Wednesday, 04 February 2026
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जनादेश का अर्थ आर्थिक असफलता नही है

केन्द्रिय वित्त मंत्री श्रीमति सीता रमण ने संसद में वर्ष 2020-21 का बजट प्रस्ताव रखते हुए यह कहा है कि मई 2019 में देश की जनता ने मोदी सरकार को जो भारी जनादेश दिया है वह केवल राजनीतिक स्थिरता के लिये ही नही दिया है बल्कि इसके माध्यम से सरकार की आर्थिक नीतियों में भी विश्वास व्यक्त किया है। देश की जनता जब भी किसी सरकार का चयन करती है तो इसी अपेक्षा के साथ करती है कि यह सरकार राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करे। 2014 मे भी यही विश्वास व्यक्त किया था क्योंकि तब सरकार ने विदेशों में जमा देश के कालेधन को वापिस लाकर हर आदमी के खाते में पन्द्रह लाख आ जाने का वायदा किया था। नवम्बर 2016 में जब नोटबंदी लागू की गयी थी तब भी यह कहा गया था कि इससे आतंकवाद और कालेधन पर अंकुश लगेगा। लेकिन नोटबंदी के माध्यम से कितना कालाधन पकड़ा गया या स्वतः ही खत्म हो गया यह आंकड़ा अभी तक देश की जनता के सामने नही आया है। बल्कि यह हुआ कि सरकार को आरबीआई से सुरक्षित धन लेना पड़ा। नोटबंदी से जो उद्योग प्रभावित हुए उन्हें पुनः मुख्य धारा में लाने के लिये विशेष सहायता पैकेज दिये गये। लेकिन यह पैकेज देने से सही में कितना लाभ हुआ और कितना रोज़गार बढ़ा इसका भी कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है। उल्टे यह सामने आया कि इसके बाद मंहगाई और बेरोज़गारी दोनो बढ गयी। प्याज़ की कीमतें इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। यह चर्चा इसलिये उठा रहा हूं क्योंकि चुनावी चर्चाओं से यदि कोई चीज़ गायब रहती है तो वह केवल सरकार की आर्थिक नीतियां ही होती हैं क्योंकि राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र/ संकल्प पत्र उस समय जनता में जारी करते हैं जब जनता भावनात्मक मुद्दों के गिई पूरी तरह केन्द्रित हो चुकी होती है। उसके पास राष्ट्र भक्ति और हिन्दु -मुस्लिम, मन्दिर-मस्जिद जैसे मुद्दे पूरी तरह अपना असर कर चुके होते हैं। इसलिये जनादेश को आर्थिक नीतियां पर मोहर मान लेना सही नही होगा।
केन्द्र सरकार के वर्ष 2019-20 के बजट में यह कहा गया था कि इस वर्ष सरकार की कुल राजस्व आय 27,86,349 करोड़ रहेगी लेकिन संशोधित अनुमानों में इसे घटाकर 26,98,522 करोड़ पर लाया गया है। यही स्थिति खर्च में भी रही है। बजट अनुमानों के मुताबिक कुल 27,86,349 करोड़ माना गया था जिसे संशोधित करके 26,98,522 करोड़ पर लाया गया है इसके परिणामस्वरूप जो घाटा 4,85019 करोड़ आंका गया था वह संशोधित में 4,99,544 करोड़ हो गया है। वर्ष 2019-20 के इन बजट आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के आय, व्यय और घाटे के सारे आकलन और अनुमान जमीनी हकीकत पर पूरे नही उतर पाये हैं। इसी