Wednesday, 04 February 2026
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प्रदेश की आर्थिकी पर संभावित श्वेत पत्र

सुक्खू सरकार ने पदभार संभालते ही प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर अपनी चिन्ता जनता से साझा की थी। जनता के सामने यह आंकड़ा रखा था कि उनकी सरकार को विरासत में 75 हजार करोड़ का कर्ज और 11000 करोड़ की देनदारियों मिली हैं। यह आंकड़ा सामने रखते हुये प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे हो जाने की आशंका भी व्यक्त की थी। यह भी कहा था कि वह वित्तीय स्थिति पर बजट सत्र में श्वेत पत्र लायेंगे। बजट सत्र में तो यह श्वेत पत्र नहीं आ पाया लेकिन अब यह श्वेत पत्र तैयार करने के लिए उप-मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया गया है। इसलिये यह उम्मीद है कि यह श्वेत पत्र अब तो आ ही जायेगा। जब किसी परिवार की वित्तीय स्थिति चिन्ताजनक हो जाती है तो सबसे पहले परिवार का मुखिया अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाने की बात करता है और उसके बाद संसाधन बढ़ाने की ओर कदम उठाता है। परिवार की तर्ज पर ही प्रदेश और देश की आर्थिकी चलती है। जब प्रदेश पर इतने कर्ज भार की बात चर्चा में आयी है तब दो पुर्व मुख्य मंत्रियों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के ब्यान आये हैं। दोनों ने अपने-अपने समय की स्थितियां स्पष्ट की हैं। कांग्रेस के शासनकाल की स्थिति पर पक्ष रखने के लिये आज वीरभद्र हमारे बीच है नहीं और जयराम ने अपने काल को लेकर कोई बड़ी टिप्पणी की नहीं है। वित्तीय स्थिति को लेकर जितने सवाल राजनीतिक नेतृत्व पर उठते हैं उससे ज्यादा वित्त सचिवों पर उठते हैं। वित्तीय प्रबंधन के लिये प्रदेश में एफआरबीएम विधेयक पारित है और इसके मुताबिक सरकार उसी कार्य के लिये कर्ज ले सकती है जिसके निवेश से प्रदेश की आय बढ़े।
इस परिपेक्ष में प्रदेश की जनता को यह जानने का हक है की इतना बड़ा कर्जदार कैसे खड़ा हो गया है? यह कर्ज लेने की आवश्यकता कब और क्यों पड़ी? यह कर्ज कहां-कहां निवेश हुआ है और उससे कब-कब कितनी आय बढी? इस समय कैग रिपोर्टों के मुताबिक कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लेना पड़ रहा है। राज्य की समेकित निधि से अधिक खर्च किया जा रहा है जो कि संविधान की अवहेलना है। और कई कई वर्षों तक ऐसा खर्च नियमित नहीं हो पाता है। हर वर्ष की रिपोर्ट में इसका जिक्र रहता है। बजट दस्तावेजों में किसी समय राज्य की आकस्मिक निधि का आंकड़ा दर्ज रहता था जो अब गायब है।
राज्य सरकार हर वर्ष बजट में राजस्व आय का आंकड़ा रखती है। राजस्व आय के साथ इतना बड़ा कर्जदार कैसे खड़ा हो गया आज जब वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र तैयार किया ही जा रहा है तो यह पूरी स्पष्टता के साथ की सरकार जनता को राहत देने के नाम पर कर्ज लेकर घी पीने को ही चरितार्थ तो नहीं करती रही है। क्योंकि बेरोजगारी में प्रदेश देश के पहले छः राज्यों में आ चुका है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। यह सब तब हो रहा है जब कुछ उद्योगपतियों के सहारे जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है। यह सब आंकड़े योजनाओं के अन्त विरोध के परिचायक होते हैं। इनके सहारे कुछ लोगों को कुछ समय के लिये ही बहकाया जा सकता है लेकिन स्थाई तौर पर नहीं। इसलिये श्वेत पत्र के सारे पक्ष सामने आने चाहिये ताकि लोग उस पर विश्वास कर सकें।

