Wednesday, 04 February 2026
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भ्रष्टाचार और काले धन पर घिरती मोदी सरकार

केन्द्र में 2014 में भ्रष्टाचार और काले धन के जिन मुद्दों पर सत्ता परिवर्तन हुआ था क्या उन मुद्दों से देश को मोदी के 11 वर्ष के शासन में निजात मिल गयी है या उनका आकार आज पहले से भी कहीं गुना बढ़ गया है? यह सवाल गौतम अडाणी का मुद्दा सामने आने के बाद हर भारतीयों के लिए एक चिन्ता और चिन्तन का विषय बन गया है। क्योंकि यह मुद्दा अमेरिकी अदालत में पहुंचने के बाद भारत सरकार और प्रधानमंत्री ने जिस तरह की प्रतिक्रियाएं इस पर दी हैं उससे यह और जटिल हो गया है। क्योंकि इन प्रतिक्रियाओं से जहां गौतम अडाणी और प्रधानमंत्री मोदी के संबंधों की प्रगाढ़ता सामने आयी है उससे यह आशंका बढ़ गयी है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन शब्दों के साये में भारत को अपनी शर्तों पर व्यापार समझौता करने के लिए विवश कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत की स्थिति आने वाले समय में वेनेजुऐला जैसी होने का खतरा है। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या भारत सरकार इस स्थिति पर देश की जनता के सामने सारे तथ्यों को रखने का साहस कर पायेगी। क्योंकि आज गौतम अडाणी का संकट पूरे देश का संकट बनता जा रहा है। क्योंकि अडाणी को लेकर जब भी देश में सवाल उठे हैं तो मोदी सरकार ने उनका जवाब देने की बजाये विषयान्तर करने का ही विकल्प चुना है। आज अडाणी अमेरिकी अदालत में जिस तरह से घिर गये हैं उसका नुकसान पूरे देश को होगा यह तय है। क्योंकि अडाणी पर उठे सवाल भ्रष्टाचार और काले धन के स्पष्ट प्रमाण हैं जिन पर मोदी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन जिस अनुपात में अडाणी संकट सामने है उसी अनुपात में भारत सरकार इसके तथ्यों को देश के सामने रखने की बजाये उन्हें विषयान्तर करके दबाने का प्रयास कर रही है। इसलिए मोदी सरकार से सीधे सवाल करने का समय आ गया है। 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव जिस बहुमत के साथ विषयान्तर करके मोदी भाजपा ने जीते उनका सच पिछले चुनाव में सामने आ गया है। इस चुनाव के बाद वोट चोरी का सच सामने आ गया है। बिहार में चुनाव परिणामों को लेकर मामला उच्च न्यायालय में पहुंच चुका है। कर्नाटक में इस पर मामला दर्ज है। अब कर्नाटक राज्य चुनाव आयोग ने वहां नगर निगमों के चुनाव ईवीएम मशीनों की जगह मत पत्रों से करवाने का फैसला लिया है। इस चुनाव में करीब 90 लाख मतदाता वोट डालेंगे। यह चुनाव एक ही दिन में होंगे और उनके परिणाम भी एक ही दिन में आ जाएंगे। भाजपा मत पत्रों के माध्यम से चुनाव करवाये जाने का विरोध कर रही है। यदि कर्नाटक में यह प्रयोग सफल रहता है तो शीर्ष अदालत और चुनाव आयोग के सामने मत पत्रों से चुनाव न करवाने का ठोस तर्क नहीं बचेगा। इस समय भाजपा सरकारों पर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि यह सरकारें न्यायपालिका पर पूरे नियंत्राण के प्रयासों में लगी हुई है। ई.डी. और सीबीआई के दुरुपयोग पर ममता सरकार केन्द्र के साथ सीधे टकराव पर आ गयी है। मामला उच्च न्यायालय और सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। इसी बीच शंकराचार्य प्रकरण पर पूरे हिन्दू समाज में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे भाजपा का हिन्दुत्व प्रश्नित हो गया है। कुल मिलाकर जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित होती जा रही हैं उससे मोदी सरकार अपने ही एक समय पर उठाये गये सवालों में घिरती जा रही है।

चुनाव आयोग शीर्ष न्यायपालिका और सरकार सबका एक साथ प्रश्नित होना घातक होगा