गणित में जो आंकड़े वित्तिय वर्ष 2020-21 के लिये दिये गये हैं जिनमें कुल 3042230 करोड़ का आय और व्यय दिखाया गया है वह कितना सही उतर पायेगा यह विश्वास करना कठिन हो जाता है। इस वस्तुस्थिति में जनता को वायदों और ब्यानों के मायाजाल में उलझाये रखने के अतिरिक्त तन्त्र के पास कुछ शेष नही रह जाता है। आज अगले वित्त वर्ष में सरकार ने दो लाख करोड़ से अधिक के विनिवेश का लक्ष्य रखा है जो पिछले वर्ष एक लाख करोड़ था। स्वभाविक है कि विनिवेश में सरकारी उपक्रमों को निजिक्षेत्र को दिया जायेगा। इसमें भारत पैट्रोलियम, एलआईसी, बीएसएनएल, आईटीबीआई, एयर इण्डिया और इण्डियन रेलवे जैसे उपक्रम सूचीबद्ध कर लिये गये हैं। अभी बीएसएनएल में करीब 93000 कर्मचारियों को इकट्ठे सेवानिवृति दी गयी है क्योंकि उसे नीजिक्षेत्र को सौंपना है। ऐसा ही अन्य उपक्रमों में भी होगा। नीजिक्षेत्र में जाने की प्रक्रिया का पहला असर वहां काम कर रहे कर्मचारियों पर होता है। क्योंकि सरकार की नीति लाभ से ज्यादा रोज़गार देने पर होती है जबकि नीतिक्षेत्र में लाभ कमाना ही मुख्य उद्देश्य होता है रोजगार देना नहीं। स्वभाविक है कि जब नीजिकरण की यह प्रक्रिया चलेगी तो इससे रोज़गार के अवसर कम होंगे जिसका सीधा असर देश के युवा पर पडे़गा और वह कल सरकार की नीतियों के विरोध में सड़क पर आने के लिये विवश हो जायेगा।
आर्थिक मुहाने पर ऐसे बहुत सारे बिन्दु हैं जहां सरकार की आर्थिक नीतियों /फैसलों पर खुले मन से सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता है। अभी सरकार नै बैंकों में आम आदमी के जमा पैसे की इन्शयोरैन्स की राशी एक लाख से बढ़ा कर पांच लाख की है। पहले केवल एक लाख ही बैंक में सुरक्षित रहता था जो अब पांच लाख हो गया है। यह स्वागत योग्य कदम है लेकिन इसी के साथ बैंकों को रैगुलेट करने के लिये आरबीआई से हटकर जो अथाॅरिटी बनाने की बात वित्त मन्त्री ने की है उसके तहत बैंक का घाटा उस बैंक में जमा बचत खातों से पूरा करने का जो प्रावधान किये जाने की बात है क्या उस पर सर्वाजनिक चर्चा की आवश्यकता नही है। वित्त मन्त्री ने कहा है कि इस संबंध में शीघ्र ही विधेयक लाया जायेगा। इस समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए लाखों करोड़ हो चुका है। बहुत सारे कर्जधारक देश छोड़कर विदेशों में जा बैठे हैं उनसे पैसा वसूलने और उन्हें वापिस लाने की प्रक्रियाएं चल रही हैं जिनका कोई परिणाम सामने नही आया है और इस पर कोई सार्वजनिक बहस भी उठाने नहीं दी जा रही है। बल्कि यह आरोप लग रहा है कि आर्थिक असफलताओं पर बहस को रोकने के लिये ही एनआरसी, एनपीआर और सीएए जैसे मुद्दे लाये गये हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि जब इन मुद्दों के साथ आर्थिक असफलता जुड़ जायेगी तो उसके परिणाम बहुत ही घातक होंगे।

जब प्रधानमंत्री ही आक्रामक होने को कहे तो...

नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ उभरा नागरिक विरोध जामिया और शाहीन बाग में गोली चलने के बाद भी जारी है। इन दोनों जगह गोली चलाने वाले युवा स्कूल और कालिज जाने वाले छात्र हैं। जिन्होने शायद इस संशोधन को पढ़ भी नही रखा होगा समझ आना तो और भी दूर की बात होगी। इस संशोधन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सौ से अधिक याचिकायें दायर हैं। केन्द्र सरकार ने इन पर जवाब दायर करने के लिये एक माह का समय मांगा है। सर्वोच्च न्यायालय में आयी याचिकाओं में इसके हर पक्ष पर सवाल उठाये गये हैं। एनआरसी, एनपीआर और सीएए में क्या संबंध है इस पर सवाल है। इस पर प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और अन्य मन्त्रियों एवम् नेताओं के संसद के भीतर दिये गये ब्यानों को भी अदालत के संज्ञान में लाया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस संशोधन पर उठे हर सवाल और हर शंका के समाधान का सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा और कोई मंच नही हो सकता। लेकिन इस मंच से कोई जवाब आने से पहले ही इसका विरोध कर रहे लोगों को गद्दार कहना, उन्हे टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक बताना किसी भी अर्थ में जायज नही ठहराया जा सकता है।
शाहीन बाग में विरोध पर बैठे लोगों की मांग है कि सरकार उनकी बात सुने। कानून मन्त्री रवि शंकर प्रसाद ने जब यह ब्यान दिया कि सरकार इन लोगों से बात करने के लिये तैयार है लेकिन फिर उसी दिन प्रधानमन्त्री का ब्यान आ जाता है कि भाजपा को इस पर आक्रमकता से अपनी बात रखनी होगी। प्रधानमन्त्री का यह ब्यान भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक निर्देश है। प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री ने जब विरोधियों पर आरोप लगाया कि यह लोग टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन कर रहे हैं तो निश्चित रूप से इससे बड़ा कोई आरोप नही हो सकता। ऐसे लोग सही में राष्ट्रद्रोही कहे जा सकते हैं। जब देश का प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री इतना बड़ा आरोप लगाये तो स्वभाविक है कि यह आरोप तथ्यों पर आधारित होगा। क्योंकि तब किसी के खिलाफ इस निष्कर्ष पर पहंुचेंगे कि वह देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कर रहा है तो तय है कि यहां तक पहुंचने से पहले देश की गुप्तचर ऐजैन्सीयों ने इस संद्धर्भ में सारे प्रमाण जुटा लिये होंगे। इसके लिये मानदण्ड तय कर लिये गये होंगे कि किस आधार पर किसी का ऐसा वर्गीकरण किया जायेगा। प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री के इन आरोप पर जब गृह मन्त्रालय से आरटीआई के माध्यम से यह सूचना मांगी गयी कि टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर सरकार के पास क्या जानकारी है। क्या इसके लिये कोई मानदण्ड बनाये गये हैं। क्या इसकी कोई सूची उपलब्ध है। इस तरह की सारी जानकारियां एक अंग्रेजी दैनिक एक्सप्रैस के पत्रकार ने मांगी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इस टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर पूरी अनभिज्ञता जाहिर की। उसके गृह मन्त्रालय के पास कोई जानकारी ही नही है। अखबारों ने अपने पहले पन्ने पर यह खबर छापी है। जिस पर किसी का कोई खण्डन नही आया है। इस तरह आरटीआई के  जवाब से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह का संबोधन/आरोप बिना किसी प्रमाण के ही लगा दिया गया। आज हर छोटा-बड़ा नेता इस आरोप को हवा दे रहा है।
