पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के परिणाम क्या रहेंगे यह तो परिणाम आने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो पायेगा। लेकिन जिस तरह राजनीतिक व्यवहार राजनीतिक दलों का सामने आता जा रहा है उससे यह संकेत उभर रहे हैं कि इन चुनावों में भाजपा को बड़ा नुकसान होने जा रहा है। भाजपा का यह नुकसान कांग्रेस का ही लाभ रहेगा यह पूरी स्पष्टता से नहीं कहा जा सकता क्योंकि दूसरे दल भी चुनाव में हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि यह परिणाम देश की राजनीति पर एक गहरा और दुर्गामी प्रभाव डालेंगे। क्योंकि इस समय देश 1975 के आपातकाल जैसी स्थितियों से गुजर रहा है। उस समय का आपातकाल घोषित था और आज का अघोषित है। वह आपातकाल 1975 में शुरू होकर 1977 के आम चुनाव में समाप्त हो गया था। परन्तु आज का आपात 2014 के सत्ता परिवर्तन से शुरू होकर आज तक चला आ रहा है। उस समय के आपातकाल में देश की आर्थिकी मजबूत हुई थी और आज के अघोषित आपात में आर्थिकी ही सबसे ज्यादा कमजोर हुई है। क्योंकि योजनाबद्ध तरीके से सारे अदारे निजी क्षेत्र के हवाले कर दिये गये हैं। इसमें आम आदमी के हिस्से में केवल कर्ज आया है। 2014 के सत्ता परिवर्तन के समय केंद्र सरकार का कुल कर्ज 55000 करोड़ था जो 2023 में बढ़कर 1.5 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो गया है। राज्य सरकारों का ही कर्ज 70 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है। जिस अनुपात में कर्ज बड़ा है उसी अनुपात में महंगाई और बेरोजगारी भी बड़ी है। सत्ता परिवर्तन से लेकर अब तक जो कुछ घटा है वह सब आज चर्चा का विषय बना हुआ है। केंद्र सरकार को अपनी अब तक की सारी उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने के लिए विकसित भारत संकल्प यात्रा प्रशासन के सहयोग से आयोजित करनी पड़ रही है। कुल मिलाकर देश के सामने एक ऐसी स्थिति निर्मित हो गई है जहां प्रत्येक नागरिक को भविष्य के हित में एक सुविचारित फैसला लेने की घड़ी आ गई है। इस फैसले के लिए यह ध्यान में रखना होगा कि यदि आर्थिकी बची रहेगी तो दूसरी चीजें देर सवेर संभल जायेंगी। इस समय सत्ता जिस तरह से आर्थिकी के सवाल को मन्दिर-मस्जिद और हिन्दू-मुस्लिम के आवरणों से ढकने का प्रयास कर रही है क्या वह किसी भी गणित से एक लाभकारी प्रयोग हो सकता है। आज जिस देश की आधी से अधिक आबादी को सरकार के मुफ्त राशन पर जीने के कगार पर पहुंचा दिया गया हो उस देश का भविष्य क्या होगा यह सोचने का विषय है। जिन नीतियों और योजनाओं के कारण महंगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बढ़ा हो क्या उसका समर्थन किया जा सकता है। इस समय हर राज्य सरकार का आकलन कर्ज और मुफ्ती के बिन्दुओं पर करना होगा चाहे वह किसी भी दल की सरकार हो। क्योंकि मुफ्ती के वायदे केवल कर्ज के सहारे ही पूरे किये जा सकते हैं और बढ़ता कर्ज किसी भी विकास का कोई मानदण्ड नहीं होता है। इसलिए इन चुनावों में मतदाताओं को इन बिन्दुओं का आकलन करके ही मतदाता का फैसला लेना होगा।


















जहां तक इस गणना से हिन्दू समाज में विभाजन होने का आरोप लगाया जा रहा है वह अपने में ही निराधार है। क्योंकि हिन्दू समाज उच्च वर्गों का ही एक अधिकार नहीं है। पिछले दिनों जब हिन्दू धर्म में व्याप्त मठाधिशता पर कुछ तीखे सवाल आये तब उसे सनातन पर प्रहार के रूप में क्यों देखा गया? इसका तीव्र विरोध करने का आवहान क्यों किया गया? तब धर्म में फैले ब्राह्मणवाद के एकाधिकार पर उठते सवालों से बौखलाहट क्यों फैली? क्या बड़े-बड़े मंदिरों के निर्माण से ही समाज से भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई से निजात मिल पायेगी? शायद नहीं? बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि ऐसे मंदिरवादी प्रयोगों से ही धर्म का ज्यादा ह्रास हो रहा है। नई पीढ़ी को इन भव्य मंदिरों के माध्यम से धर्म से बांधकर रखने के प्रयास फलीभूत नहीं होंगे।
