Wednesday, 06 May 2026
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एचपीयू के शोध केंद्रों पर उठते सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में 22 जुलाई 2025 को स्थापना दिवस के अवसर पर शुरू किए गए पांच नए शोध केंद्रों को उस समय बड़े बदलाव की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने दावा किया था कि ये केंद्र ‘‘कैंपस टू कम्युनिटी’’ के विज़न को आगे बढ़ाएंगे और विश्वविद्यालय को शोध व नवाचार के नये दौर में ले जाएंगे। उद्घाटन के दौरान मंत्री अनिरुद्ध सिंह की मौजूदगी ने इस पहल को और महत्व दिया था।
हालांकि, लगभग एक साल बाद इन केंद्रों की वास्तविक स्थिति उम्मीदों के अनुरूप नहीं दिख रही है। जिन केंद्रों से ठोस शोध और सामाजिक प्रभाव की उम्मीद थी, वे फिलहाल सीमित गतिविधियों तक सिमटे नजर आते हैं। सेमिनार, वर्कशॉप और एमओयू तक ही इनकी सक्रियता दिखाई देती है। ग्रीन एनर्जी और नैनोटेक्नोलॉजी से जुड़े कुछ प्रयासों को छोड़ दें, तो बाकी केंद्रों की जमीनी उपस्थिति स्पष्ट नहीं है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या इन केंद्रों की स्थापना केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
इस स्थिति का असर विश्वविद्यालय के पारंपरिक विभागों पर भी पड़ा है। सोशल वर्क, सोशियोलॉजी, एनवायरनमेंटल साइंस, फॉरेंसिक स्टडीज और डिफेंस स्टडीज जैसे विभाग पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि इन विभागों की जरूरतों को नजरअंदाज कर नए केंद्रों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे शैक्षणिक असंतुलन पैदा हो रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शन इसी असंतोष को दर्शाते हैं।
विवाद को और बढ़ाने वाला मुद्दा वर्ष 2026 के विश्वविद्यालय कैलेंडर से जुड़ा है। आरोप है कि इसमें इस्तेमाल की गई तस्वीरें वास्तविक नहीं बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार की गई हैं। यदि यह सही है, तो यह केवल प्रस्तुति का मामला नहीं बल्कि पारदर्शिता और विश्वसनीयता का भी सवाल है। एक शैक्षणिक संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी उपलब्धियों को वास्तविक तथ्यों के आधार पर ही प्रस्तुत करे। अन्यथा बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे संस्थान की साख को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शोध केंद्र को सफल बनाने के लिए पर्याप्त फंडिंग, योग्य फैकल्टी, स्पष्ट कार्ययोजना और निरंतर निगरानी जरूरी होती है। इन आधारभूत चीजों के बिना कोई भी केंद्र केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।
अब 22 जुलाई 2026 को इन केंद्रों को एक साल पूरा होगा, जो विश्वविद्यालय के लिए एक अहम परीक्षा जैसा होगा। इस दौरान यह साफ हो जाएगा कि ये केंद्र अपने उद्देश्यों को कितना पूरा कर पाये हैं। यह मुद्दा केवल पांच शोध केंद्रों का नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता और प्राथमिकताओं से जुड़ा है। यदि प्रशासन समय रहते सुधार करता है, तो स्थिति बेहतर हो सकती है, अन्यथा इसका असर छात्रों और शोधार्थियों के भरोसे पर पड़ सकता है।

वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और महिलाओं की अनदेखी पंचायत चुनावों में बड़ा मुद्दा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस इन दिनों जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल सामान्य अंदरूनी असंतोष नहीं बल्कि एक गहरे संगठनात्मक संकट की ओर इशारा करता है। पंचायत चुनावों से ठीक पहले पार्टी के भीतर उठ रही बगावत की आवाजें अब खुलकर सामने आ रही हैं और इस बार इनका सीधा निशाना प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल पर साधा गया है। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा विप्लव ठाकुर ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि निर्णय प्रक्रिया शिमला तक सीमित बैठकों में सिमट गई है और जमीनी हकीकत से दूरी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि फैसले केवल सीमित दायरे और कुछ चुनिंदा लोगों की राय के आधार पर लिये जाएंगे, तो संगठन की मजबूती और विस्तार पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। यह ब्यान किसी एक व्यक्ति पर हमला भर नहीं, बल्कि उस कार्यप्रणाली की आलोचना है जिसे लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था।
