कोरोना को लेकर जब देश भर में लाॅकडाउन का दिया गया था तब राजनीति को छोडकर अन्य सभी गतिविधियों पर विराम लग गया था। जैस-जैसे लाॅकडाउन का अवधि बढ़ती गयी तो उसी अनुपात में आर्थिक स्थिति की वास्तविकता भी सामने आती चली गयी। आम आदमी में खास तोर पर वह वर्ग जो अपने पैतृक स्थानों से दूर रोजी रोटी की तलाश में निकला हुआ था और दिहाड़ी मजदूरी करके अपना और परिवार का पेट पाल रहा था वह सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। इस वर्ग को प्रवासी की संज्ञा दी गयी। यह स्थिति आ गयी कि इसके भोजन की व्यवस्था करना कोरोना से निपटने से भी बड़ी चुनौति बन गयी। केन्द्र सरकार को आर्थिक स्थिति को संभालने के लिये 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज घोषित करना पड़ा। जैसे-जैसे इस आर्थिक पैकेज का खुलासा सामने आता गया और यह निकला कि इसमें हर वर्ग को ऋण सुविधा उपलब्ध करवाने पर ज्यादा जो़र दिया गया है बजाये इसके की सीधे कैश गरीब आदमी को उपलब्ध करवाया जाता। ऋण देने के लिये देश की वित्तमन्त्री को बैंकों को यहां तक कहना पड़ा कि वह खुले मन से ऋण दें और सीबीसी सीबीआई तथा सीएजी से न डरें। प्रधानमन्त्री तीन बार यह कह चुके हैं कि इस संकट को अवसर में बदलना होगा लेकिन इसका असर नही हो पाया है। आर्थिक स्थिति को लेकर सरकार के नोटबंदी से लेकर अब तक के सारे आर्थिक फैसलों पर चर्चा होने लग पड़ी है। इसी वस्तुस्थिति में लाॅकडाऊन के बाद अनलाॅक उस समय शुरू करना पड़ा जब कोेरोना के मामले हर रोज़ बढ़ते चले गये। अभी यह भी स्पष्ट नही हो पा रहा है कि यह प्रकोप कब तक सहना पड़ेगा। कब इसका घटाव शुरू होगा। लाॅकडाऊन के समय जो यह निर्देश जारी किये गये थे कि जो जहां है वह वहीं रहे कोई अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकले। इन निर्देशों को बदलना पड़ा क्योंकि जो प्रवासी मज़दूर रोटी के संकट में आ गये थे उन्होने बाहर सड़को पर आना शुरू कर दिया। सैंकड़ो मील पैदल चलकर अपने अपने घर पहुंचने को निकल पड़े। इन मज़दूरों की हालत पर जब सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं आयी तब शीर्ष अदालत ने इनपर सुनवाई से इन्कार कर दिया। जो सरकार ने कहा और गोदी मीडिया ने जो दिखाया उसी पर बिना किसी शपथ पत्र के विश्वास कर लिया लेकिन जब कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों ने प्रवासी मज़दूरों की स्थिति का संज्ञान लेना शुरू कर दिया और कई सेवानिवृत न्यायधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय से तीखे सवाल पूछे तब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस स्थिति का संज्ञान लिया और केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों को निर्देश दिये कि वह इन प्रवासी मज़दूरों को अपने अपने घर पहुंचाने का पन्द्रह दिनों में प्रबन्ध करें। अब ऐसे मज़दूरो और अन्य लोगों को अपने घरों तक पहुंचाने का काम शुरू हुआ है लेकिन इसी के साथ इन बाहर से आये लोगों के कारण हर राज्य में कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं। सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के लाॅकडाऊन के शुरू में अपनाये रूख तथा