प्रदेश भर में इस मानसून सत्र से जो तबाही हुई है उससे कुछ बुनियादी सवाल भी उठ खड़े हुये हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस विनाश के लिये क्या प्रकृति ही जिम्मेदार है या सरकार की नीतियों और हमारा लालच भी बराबर का जिम्मेदार रहा है। मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है की सरकार की नीतियां लालच से ज्यादा जिम्मेदार रही है। क्योंकि जब नीतियों में ढील दी जाती है तो उससे लालच बढ़ता जाता है। हिमाचल में गैर कृषक गैर हिमाचली को जमीन खरीदने पर मूलतः प्रबंध रहा है। इस प्रतिबंध में ढील देने के लिये भू राजस्व अधिनियम की धारा 118 में सरकारी अनुमति का प्रभावधान करके इस खरीद का मार्ग प्रशस्त किया गया। इस प्रावधान का इतना दुरूपयोग हुआ है की सरकारों पर हिमाचल को बेचने के आरोप लगे। बेनामी खरीदो पर चार बार जांच आयोग बैठाये गये। हर जांच रिपोर्ट में सैकड़ो मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन किसी भी रिपोर्ट पर कोई अंतिम कारवाई नहीं हो पायी है। इसी का परिणाम है कि हर एक पर्यटक स्थल पर गैर हिमाचली गैर कृषक व्यवसायिक परिसर बनाकर बैठे हुये है। प्रदेश में कार्यरत गैर हिमाचली गैर कृषक अधिकारियों ने भी जब यहां जमीन खरीदनी शुरू की तब यह भी प्रावधान नहीं किया गया की एक व्यक्ति को धारा 118 के तहत कितनी बार जमीन खरीद की अनुमति मिल सकती है।
जमीन खरीद पर प्रतिबंध के साथ ही लैंड सीलिंग एक्ट के तहत अधिकतम भूमि सीमा का भी प्रतिबंध है । इस प्रतिबंध के तहत 161 बीघा या 300 कनाल से अधिक जमीन नहीं खरीदी जा सकती। लेकिन जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योगों के लिए यह सीमा में छूट दे दी गयी। यही नहीं राधा स्वामी सत्संग व्यास के लिये भी इसमें छूट दे दी गयी और इस संस्था को कृषक का दर्जा भी अदालत के माध्यम से दिला दिया गया और इस फैसले की कोई अपील तक नहीं की गयी। इसी का परिणाम है की राधा स्वामी सत्संग ब्यास के पास आज हजारों बिघा जमीन है। अब तो 1974 में पारित लैंड सीलिंग एक्ट में भी संशोधन करके एक नया आयाम स्थापित कर दिया गया है। इस संशोधन के लाभार्थी कौन होंगे यह नई चर्चा का विषय बन जायेगा। रियल स्टेट प्रदेश में एक पूरा उद्योग बन गया जबकि नये स्थापित उद्योगिक क्षेत्रों में लेबर को आवासीय सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये ऐसे निर्माणों के अनुमति दी गई थी।
इसी तरह भवन निर्माण के लिए जो स्थाई पॉलिसी 1979 में बनाई जानी थी वह आज 2023 में भी अंतरिम आधार पर ही चल रही है। क्योंकि स्थाई योजना एनजीटी के आदेश के बाद केवल शिमला के लिये ही बन पायी और वह सर्वाेच्च न्यायालय में विचाराधीन चल रही है। भवन निर्माणों में अवैधताओं को कैसे लालच का रूप लेने दिया गया इसका खुलासा अब तक लायी गयी रिटेंशन पॉलिसीयों से हो जाता है। जिस विकास के नाम पर इन अवैधताओं को बढ़ावा दिया जाता रहा है उसे सब का सामूहिक परिणाम है यह विनाश। इस विनाश में जहां प्रभावितों को तुरंत राहत पहुंचना प्राथमिकता है तो उसी के साथ यह पुनर्निर्माण भी आवश्यक है। निर्माण की अनिवार्यता और राहत की तात्कालिक आवश्यकता के साथ ही भविष्य की संभावनाओं को भी ध्यान में रखकर अगले फैसले लेने होंगे। यह निष्पक्षता से विचार करना होगा की क्या शिमला राजधानी के तौर पर भविष्य की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा कर पायेगा। जो लोग कल तक किन्हीं कारणों से एनजीटी के फैसले का विरोध कर रहे थे उन्हें अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर खुले मन से इस विनाश के परिपेक्ष में फैसला लेना होगा। यह फैसला आज की राजनीतिक और प्रशासनिक पीढ़ियां की परीक्षा भी साबित होगी।





