Wednesday, 04 February 2026
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मोदी सरकार के आर्थिक फैसलों पर उठते सवाल

शिमला/शैल। किसी भी सरकार की प्रमुख कसौटी उसके आर्थिक फैसले होते हैं क्योंकि इन फैसलों का सीधा प्रभाव देश के हर नागरिक पर पड़ता है। कोई भी व्यक्ति ज्यादा देर तक इन फैसलों पर तटस्थ नही रह सकता है। यदि वह प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष में सरकार का समर्थक होगा तो इन फैसलों को जायज ठहराने के लिये तर्क तलाश लेगा। लेकिन जो व्यक्ति किसी भी दल का सदस्य नही होगा वह इन फैसलों पर अपनी बेबाक प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे उस समय पूरा देश मंहगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलित था। अन्ना का आन्दोलन उस रोष का प्रखर मूर्त रूप था। उस समय देश कांग्रेस और यू.पी.ए. के शासन का विकल्प तलाश रहा था। उस समय पूरा रजनीतिक ध्रुवीकरण एन.डी.ए. और यू.पी.ए. की शक्ल में सामने था। इनका कोई तीसरा कारगर विकल्प देश के सामने नही था। इसलिये यू.पी.ए. का विकल्प एन.डी.ए में सारा सत्ता समीकरण केवल भाजपा के गिर्द ही केन्द्रित होकर रह जायेगा यह शायद एन.डी.ए. के घटक दलों को भी अन्दाजा नही था। भाजपा क्योंकि एन.डी.ए. का केन्द्र बिन्दु बन गयी और मोदी कैसे उसके एक मात्र केन्द्रित नेता बन गये इसके कई कारण रहे हैं। लेकिन सत्ता परिवर्तन में ‘‘अच्छे दिन आयेंगे’’ ‘‘काला धन वापिस आने से हर व्यक्ति के खाते मे पन्द्रह लाख आयेंगे’’- इन नारों ने बड़ी प्रमुख भूमिका निभाई है।
इन नारों के प्रलोभन से बनी मोदी सरकार ने जब देश के सामने अपनी आर्थिक सोच और कार्यक्रम रखे और इन्हे अमली जामा पहनाने के लिये फैसले लेने शुरू किये तब मंहगाई, बेरोजगारी को लेकर बुने गये सारे सपनों की हवा निकल गयी। मंहगाई और बेरोजगारी घटने की बजाये और बढ़ गयी। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी तीन वर्षों में कोई ठोस परिणाम सामने नही आये हैं। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ की गयी हर कारवाई के पीछे अब शुद्ध राजनीतिक की गंध आने लगी है। हमारे ही मुख्यमन्त्री के मामले में वीरभद्र के साथ सह अभियुक्त बने उनके एल.आई.सी. एजैन्ट आनन्द चैहान एक वर्ष से अधिक से ईडी की हिरासत में चल रहे हैं और वीरभद्र के खिलाफ अभी तक ईडी अनुपूरक चालान तक दायर नही कर पायी है। यही नही वीरभद्र सिंह के चुनाव शपथ पत्र को लेकर आयी दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी पर अब तक कोई कारवाई न होना तथा दिल्ली से लेकर शिमला तक पूरे भाजपा नेतृत्व का इस पर खामोश रहना भाजपा की ईमानदारी और हल्की राजनीतिक का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा भ्रष्टाचार पर केवल राजनीतिक करना चाहती है कारवाई नही।
मोदी सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक फैसला नोटबंदी रहा है। इस फैसले से आंतकवाद और कालेधन की कमर तोड़ने के दावे किये गये थे। लेकिन इस फैसले के बाद भी आंतकी घटनाओं में कोई कमी नही आयी है। जाली नोट नये कंरसी के जारी होने के साथ ही बाज़ार में आ गये थे। रिजर्व बैंक ने स्वयं स्वीकारा है कि 500 ओर 1000 के पुराने नोट 99% उसके पास वापिस आ गये हैं। स्वभाविक है कि इन पुराने नोटों के बदले में इनके धारकों को नये नोट दिये गये हैं क्योंकि आर.बी.