लिये गये फैसलों पर आज के रूख और फैसलों के परिदृश्य में सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि लाॅकडाऊन शुरू करते समय जो दिशानिर्देश जारी किये गये थे उनसे जो डर जनता में परोसा गया था वह डर हर रोज़ बढ़ते आंकड़ों से पुख्ता होता चला गया। इस डर का असर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों तक पर पड़ा। लोग अपनों की ही खुशी और गमी में शरीक नही हो पाये। लोग अपने ही परिजनों के अन्तिम संस्कार तक करने का साहस नहीं जुटा पाये। यह काम भी प्रशासन को करना पड़ा।
लेकिन इसी सबके बीच राजनीति अपनी जगह बराबर जारी रही। विधायकों का पासे बदलना जारी रहा। सभी राजनीतिक दलों के नेतृत्व को अपने -अपने विधायकों को सुरक्षा के नाम पर एक दूसरे की पहुंच से दूर रखना पड़ा। सरकार अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने का का जश्न मनाने के लिये वर्चुअल रैलियों का आयोजन करने लग पड़ी। बढ़ते कोरोना मामलों के बीच रैलियों का यह आयोजन चर्चा का विषय बनना शुरू हो गया। स्वभाविक था कि भाजपा और सरकार का यह आयोजन आने वाले दिनों में एक बड़ी राजनैतिक नैतिकता का विषय बन जाता। लेकिन इसी बीच भारत चीन सीमा विवाद में देश के बीस सैनिकों की हत्या ने एक और बड़ा सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है। इन सैनिकों की शहादत को मैं हत्या का संज्ञान इसलिये दे रहा हॅंू क्योंकि यह निहत्थे थे इनके पास कोई शस्त्र नही था। इनका निहत्था होना विदेश मन्त्री के उस ब्यान से पुष्ट हो जाता है जिसमें उन्होंने 1964 के समझौते का जिक्र किया था कि इसके मुताबिक शस्त्रों का प्रयोग नही किया जा सकता था। विदेश मन्त्री के इस तर्क को सेना के ही पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने समझौते के क्लाज छः का संद्धर्भ उठाकर खारिज कर दिया है। अब इस पूरे प्रकरण पर रक्षामन्त्री, विदेश मन्त्री और प्रधानमन्त्री के जो ब्यान आये हैं वह एक दूसरे से मेल नही खाते हैं। फिर छः वर्ष के कार्यकाल में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी में अठाहर बार मुलाकात हो चुकी है। नरेन्द्र मोदी स्वयं पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। शी दंपति भी भारत आ चुके हैं। दोनों नेताओं ने एक दूसरे को लेकर जो कुछ देश की जनता में कह रखा है उससे यही संकेत और संदेश उभरता है कि इनके रिश्ते राजनीति से आगे निकलकर व्यक्तिगत एवम् पारिवारिक हो चुके हैं शायद इन्ही रिश्तों के कारण आज चीन का देश के व्यापार में एक बहुत बड़ी हिस्सेदारी हो चुकी है। चीन से जो आयात किया जाता है उसके मुकाबले हमारा चीन को निर्यात बहुत ही कम है। आज चीन की सैंकड़ो कम्पनियां भारत में कारोबार कर रही हैं। चीन का निवेश दो लाख करोड़ से भी शायद बढ़ गया है। दूर संचार के क्षेत्र में 70% तक चीन का कब्जा हो चुका है। आज चीन के सामान का बहिष्कार करने का आन्दोलन खड़ा किया जा रहा है। अन्य सारे मुद्दों को छोड़कर देश का ध्यान इस पर केन्द्रित करने के प्रयास में भी मीडिया और भक्तों का एक बड़ा वर्ग लग गया है। लेकिन सरकार की ओर से इसपर अभी तक चुप्पी चली हुई है। विपक्ष सही स्थिति देश के सामने रखने