इस असंतोष को सबसे ज्यादा हवा हाल ही में घोषित 71 ब्लॉक अध्यक्षों की सूची ने दी है, जिसने संगठन के भीतर विवाद को खुला रूप दे दिया। इस सूची में एक भी महिला को स्थान नहीं मिलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है, खासकर तब जब हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की आबादी लगभग आधी है और पंचायत स्तर पर उनकी भागीदारी 52 प्रतिशत से भी अधिक है। यह तथ्य न केवल महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में संगठनात्मक ढांचे में उनकी पूरी तरह अनदेखी पार्टी की रणनीतिक सोच पर सवाल खड़े करती है। विप्लव ठाकुर ने इसे जल्दबाजी और सिफारिश आधारित नियुक्तियां बताते हुए कहा है कि इससे न केवल जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई है बल्कि सामाजिक संतुलन भी बिगड़ा है, जो आने वाले चुनावों में नुकसानदायक साबित हो सकता है।
पिछले कुछ महीनों में सामने आये बयानों को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि असंतोष किसी एक फैसले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई स्तरों पर जमा हो रही नाराजगी का परिणाम है। वरिष्ठ नेता कौल सिंह ठाकुर ने लगातार सरकार और संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया और जिन अधिकारियों को वे पास रखना चाहते थे, उन्हें दूर भेज दिया गया। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा अपने मं़ित्रयों को फ्री हैंड नहीं दिया जा रहा, जबकि मंत्री सक्षम हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। हाल ही में उनका यह बयान कि यदि मंडी की जनता उन्हें जिताती तो वे मुख्यमंत्री होते, पार्टी के भीतर चल रही नेतृत्व संबंधी खींचतान को सार्वजनिक रूप से उजागर करता है। इसी तरह नीरज भारती भी कई मौकों पर अपनी नाराजगी जता चुके हैं, जिससे यह साफ हो जाता है कि यह असंतोष अलग-अलग गुटों में फैल चुका है और अब इसे दबा पाना आसान नहीं रह गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी एक बड़ा कारण है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली को लेकर भी पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं। आरोप यह है कि निर्णय प्रक्रिया में केंद्रीकरण बढ़ा है और जमीनी स्तर से मिलने वाले फीडबैक को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। इससे कार्यकर्ताओं में यह भावना पैदा हो रही है कि उनकी भूमिका सीमित हो गई है और यही निराशा अब बगावत के रूप में सामने आ रही है।
पंचायत चुनावों के संदर्भ में यह बगावत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि स्थानीय चुनावों में व्यक्तिगत छवि और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 के पंचायत चुनावों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बागी उम्मीदवारों का असर कितना गहरा हो सकता है। उस चुनाव में लगभग 20 से 25 प्रतिशत सीटों पर बागी उम्मीदवार मैदान में थे और करीब 10 से 15 प्रतिशत मामलों में उन्होंने जीत दर्ज की थी। कई जगहों पर वोटों के विभाजन ने आधिकारिक समर्थित उम्मीदवारों को सीधे नुकसान पहुंचाया, जिसका फायदा विपक्षी उम्मीदवारों को मिला। इस बार भी यदि यही स्थिति बनी रहती है तो कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं का रुझान भी इस समीकरण को प्रभावित करता है। पंचायत चुनावों में अकसर पार्टी की बजाये उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, उसका सामाजिक जुड़ाव और स्थानीय स्तर पर उसकी सक्रियता अधिक मायने रखती है। ऐसे में यदि बागी उम्मीदवार अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं तो वे आसानी से पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को चुनौती दे सकते हैं। महिलाओं की अनदेखी जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बन सकते हैं, जो कांग्रेस के खिलाफ माहौल तैयार कर सकते हैं।
कुल मिलाकर हिमाचल कांग्रेस में उभरती यह बगावत केवल असंतोष का प्रदर्शन नहीं बल्कि एक बड़े संगठनात्मक असंतुलन का संकेत है, जिसमें ‘नारी शक्ति’ का सवाल अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैक्टर बनकर उभर रहा है। यदि नेतृत्व समय रहते इस असंतोष को दूर करने और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने में विफल रहता है, तो पंचायत चुनावों में इसका सीधा नुकसान देखने को मिल सकता है। वहीं यदि पार्टी इस स्थिति को सुधारने के अवसर के रूप में लेती है और संगठनात्मक ढांचे में संतुलन स्थापित करती है, तो यही मुद्दा उसके पक्ष में भी जा सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि हिमाचल की राजनीति में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और पंचायत चुनाव इस बगावत और ‘नारी शक्ति’ के सवाल का पहला बड़ा इम्तिहान साबित होंगे, जहां यह तय होगा कि यह असंतोष केवल आवाज बनकर रह जाएगा या फिर राजनीतिक समीकरणों को बदलने वाली ताकत में तब्दील होगा।