आई. ने यह नही दावा किया है कि पुराने 99% वापिस आये नोटों में इतने कालेधन के नोट थे ओर उनके बदले में नये नोट नही दिये गये हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि या तो कालेधन को लेकर किये जा रहे स्वामी रामदेव जैसे लोगों के सारे आंकलन और दावे कोरे बकवास थे या फिर नोट बंदी के माध्यम से सारे कालेधन को सफेद करने का अवसर मिल गया। इस नोटबंदी से आर्थिक विकास की दर में कमी आयी है यह देश के सामने स्पष्ट हो चुका है। बल्कि पुरानी कंरसी को नयी कंरसी के साथ बदलने में जो देश का खर्च हुआ है आज उसे जीएसटी जैसे फैसलों से भरने का प्रयास किया जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान को हाइटैक करने के लिये जो साधन मोदी को अंबानी और अदानी समूहों द्वारा उपलब्ध करवाये गये थे आज उसकी कीमत चुकाने के लिये हर बड़े व्यापारिक फैसले का लाभार्थी इन उद्योग घरानों को बनाया जा रहा है। यह भी अब देश के सामने स्पष्ट हो चुका है।
आज संभवतः इसी कारण से वित्त मन्त्री अरूण जेटली के फैसलों को लेकर बाजपेयी के समय रहे वित्त मन्त्री यशवन्त सिन्हा ने विवश होकर अपना मुंह खोला है। सिन्हा के स्वर के साथ ही शत्रुघन सिन्हा और डा. स्वामी भी जेटली को असफल वित्त मन्त्री करार दे चुके हैं। बल्कि कुछ लोग तो नागपुर में पिछले दिनों हुई संघ के पूर्व प्रचारकों की बैठक के बाद एक नये आर.एस.एस के पंजीेकरण के लिये जनार्दन मून के नागपुर के सहायक चैरिटी कमीशनर के यहां से आये पंजीकरण के आवेदन को भी इसी दिशा में देख रहे हैं। क्योंकि संघ का गठन तो 27 सितम्बर 1925 को हो गया था और 47 देशों में संघ की मौजूदगी है। लेकिन इसका अपने ही देश में कोई पंजीकरण नही है और शायद इसकी अधिकांश लोगों को तो जानकारी भी नहीं है। ऐसे में आज 90 वर्ष बाद अचानक इस सवाल का नागपुर में ही उठना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संघ के ही कुछ भागों में सरकार की नीतियों और नीयत को लेकर गंभीर मतभेद पैदा हो चुके हैं।

किन मुद्दों पर लड़ा जायेगा यह चुनाव

शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा के चुनाव नवम्बर में होने तय हैं। इस चुनाव में भी मुकाबला सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच ही रहेगा यह भी तय है। क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस को पंजाब के अतिरिक्त कोई सफलता नही मिली है। इसी सफलता का परिणाम है कि आज राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री ओर लोकसभा अध्यक्ष तक देश के चारों शीर्ष पदों पर सत्तारूढ़ भाजपा का कब्जा है। भाजपा को यह सफलता क्यों और कैसे मिली है। इस पर यहां चर्चा का कोई औचित्य नही है। लेकिन यहां यह महत्वपूर्ण है कि इस सफलता से देश को क्या है। किसी भी सरकार की कसौटी उसकी आर्थिक और सामाजिक नीतियां होती है और इन्ही नीतियों की समीक्षा किसी भी चुनाव का केन्द्रिय मुद्दा होना चाहिये। इस दृष्टि से आर्थिक नीति पटल पर नोटबंदी मोदी सरकार का एक प्रमुख फैसला रहा है। यह फैसला लेने के जो भी आधार रहे हैं और इस फैसले से जो भी उपलब्धियां अपेक्षित थी वह सब आधारहीन साबित हुई है। क्योंकि जब पुराने 99% नोट सरकार के पास रिर्जब बैंक में वापिस पहुंच गये हैं और इन्हें नये नोटों से बदलना पड़ा है तो इसमें सरकार के अतिरिक्त और किसी का भी नुकसान नहीं हुआ है। सरकार ने पहले पुराने नोट छापने और उन्हे उपभोक्ता तक पहुंचाने में निवेश किया और अब नये नोटों के लिये वही सब कुछ करना पड़ा। इस फैसले से कालेधन को लेकर भी जो धारणा-प्रचार देश में पहले चल रही थी वह भी पूरी तरह सही साबित नही हुई है। इस तरह जब यह मूल फैसला ही असफल हो गया है तो इसके बाद फैसलों के भी वांच्छित परिणाम मिलना संभव नही है और यही सब कुछ हर संपति को आधार से जो जोड़ने जी एस टी लागू करने हर काम डिजिटल प्रणाली से करने आदि के फैसलो से हुआ है। इसी सबका परिणाम है पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ना और उससे हर चीज का मंहगा होना। सरकार के इन फैसलों से जनता को असुविधा हुई है रोष भी पनप रहा है क्योंकि इन सब फैसलो का लाभार्थी नीजिक्षेत्र के कुछ अंबानी-अदानी जैसे बड़े उद्योग घराने ही हुए है।