1971 में किन्नौर में आये भूकंप का असर शिमला के रिज और लक्कड़ बाजार क्षेत्र में आज भी देखा जा सकता है। आज तक रिज अपने पुराने मूल रूप में नहीं आ सका है। हर वर्ष रिज के जख्म हरे हो जाते हैं। इसी विनाश के कारण 1979 में यह माना गया कि प्रदेश के सुनियोजित विकास के लिए नगर एवं ग्रामीण नियोजन विभाग चाहिए और परिणामतयः टीसीपी विभाग का गठन हुआ। प्रदेश के नगरीय और ग्रामीण विकास के लिये एक स्थाई विकास योजना तैयार करने की जिम्मेदारी इस विभाग की थी। लेकिन राजनीति के चलते यह विभाग ग्रामीण क्षेत्र तो दूर शहरों के लिये भी कोई स्थाई योजना नहीं बना पाया है। राजधानी नगर शिमला के लिये ऐसी स्थाई योजना की एकदम आवश्यकता थी लेकिन 1979 में जो अंतरिम योजना जारी हुई उसमें भी एन.जी.टी. का फैसला आने तक 9 बार रिटैन्शन पॉलिसीयां जारी हुई और हर पॉलिसी में अवैधता का अनुमोदन किया। यहां तक की एन.जी.टी. का फैसला आने के बाद भी हजारों अवैध निर्माण खड़े हो गये। सरकार स्वयं फैसले के उल्लंघनकर्ताओं में शामिल है। शायद सरकार के किसी भी निर्माण का नक्शा कहीं से भी पारित नहीं है। जबकि टी.सी.पी. नियमों के अनुसार हर सरकारी भवन का नक्शा पास होना आवश्यक है।
राजधानी नगर शिमला के कई हिस्से स्लाइडिंग और सिंकिंग जोन घोषित हैं। इनमें कायदे से कोई निर्माण नहीं होना चाहिए था। लेकिन यहां निर्माण हुए हैं। पहाड़ में 35 डिग्री से ज्यादा के ढलान पर निर्माण नहीं होना चाहिए। लेकिन सरकारी निर्माण भी हुये हैं। जब सरकारी भवन ही कई-कई मंजिलों के बन गये तो प्राइवेट सैक्टर को कैसे रोका जा सकता था। ऐसे बहुमंजिला भवनों की एक लंबी सूची विधानसभा के पटल पर भी आ चुकी है लेकिन वह रिकार्ड का हिस्सा बनकर ही रह गई है। आज शिमला में जो तबाही हुई है उसका एक मात्र कारण निर्माण की अवैधताएं हैं जिन्हें रोक पाना शायद किसी भी सरकार के बस में नहीं रह गया है। सुक्खू सरकार ने भी इसी दबाव में आकर ऐटिक और बेसमैन्ट का फैसला लिया है। जब सरकार के अपने भवन ही असुरक्षित होने लग जायें तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिमला कितना सुरक्षित रह गया है। इस विनाश के बाद शिमला की सुरक्षा को लेकर हर मंच पर सवाल उठ रहे हैं। पिछले चार दशको में हुए शिमला के विकास ने आज जहां लाकर खड़ा कर दिया है उसके बाद यह सामान्य सवाल उठने लग गया है कि भविष्य को सामने रखते अब राजधानी को शिमला से किसी दूसरे स्थान पर ले जाने पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। एन.जी.टी. ने कुछ कार्यालय शिमला से बाहर ले जाने के निर्देश दिए हुए हैं। लेकिन अब कार्यालयों की जगह राजधानी को ही शिफ्ट करने पर विचार किया जाना चाहिए।







भारतीय दण्ड संहिता निर्माताओं ने हर अपराध की गंभीरता को आंकते हुए उसमें अधिकतम दण्ड का प्रावधान किया हुआ है जो आजीवन कारावास और मृत्यु दण्ड तक का है। मानहानि के मामले में अधिकतम सजा दो वर्ष की है। किसी भी अपराध में जब कोई न्यायधीश अधिकतम सजा सुनाता है तब उसमें वह यह कारण भी दर्ज करता है कि अधिकतम सजा क्यों दी जा रही है। लेकिन सर्वाेच्च न्यायालय ने यह साफ कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में अधिकतम सजा के आधारों की व्याख्या ही नहीं की है। जब राहुल सत्र न्यायालय और फिर गुजरात उच्च न्यायालय में अपील में गये तो वहां भी मान्य अदालतों ने इस पक्ष का संज्ञान ही नहीं लिया। यदि राहुल गांधी को इस मामले में दो वर्ष से एक दिन की भी सजा कम होती तो उनकी संसद सदस्यता न जाती। इसलिए आम आदमी में यह धारणा बनती जा रही है कि राहुल को संसद से बाहर रखने के लिये यह मामला बनाया गया था। इस सजा के बाद ही गुजरात में मोदी समाज का अधिवेशन हुआ और गृह मन्त्री अमित शाह उसमें शामिल हुए। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को समाज का रत्न कहा गया। राहुल के खिलाफ मानहानि का मामला करने वाले पूर्णेश मोदी को महिमामण्डित किया। इस मामले में जो कुछ घटा है उससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि आज प्रधानमन्त्री से लेकर पूरी भाजपा तक राहुल से डरी हुई है।