हिमाचल का 54,928 करोड़ रूपये का बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 का 54,928 करोड़ रुपये का बजट राज्य की आर्थिक दिशा, सामाजिक प्राथमिकताओं और विकास की रणनीति का व्यापक दस्तावेज है। यह बजट ऐसे समय में आया है जब राज्य को राजस्व घाटे, सीमित संसाधनों और बढ़ती विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना है। इसके बावजूद सरकार ने 8.3 प्रतिशत की अनुमानित आर्थिक वृद्धि दर, 2,83,626 रुपये की प्रतिव्यक्ति आय और 2.54 लाख करोड़ रुपये के सकल घरेलू उत्पाद का लक्ष्य निर्धारित कर यह संकेत दिया है कि विकास की गति बनाए रखने की ठोस कोशिश की जा रही है।
इस बजट का सबसे बड़ा फोकस ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका सुदृढ़ीकरण पर है। डेयरी क्षेत्र में सहकारी समितियों की संख्या को दोगुना कर 2,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। दूध उत्पादकों को मिलने वाला प्रोत्साहन 3 रुपये से बढ़ाकर 6 रुपये प्रति लीटर किया गया है, जिससे सीधे हजारों किसानों को लाभ मिलेगा। पशुपालक समुदायों गद्दी, गुज्जर, किन्नौरा आदि के 40,000 से अधिक परिवारों के लिए 300 करोड़ रुपये की विशेष योजना शुरू की जाएगी। ऊन के लिए 100 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है, जो पशुपालकों की आय बढ़ाने में सहायक होगा।
कृषि क्षेत्र में भी सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। गेहूं का समर्थन मूल्य 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम किया गया है, जबकि मक्का 40 से 50 रुपये, जौ 60 से 80 रुपये और हल्दी 90 से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम की गई है। पहली बार अदरक को 30 रुपये प्रति किलोग्राम के एमएसपी में शामिल करना किसानों के लिए बड़ी राहत है। ‘बीज गांव’ योजना के तहत किसानों को प्रति बीघा 5,000 रुपये की सब्सिडी और प्रत्येक गांव को 2 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा, जिससे पारंपरिक बीजों का संरक्षण और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
बागवानी और वन क्षेत्र में सरकार ने 8,000 हेक्टेयर में पौधरोपण और 4,000 हेक्टेयर में सामुदायिक वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा है। 1,100 सामुदायिक समूहों को वित्तीय सहायता दी जाएगी। ‘मिशन 32 प्रतिशत’ के तहत वर्ष 2030 तक वन क्षेत्र को 32 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अलावा, 50 नए ईको-टूरिज्म स्थलों का विकास और 50 वन विश्राम गृहों की ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती देगी।
सामाजिक कल्याण और महिला-बाल विकास के क्षेत्र में इस बजट में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 1,700 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रति माह किया गया है। ‘शुभ विवाह योजना’ के तहत पात्र महिलाओं को 51,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी। महिला सशक्तिकरण योजना के अंतर्गत 3 लाख रुपये तक का सब्सिडीयुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा, बालिकाओं और महिलाओं के पुनर्वास के लिए नई योजनाओं की शुरुआत की जाएगी।
शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता सुधार और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। 150 स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा, जबकि 150 अन्य स्कूलों को भी समान स्तर पर उन्नत किया जाएगा। राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूलों के लिए 99 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बच्चों के पोषण के लिए 17 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। उच्च शिक्षा में 389 सहायक प्राध्यापकों की भर्ती और नए व्यावसायिक पाठयक्रम शुरू किए जाएंगे।