जो लोग इस गणना को चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं और इस प्रयोग को हिन्दुओं को विभाजित करने का प्रयास मान रहे हैं उन्हें यह समझना होगा कि यह तर्क किन लोगों की तरफ से आ रहा है? भारत बहु धर्मी बहु जाति और बहु भाषी देश है। इसमें देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का प्रयास कौन लोग कर रहे हैं? कौन लोग मनुस्मृति को स्कूली पाठयक्रम का हिस्सा बनाने की वकालत कर रहे हैं? कौन लोग आज देश के मुस्लिम समाज को संसद और विधानसभाओं से बाहर रखने का प्रयास कर रहे हैं? क्या ऐसे प्रयासों से पूरा देश कमजोर नहीं हो रहा है? इंण्डिया से भारत शब्दों के बदलाव से ही नहीं बना जायेगा। उसके लिये ”वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा पर व्यवहारिक रूप से आचरण करना होगा। संविधान की प्रस्तावना से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद शब्दों को हटाने की मानसिकता ने देश में जातिगत जनगणना की आवश्यकता को जन्म दिया है। इस वस्तु स्थिति में यह जनगणना पहली आवश्यकता बन गयी है ताकि यह पता चल सके कि किसके पास कितने संसाधन पहुंचे हैं? देश की शासन-प्रशासन व्यवस्था में किसकी कितनी भागीदारी हो पायी है।






इस समय नर्सी केेजी से ही निजी से प्राइवेट सेक्टर शिक्षा में बराबर का भागीदार बना हुआ है। हिमाचल जैसे राज्य में भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या करीब 45% है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वालों बच्चों की संख्या 55% है। यहीं से शिक्षा में यह विसंगति आनी शुरू हो जाती है। क्योंकि राजनेताओं से लेकर प्रशासकों और शिक्षकों तक के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इससे सरकारी स्कूलों का प्रबंधन और स्तर प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले कमजोर पड़ता जा रहा है। इस समय नई शिक्षा नीति की भूमिका में ही यह कहा गया है की खाड़ी देशों में हेल्परों की बहुत आवश्यकता है और हमारे बच्चों को आसानी से वहां रोजगार मिल जाएगा इसलिए नई शिक्षा नीति में व्यवसायिक प्रशिक्षण को विशेष बल दिया गया है। यह शिक्षा नीति सरकारी स्कूलों में तो शुरू हो जाएगी लेकिन क्या महंगे प्राइवेट स्कूलों में भी लागू हो पायेगी। इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। ऐसे में जब स्कूल स्तर पर से ही यह मनोवैज्ञानिक व्यवस्था ऐसी बना दी जायेगी कि गरीब का बच्चा तो हेल्पर बनने की मानसिकता से पढे़गा और अमीर का बच्चा इंजीनियर डॉक्टर और वकील बनने के लिए पढ़ेगा तो तय है कि सरकारी स्कूलों की व्यवहारिक स्थिति इससे भी बत्तर होती जायेगी।
शिक्षा और स्वास्थ्य हर व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताएं बन चुकी है। इसलिए यहां बड़ा बाजार बनती जा रही है। यह बाजारीकरण ही सामाजिक असमानता का मूल बनता जा रहा है। शिक्षा में अटल आदर्श विद्यालय और राजीव गांधी डे बोर्डिंग स्कूल खोलकर राजनीतिक आकाओं के आगे तो स्थान बनाया जा सकता है लेकिन इससे समाज में बढ़ती गैर बराबरी को नहीं रोका जा सकेगा। आने वाले समाज में यह बाजारीकरण सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा यह तय है। विश्व बैंक की इन रिपोर्ट का व्यवहारिक संज्ञान लेकर इस वस्तु स्थिति के लिये जिम्मेदार तंत्र को जवाब देह बनाने के लिये अभी से कदम उठाने होंगे अन्यथा हर बार यह रिपोर्ट आती रहेगी और देश प्रदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का पात्र बनते रहेंगे।