क्या हिमाचल कांग्रेस राहुल के साथ है

राहुल गांधी ने अपना सरकारी आवास खाली कर दिया है। सूरत की एक अदालत ने मानहानि के मामले में उन्हें दो वर्ष की सजा सुना दी। इस फैसले का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लेते हुये लोकसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी और उसके बाद उन्हें सरकारी आवास खाली करने का नोटिस भी थमा दिया। राहुल ने इस आदेश की अनुपालना करते हुये आवास खाली कर दिया। सूरत की जिस अदालत ने सजा दी थी उसी ने उन्हें अपील के लिए तीस दिन का समय देते हुये अपने फैसले पर रोक भी लगा दी थी। लेकिन लोकसभा सचिवालय ने इस समय तक इन्तजार करने की बजाये तुरन्त कारवाई कर दी। लोकसभा सचिवालय की इस कारवाई पर पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रियाएं उभरी हैं और यह एक बड़ी राष्ट्र बहस का विषय बन गया है। हर राजनीतिक दल और नेता को इस पर अपना स्टैंड लेना पड़ा है। कोई भी तटस्था की स्थिति में नही रह पाया है। कानूनी लड़ाई के साथ-साथ इसका राजनीतिक पक्ष बहुत बड़ा बन गया है। क्योंकि यह सजा किसी हत्या, अपहरण, डकैती या भ्रष्टाचार के मामले में नहीं वरन चुनावी सभा में दिये गये एक ब्यान पर हुई है। बल्कि इस सजा और उस पर हुई कारवाई से देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों के भविष्य को लेकर उठे सवाल अपरोक्ष में और पुख्ता हो जाते हैं। राहुल गांधी के खिलाफ हुई कारवाई के बाद केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा खेल और युवा सेवाएं मंत्री हिमाचल के हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर द्वारा 2019 में शाहीन बाग में दिये भाषण देश के गद्दारों को गोली............ का प्रकरण भी सीपीएम नेता वृंदा करात ने सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संबद्ध पक्षों को नोटिस भी जारी कर दिये हैं। राहुल और अनुराग के ब्यानों की यदि तुलना की जाये तो अनुराग का ब्यान ज्यादा गंभीर है। अनुराग हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं और हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है। इस नाते हिमाचल में अनुराग के ब्यान पर राहुल गांधी के परिपेक्ष में प्रदेश में ज्यादा सवाल उठने चाहिये थे। इन सवालों से प्रदेश की जनता राहुल द्वारा लोकतंत्र पर उठाये प्रश्नों को अच्छी तरह से समझ सकती थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि न मीडिया ने और न ही प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने इस पर मुंह खोला। यही नहीं कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री आनन्द शर्मा इस समय किसी भी सदन के सदस्य नहीं है परन्तु उनके पास सरकारी आवास है और उसे खाली करवाने के लिये मोदी सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है। यही स्थिति गुलाम नबी आजाद, मायावती, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की है। राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रश्न उछल चुके हैं। परन्तु हिमाचल में कोई कांग्रेस नेता इस पर जुबान खोलने का साहस नही कर रहा है जबकि यहां कांग्रेस की सरकार है। आनन्द शर्मा की सांसद निधि से नादौन आदि क्षेत्रों में बहुत काम हुये हैं। आनन्द शर्मा के बड़े स्तर पर प्रदेश में समर्थक हैं।
अनुराग और आनंद शर्मा का प्रसंग उठना इसलिये प्रसांगिक है कि यह दोनों नेता हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं। यदि प्रदेश में इन पर सवाल उठेंगे तो यह जवाब देने के लिये उपलब्ध होंगे। इस समय राहुल के खिलाफ हो रही कारवाई को भाजपा और उसके मित्र जायज ठहरा रहे हैं। ऐसे में यदि तथ्यों पर आधारित कांग्रेस शासित राज्यों में भी सवाल नहीं उठाये जाएंगे तो जनता राहुल के समर्थन में कैसे आगे आ पायेगी। जिन बुनियादी सवालों पर राहुल आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं यदि उन पर कांग्रेस शासित राज्यों में ही जन आन्दोलन न खड़ा हो पाये तो यह लड़ाई कैसे जीती जायेगी। आज यदि कांग्रेस नेतृत्व कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों की कार्यशैली पर ही नजर नहीं रख पायेगा तो 2024 की लड़ाई जितना कठिन हो जायेगा। जो आरोप भाजपा सरकारों पर लगते आये हैं यदि कांग्रेस की सरकारें भी उन्हीं आरोपों से घिर जायेगी तो जनता क्यों कांग्रेस पर विश्वास करेंगी।