स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट का आकार और दृष्टिकोण दोनों व्यापक हैं। नाहन मेडिकल कॉलेज के निर्माण के लिए 500 करोड़ रुपये, चंबा मेडिकल कॉलेज के विस्तार के लिए 194 करोड़ रुपये और हमीरपुर में नए डेंटल कॉलेज के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। टांडा, हमीरपुर और शिमला में आधुनिक कैंसर उपचार केंद्र स्थापित किए जाएंगे। 18 डे-केयर कैंसर सेंटर और 4 टर्शियरी केयर सेंटर स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा, 150 स्टाफ नर्स, 500 रोगी मित्र, 40 फार्मेसी अधिकारी और 30 रेडियोग्राफर सहित 1,000 से अधिक पद भरे जाएंगे।
ऊर्जा क्षेत्र में 450 करोड़ रुपये की लागत से बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा। 5 से 11 मेगावाट क्षमता की छः सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। पांवटा साहिब में 124 करोड़ रुपये और कांगड़ा में 221 करोड़ रुपये की लागत से नए उपकेंद्र बनाए जाएंगे। पंचायत स्तर पर सोलर परियोजनाओं से होने वाली आय का 30 प्रतिशत पंचायत और 20 प्रतिशत कमजोर वर्गों के कल्याण पर खर्च किया जाएगा।
पर्यटन क्षेत्र में 345 करोड़ रुपये से अधिक की राशि विकास कार्यों पर खर्च की जाएगी। कांगड़ा एयरपोर्ट के विस्तार के लिए 3,349 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही, कई नए हेलीपोर्ट्स का निर्माण और हवाई सेवाओं का विस्तार किया जाएगा, जिससे राज्य की कनेक्टिविटी में सुधार होगा।
जल आपूर्ति और स्वच्छता के क्षेत्र में लगभग 2,000 करोड़ रुपये की व्यापक योजना तैयार की गई है। 500 जल योजनाओं में शोधन संयंत्र लगाए जाएंगे और 200 किलोमीटर पुरानी पाइपलाइन बदली जाएगी। शिमला में 10,000 घरों को 24ग7 जल आपूर्ति देने का लक्ष्य रखा गया है।
सड़क और परिवहन क्षेत्र में 500 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण, 950 किलोमीटर सड़कों की टारिंग, 1,500 किलोमीटर सड़कों का नवीनीकरण और 47 पुलों का निर्माण प्रस्तावित है। प्रधानमंत्राी ग्राम सड़क योजना के तहत 2,244 करोड़ रुपये की लागत से 1,538 किलोमीटर सड़कों को स्वीकृति दी गई है।
ग्रामीण विकास के तहत 1 लाख गरीब परिवारों को ‘मुख्यमंत्री अपना सुखी परिवार योजना’ के अंतर्गत 300 यूनिट मुफ्त बिजली और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। महिलाओं को 1,500 रुपये प्रतिमाह की सहायता भी दी जाएगी।
आईटी और नवाचार क्षेत्रा में स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने और ई-गवर्नेंस को लागू करने पर जोर दिया गया है। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता और दक्षता में सुधार होगा।
कर्मचारी कल्याण के तहत एनएचएम कर्मचारियों को औसतन 14,000 रुपये की वेतन वृद्धि दी जाएगी। डॉक्टरों का वेतन 33,660 रुपये से बढ़ाकर 40,000 रुपये किया गया है। दैनिक वेतनभोगियों का वेतन 450 रुपये प्रतिदिन और आउटसोर्स कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 13,750 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्राी के वेतन में 50 प्रतिशत, मंत्रियों के वेतन में 30 प्रतिशत और विधायकों के वेतन में 20 प्रतिशत की अस्थायी कटौती की गई है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सख्त निर्णय लेने को तैयार है।
कुल मिलाकर यह बजट आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट करता है कि सरकार ने ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यटन और अवसंरचना पर व्यापक निवेश की योजना बनाई है। हालांकि, इन योजनाओं की वास्तविक सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि सरकार इन घोषणाओं को धरातल पर उतारने में सफल रहती है, तो यह बजट हिमाचल प्रदेश के लिए दीर्घकालिक और समावेशी विकास की मजबूत नींव साबित हो सकता है।

आंकड़ों के सहारे सरकार पर हमलावर जयराम

विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर उजागर
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बजट 2026-27 पर चर्चा के दौरान सियासी टकराव तेज हो गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के बजट को ‘प्रदेश को गुमराह करने वाला झूठ का पुलिंदा’ करार दिया।
जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि सरकार ने अधिकांश योजनाओं की घोषणाएं बिना पर्याप्त बजट प्रावधान के की हैं और पिछले तीन वर्षों में घोषित कई योजनाएं जमीन पर उतर ही नहीं पायी। उन्होंने कहा कि बजट का आकार स्थिर रहना और प्रमुख क्षेत्रों में लगातार कटौती विकास की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उनके अनुसार, 2024-25 की तुलना में पिछले वर्ष मेजर सेक्टर में 2354 करोड़ (21%) की कमी आई, जबकि आगामी वित्त वर्ष में यह कटौती 3188 करोड़ (41.77%)तक पहुंच गई है। सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, ग्रामीण विकास, कृषि और सड़क जैसे क्षेत्रों में कटौती को उन्होंने ‘आत्मनिर्भर हिमाचल’ के दावों के विपरीत बताया।