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन वाली अर्थव्यवस्था करार दिया है। आईएमएफ ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार आर्थिक आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रही है। भारत सरकार ने आईएमएफ के इस आकलन का कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन इस आकलन के आईने में कुछ आंकड़े अवश्य ही सोचने पर विवश करते हैं कि यह सरकार देश के अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो मुफ्त राशन हर माह दे रही है। यदि 144 करोड़ के देश में 80 करोड़ लोगों को सरकार के 5 किलो मुफ्त राशन पर आश्रित रहना पड़ रहा है तो इसी से विकास के सारे दावों पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इस समय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर चल रहा है और यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि रुपया जो आज 90 के पार है जल्द ही 100 का आंकड़ा छू सकता है। आज कर्जदारों में देश शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है और रसोई गैस का जो सिलेंडर 2014 में 400 रूपये का था वह आज 1000 का आंकड़ा छूने के कगार पर पहुंच गया है। सरकार ने हर चुनाव में जनता से जो जो वायदे किये थे वह कितने पूरे हुये हैं आज देश की जनता इस पर गंभीरता से विचार करने पर पहुंच गयी है। क्योंकि जिस सरकार का व्यवहारिक पक्ष इतना प्रश्नित हो वह किस आधार पर चुनाव में सफलता प्राप्त कर रही है। यह प्रश्न अब और भी उग्रता से उठना शुरू हो गया है जब से कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूरे प्रमाणिक साक्ष्य के साथ चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाये हैं।
यहां अपने में ही बहुत गंभीर हो जाता है जब चुनाव आयोग जैसी संस्था लगातार सवालो में घिरती जा रही हो और उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब न आये। सवाल चुनाव आयोग पर उठ रहे हैं और जवाब सरकार देने लग गयी है। चुनाव आयोग को लेकर मामले शीर्ष अदालत तक भी जा पहुंचे हैं। लेकिन वहां से भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं आ रहा है। ऐसे में आज स्थिति यह बन गयी है कि चुनाव आयोग सरकार और शीर्ष न्यायपालिका सब एक साथ प्रश्नित हो गये हैं। एसआईआर पर हर राज्य में सवाल उठते जा रहे हैं। कई जगहों पर बी एल ओज की आत्महत्या के मामले सामने आ चुके हैं लेकिन चुनाव आयोग पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। एक आरटीआई चर्चा में आई जिसमें चुनाव आयोग ने स्पष्ट कहा है कि उसने एस आई आर को लेकर कोई आदेश जारी ही नहीं किये हैं। कर्नाटक में चुनाव आयोग के खिलाफ दर्ज मामला अदालत तक जा पहुंचा है। बिहार चुनाव पर उच्च न्यायालय में मामला जा पहुंचा है कि एक राज्य विधानसभा चुनाव में आचार संहिता को लेकर जो नियम प्रभावी थे वह बिहार चुनाव में प्रभावी क्यों नहीं हुये। बंगाल में ई.डी. के खिलाफ ममता ने एफआईआर दर्ज करवाई है मामला सर्वाेच्च न्यायालय पहुंच गया है।
लेकिन इसी दौरान केरल में आरएसएस के लोगों के खिलाफ विस्फोटक पदार्थ रखने को लेकर मामला दर्ज है। गाजियाबाद में हिंदुत्व के नाम पर खुलेआम तलवारे बांटी गयी। सिकंदराबाद में हिन्दू नेताओं द्वारा एक मुस्लिम बस्ती को खाली करने के आदेश देने का मामला सामने आया है। इन दोनों घटनाओं को लेकर पुलिस ने मामला दर्ज कर इन कथित हिन्दू नेताओं को हिरासत में ले लिया है। यह घटनाएं चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने के बाद सामने आने को यह माना जा रहा है कि सरकार पूरे विमर्श को हिंदुत्व का आकार देने का प्रयास कर रही है। इस समय जिस तरह का विमर्श सरकार चुनाव आयोग और शीर्ष अदालत को लेकर बनता जा रहा है उसके परिणाम गंभीर होंगे जिन्हें किसी बुलडोजर न्याय से बदला नहीं जा सकेगा। स्थितियों को पूरी समग्रता में एक साथ रख कर देखना होगा।

हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने में एमएसएमई की निर्णायक भूमिका

हिमाचल प्रदेश में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) आज केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और आत्मनिर्भरता की मजबूत आधारशिला बन चुके हैं। पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और कठिन परिवहन व्यवस्था के बावजूद, राज्य का एमएसएमई सैक्टर स्थानीय हुनर, परंपरा और नवाचार के सहारे विकास की नई इबारत लिख रहा है। यह क्षेत्र अब रोजगार सृजन तक सीमित न रहकर, ग्रामीण सशक्तिकरण, महिला उद्यमिता और टिकाऊ विकास का प्रमुख माध्यम बन चुका है।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि यहां बड़े उद्योगों की संभावनाएं सीमित हैं। ऐसे में छोटे और मध्यम उद्यम स्थानीय स्तर पर कच्चे माल का उपयोग कर मूल्य संवर्धन करते हैं और गांवों से शहरों तक रोजगार के अवसर पैदा करते हैं। खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, हस्तशिल्प, फार्मास्यूटिकल्स, आयुर्वेद, डेयरी, पर्यटन आधारित सेवाएं और उभरते स्टार्टअप ये सभी क्षेत्र एमएसएमई के जरिए नई पहचान बना रहे हैं। इससे न केवल आय के स्रोत बढ़े हैं, बल्कि युवाओं को पलायन के बजाये अपने ही क्षेत्र में भविष्य गढ़ने का अवसर भी मिला है।
राज्य के पारंपरिक उत्पादों ने एमएसएमई के माध्यम से आधुनिक बाजारों में जगह बनाई है। सेब, शहद, जड़ी-बूटियां, ऊनी वस्त्र, हस्तशिल्प और स्थानीय खाद्य उत्पाद अब बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता मानकों के साथ राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स ने छोटे उद्यमियों को बड़ी मंडियों से जोड़ा है, जिससे ‘लोकल से ग्लोबल’ का सपना साकार होता दिख रहा है। यह बदलाव ग्रामीण उत्पादकों के आत्मविश्वास को भी मजबूत कर रहा है।
एमएसएमई सैक्टर में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी हिमाचल के सामाजिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। स्वयं सहायता समूहों से लेकर व्यक्तिगत स्टार्टअप तक, महिलाएं खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई-कढ़ाई, हथकरघा, ऑर्गेनिक उत्पाद, हस्तशिल्प और सेवा क्षेत्रा में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है और परिवार व समाज में उनकी निर्णयात्मक भूमिका भी सशक्त हुई है। कई क्षेत्रों में महिला-नेतृत्व वाले उद्यम सामूहिक रोजगार का आधार बनते जा रहे हैं, जो समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सरकारी योजनाओं और नीतिगत समर्थन ने एमएसएमई को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई है। वित्तीय सहायता, सब्सिडी, कौशल विकास कार्यक्रम, उद्यमिता प्रशिक्षण और सिंगल विंडो सिस्टम जैसे प्रयासों से छोटे उद्यमियों का भरोसा बढ़ा है। मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना, एमएसएमई फेस्ट, निवेशक संवाद और क्लस्टर आधारित विकास ने नए उद्यमों को प्रोत्साहित किया है। इससे बाजार संपर्क, तकनीकी सहयोग और निवेश के अवसर बढ़े हैं, जो छोटे उद्योगों को बड़े मंच तक ले जाने में सहायक साबित हो रहे हैं।