के लिये सरकार से लगातार सवाल पूछ रहा है। इन सवालों को राष्ट्र की एकता के नाम पर दबाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि यह सवाल प्रधानमन्त्री, रक्षा मन्त्री और विदेशमन्त्री के परस्पर विरोधी ब्यानों से उभरे हैं। ऐसे में यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि देश को सच्चाई बतायी जाये और यह जिम्मेदारी सरकार और सत्ता पक्ष की है। विपक्ष यह सवाल पूछकर अपना काम जिम्मेदारी से कर रहा है। क्योंकि नेताओं के सैनिकों की शहादत पर आने वाले ब्यान कुछ ही समय तक प्रासंगिक रहते हैं और शहादत से उभरा संकट परिवारों को स्वयं ही सहना और भुगतना पड़ता है।



लाॅकडाऊन के कारण सबसे ज्यादा प्रवासी मज़दूर प्रभावित हुए। इन लोगों को पहले तो अपने गांवों में सोशल डिस्टैन्सिंग के नाम पर जाने नही दिया गया, परिवहन के सारे साधन बन्द कर दिये गये। जब इन लोगों के भूखे मरने की नौबत आ गयी और सैंकड़ों, हज़ारों मील पैदल चलने पर विवश हो गये तब इन्हे जाने की अनुमति दे दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रवासी मज़दूरों पर आयी याचिकाओं को सुनने से इन्कार कर दिया और सरकार बिना शपथ पत्र के भी जो कुछ बोलती रही उसी को ब्रहम वाक्य मानती रही। इस पर जब रोष फैलने लगा तब शीर्ष अदालत ने सरकारों को निर्देश दिये की इन मज़दूरों को पन्द्रह दिन में अपने घर पहुंचाने का प्रबन्ध किया जाये। लेकिन न तो सरकार ने यह माना कि उसका पहला फैसला गलत था और न ही अदालत ने यह कहा। अब जब प्रतिदिन यह केस बढ रहे हैं तब पहले के प्रतिबन्धों को हटाया जा रहा है। गतिविधियां फिर शुरू करने की अनुमतियां दी जा रही हैं। अब यह सलाह दी जा रही है कि लम्बे समय तक कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी होगी। सरकार की इस सलाह से यह स्पष्ट हो जाता है कि कोरोना को लेकर अबतक का सारा आकलन और फैसले गलत थे। यह अलग सवाल है कि यह गलती सरकार से स्वभाविक सहजता में हो गयी या पूरे सोच विचार के साथ योजना के तहत की गयी है। क्योंकि जिस ढंग से केस बढ़ते जा रहे हैं उसके मुताबिक तो लाॅकडाऊन और सोशल डिस्टैसिंग की जरूरत अब थी फिर कोरोना को लेकर अब तक कोई दवाई तो सामने आयी नही है और दवाई के अभाव में सरकार ने आयुर्वेद के काढ़े की राय लोगों को दी थी। कोरोना जो लक्षण सामने आये हैं उनमें यह काढा सबसे ज्यादा उपयोगी है इसमें कोई दो राय नहीं है। यह काढ़ा बड़े अधिकारियों, सांसदो, विधायकों और कुछ स्वास्थ्य तथा पुलिस कर्मियों कई जगह सरकार ने मुफ्त में बांटा है। लेकिन अन्य कर्मचारियों और आम आदमी को यह उपलब्ध नही है। सरकार इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये कुछ नही कर रही है जबकि यह काढ़ा हर आदामी को उपलब्ध करवाया जाना चाहिये था। लेकिन सरकार ऐसा कर नही रही है इससे भी सरकार की गंभीरता पर ही सवाल उठते हैं।
इस परिदृश्य में यह सवाल और ज्यादा गंभीर और सापेक्ष हो जाता है कि आखिर सरकार का पैसा चला कहां गया। क्योंकि बीस लाख करोड़ के राहत पैकेज में कैश-इन- हैण्ड तो बहुत कम लोगों को और बहुत ही कम राशी में दिया गया है। बल्कि सारा जोर बैंकों के ऋण पर है। लेकिन अब बैंक सहजता से ