीनों के गायब होने पर जो आयोग और सरकार अब तक चुप बैठी है क्या उस पर आसानी से विश्वास किया जा सकता है। इस बार इन ई वी एम मशीनों पर राजनेताओं और राजनीतिक दलों में नहीं वरन आम आदमी ने सवाल उठाये हैं। वरिष्ठ वकील इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। इस समय ई वी एम पर से आम आदमी का भरोसा लगातार टूटता जा रहा है। फिर ई वी एम मशीन की सामान्य समझ के लिए भी इंजीनियर होना आवश्यक है। और इसका सीधा सा अर्थ है कि यह ई वी एम मशीनों की वर्किंग आम आदमी की समझ से परे हैं ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक जी चयन प्रक्रिया की आम आदमी को बुनियादी समझ ही नहीं है उस पर विश्वास कैसे कर पायेगा। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता माने जाते हैं ऐसे लोकप्रिय नेता के नेतृत्व में चुनाव चाहे जिस मर्जी प्रक्रिया से करवाये जाये उनकी पार्टी का जीतना तय है। इसलिये जिस प्रक्रिया पर आम आदमी का विश्वास हो और उसे समझ आती हो उसके माध्यम से चुनाव करवाने में नुकसान ही क्या है। यदि मत पत्रों से चुनाव करवाने और उनकी गणना करने में चार दिन का समय ज्यादा भी लग जाता है तो उसमें आपत्ति ही क्या है? यह समय लगने से नेता और चुनाव प्रक्रिया दोनों पर ही विश्वास बहाल हो जायेगा। इस समय उन्नीस लाख ई वी एम मशीनों के गायब होने पर सरकार और चुनाव आयोग दोनों की निष्क्रियता आम आदमी की समझ में आने लगी है। इसमें आम आदमी का वर्तमान चुनाव प्रक्रिया पर से विश्वास उठना स्वभाविक है। यदि समय रहते इस प्रक्रिया को न बदला गया तो आम आदमी का आक्रोष क्या रख अपना लेगा इसका अन्दाजा लगाना कठिन है।