हालांकि, एमएसएमई सैक्टर के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कच्चे माल की बढ़ती लागत, सीमित लॉजिस्टिक्स, परिवहन की कठिनाइयां और तकनीकी उन्नयन की जरूरत कई उद्यमों के लिए बाधा बनती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी और मौसम आधारित जोखिम भी उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करते हैं। इसके बावजूद, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन मार्केटिंग और स्थानीय स्तर पर सहयोगात्मक मॉडल ने इन चुनौतियों को काफी हद तक कम किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऑर्गेनिक खेती, एग्रो-प्रोसेसिंग, नवीकरणीय ऊर्जा, वेलनेस, हर्बल उत्पाद और पर्यटन आधारित एमएसएमई हिमाचल की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे। यदि तकनीकी नवाचार, वित्तीय पहुंच और बाजार नेटवर्क को और मजबूत किया जाए, तो यह क्षेत्र राज्य को आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास की ओर तेजी से अग्रसर कर सकता है।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश का एमएसएमई सैक्टर छोटे प्रयासों के जरिए बड़े बदलाव की कहानी कहता है। यह क्षेत्र न केवल रोजगार और आय के अवसर पैदा कर रहा है, बल्कि स्थानीय पहचान, सामाजिक संतुलन और आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत कर रहा है। स्थानीय संसाधनों और आधुनिक सोच के समन्वय से एमएसएमई आज हिमाचल के विकास मॉडल का सबसे भरोसेमंद आधार बन चुका है, जो आने वाले वर्षों में राज्य को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

युवाओं को नशे से बचाना सरकार और समाज की कठोर परीक्षा

हिमाचल प्रदेश की पहचान हमेशा से शांत वादियों, सुदृढ़ सामाजिक मूल्यों और अनुशासित जीवनशैली से रही है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस पहचान को गहरी चोट पहुंचाई है। चिट्टा, स्मैक, सिंथेटिक ड्रग्स और शराब की लत ने युवाओं को तेजी से अपनी गिरफ्त में लिया है। यह केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक ढांचे और भविष्य पर सीधा हमला है। ऐसे में सरकार की भूमिका, उसकी नीतियों की प्रभावशीलता और समाज की जिम्मेदारी-तीनों की कड़ी परीक्षा हो रही है।
नशा किसी एक कारण से पैदा नहीं होता। इसके पीछे बेरोजगारी, असफलता का डर, मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा का दबाव, पारिवारिक संवाद की कमी और आधुनिक जीवनशैली की खोखली चमक जैसे कई कारक हैं। हिमाचल जैसे पर्यटन और सीमावर्ती राज्य में मादक पदार्थों की आसान उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना देती है। ऐसे में यह भ्रम पालना कि केवल पुलिस कारवाई से नशे को जड़ से खत्म किया जा सकता है, एक खतरनाक आत्मसंतोष होगा।
यह सच है कि हिमाचल सरकार ने नशे के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। चिट्टा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ पुलिस और विशेष टास्क फोर्स की कारवाई ने कई नेटवर्क तोड़े हैं और यह संदेश दिया है कि राज्य में नशे के कारोबार के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दमनात्मक कारवाई नशे की समस्या का केवल एक पहलू है, समाधान नहीं। जब तक मांग बनी रहेगी, आपूर्ति के रास्ते नए-नए रूपों में निकलते रहेंगे।
सरकार ने इस सच्चाई को कुछ हद तक स्वीकार करते हुए जागरूकता अभियानों और पुनर्वास पर ध्यान दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी कार्यक्रम, सार्वजनिक अभियानों के जरिए संदेश और पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था-ये सभी सकारात्मक कदम हैं। नशे को अपराध नहीं, बल्कि बीमारी मानकर उपचार की ओर बढ़ना एक जरूरी और मानवीय दृष्टिकोण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रयास पर्याप्त गहराई तक पहुंच पा रहे हैं, या फिर ये भी कई बार औपचारिकता बनकर रह जाते हैं?
सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि नशा निवारण को अब भी अक्सर अभियान की तरह देखा जाता है, जबकि यह एक लंबी और निरंतर सामाजिक प्रक्रिया है। स्कूलों और कॉलेजों में स्थायी काउंसलिंग व्यवस्था का अभाव गंभीर चिंता का विषय है। जब तक युवाओं के मानसिक दबाव, असुरक्षा और अवसाद को समय रहते नहीं समझा जाएगा, तब तक नशा उनके लिए आसान पलायन बना रहेगा।
परिवारों की भूमिका पर भी सख्ती से आत्ममंथन जरूरी है। माता-पिता की व्यस्तता, संवाद की कमी और कई बार सामाजिक दिखावे की दौड़ में बच्चों की वास्तविक स्थिति अनदेखी रह जाती है। जब परिवार ही शुरुआती संकेत नहीं पहचान पाएगा, तो सरकार या पुलिस से चमत्कार की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।
समाज और समुदाय की निष्क्रियता भी उतनी ही चिंताजनक है। पंचायतें, युवक मंडल और सामाजिक संगठन यदि केवल दर्शक बने रहेंगे, तो नशे के खिलाफ लड़ाई कभी निर्णायक नहीं हो सकती। यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब समाज खुद नशे के खिलाफ खड़ा हो और इसे सामूहिक अपमान के रूप में देखे।
डिजिटल युग में नशे की चुनौती भी डिजिटल हो चुकी है। ऑनलाइन नेटवर्क, सोशल मीडिया और नए तरीकों से फैलता नशा सरकार की पारंपरिक रणनीतियों को बार-बार चुनौती दे रहा है। इसके मुकाबले के लिए उतनी ही आक्रामक और आधुनिक सोच की जरूरत है।
हिमाचल में नशे के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार की नहीं है। सरकार नीति बना सकती है और कानून लागू कर सकती है, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी। यदि आज भी हम इसे दूसरों की समस्या समझकर टालते रहे, तो कल इसकी कीमत पूरे राज्य को चुकानी पड़ेगी। युवाओं को नशे से बचाना विकल्प नहीं, अनिवार्यता है-और इसमें सरकार, समाज और परिवार, तीनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी।

हिमाचल का आर्थिक संकट क्यों?

हिमाचल सरकार जिस तरह के आर्थिक संकट में घिर गयी उसने हर व्यक्ति का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रखा है। क्योंकि इस समय सरकार का कुल कर्जभार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। चिन्ता और चिन्तन इस बात की है कि हमारे माननीय विधायकों ने एक भी विधानसभा सत्र में इस पर कोई चर्चा नहीं की कि इस बढ़ते कर्ज से कैसे मुक्ति मिल सकती है। जबकि अपने वेतन भत्ते बढ़ाने के लिये सभी ध्वनि मत से एक थे। सुक्खू सरकार ने जब कार्यभार संभाला था तो प्रदेश पर पचहतर हजार करोड़ का कर्ज था और दस कजार करोड़ की देनदारियां पिछली सरकार विरासत में छोड़ गयी थी। सुक्खू सरकार अब तक 29046 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। अगले 2 वर्षों में इतना ही कर्ज और लेना पड़ेगा। क्योंकि आगे तो चुनावी वर्ष होगा सरकार चुनाव की नजर से कर्ज लेगी। यह एक स्थापित सत्य है कि बढ़ते कर्ज के कारण सरकार को अपना राजस्व व्यय कम करना पड़ता है जिसका सीधा प्रभाव स्थायी सरकारी रोजगार पर पड़ेगा और हिमाचल में सरकार ही सबसे बड़ी रोजगार प्रदाता है। जो सरकार इस समय ही मल्टीटास्क वर्कर भर्ती से मित्रा योजना तक पहुंच गयी है उसे यह मित्र योजनाएं भी बन्द करनी पड़ेगी। सुक्खू सरकार ने अब तक 26683 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है जिसका अर्थ है कि यह सरकार हर बार कर्ज मुक्त बजट देकर इतने का करभार प्रदेश की जनता पर लाद चुकी है। इस राजस्व जुटाने से क्या आम आदमी को कोई राहत मिलती है शायद नहीं। प्रदेश का कर्जभार जीडीपी के 44% से बढ़ गया है जबकि यह पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिए। इसी के साथ प्रदेश के 90% लोगों के बैंक खाते हैं और कर्ज केवल 4% ने ही ले रखा है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार है और कर्ज एक लाख है जिस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार हो क्या उस प्रदेश में सरकार पर आर्थिक संकट होना चाहिये? क्या उस प्रदेश के आम आदमी को सरकार के सस्ते राशन पर निर्भर रहना चाहिए? व्यवहारिक रूप से शायद नहीं। लेकिन आज हिमाचल बेरोजगारी में छठे स्थान पर पहुंच चुका है और आम आदमी की सस्ते राशन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसा इसलिये है कि इन आंकड़ों का आम आदमी से कोई लेना देना नहीं है। यह आंकड़े सरकार को प्रभावित करते हैं। एक बड़े निवेश से सरकार का जीडीपी बढ़ जाता है और उससे सरकार की कर्ज लेने की सीमा बढ़ जाती है जिसका आम आदमी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सरकारें कर्ज लेकर और एक दूसरे को दोष देकर अपना काम निकाल लेती हैं लेकिन कालान्तर में इसका कुप्रभाव आम आदमी पर पड़ता है। इसलिये यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि कहीं सरकार की सोच और योजनाएं ऐसी तो नहीं रही जिनका प्रदेश के आम आदमी के साथ कोई लेना देना ही नहीं था। क्योंकि स्व. रामलाल ठाकुर के कार्यकाल तक प्रदेश पर कोई कर्ज भार नहीं था। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है और इस नाते कृषि और बागवानी के लिये तो अनुकूल है पर शायद औद्योगिकरण के लिये नहीं। क्योंकि उद्योग के लिये कच्चा माल और उपभोक्ता दोनों में से एक का प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है और यह दोनों तत्व प्रदेश में बड़ी मात्रा में उपलब्ध नहीं है। प्रदेश में खनिज के रूप में सीमेंट बनाने के लिये पर्याप्त कच्चा माल है। लेकिन संयोग से इस उद्योग में हिमाचल सरकार की अपनी कोई इकाई स्थापित नहीं है। सीमेंट के अतिरिक्त प्रदेश में नदी जल की काफी उपलब्धता है। इसका दोहन जल विद्युत परियोजनाओं के लिये हुआ। लेकिन इसमें भी जब 1980 के दशक में बिजली बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन स्व.कैलाश महाजन की बोर्ड से बर्खास्तगी के बाद प्रदेश सरकार इस दिशा में अपने स्वामित्व में कोई बड़ी योजना स्थापित नहीं कर पायी है। उस समय बसपा परियोजना बोर्ड से छीनकर जेपी उद्योग को दे दी गयी। इस पर तब तक हुआ सोलह करोड़ का निवेश जे.पी. से कभी वापस नहीं मिला। बल्कि जब यह राशि बढ़कर 92 करोड़ हो गयी तो इस बट्टे खाते में डाल दिया गया। कैग ने इस पर गंभीर सवाल उठाये हैं जिन्हें नजर अन्दाज कर दिया गया। आज जिस मुकाम पर स्थितियां पहुंच चुकी है उससे अब तक के इतिहास पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।

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