मोदी सरकार देश के युवाओं को मेक-इन-इण्डिया का एक सूत्र दिया है लेकिन इस सूत्र की व्यवहारिकता आज पूरी तरह सवालों मंे आ खड़ी हुई है। क्योकि सरकार के इस संद्धर्भ में लिये गये फैसलो की हकीकत इसके एकदम उल्ट है। बुलेट ट्रैन के फैसले को कार्यान्वित करेगा जापान। यह कहा गया है कि इस पर होने वाला करीब 1.50 लाख करोड़ का निवेश मामूली ब्याज पर जापान भारत को देगा और इसे 50 वर्षो में जापानी मुद्रा में वापिस किया जायेगाा। उस समय रूपये की कीमत जापानी मुद्रा के मुकाबले में क्या रहेगी? क्या उस समय यही एक लाख करोड़ पचास लाख करोड़ नही बन जायेगा। क्योंकि जो ऋण भारतीय मुद्रा में लिया जाता है और उसे जब ऋण देने वाले देश की मुद्रा में वापिस किया जाता है तब सारा आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिये ऐसे बड़े फैसले वर्तमान की व्यवहारिकता को देखकर लिये जाने चाहिये। आज सरदार पटेल की मूर्ति हम चीन से बनवा रहे हैं। स्मार्ट सिटी के लिये स्वीडन और मेक-इन-इण्डिया का ‘‘लोगो’’ तक तो हम खुद न बना कर स्वीटज़रलैण्ड से बनवा रहे हैं। प्रधानमन्त्री की अपनी बुलेट प्रुफ कार ही जर्मनी की बनी हुई है। ऐसे बहुत सारे फैसले ऐसे है जहां सरकार स्वयं अपनी ही मेक-इन-इण्डिया की धारणा के खिलाफ काम कर रही है। क्योंकि अभी देश इस तरह के फैसलों के लिये पूरी तरह तैयार नही है लेकिन सरकार का पूरा जोर इन फैसलों को सही प्रचारित-प्रसारित करने का एक तरह से अभियान छेड़ा गया है। जबकि आर्थिक फैसलों की कसौटी मंहगाई और बेरोजगारी का कम होना ही होता है। माना जा सकता है कि बेरोजगारी कम होने में थोड़ा समय लग सकता है लेकिन मंहगाई तो तुरन्त प्रभाव से रूकनी चाहिये जो लगातार बढ़ती जा रही है।
इसलिये आज जब जनता के पास फिर से सरकार चुनने का अवसर है तो उसे उसके सामने आने वाले  उम्मीदवारों  से इन सवालों पर खुलकर जवाब मांगना चाहिये। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कैसे उसका प्रतिनिधि जनता पर बिना कोई नया टैक्स लगाये और सरकार पर कर्ज का बोझ डाले बिना कैसे मंहगाई और बेरोजगारी की समस्याओं को हल करेगा। क्योंकि आज प्रदेश पूरी तरह कर्ज के जाल में फंस चुका है। एक लम्बे अरसे से कोई बड़ा उद्योग प्रदेश में नही आया है। जिस प्रदेश को एक विद्युत राज्य के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया गया था आज इन्ही विद्युत परियोजनाओं के कारण प्रदेश का आर्थिक सन्तुलन बुरी तरह बिगड़ गया है। क्योंकि प्रदेश में विद्युत के उत्पादन में कार्यरत नीजिक्षेत्र से सरकार को मंहगी दरों पर अनुबन्धों के कारण बिजली खरीदनी पड़ रही है लेकिन मुनाफा तो दूर उन्ही दरों पर आगे बिक नही रही है। इसी के कारण सरकार-विद्युत बोर्ड के अपने स्वामित्व वाली परियोजनाओं में हर वर्ष हजा़रों- हज़ार घन्टो का शट डाऊन चल कर इनमें उत्पादन बन्द कर रखा गया है। यह स्थिति पिछले एक दशक से अधिक समय से चली आ रही है लेकिन सरकारी तन्त्र इस संद्धर्भ में आयी शिकायतों के वाबजूद इस ओर कोई कारवाई नही कर रहा है। आज भाजपा