क्यों हारी कांग्रेस

पहले हिमाचल और फिर कर्नाटक में चुनावी जीत हासिल करके कांग्रेस ने मध्य प्रदेश राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में भी मुफ्ती के वायदों के सहारे जो चुनाव जीतने की उम्मीद लगा रखी थी उसे परिणामों ने धरासाही कर दिया है। क्योंकि भाजपा ने कांग्रेस से बड़े वायदे परोस दिये और जनता अपना लाभ देखकर भाजपा की ओर हो ली। 2014 से 2023 तक जितने भी संसद से लेकर विधानसभा तक के चुनाव हुये हैं हर चुनाव मुफ्ती के वायदे पर लड़ा गया है। मुफ्ती के इन वायदों की कितनी कीमत सरकारी खजाने और आम आदमी को उठानी पड़ती है इस पर कभी सार्वजनिक बहस नहीं हुई है। सर्वाेच्च अदालत में भी मुफ्ती  के मामले पर कोई ठोस कारवाई नहीं हो पायी है। इसलिए जब तक राजनीतिक दल मुफ्ती पर चुनाव लड़ते रहेंगे तब तक चुनावी हार जीत इसी तरह चलती रहेगी। नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा को देश 2014 से देखता आ रहा है हर चुनाव में नया वायदा और नया मुद्दा मूल मंत्र रहा है। जिस देश में 140 करोड़ की आबादी में से अभी भी 81 करोड़ को सरकार के मुफ्त अनाज के सहारे जीना पड़ रहा हो उसको कितना विकसित देश माना जाना चाहिये यह सोचने का विषय है। इसलिये चुनावी हार जीत कोई बहुत ज्यादा प्रासंगिक नहीं रह जाती।
लेकिन इस चुनावी हार के बाद राहुल गांधी के लिये अवश्य ही कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठ जाते हैं क्योंकि राहुल गांधी ने जिस ईमानदारी से देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं के ह्यस का प्रश्न उठाया। जिस तरह से देश के संसाधनों को कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेचे जाने के बुनियादी सवाल उठाये और समाज को नफरती ब्यानों द्वारा बांटे जाने का सवाल उठाया। इन सवालों पर देश को जोड़ने के लिये कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा निकाली और जनता ने उसका स्वागत किया। उससे लगा था कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का विकल्प हो सकते हैं। लेकिन इन चुनावों में कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा नुकसान राहुल गांधी की छवि को होगा। क्योंकि इन चुनावों की धूरी कांग्रेस में वही बने हुये थे। इसलिये इस हार से उठते सवाल भी उन्हीं को संबोधित होंगे। इस समय केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकारों तक सभी भारी कर्ज के बोझ तले दबे हैं। राज्य सरकारों पर ही 70 लाख करोड़ का कर्जा है। ऐसे में क्या कोई भी राज्य सरकार बिना कर्ज लिये कोई भी गारन्टी वायदा पूरा कर सकती है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने हुये एक वर्ष हो गया है। प्रदेश सरकार हर माह 1000 करोड़ का कर्ज ले रही है। दस गारंटीयां चुनावों में दी थी जिनमें से किसी एक पर अमल नहीं हुआ है। भाजपा ने इसे मुद्दा बनाकर इन राज्यों में खूब उछाला। इसी कारण हिमाचल कांग्रेस का कोई बड़ा नेता या मंत्री इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिये नहीं आ पाया। क्या हिमाचल सरकार की इस असफलता का कांग्रेस की विश्वसनीयता पर असर नहीं पड़ेगा? जब तक कांग्रेस अपनी राज्य सरकारों के कामकाज पर नजर नहीं रखेगी तब तक सरकारों की विश्वसनीयता नहीं बन पायेगी।
आने वाले लोकसभा चुनावों के लिये जो जनता से वायदे किये जायें उन्हें पूरा करने के लिये आम आदमी पर कर्ज का बोझ नहीं डाला जायेगा जब तक यह विश्वास आम आदमी को नहीं हो जायेगा तब तक कोई भी चुनावी सफलता आसान नहीं होगी। इसलिए अब जब यह देखा खोजा जा रहा है कि कांग्रेस क्यों हारी तो सबसे पहले प्रत्यक्ष रूप से हिमाचल का नाम आ रहा जिसने गारंटीयों से अपनी जीत तो हासिल कर ली परन्तु और जगह हार का बड़ा कारण भी बन गयी।