क्या हिमाचल कांग्रेस राहुल के साथ हैं

राहुल गांधी ने अपना सरकारी आवास खाली कर दिया है। सूरत की एक अदालत ने मानहानि के मामले में उन्हें दो वर्ष की सजा सुना दी। इस फैसले का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लेते हुये लोकसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी और उसके बाद उन्हें सरकारी आवास खाली करने का नोटिस भी थमा दिया। राहुल ने इस आदेश की अनुपालना करते हुये आवास खाली कर दिया। सूरत की जिस अदालत ने सजा दी थी उसी ने उन्हें अपील के लिए तीस दिन का समय देते हुये अपने फैसले पर रोक भी लगा दी थी। लेकिन लोकसभा सचिवालय ने इस समय तक इन्तजार करने की बजाये तुरन्त कारवाई कर दी। लोकसभा सचिवालय की इस कारवाई पर पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रियाएं उभरी हैं और यह एक बड़ी राष्ट्र बहस का विषय बन गया है। हर राजनीतिक दल और नेता को इस पर अपना स्टैंड लेना पड़ा है। कोई भी तटस्था की स्थिति में नही रह पाया है। कानूनी लड़ाई के साथ-साथ इसका राजनीतिक पक्ष बहुत बड़ा बन गया है। क्योंकि यह सजा किसी हत्या, अपहरण, डकैती या भ्रष्टाचार के मामले में नहीं वरन चुनावी सभा में दिये गये एक ब्यान पर हुई है। बल्कि इस सजा और उस पर हुई कारवाई से देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों के भविष्य को लेकर उठे सवाल अपरोक्ष में और पुख्ता हो जाते हैं। राहुल गांधी के खिलाफ हुई कारवाई के बाद केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा खेल और युवा सेवाएं मंत्री हिमाचल के हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर द्वारा 2019 में शाहीन बाग में दिये भाषण देश के गद्दारों को गोली............ का प्रकरण भी सीपीएम नेता वृंदा करात ने सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संबद्ध पक्षों को नोटिस भी जारी कर दिये हैं। राहुल और अनुराग के ब्यानों की यदि तुलना की जाये तो अनुराग का ब्यान ज्यादा गंभीर है। अनुराग हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं और हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है। इस नाते हिमाचल में अनुराग के ब्यान पर राहुल गांधी के परिपेक्ष में प्रदेश में ज्यादा सवाल उठने चाहिये थे। इन सवालों से प्रदेश की जनता राहुल द्वारा लोकतंत्र पर उठाये प्रश्नों को अच्छी तरह से समझ सकती थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि न मीडिया ने और न ही प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने इस पर मुंह खोला। यही नहीं कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री आनन्द शर्मा इस समय किसी भी सदन के सदस्य नहीं है परन्तु उनके पास सरकारी आवास है और उसे खाली करवाने के लिये मोदी सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है। यही स्थिति गुलाम नबी आजाद, मायावती, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की है। राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रश्न उछल चुके हैं। परन्तु हिमाचल में कोई कांग्रेस नेता इस पर जुबान खोलने का साहस नही कर रहा है जबकि यहां कांग्रेस की सरकार है। आनन्द शर्मा की सांसद निधि से नादौन आदि क्षेत्रों में बहुत काम हुये हैं। आनन्द शर्मा के बड़े स्तर पर प्रदेश में समर्थक हैं।
अनुराग और आनंद शर्मा का प्रसंग उठना इसलिये प्रसांगिक है कि यह दोनों नेता हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं। यदि प्रदेश में इन पर सवाल उठेंगे तो यह जवाब देने के लिये उपलब्ध होंगे। इस समय राहुल के खिलाफ हो रही कारवाई को भाजपा और उसके मित्र जायज ठहरा रहे हैं। ऐसे में यदि तथ्यों पर आधारित कांग्रेस शासित राज्यों में भी सवाल नहीं उठाये जाएंगे तो जनता राहुल के समर्थन में कैसे आगे आ पायेगी। जिन बुनियादी सवालों पर राहुल आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं यदि उन पर कांग्रेस शासित राज्यों में ही जन आन्दोलन न खड़ा हो पाये तो यह लड़ाई कैसे जीती जायेगी। आज यदि कांग्रेस नेतृत्व कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों की कार्यशैली पर ही नजर नहीं रख पायेगा तो 2024 की लड़ाई जितना कठिन हो जायेगा। जो आरोप भाजपा सरकारों पर लगते आये हैं यदि कांग्रेस की सरकारें भी उन्हीं आरोपों से घिर जायेगी तो जनता क्यों कांग्रेस पर विश्वास करेंगी।

मलिक के ब्यान पर प्रधानमंत्री चुप क्यों?