जिस तरह से चुनावी मुद्दे लेकर आ रही है उनमें भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दे के रूप में उछाला गया है। भ्रष्टाचार सबसे बड़ा रोग है और इस पर अंकुश लगाना चाहिये इसमे कोई दो राय नही हो सकती। लेकिन यहां भाजपा को यह बताना होगा कि उसने अपने पहले के दोनो ही शासनकालों में भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या किया? क्योंकि पिछला रिकार्ड यह प्रमाणित करता है कि भाजपा ने अपने ही सौंपे आरोप पत्रों पर कोई कारवाई नही की है इसके दस्तावेजी प्रणाम आने वाले दिनों मे हम पाठकों के सामने रखेंगे। इसलिये आज प्रदेश की जनता से यह अपेक्षा है कि वह इस चुनाव में पार्टीयों के ऐजैण्डे को प्रमुखता और गंभीरता देने की बजाये उन आर्थिक सवालों पर चिन्तन करें जो हमने पाठकों के सामने रखें है और फिर अपने समर्थन का फैसला ले।

तेल कीमतों से फिर उठे नीयत ओर नीति पर सवाल

शिमला/शैल। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से केन्द्र सरकार के फैसलों को लेकर एक बार फिर वैसी ही बहस छिड़ गयी है जो नोटबंदी के फैसले के बाद उभरी थी। यह बहस इसलिये उठी है क्योंकि पिछले तीन वर्षों की तुलना में यह कीमतें अपने उच्चतम स्तर तक पहुच गयी हैं। जबकि 2014 में जब मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी और उस समय अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की जो कीमत थी उसके मुकाबले में आज 2017 में इस कीमत में 58% की कमी आयी है। अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार की कीमतों को सामने रखते हुए तो पेट्रोल-डीजल की कीमत आधी रह जानी चाहिये थी लेकिन ऐसा न होकर यह अपने उच्चतम पर पहुंच गयी। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि सरकार ने एक्साईज डयूटी बढ़ा दी। 2014 में डीजल पर 3.56 रूपये डयूटी थी जो अब 17.33 रूपये हो गयी है। पेट्रोल पर यह एक्साईज डूयटी 9.48 रूपये थी जो आज 21.48 रूपये कर दी गयी है। इन तीन वर्षों में यह डूयटी 11 बार बढ़ी है और स्वभाविक है कि जब एक्साईज डयूटी बढे़गी तो कीमतें बढ़ेगी ही। लेकिन ईंधन का सबसे बड़ा स्त्रोत तेल है और माल ढुलाई का सबसे बड़ा कारक है। इसलिये जब तेल की कीमत बढ़ेगी तो परिणामस्वरूप हर चीज की कीमत बढ़ जायेगी। इसी कारण से इन तीन वर्षों में सारे आंकड़ों और दावों के वाबजूद मंहगाई लगातार बढ़ती ही गयी है। यह तेल की कीमतें बढ़ने का जो तर्क सरकार दे रही है कि एक्साईज डयूटी से मिलने वाला पैसा जन कल्याण की योजनाओं पर खर्च होता है और हर चीज पर जन संख्या के एक बड़े वर्ग को जो सब्सिडी दी जा रही है। उसके लिये भी पैसा कहीं से तो आना है। इस परिदृश्य में सरकार के कीमतें बढ़ाने के फैसले को गल्त नही ठहराया जा सकता।
लेकिन जब इसी के साथ जुड़े दूसरे यह पक्ष सामने आते हैं कि सरकार के इन फैसलों का लाभ आम आदमी की बजाये कुछ उद्योग घरानों को ज्यादा हो रहा है तो सरकार की नीयत और नीति दोनों पर संदेह होने लगता है। क्योंकि जब सरकार के बड़े फैसलों पर नजर जाती है तब सबसे पहले डिजिटल इण्डिया का नारा सामने आता हैं परन्तु डिजिटल इण्डिया का अगुआ सरकार के उपक्रम बीएसएनएल या एमटीएनएल न बनकर रिलांयस ‘जियो’ बना। कैशलैस इकोनाॅमी का लीडर एनपीसीआई के ‘‘रूपये ’’ की जगह ’’पेटीएम’’ हो गया। फ्रांस के राफेल जेट का भागीदार हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स के स्थान पर रिलांयस का ‘‘पिपावा डिफैंस’’ हो गया। भारतीय रेल को डीजल की सप्लाई का ठेका इण्यिन आॅयल कारपोरेशन की जगह