प्रशासनिक ट्रिब्यूनल क्या वक्त की जरूरत है

हिमाचल सरकार ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को फिर से बहाल करने का निर्णय लिया है क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनावों में ऐसा आश्वासन प्रदेश के कर्मचारियों को दिया गया था। प्रदेश में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की स्थापना 1986 में की गयी थी। 1986 के बाद इसे दो बार बन्द किया गया। संयोगवश बन्द करने का फैसला दोनों बार भाजपा शासन के दौरान ही लिया गया। जुलाई 2019 में पूर्व जयराम ठाकुर की सरकार के दौरान कर्मचारियों के ही आग्रह पर लिया गया था। आज इसे दोबारा खोलने का फैसला क्या इसलिये लिया जा रहा है कि बन्द करने का फैसला पूर्व सरकार ने लिया था। 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने प्रदेश की जनता को दस गारंटीयां भी दी थी। लाखों युवाओं को रोजगार देने का वायदा भी किया गया था। लेकिन जब इन गारंटीयों को पूरा करने की बात आयी तब प्रदेश के सामने राज्य की कठिन वित्तीय स्थिति का राग अलाप कर श्रीलंका जैसे हालात होने की चेतावनी दे डाली। इसके बाद प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लाकर 92 हजार करोड़ की देनदारी विरासत में मिलने की बात कर दी। इस कर्ज की विरासत के नाम पर कितनी बार कितनी सेवाओं और वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि कर दी गई है यह सिर्फ उपभोक्ता ही जानता है। इस कठिन वितिय स्थिति के नाम पर ही सरकार ने अब तक 12000 करोड़ का कर्ज ले लिया है। जो स्थितियां आज प्रदेश की चल रही है उनके मद्देनजर यह स्पष्ट है कि सरकार आम जनता से किया गया कोई भी वायदा पूरा नहीं कर पायेगी। क्योंकि सरकार भ्रष्टाचार से लगातार समझौता करती जा रही है। बल्कि भ्रष्टाचार अब सरकार के एजैन्डे पर ही नहीं है। इस परिदृश्य में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल दोबारा खोलकर प्रदेश पर सौ करोड़ का बोझ डालना कितना हितकारी होगा यह आम सवाल बन गया है। जब जुलाई 2019 में ट्रिब्यूनल को बन्द कर दिया गया था और कर्मचारी मामले प्रदेश उच्च न्यायालय को ट्रांसफर कर दिये गये थे तब इन मामलों के आंकड़ों पर ही उच्च न्यायालय से न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ौतरी की गयी थी। मुख्य न्यायालय में जजों की संख्या 13 से 17 कर दी गयी थी। अब फिर इस संख्या को 17 से 21 करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। अब जब ट्रिब्यूनल फिर से खोल दिया जायेगा तो कर्मचारियों के मामले वहां से ट्रांसफर होकर ट्रिब्यूनल में वापस आएंगे और इसका असर उच्च न्यायालय पर पड़ेगा और उसके विस्तार का रास्ता रुक जायेगा। दूसरी ओर ट्रिब्यूनल के लिये एक अलग भवन की व्यवस्था करनी पड़ेगी। क्योंकि पुराना भवन अब उच्च न्यायालय के पास नहीं है। ऐसे में यह अहम सवाल हो जाता है कि क्या कर्ज लेकर ऐसी व्यवस्था करना आवश्यक है। इस समय कर्मचारियों के कई मामले लंबित पड़े हुये हैं। 2016 में जो वेतनमानों में संशोधन हुआ था उसके मुताबिक सरकार अभी तक सरकारी कर्मचारियों को भुगतान नहीं कर पायी है। सेवानिवृत कर्मचारी इन लाभों के लिये उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं। दर्जनों मामलों पर उच्च न्यायालय कर्मचारियों को यह भुगतान 6% ब्याज सहित करने के आदेश कर चुका हैै लेकिन सरकार इन फसलों पर अमल नहीं कर पा रही है। ऐसी करोडों की देनदारियां सरकार के नाम खड़ी हो गयी है और कर्मचारियों में रोष फैलता जा रहा है। इस वस्तुस्थिति में ट्रिब्यूनल की बहाली कुछ सेवानिवृत्ति बड़े अधिकारियों के पुनः रोजगार का साधन बनने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पायेगा। बल्कि कर्मचारियों को जो न्याय आज तक उच्च न्यायालय से मिल रहा है उसके मिलने का रास्ता भी लम्बा हो जायेगा। यह ट्रिब्यूनल पुनः खोलने से पहले सरकार को यह आंकड़ा जारी करना चाहिये की जब यह संस्थान खोला गया था तब कितने मामले इसके पास आये थे। प्रतिवर्ष औसतन कितने मामलों का फैसला हुआ है। उच्च न्यायालय में कर्मचारियों के कितने मामले प्रतिवर्ष निपटाये गये? आज इसे खोलने की आवश्यकता क्यों आयी है? इस पर प्रतिवर्ष कितना खर्च होगा और उसका साधन क्या होगा। सरकार जब तक तार्किक तरीके से अपना पक्ष जनता में नहीं रखेगी तब तक इस प्रयास को कर्ज लेकर घी पीने का जुगाड़ ही माना जायेगा।

Facebook



  Search