फरवरी 2019 में घटे पुलवामा प्रकरण पर जो जानकारी तत्कालीन राज्यपाल सत्य पाल मलिक के दी वायर में आये एक साक्षात्कार के माध्यम से सामने आयी है उसने पूरे तन्त्र को सवालों में लाकर खड़ा कर दिया है। पुलवामा में सेना के काफिले में सेन्ध लगाकर घुसी एक गाड़ी में हुए विस्फोट से सी.आर.पी.एफ. के चालीस जवान शहीद हो गये थे। इस दुर्घटना को पाकिस्तान की नापाक हरकत करार दिया गया और इसका बदला बालाकोट में लिया गया। बालाकोट को ‘‘घर में घुसकर मारा’’ से देश का गुस्सा कुछ शान्त हुआ था और इसी से पूरा चुनावी परिदृश्य बदल गया था। लेकिन अब जम्मू-कश्मीर में उस समय राज्यपाल रहे सत्य पाल मलिक के साक्षात्कार से यह सामने आना कि यह सब हमारे तन्त्र की चूक के कारण हुआ है। पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। मलिक के मुताबिक सी.आर.पी.एफ. के इस ‘‘कानवाई’’ के लिए पांच हैलीकॉप्टर मांगे थे जो उसे नहीं दिये गये। उस क्षेत्र में यह आरडीएक्स से लदी गाड़ी कई दिनों से घूम रही थी जिस पर किसी ने कोई सन्देह नही किया गया। पुलवामा की मुख्य सड़क से मिलने वाले संपर्क मार्गों की कोई नाकाबन्दी नहीं की गयी थी। मलिक उस समय राज्यपाल थे और उनके पास यह सारी आधिकारिक जानकारी रही होगी। फिर जब पुलवामा घटा था तब भी मीडिया के कुछ हिस्से में यह सवाल उभरा था कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में इन जवानों को हैलीकॉप्टर से क्यों नहीं ले जाया गया था।
मलिक ने अपने साक्षात्कार ने यह भी कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस चूक से अवगत करवाया था परन्तु उन्हें प्रधानमंत्री और सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपनी जुबान बन्द रखने के लिये कहा था। अब जब मलिक का यह साक्षात्कार सामने आया है तब इस पर पूर्व सैनिक अधिकारियों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। पूर्व सेना प्रमुख जनरल शंकर राय चौधरी ने इसकी जांच किये जाने की मांग की है। बहुत सारे पूर्व सैनिक अधिकारी इस पर प्रधानमंत्री से सवाल पूछ रहे हैं क्योंकि अपनी ही चूक से अपने ही जवानों की जान चली जाये तो निश्चित रूप से इसका सेना के मनोबल पर असर पड़ेगा। प्रधानमंत्री इस पर चुप हैं। गृहमन्त्री अमित शाह की यह प्रतिक्रिया आयी है की मलिक जब राज्यपाल थे तब क्यों चुप रहे। मलिक का ब्यान कोई राजनीतिक ब्यान नही है वह तब के राज्यपाल हैं। इस पर सीधा जवाब आना चाहिये कि यह सच या झूठ है। यह देश और सेना दोनों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है और इस पर प्रधानमंत्री की चुप्पी कई और सवाल खड़े कर देती है।
मलिक के इस साक्षात्कार के बाद जिस तरह से सीबीआई ने एक इन्शयोरैन्स के मामले में उन्हें तलब किया है और उनके यहां एक गैर राजनीतिक आयोजन पर जिस तरह दिल्ली पुलिस ने कारवाई की है उससे न चाहते हुए भी यह सन्देश चला गया है कि सरकार उनसे डर रही है। क्योंकि मलिक किसान आन्दोलन के दौरान कितने मुखर थे यह पूरा देश जानता है। अभी उनके आवास पर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की खाप पंचायतों के नेता और दूसरे किसान नेता आये थे उससे उनकी लोकप्रियता का अन्दाजा लगाया जा सकता है। मलिक के ब्यान का जवाब सीबीआई की सक्रियता नहीं हो सकती न ही इस पर ज्यादा देर तक चुप रहा जा पायेगा।