रिलांयस पैट्रोकेमिकल्स को मिल गया। आस्ट्रेलिया की खानों का टैण्डर सरकार चाहती तो सरकारी उपक्रम एमएमटीसी को एसबीआई की बैंक गांरटी पर मिल सकता था। लेकिन यह अदानी ग्रुप को मिला। इन कुछ फैसलों से यह गंध आती है कि क्या जानबूझकर सरकारी उपक्रमों को एक योजनाबद्ध तरीके से निज़िक्षेत्र का पिछलगू बनाया जा रहा है । क्योंकि जब निजिक्षेत्र केा इस तरह के लाभ पहुंचाये जाते है तो उनसे बदले में पार्टीयों को चुनावी चंदा मिल जाता है जो सरकारी उपक्रमों से संभव नही हो सकता। और इससे आम आदमी तथा सरकार दोनों का नुकसान होता है। यदि निजिक्षेत्र की जगह सरकारी उपक्रमों को आगे बढ़ाया जायेगा तो इससे सीधा लाभ सरकार को होगा। जो लाभ रिलांयस और अदानी ग्रुप को दे दिये गये हैं यदि यही लाभ सरकारी क्षेत्र को मिलते तो एक्साईज डूयटी बढ़ाकर तेल की कीमतें बढ़ाने की आवश्यकता नही पड़ती।
आज आम आदमी काफी जागरूक हो चुका है वह सरकार के फैसलों को समझने लगा है। उसे जो अच्छे दिन आने का सपना दिखाया गया था वह अब पूरी तरह टूट गया है क्योंकि उसके लिये अच्छे दिनों का एक ही व्यहारिक मानक है कि मंहगाई कितनी कम हुई है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आज हर चीज को आधार से लिंक कर दिया गया है। उसे क्या खाना और पहनना चाहिये यह तय करना सरकार का काम नही है। सरकार का काम है एक सुचारू व्यवस्था स्थापित करना और वह अभी तक हो नही पायी है। क्योंकि हर फैंसला कहीं-ना कहीं आकर विवादित होता जा रहा है। जिस आधार लिंककिंग पर इतना जोर दिया गया उस आधार को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो प्रश्न उठाये है उससे पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। नोटबंदी के फैसले से लाभ होने की बजाये नुकसान हुआ है क्योंकि जब पुराने नोट वापिस लेकर उनके बदले में नये नोट वापिस देने पड़े हे तो इस फैसले का सारा घोषित आधार ही धराशायी हो जाता है। नोटबंदी के बाद अब जीएसटी लाया गया। ‘‘एक देश एक टैक्स’’ का नारा दिया गया लेकिन इस फैसले के बाद चीजो की कीमतों में कमी आने की बजाये और बढ़ी है क्योंकि टैक्स की दर बढ़ा दी गयी जो पहले अधिकतम 15% प्रस्तावित थी उसे 28% कर दिया गया। यह टैक्स कहां किस चीज पर कितना है इसको लेकर न तो दुकानदार को और न ही उपभोक्ता को पूरी जानकारी दी गयी है क्योंकि इसे लागू करने वाला तन्त्र स्वयं ही इस पर स्पष्ट नही है। सरकार के सारे महत्वपूर्ण फैसलों पर यही धारणा बनती जा रही है कि जिस तेजी से यह फैसले लाये जा रहे हैं उनके लिये उसी अनुपात में वातावरण तैयार नही किया जा रहा है। यह नही देखा जा रहा है कि इनका व्यवहारिक पक्ष क्या है। बल्कि यह गंध आ रही है कि यह फैसले कुछ उन उद्योग घरानों को सामने रखकर लिये जा रहे हैं जिन्होने पिछले चुनावों के प्रचार अभियान में मोदी जी को विशेष सहयोग प्रदान किया था। लेकिन देश केवल कुछ उद्योग घराने ही नही है और आम आदमी इसे अब समझने लगा है।

गौरी लंकेश की हत्या के बाद उठते सवाल

शिमला/शैल। कन्नड के एक साप्ताहिक समाचार गौरी लंकेश की संपादक गौरी की पिछले मंगलवार को कुछ अज्ञात बन्दूकधारियों ने उनके घर में घुसकर शाम को उस समय हत्या कर दी जब वह दफ्तर से आकर अपनी गाड़ी पार्क कर रही थी। गौरी की हत्या से पूरा पत्रकार जगत स्तब्ध और रोष में है। देश के कई भागों में पत्रकारों ने इस हत्या की निन्दा करते हुए गौरी के हत्यारों को शीघ्र पकड़ने की मांग की है। गौरी की हत्या के लिये हिन्दुत्वादी विचारधारा से लेकर नक्सलवादियों तक को जिम्मेदार माना