उन्होंने कहा कि पूंजीगत व्यय तीन वर्षों में घटकर लगभग आधा रह गया है, जबकि राजस्व घाटा लगातार बढ़ रहा है। पिछले चार बजटों में औसतन 10,620 करोड़ रुपये का घाटा वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़ा करता है। रोजगार के मुद्दे पर उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार के दौरान सरकारी नौकरियों में वृद्धि हुई थी, जबकि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में लगभग 15 हजार नौकरियां कम हो गई हैं। उनके मुताबिक, 2022 में जहां सरकारी कर्मचारियों की संख्या 1.90 लाख के करीब थी, वहीं 2025 में यह घटकर 1.75 लाख रह गई है।
केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र पर आरोप लगाती है, जबकि वास्तविकता यह है कि राजस्व प्राप्तियों में केंद्र की हिस्सेदारी पिछले तीन वर्षों में 56%, 54% और 53.6% रही है। केंद्रीय करों, अनुदानों और योजनाओं के माध्यम से राज्य को निरंतर वित्तीय सहयोग मिलता रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि खेत बाड़ाबंदी योजना का बजट 40 करोड़ से घटाकर 10 करोड़ कर दिया गया है, जबकि बिजली सब्सिडी 1562 करोड़ से घटकर 858 करोड़ रह गई है। हिमकेयर जैसी योजनाओं में भी कटौती के संकेत बताये गये। उन्होंने वेतन प्रावधानों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि 2026-27 के बजट में वेतन के लिए 14,721 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जो पिछले वर्ष से मात्र 5 करोड़ अधिक है, जिससे महंगाई भत्ता देने की मंशा पर संदेह होता है। साथ ही, वेतन स्थगन के संकेतों को उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध बताया।
जयराम ठाकुर ने बजट भाषण और दस्तावेजों के आंकड़ों में अंतर का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जहां बिजली रॉयल्टी 2,500 करोड़ बताई गई, वहीं बजट में प्राप्ति 2,191 करोड़ दिखाई गई है, जो दावों और वास्तविक आंकड़ों के बीच अंतर को दर्शाता है। इसी तरह आबकारी राजस्व अनुमान में भी गिरावट दर्ज की गई है।
उन्होंने अंत में सवाल उठाया कि जब बजट के आंकड़े ही सरकार के दावों का समर्थन नहीं कर रहे, तो विकास के दावे कितने विश्वसनीय हैं। वहीं, सरकार की ओर से बजट को संसाधन- आधारित और संतुलित बताते हुए इन आरोपों को खारिज किया जा रहा है।

सवालों के घेरे में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, संकट से उबरना चुनौती

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, दशकों से प्रदेश की उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी विश्वविद्यालय से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित अनेक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स, आईपीएस अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं। आज भी हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रमुख परीक्षाओं में इस विश्वविद्यालय के छात्रा बड़ी संख्या में सफलता हासिल करते हैं, जो इसकी शैक्षणिक परंपरा और क्षमता को दर्शाता है।
2 जून 2025 को विश्वविद्यालय की कमान नए कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने संभाली। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि विश्वविद्यालय शैक्षणिक और प्रशासनिक दृष्टि से अपने सबसे निम्न स्तर पर पहुंच चुका है और इसे ‘पाताल लोक’ से बाहर निकालना अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद कुलपति ने पहला बड़ा निर्णय लेते हुए परिसर में पांच नए सेंटर खोलने की घोषणा की।
हालांकि इससे जुड़ा एक गंभीर प्रश्न भी सामने आता है। वर्ष 2023 की कैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि विश्वविद्यालय के कई विभागों में 30 से 79 प्रतिशत तक बुनियादी उपकरणों की कमी है। जिन विभागों का जिक्र कैग की रिपोर्ट में किया गया है, वे विश्वविद्यालय के लगभग 30-35 वर्ष पुराने विभाग हैं।
इसी विषय पर जब कैग की रिपोर्ट के संदर्भ में कैग द्वारा ही हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुल सचिव से यह प्रश्न किया गया कि यदि विश्वविद्यालय के विभागों में इतनी बड़ी संख्या में बेसिक इंस्ट्रूमेंट की कमी है, तो क्या इससे छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान से वंचित नहीं होना पड़ेगा?