नई शिक्षा नीति पर उठे सवाल

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू हो गयी है। इसे लागू करने के साथ ही कक्षा बारहवीं तक के पाठयक्रमों में एन.सी.आर.टी. ने बदलाव किया है। पाठयक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी एन.सी.आर.टी. की है। पिछले दिनों जब देश कोविड से जूझ रहा था और लॉकडाउन लगाना पड़ा था तब सबसे ज्यादा स्कूल पढ़ने वाले बच्चे प्रभावित हुये थे। ऑनलाइन क्लासें लगाई गयी थी। इसका संज्ञान लेते हुये एन.सी.आर.टी. ने 30 प्रतिशत तक पाठयक्रमों में कटौती करने का फैसला लिया। स्वभाविक है कि जब पाठयक्रम घटाया जायेगा तो निश्चित रूप से किताबों से कुछ अध्याय हटाने पड़ेंगे। इससे जिस तरह से अध्याय हटाये गये हैं उससे हटाने वालों की नीयत पर संकाएं उठना शुरू हो गयी है। क्योंकि कोविड के कारण 30 प्रतिशत पाठयक्रम बच्चों का बोझ कम करने के नाम पर घटाया गया लेकिन जब कोविड की आशंका नहीं रहेगी तब फिर से हटाये गये अध्यायों को पाठयक्रम का हिस्सा बना दिया जायेगा यी नहीं कहा जा रहा है। यही सरकार की नीयत पर संदेह का आधार बन रहा है। क्योंकि जो अध्याय हटाये गये हैं उनके बिना शिक्षण और ज्ञान दोनों अधूरे रह जाते हैं।
इस देश में अंग्रेजों से बहुत पहले मुस्लिम आ गये थे। उनका शासन भी देश में रहा है। वह देश में बस गये और यही का हिस्सा बन गये। अंग्रेजो के खिलाफ आजादी की लड़ाई में उनका भी योगदान रहा है। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई जिसे झूठलाया नहीं जा सकता। जो निश्चित रूप से सच हो उसे ही इतिहास कहा जाता है। आजादी की लड़ाई में कांग्रेस का योगदान दूसरों से अधिक रहा है। गांधी उसके नायक रहे हैं। मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन इस लड़ाई में देश के हवाले कर दिया था। क्या इन तथ्यों को झूठलाया जा सकता है शायद नहीं। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की आजादी की लड़ाई में रही भूमिका पर जो सवाल भाजपा नेता डा. स्वामी ने उठाये हैं क्या उनका जवाब किसी ने आज तक दिया है? गांधी, नेहरू और मुगल इतिहास के अध्यायों को पाठयक्रम से हटाकर इतिहास से नहीं मिटाया जा सकता। ईसा को किसी पाठय पुस्तक में अपशब्द कहकर उनकी महानता को कम नहीं किया जा सकता। पाठयक्रमों में मनुस्मृति और श्री मदभगवत् गीता को जोड़कर इतिहास को नये सिरे से नहीं लिखा जा सकता। जो प्रयास संघ के इतिहास लेखन प्रकोष्ठ के माध्यम से किया जा रहा है।
पाठयक्रमों से अध्यायों को हटाने जोड़ने से ज्यादा संवेदनशील मुद्दा यह है कि अब बच्चों को पाठयक्रमों में विस्तृत चुनाव पर विकल्प दे दिये गये हैं। अब पाठयक्रम ‘‘अतिरिक्त पाठयक्रम’’ या सह पाठयक्रम कला, मानविकी और विज्ञान अथवा व्यवसायिक या अकादमिक धारा जैसी कोई श्रेणीयां नहीं होगी। यह विषय बच्चों की रूची के अनुसार पाठयक्रम में शामिल किये जायेंगे। पहले प्लस टू के बाद बच्चा एक धारा विशेष में जाने का पात्र हो जाता था। क्योंकि सारी व्यवसायिक शिक्षा प्लस टू के बाद पंचवर्षीय हो चुकी है। अब क्योंकि कोई धारा ही नहीं होगी तो वह अगला विकल्प क्या और कैसे चुनेगा। दो वर्ष बाद जो बच्चे प्लस टू करके निकलेंगे उनके लिये यह व्यवहारिक कठिनाई खड़ी होगी। इस समय जो बहस पाठयक्रमों में कटौती करके हटाये गये अध्यायो पर केंद्रित होकर रह गई है उसमें प्लस टू के बाद आने वाली स्थिति पर विचार करना आवश्यक है।

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