जा रहा है। इसमें असल में इस हत्या के लिये कौन जिम्मेदार है और यह हत्या क्यों की गयी है इसका पता तो जांच रिपोर्ट आने के बाद ही लगेगा। लेकिन जैसे ही इस हत्या के लिये हिन्दुत्ववादी विचारधारा को जिम्मेदार माना जाने लगा तभी से कुछ हिन्दुत्व विचारधारा से ताल्लुक रखने का दावा करने वाले लोगों की जिस भाषा में प्रतिक्रियाएं आयी हैं उससे पूरी स्थिति ही एकदम बदल गयी है। क्योंकि जिस भाषा में यह प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया में आयी है वह न केवल निन्दनीय है वरन ऐसी भाषा प्रयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी कारवाई होनी चाहिये। क्योंकि ऐसी प्रतिक्रियाएं देने वाले अपने को हिन्दुत्व की विचारधारा का समर्थक होने का दावा भी कर रहे हैं। ऐसे दावों से सीधे भाजपा और संघ परिवार की नीयत और नीति दोनो पर ही गंभीर सवाल उठते हैं और कालान्तर में यह सवाल पूरे समाज के लिये कठिनाई पैदा करेंगे।
क्योंकि आज केन्द्र में भाजपा नीत सरकार है बल्कि भाजपा के अपने पास ही इतना प्रचण्ड बहुमत है कि उसे सरकार चलाने के लिये किसी दूसरे की आवश्यकता ही नही है। भाजपा को इतना व्यापक समर्थन क्यों मिला था? कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर किस तरह के आरोप उस समय लग रहे थे? उन आरोपों की पृष्ठभूमि में अन्ना जैसे आन्दोलनांे की भूमिका क्या रही है? इन सवालों पर लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद बहुत कुछ लिखा जा चुका है और सामने भी आ चुका है। फिर भी वर्तमान संद्धर्भ में यह स्मरणीय है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा ने मुस्मिल समुदाय के लोगों को चुनाव टिकट नही दिये थे। लोकसभा की ही परिपाटी यूपी के चुनावों में भी दोहरायी गयी। ऐसा क्यों किया गया? इसके दो ही कारण हो सकते हैं कि या तो भाजपा में कोई मुस्लमान उसका सदस्य ही नही है या फिर भाजपा पूरे मुस्लिम समुदाय को शासन में भागीदारी के योग्य ही नही मानती है। लेकिन केन्द्रिय मन्त्री परिषद और उत्तर प्रदेश के योगी मन्त्री मण्डल में मुस्लमानों को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व दिया गया है उससे यही समझ आता है कि इस समुदाय को वैचारिक कूटनीति के तहत ही चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया गया था। इसका खुलासा चुनावों के दौरान और उसके बाद जिस तरह के ब्यान कुछ भाजपा नेताओं के मुस्लमानो को लेकर आये थे उससे हो जाता है। प्रधानमन्त्री को स्वयं ऐसे ब्यानों की निन्दा करनी पड़ी थी। इसी तरह की भावना गोरक्षा के नाम पर हुई हिंसात्मक घटनाओं में भी सामने आयी है। बल्कि इस हिंसा की प्रधानमन्त्री मोदी ने बार -बार निन्दा की है और अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसका कड़ा संज्ञान लेेते हुए राज्य सरकारों को इससे निपटने के कड़े निर्देश दिये हैं। इस सबसे यह प्रमाणित होता है कि समाज में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। क्योंकि कहीं सरकार की नीयत और नीति को लेकर सन्देह का वातावरण बनता जा रहा हैं। क्योंकि सरकार सबकी एक बराबर होती है किसी एक वर्ग विशेष की नही होती है। इस नाते देश के मुस्लिम समुदाय की भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पूरी भागीदारी बनती है जो सत्तारूढ़ दल की ओर से उन्हें नही मिल पायी है।
ऐसे में जहां सामाजिक सौहार्द के नाम पर सत्तारूढ़ दल की नीयत और नीति पर सन्देह के सवाल उठने शुरू हो गये हैं वहीं पर सरकार के नीतिगत फैलसों पर भी अब सवाल खड़े हो गये हैं। नोटबंदी सरकार की अब तक सबसे बड़ा नीतिगत फैसला रहा है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि आर्थिक संद्धर्भ में किसी भी देश के लिये इससे बड़ा कोई फैसला हो ही नही सकता है। लेकिन यह फैेसला लाभ की अपेक्षा नुकसानदेह साबित हुआ है। क्योंकि इस फैसले के तहत जब पुराने 500 और 1000 के नोटों का चलन कानूनी रूप से बन्द हो गया तब उसके बाद वह नोट चाहे बैंक में थे या किसी व्यक्ति के पास थे वह उसके लिये एकदम अर्थहीन हो गये। किसी के पास भी अधिकतम कितना पैसा किस शक्ल में हो -चाहे कैश हो या संपत्ति के रूप में -इसकी कोई न्यूनतम या अधिकतम की सीमा नही है। यह भी कोई बंदिश नही है कि कोई व्यक्ति कितना कैश घर में रख सकता है। इसके लिये केवल एक ही शर्त है कि व्यक्ति के पास पैसे का वैध स्त्रोत हो। जब नोटबंदी के पुराने नोटों का 99% वापिस आरबीआई के पास पहुंच गया है तो इसका सीधा अर्थ है कि यह सारा पैसा वैध था। इस नाते यह सारा पुराना पैसा नये नोटों की शक्ल मेें धारकों  को वापिस करना पड़ा है। इससे सरकार के अतिरिक्त और किसी का नुकासान हुआ नही है। इस नोटबंदी से जो विकास दर में कमी आयी है उसको पूरा होने में बहुत समय लग जायेगा।
इसी के साथ अब मन्त्रीमण्डल विस्तार में दो ऐसे लोगों को मंत्री बनाना पड़ गया जो इस समय किसी भी सदन के सदस्य नही हैं। इससे पार्टी के चुने हुए लोगों में यह संदेश जाता है कि या तो प्रधानमन्त्री को इन चुने हुए लोगों पर भरोसा नही रह गया है या फिर उनकी नजर में इन लोगों में से कोई भी इस लायक है ही नही कि उसे मन्त्री बनाया जा सकता। इनमें से जो भी स्थिति रही हो वह सरकार और देश के लिये सुखद नही कही जा सकती। आज तीन वर्ष बाद भी मंहगाई में कोई कमी नही आयी है यूपीए के जिस भ्रष्टाचार के मुद्दा बनने से यह सरकार बनी थी उसके खिलाफ अभी तक कोई ठोस कारवाई सामने नही आयी है। बल्कि सरकार के सारे प्रचार को आज फेक न्यूज की संज्ञा दी जाने लग पड़ी है और यह फेक न्यूज गौरी लंकेश की हत्या के बाद अब जन चर्चा का विषय बनती जा रही है।

नोटबंदी का सच

रिर्जव बैंक आॅॅफइण्डिया ने दावा किया है कि नोटबंदी के तहत बैन किये गये 500 और 1000 के 99% नोट वापिस आ गये हैं केवल 1% पुराने नोट वापिस नही आये हैं। नोटबंदी में 500 और 1000 के नोट बंद किये गये थे और इसके लिये एक तर्क दिया गया था कि बडे़ नोटों से काला धन जमा रखने में आसानी होती है। यह भी तर्क दिया गया था कि इससे आंतकी गतिविधियों में कमी आयेगी। नोटबंदी के दौरान जो आम आदमी को असुविधा हुई है उसके कारण उस समय 100 से अधिक लोगों की जान गयी है। यह सच भी सबके सामने है। नोटबंदी के बाद आंतकी हमलों में भी कोई कमी नही आयी है। प्रायः हर दिन कहीं न कहीं कोई वारदात होती ही रही है। नोटबंदी के बाद मंहगाई में भी कोई कमी नहीं आयी है। नोटबंदी के बाद देश के भीतर कितना कालाधन मिला इसको लेकर भी कोई अधिकारिक आंकड़ा आरबीआई की ओर से जारी नही हुआ है बल्कि इसको लेकर वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 16 मई को जो आंकडे़ सामने रखे थे अब प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को देश के सामने रखे आंकड़ो में इन्हे आधा कर दिया है। नोटबंदी के बाद नये नोट छापने के लिये आरबीआई ने करीब आठ हजार करोड़ खर्च किये हैं यह दावा भी आरबीआई ने ही किया है।
इस परिदृश्य में यदि नोटबंदी के फैसले का आकंलन किया जाये तो सरकार के अपने ही कृत्य से यह फैसला तर्क की कसौटी पर खरा नही उतरता है क्योंकि नोटबंदी के बाद भी सरकार/आरबीआई 500 और 2000 के नये नोट लेकर सामने आयी है। यदि बड़े मूल्य के नोटों के माध्यम से कालाधन जमा करना आसान होता है तो अब दो हजार मूल्य का नोट आने से तो यह और आसान हो जायेगा। तो क्या माना जाये कि सरकार ने कालेधन वालों को और सुविधा देने के लिये नोटबंदी का कदम उठाया। जाली नोट जिस तरह से पहले छप रहे थे अब भी वैसे ही यह धंधा चला हुआ है। जाली नोटों के कई मामले पकड़े गये हैं। नोटबंदी सरकार का एक बहुत बड़ा क्रान्तिकारी फैसला करार दिया जा रहा था। इन्ही सुधारों की कड़ी में सरकार ने जनधन योजना के तहत जीरो बैलैन्स पर लोगों के खाते खुलवाये। लेकिन आज भी आधे से ज्यादा जीरो बैलैन्स पर ही चल रहे हैं। इनमें कोई  ट्रांजैक्शन हो नही रही है क्योंकि इन लोगों के पास बैंक में जमा करवाने लायक पैसा है ही नही बल्कि यह खाते खोलने के लिये जो बैंको का खर्च आया है वह हर आदमी पर एक अतिरिक्त बोझ पड़ा है। इसी के साथ सरकार ने सारी ट्रांजैक्शन डिजिटल करने पर बल दिया है। ई-समाधान की ओर बढ़ने की आवश्यकता की वकालत की जा रही है। लेकिन इस दिशा का कड़वा सच यह है कि आज भी देश में हर स्थान पर 24 x 7 निर्बाध बिजली की आपूर्ति नही है। राजधानी नगरों तक में यह सुनिश्चितता नही है। जबकि डिजिटल के लिये निर्बाध बिजली बुनियादी आवश्यकता है। जब बिजली की आपूर्ति निर्बाध नही है तो उसका प्रभाव इन्टरनैट सर्विस पर पड़ना स्वभाविक है। इसी कारण सरकार की संचार सेवाएं अक्सर बाधित रहती हैं। इन व्यवहारिक स्थितियों से स्पष्ट हो जाता है कि सरकार जिस तरह के सुधारों की वकालत कर रही है उसके लिये जमीन तैयार ही नही है।
नोटबंदी को लेकर जो दावा आरबीआई ने 99% पुराने नोट वापिस आने का किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि देश के भीतर कालेधन के आंकड़ो को लेकर स्वामी रामदेव जैसे जो लोग दावे कर रहे थे या तो वह आंकडे गल्त थे उनकी सूचना और आंकलन गल्त था या फिर सरकार नोटबंदी के बावजूद कालेधन को पकड़ने में पूरी तरह असफल रही है। यदि सरकार असफल नही है तो क्या जो एक प्रतिशत पुराने नोट वापिस नही आये हंै वह कालाधन है। इस पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
आज सरकार बैंकिंग सुधारों को बैंक युनियनों ने ही जन विरोधी करार दिया है। यूनियनों ने पब्लिक सैक्टर बैंको के निजिकरण और बैंको के विलय का विरोध किया है। आज करीब 6 लाख करोड़ का एनपीए चल रहा है और इसमें 70% से अधिक बड़े काॅरपोरेट घरानो का है। लेकिन इन लोगों के खिलाफ कारवाई करने की बजाये सरकार इन्हे किसी न किसी रूप में पैकेज देकर लाभ पहुंचा रही है। बल्कि नोटबंदी के दौरान हर व्यक्ति को 500 और 1000 के नोटों की शक्ल में रखी अपनी संचित  पूंजी को जबरन बैंको में ले जाकर जमा करवना पड़ा और फिर कई दिनों तक उसे उतनी निकासी करने की सुविधा नही मिली तो इस तरह अचानक बैंकों के पास भारी भरकम पैसा आ गया तो क्या इस पैसे का अपरोक्ष में लाभ इन काॅरपोरेट घरानों को नही मिला? क्योंकि बैंकों ने इस पैसे का निवेश इन घरानों के अतिरिक्त और कहीं तो किया नही। बल्कि बैंकों के पास इतना डिपोजिट आ जाने के बाद तो बैंको ने बचत पर ब्याज दरें तक कम कर दी। इस तरह सरकार के नोटबंदी से लेकर बैंकिंग सुधारों तक के सारे फैसलों से आम आदमी को कोई लाभ नही मिल पा रहा है। क्योंकि आम आदमी के लिये यह सारे सुधारवादी फैसले तभी लाभदायक सिद्ध होंगे जब मंहगाई और बेरोजगारी पर लगाम लगेगी और इसकी कोई संभावना नजर नही आ रही है।

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