इस पर उनका जवाब था कि विश्वविद्यालय के पास उपकरण और इक्विपमेंट खरीदने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जब पुराने और मूलभूत विभागों में आवश्यक तकनीकी सुविधाओं और उपकरणों का अभाव है, तो क्या विश्वविद्यालय को पहले इन विभागों को सशक्त बनाना चाहिए या नए विभाग और सेंटर खोलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
स्थिति का एक और उदाहरण फोरेंसिक साइंस विभाग है, जिसे वर्ष 2021 में शुरू किया गया था। वर्तमान में यह विभाग एक सस्ती राशन की दुकान के साथ संचालित हो रहा है। यह स्थिति न केवल बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करती है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। कई पुराने विभागों में छात्रों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था तक नहीं है और प्रयोगशालाओं में आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं।
इसी बीच विश्वविद्यालय के शिक्षक और गैर-शिक्षक समुदाय की समस्याएं भी लगातार सामने आती रही हैं। पिछले वर्ष कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलने के कारण महीने में लगभग 5 से 7 दिन तक हड़ताल की स्थिति बनी रही थी। वर्तमान में भी पदोन्नति, नियुक्तियों और अन्य प्रशासनिक मांगों से जुड़ी समस्याओं के कारण समय-समय पर आंदोलन और विरोध देखने को मिलते रहे हैं।
कुलपति ने ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही। यह भी दावा किया गया कि प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जाएंगे। हालांकि दूसरी ओर आईआईटी मंडी ने 2025 में बिना किसी प्रचार के डिजास्टर मैनेजमेंट विभाग के साथ मिलकर एआई आधारित लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया, जिसे मंडी सहित हिमाचल प्रदेश के कई संवेदनशील क्षेत्रों में स्थापित किया जा रहा है। लगभग 90 प्रतिशत सटीकता वाला यह सिस्टम आपदा प्रबंधन के क्षेत्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है और इसे ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल का एक सफल उदाहरण भी माना जा रहा है।
इसके अलावा विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पिछले नौ महीनों में छात्रों या छात्र संगठनों के बीच हिंसक घटनाओं में कोई विशेष कमी देखने को नहीं मिली है। हाल ही में विधि विभाग में एक छात्र द्वारा दूसरे छात्र को चाकू मारने की घटना ने भी विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
सार्वजनिक मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना कि विश्वविद्यालय ‘पाताल लोक’ में पहुंच चुका है या इसका शैक्षणिक स्तर अत्यंत निम्न हो चुका है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसी टिप्पणियों से न केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि उन हजारों पूर्व छात्रों का भी मनोबल प्रभावित होता है जिन्होंने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न क्षेत्रों चाहे वह राजनीति हो, प्रशासनिक सेवाएं हों, न्यायिक सेवाएं हों या शिक्षा का क्षेत्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हर वर्ष प्रशासनिक सेवाओं में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रहे हैं। न्यायिक सेवाओं में भी विश्वविद्यालय के छात्र लगातार आगे आ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के परिणामों में भी बड़ी संख्या में सफल अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को ‘निम्न स्तर’ या ‘पाताल लोक’ में पहुंचा हुआ बताना वास्तव में उचित है?
अब जबकि कुलपति को पदभार संभाले लगभग नौ महीने हो चुके हैं, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पिछले नौ महीनों में विश्वविद्यालय वास्तव में ‘पाताल लोक’ से बाहर निकल पाया है, या फिर यह केवल अखबारों और घोषणाओं तक ही सीमित रह गया है? प्रदेश की जनता, छात्रा और विश्वविद्यालय समुदाय अब इस बात का उत्तर ठोस कार्यों के रूप में देखना चाहते हैं।
 

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