2014 में जब से मोदी ने सत्ता संभाली है तब से लेकर आज तक राहुल और नेहरू-गांधी परिवार को घेरने के लिये जो कुछ भी इस सरकार ने किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी स्वतः ही राहुल से हल्के पड़ते जा रहे हैं। एक नेता को संसद से बाहर रखने के लिये इस सीमा तक जाना कई सन्देशो और आशंकाओं की आहट मानी जा रही है। 2024 के चुनावों को टालने से लेकर कुछ भी घट सकता है। क्योंकि इस समय जो बहुमत संसद में भाजपा को हासिल है उसके सहारे हिंदुत्व को लाने के लिये सरकार किसी भी हद तक जा सकती है। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के नाम से जो भारत का नया संविधान कुछ अरसे से वायरल होकर बाहर आया है उस पर संघ से लेकर भारत सरकार तक सबकी चुप्पी अपने में बहुत कुछ कह जाती है। हिंदुत्व को संवैधानिक तौर पर लागू करने के जो निर्देश एक समय मेघालय उच्च न्यायालय के फैसले के माध्यम से भारत सरकार तक 2019 में आ चुका है उस पर भी अभी तक की खमोसी अर्थ पूर्ण लगती है।





मणिपुर में हिंसा रूक नहीं रही है या रोकी नहीं जा रही है। इस सवाल की पड़ताल करने के लिये मणिपुर की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझना आवश्यक हो जाता है। यहां पर मैंतेई, कुकी और नगा मिलिशिया तीन समुदाय रहते है। मैतेई समुदाय की संख्या 53% और कुकी समुदाय 43% और शेष अन्य है। मणिपुर की 60 सदस्यों की विधानसभा में से 40 सीटों पर मैतेई समुदाय का कब्जा है। मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह भी मैतेई है। अधिकांश में यह लोग हिन्दू हैं और मणिपुर के मैदानी इलाकों में रहते हैं। जबकि कुकी पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं। कुकी समुदाय को एस.टी. का दर्जा हासिल है। संविधान की धारा 371 (C) के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिये विधानसभा में इनके सदस्यों की एक कमेटी गठित की जाती है जो यहां के विकास को देखती है और सीधे राज्यपाल के नियंत्रण में होती है। पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिये धन का प्रावधान भी अलग से रहता है। इसकी रिपोर्ट सीधे राष्ट्रपति को जाती है। संविधान के अनुसार Manipur, which has become a State under North-Eastern Areas (reorganisation) Act, 1971, shall have a committee in its Legislative Assembly, to look after the interests of the Hill Areas in the State. अब मैतेई समुदाय के लोग भी कुकीयों की तर्ज पर अपने लिये एस.टी. का दर्जा दिये जाने की मांग कर रहे हैं। यह मांग ही दोनों समुदाय में झगड़े का कारण बनी हुई है।
कुकी अधिकांश में ईसाई और मैतेई हिन्दू हैं और बहुमत में हैं। मैतेई इम्फाल घाटी के मैदानी क्षेत्र में रहते हैं। कुकी समुदाय को लगता है कि यदि मैतेई समुदाय को भी एस.टी. का दर्जा दे दिया जाता है तो उनका हर चीज में दखल बढ़ जायेगा। मई में हिंसा फैलने से पहले एक अफवाह फैली कि कुकी मिलिशिया मैन द्वारा एक महिला के साथ दुष्कर्म किया गया है। इस फर्जी रिपोर्ट के बाद भड़की हिंसा अब तक रुकने का नाम नहीं ले रही है। मणिपुर में भाजपा की सरकार है लेकिन यह सरकार हिंसा रोकने में असफल रह रही हैं। केन्द्र सरकार वहां पर राष्ट्रपति शासन लगाने से हिचकचा रही है। यह माना जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन लगाकर ही हालात पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। मैतेई समुदाय की मांग संविधान के अनुसार यदि मानी जा सकती है तो प्रदेश और केन्द्र में दोनों जगह भाजपा की सरकारें होने से इसे क्यों नहीं माना जा रहा है? यदि यह मांग संविधान सम्मत नहीं है तो प्रदेश सरकार अपने लोगों को समझा क्यों नहीं पा रही हैं। आज यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय आकार लेने लगा है। अमेरिका की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ चुकी है। ऐसे में यदि राष्ट्रपति शासन लगा कर हिंसा को रोका जा सकता है तो तुरन्त प्रभाव से ऐसा कर दिया जाना चाहिये। मणिपुर की जिम्मेदारी से बंगाल और राजस्थान का नाम लेकर नहीं बचा जा सकता।