दिल्ली चुनावों के प्रचार में जब अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के ब्यानों का कड़ा संज्ञान लेते हुय चुनाव आयोग ने उन पर प्रतिबन्ध लगाया तो भाजपा ने इस प्रतिबन्ध का विरोध करते हुए चुनाव आयोग में इस पर आपति दर्ज करवाई। यह आपति दर्ज करवाने का अर्थ है कि भाजपा प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के ब्यानों का समर्थन करती है। आज जब प्रधानमन्त्री ने पार्टी को निर्देश दिया है कि वह आक्रामक होकर इस संशोधन पर अपना पक्ष रखें तो स्वभाविक है कि अनुराग और प्रवेश वर्मा की तर्ज के कई और ऐसे ही ब्यान देखने को मिलंेगे। जिस तरह से जामिया और शाहीन बाग में दो छात्रों ने गोली चलायी है ऐसे ही कई और छात्र देश के अन्य भागों में भी देखने को मिल जायें तो क्या उससे कोई हैरानी होगी क्योंकि इस मुद्दे पर तर्क तो सर्वोच्च न्यायालय में ही सामने आयेगा जहां सरकार और याचिकाकर्ता खुलकर अपना-अपना पक्ष रखेंगे। अभी इस संशोधन पर उभरा विरोध थमा नही है और इसी बीच शाहीन बाग में संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा तैयार किये गये भारतीय संविधान को लेकर भी चर्चा उठ गयी है। यह आरोप लगाया गया है कि यह नया संविधान हिन्दु धर्म पर आधारित है। इसके मुताबिक भारत को एक हिन्दु राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा। इस कथित संविधान का संक्षिप्त प्रारूप सोशल मीडिया के मंच पर आ चुका है। लेकिन इस कथित संविधान को लेकर सरकार और संघ की ओर से कोई स्पष्टीकरण/खण्डन जारी नही किया गया है। यह संविधान पूरी तरह मनुस्मृति पर आधारित है। आज पूरे देश में ही नही बल्कि यूरोपीय यूनियन के मंच तक नागरकिता संशोधन अधिनियम चर्चा और विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में इसी समय इस सविंधान की चर्चा उठना और बड़े गंभीर संकेत और संदेश देता है जिस पर समय रहते कदम उठाने की आवश्यकता है।

जब प्रधानमंत्री ही आक्रामक होने को कहे तो...

नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ उभरा नागरिक विरोध जामिया और शाहीन बाग में गोली चलने के बाद भी जारी है। इन दोनों जगह गोली चलाने वाले युवा स्कूल और कालिज जाने वाले छात्र हैं। जिन्होने शायद इस संशोधन को पढ़ भी नही रखा होगा समझ आना तो और भी दूर की बात होगी। इस संशोधन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सौ से अधिक याचिकायें दायर हैं। केन्द्र सरकार ने इन पर जवाब दायर करने के लिये एक माह का समय मांगा है। सर्वोच्च न्यायालय में आयी याचिकाओं में इसके हर पक्ष पर सवाल उठाये गये हैं। एनआरसी, एनपीआर और सीएए में क्या संबंध है इस पर सवाल है। इस पर प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और अन्य मन्त्रियों एवम् नेताओं के संसद के भीतर दिये गये ब्यानों को भी अदालत के संज्ञान में लाया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस संशोधन पर उठे हर सवाल और हर शंका के समाधान का सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा और कोई मंच नही हो सकता। लेकिन इस मंच से कोई जवाब आने से पहले ही इसका विरोध कर रहे लोगों को गद्दार कहना, उन्हे टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक बताना किसी भी अर्थ में जायज नही ठहराया जा सकता है।
शाहीन बाग में विरोध पर बैठे लोगों की मांग है कि सरकार उनकी बात सुने। कानून मन्त्री रवि शंकर प्रसाद ने जब यह ब्यान दिया कि सरकार इन लोगों से बात करने के लिये तैयार है लेकिन फिर उसी दिन प्रधानमन्त्री का ब्यान आ जाता है कि भाजपा को इस पर आक्रमकता से अपनी बात रखनी होगी। प्रधानमन्त्री का यह ब्यान भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक निर्देश है। प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री ने जब विरोधियों पर आरोप लगाया कि यह लोग टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन कर रहे हैं तो निश्चित रूप से इससे बड़ा कोई आरोप नही हो सकता। ऐसे लोग सही में राष्ट्रद्रोही कहे जा सकते हैं। जब देश का प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री इतना बड़ा आरोप लगाये तो स्वभाविक है कि यह आरोप तथ्यों पर आधारित होगा। क्योंकि तब किसी के खिलाफ इस निष्कर्ष पर पहंुचेंगे कि वह देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कर रहा है तो तय है कि यहां तक पहुंचने से पहले देश की गुप्तचर ऐजैन्सीयों ने इस संद्धर्भ में सारे प्रमाण जुटा लिये होंगे। इसके लिये मानदण्ड तय कर लिये गये होंगे कि किस आधार पर किसी का ऐसा वर्गीकरण किया जायेगा। प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री के इन आरोप पर जब गृह मन्त्रालय से आरटीआई के माध्यम से यह सूचना मांगी गयी कि टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर सरकार के पास क्या जानकारी है। क्या इसके लिये कोई मानदण्ड बनाये गये हैं। क्या इसकी कोई सूची उपलब्ध है। इस तरह की सारी जानकारियां एक अंग्रेजी दैनिक एक्सप्रैस के पत्रकार ने मांगी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इस टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर पूरी अनभिज्ञता जाहिर की। उसके गृह मन्त्रालय के पास कोई जानकारी ही नही है। अखबारों ने अपने पहले पन्ने पर यह खबर छापी है। जिस पर किसी का कोई खण्डन नही आया है। इस तरह आरटीआई के  जवाब से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह का संबोधन/आरोप बिना किसी प्रमाण के ही लगा दिया गया। आज हर छोटा-बड़ा नेता इस आरोप को हवा दे रहा है।
दिल्ली चुनावों के प्रचार में जब अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के ब्यानों का कड़ा संज्ञान लेते हुय चुनाव आयोग ने उन पर प्रतिबन्ध लगाया तो भाजपा ने इस प्रतिबन्ध का विरोध करते हुए चुनाव आयोग में इस पर आपति दर्ज करवाई। यह आपति दर्ज करवाने का अर्थ है कि भाजपा प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के ब्यानों का समर्थन करती है। आज जब प्रधानमन्त्री ने पार्टी को निर्देश दिया है कि वह आक्रामक होकर इस संशोधन पर अपना पक्ष रखें तो स्वभाविक है कि अनुराग और प्रवेश वर्मा की तर्ज के कई और ऐसे ही ब्यान देखने को मिलंेगे। जिस तरह से जामिया और शाहीन बाग में दो छात्रों ने गोली चलायी है ऐसे ही कई और छात्र देश के अन्य भागों में भी देखने को मिल जायें तो क्या उससे कोई हैरानी होगी क्योंकि इस मुद्दे पर तर्क तो सर्वोच्च न्यायालय में ही सामने आयेगा जहां सरकार और याचिकाकर्ता खुलकर अपना-अपना पक्ष रखेंगे। अभी इस संशोधन पर उभरा विरोध थमा नही है और इसी बीच शाहीन बाग में संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा तैयार किये गये भारतीय संविधान को लेकर भी चर्चा उठ गयी है। यह आरोप लगाया गया है कि यह नया संविधान हिन्दु धर्म पर आधारित है। इसके मुताबिक भारत को एक हिन्दु राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा। इस कथित संविधान का संक्षिप्त प्रारूप सोशल मीडिया के मंच पर आ चुका है। लेकिन इस कथित संविधान को लेकर सरकार और संघ की ओर से कोई स्पष्टीकरण/खण्डन जारी नही किया गया है। यह संविधान पूरी तरह मनुस्मृति पर आधारित है। आज पूरे देश में ही नही बल्कि यूरोपीय यूनियन के मंच तक नागरकिता संशोधन अधिनियम चर्चा और विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में इसी समय इस सविंधान की चर्चा उठना और बड़े गंभीर संकेत और संदेश देता है जिस पर समय रहते कदम उठाने की आवश्यकता है।

हर विरोध राष्ट्रद्रोह नहीं होता

 

नागरिकता संशोधन अधिनियम पर उभरा विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है और गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि कोई चाहे कितना भी विरोध कर ले परन्तु यह अधिनियम वापिस नही होगा। गृहमन्त्री के ब्यान से यह विरोध सरकार बनाम जनता की शक्ल लेता नजर आ रहा है क्योंकि शाहीनबाग में विरोध में धरना प्रदर्शन पर बैठी महिलाओं से संवाद का रास्ता अपनाने की बजाये इन्हे अपमानित करने की नीति अपनाई जाने लगी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ से लेकर नीचे भाजपा के सोशल मीडिया सैल तक के ब्यानों और पोस्टों से यह स्पष्ट हो जाता है। ऐसे में यह समझना बहुत आवश्यक हो जाता है कि यदि यह अधिनियम लागू हो जाता है तो इसका परिणाम क्या होगा। अधिनियम के मुताबिक 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से वैध/अवैध रूप से भारत आये हिन्दुओं, सिखों, बौद्ध, ईसाई, पारसी तथा जैन लोगों को यहां की नागरिकता प्रदान कर दी जायेगी। संसद में आये आंकड़ो के मुताबिक ऐसे आये कुल 31 हजार लोगों ने ही ऐसी नागरिकता के लिये आवदेन कर रखा है। यदि  सही में यह आंकड़ा 31-32 हजार तक ही सीमित रहता है तो 120 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में इससे कोई बड़ा अन्तर नहीं पड़ेगा और तब यह विरोध कोई अर्थ नही रखता।
लेकिन क्या सही में इतनी सी ही बात है? नहीं यह सब कुछ इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। यह मसला असम में एनआरसी लागू होने से शुरू हुआ। असम में 1971 में पाकिस्तान विभाजन से बने बंग्लादेश से लाखों की संख्या में आये बंगलादेशी शरणार्थीयों से शुरू होता है। क्योंकि बहुत सारे लोग वापिस बंगलादेश जाने की बजाये यहीं रह गये थे। इन लोगों के यहीं रह जाने से असम के मूल लोग प्रभावित हुए और इन लोगों को वापिस बंगलादेश भेजने के लिये असम के युवाओं और छात्रों ने बड़ा आन्दोलन किया। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप तत्कालीन केन्द्र सरकार ने इन आन्दोलनरत छात्रों के साथ समझौता किया कि 24 मार्च 1971 के बाद आये बंगलादेशीयों को वापिस भेजा जायेगा। असम गण परिषद की सरकार इसी आन्दोलन के परिणामस्वरूप बनी थी। इस समझौते को लागू करवाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका तक दायर हुई। इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने असम में ऐसे लोगों की सूची तैयार करने के निर्देश दिये। इन निर्देशों पर अमल करते हुए जो सूची तैयार की गयी उसमें करीब 20 लाख लोग गैर नागरिक पाये गये। असम में जब एनआरसी की यह प्रक्रिया चल रही थी तभी गृहमन्त्री ने संसद में यह कह दिया कि एनआरसी पूरे देश में लागू होगा। असम मे जो बीस लाख लोग गैर नागरिकों की सूची में आये उनमें ज्यादा जनसंख्या हिन्दुओं की है। हिन्दुओं की संख्या ज्यादा होने और एनआरसी के विरोध के चलते असम के सवाल को यहीं पर खड़ा कर दिया गया है।
असम की समस्या का कोई हल निकालने के स्थान पर नागरिकता संशोधन अधिनियम ला दिया गया और इसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बंगलादेश से आये गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रावधान कर दिया गया। इस नागरिकता के लिये आधार तैयार करने का काम एनपीआर से शुरू कर दिया गया। एनपीआर हर उस व्यक्ति की गणना करेगा जो किसी स्थान पर छः माह  से रह रहा है या रहना चाह रहा है। यह जनसंख्या का रजिस्टर है नागरिकों का नहीं। इसमें हर व्यक्ति गिनती में आयेगा चाहे वह नागरिक है या नही। जो व्यक्ति यहां का नागरिक है उसे अपनी नागरिकता के प्रमाण में दस्तावेज देने होंगे। उसे अपने पैरेन्टस और ग्रैन्ड पैरेन्टस का प्रमाण देना होगा। इसमें गलत सूचना देने पर दण्ड का भी प्रावधान है। यह भी प्रावधान है कि कोई भी आपके ऊपर सन्देह जता सकता है। सन्देह जताने से आप सन्देहशील की सूची में आ जायेंगे। इस सूची में आने से ही समस्याएं खड़ी हो जायेंगी। एनपीआर पर कारवाई शुरू हो गयी है। सर्वोच्च न्यायालय में नागरिकता संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह सामने आ चुका है कि उत्तर प्रदेश के उन्नीस जिलों में एनपीआर में 49 लाख सन्देहशील श्रेणी में आ गये हैं। ममता बैनर्जी के अनुसार चैदह लाख दार्जलिंग में प्रभावित हो रहे हैं। इस तरह यह माना जा रहा है कि एनपीआर के माध्यम से करोड़ों लोग सन्देहशील नागरिकों की श्रेणी में आ जायेंगे। अब देखना यह है कि इसमें किस समुदाय के कितने लोग आते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति क्या होती है। एनपीआर में आने वाले लोग डाटा के आधार पर ही एनआरसी और नागरिकता संशोधन का काम आगे बढ़ेगा।
 सरकार को संसद में मिले प्रचण्ड बहुमत के आधार पर अपने ऐजैण्डे को आगे बढ़ा रही और उसका ऐजैण्डा भारत को भी धर्म के आधार पर हिन्दु राष्ट्र बनाने का है यह हर रोज सार्वजनिक होता जा रहा है। धर्म की मादकता के आगे तर्क गौण हो चुका है। आज देश लोकतन्त्र के हर स्थापित मानक पर नीचे आता जा रहा है। विश्व समुदाय की नजर मे भारत की साख लगातार गिरती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय भी महत्वपूर्ण सवालों को लंबित रखने की नीति पर चल रहा है। जम्मू कश्मीर पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है लेकिन वहां के तीनों पूर्व मुख्यमन्त्री अभी तक नजऱबन्द चल रहे हैं। देश के मीडिया का सच कोबरा पोस्ट के स्टिंग आप्रेशन के माध्यम से सामने आ चुका है। जिसमें तीन दर्जन से अधिक बड़े मीडिया संस्थान कैसे बिकने को तैयार और किस हद तक विपक्ष के बडे नेताओं का सुनियोजित चरित्र हनन करने पर सहमत हो जाते हैं इससे देश की स्थिति का पता चल जाता है। आर्थिक तौर पर देश कितना कमजोर हो चुका है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार फिर आरबीआई से पैसे की मांग कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि  क्या एनआरसी, एनपीआर और नागरिकता संशोधन पर टकराव बढ़ा कर आर्थिक असफलता को लम्बे अरसे तक छुपाया जा सकेगा? शायद नही। हर विरोध को राष्ट्रद्रोह कहकर चुप नही कराया जा सकता। आज टुकड़े-टुकड़े गैंग के सवाल पर आरटीआई में सूचना के बाद प्रधानमन्त्री और गृहमंत्री का कद बहुत छोटा हो गया है।

 

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले तक नागरिकता संशेाधन वापिस लिया जाये

नागरिकता संशोधन अधिनियम पर उभरा विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। जनता प्रधानमंत्री मोदी की बात नही सुन रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि जनता प्रधानमंत्री पर विश्वास नही कर पा रही है। यही सबसे दुखद है कि प्रधानमंत्री जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। इसलिये यह जानना/ समझना बहुत आवश्यक हो जाता है कि ऐसा हो क्यों रहा है। क्या प्रधानमंत्री को अपने ही लोगों का सहयोग नही मिल रहा है। क्योंकि मोदी के मन्त्री अमितशाह, प्रकाश जावडेकर, रविशंकर प्रसाद जैसे वरिष्ठ लोग ही प्रधानमन्त्री से अलग भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। प्रधानमन्त्री और उनके मन्त्रीयों के अलग -अलग ब्यानों से पैदा हुए विरोधाभास के कारण उभरी भ्रान्ति तथा डर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग और असम ऐडवोकेट ऐसोसियेशन ने दो याचिकाएं भी दायर कर दी हैं। बंगाल के एक अध्यापक मण्डल की एनपीआर को लेकर आयी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में केरल सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर विधिवत चुनौती दे रखी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संद्धर्भ में आयी पांच दर्जन से अधिक याचिकाओं पर 22 जनवरी से सुनवाई करने की भी घोषणा कर दी है। ऐसे मे जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर सुनवाई शुरू करने की बात कर दी है तो केन्द्र सरकार को भी इस अधिनियम और इसी के साथ एनपीआर तथा एनआरसी पर शीर्ष अदालत का फैसला आने तक सारी प्रक्रिया स्थगित कर देनी चाहिये।
इस समय नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों में आ चुकी हैं उससे पता चलता है कि देश में इसका विरोध कितना हो रहा है। शायद आज तक इतना विरोध किसी भी मुद्दे पर नही उभरा है। एनआरसी, सीएए और एनपीआर का जिस भी व्यक्ति ने ईमानदारी से अध्ययन किया है वह मानेगा कि तीनों में गहरा संबंध है बल्कि एनपीआर ही सबकी बुनियाद है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री अैर उनके मन्त्री इस विषय पर कुछ भी बोलते हैं तो उससे सरकार और नेतृत्व की नीयत पर ही सवाल खड़े होने लग जाते हैं। राज्य मन्त्री किरन रिजजू ने राज्य सभा में 24-7-2014 को एक प्रश्न के उत्तर में स्वयं यह माना है कि एनपीआर ही इस सबका आधार है। स्थितियां जो 2014 में थी वही आज भी हैं। यह सही है कि अवैध घुसपैठिये और धर्म के कारण प्रताड़ित हो कर आने वाले व्यक्ति में फर्क होता है। प्रताड़ित की मद्द की जानी चाहिये घुसपैठिये की नहीं लेकिन फर्क कैसे किया जायेगा सवाल तो यह है। क्योंकि नियमों में ऐसा कोई प्रावधान ही नही रखा गया है। जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित की जा रही हैं उससे यही संकेत उभरता है कि केवल मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही बाहर का रास्ता दिखाने की बिसात बिछायी जा रही है।
प्रधानमन्त्री कह चुके हैं कि एनआरसी को लेकर कहीं कोई चर्चा ही नही हुई है और जब इस पर सरकार में कोई चर्चा कोई फैसला ही नही हुआ है तब एनपीआर को लेकर कोई प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है इसके लिये धन का प्रावधान क्यों किया जा रहा है। एनपीआर का प्रतिफल तो एनआरसी और सीएए में आयेगा। जब एनआरसी लागू ही नही किया जाना है तो एनपीआर का बखेड़ा ही क्यों शुरू किया जाये। सर्वोच्च न्यायालय में आयी याचिकाओं पर सरकार को यह जवाब देना है। सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी एक तरफ प्रधानमंत्री और उनके मन्त्रीयों के ब्यान होंगे और दूसरी एनआरसी, सीएए तथा एनपीआर पर जारी सरकारी आदेश होंगे। सबका मसौदा सामने होगा। यह स्थिति एक तरह से सरकार और सर्वोच्च न्यायालय दोनो के लिये परीक्षा की घड़ी होगी। इस परीक्षा में दोनो का एक साथ पास होना संभव नही है। लेकिन किसी एक का भी असफल होना देश के लिये घातक होगा। आज देश की अर्थव्यवस्था भी एक संकट के दौर से गुजर रही है और इसे नोटों पर महात्मा गांधी की जगह लक्ष्मी माता की फोटो छापकर उबारा नही जा सकता जैसा कि भाजपा नेता डा. स्वामी ने सुझाव दिया है। इस समय सरकार को अपने ऐजैण्डे से हटकर नागरिकता संशोधन को वापिस सर्वदलीय बैठक बुलाकर सर्व सहमति से इसका हल निकालना होगा। यदि ऐसा नही हो पाता है तो आने वाला समय नेतृत्व को माफ नही कर पायेगा।

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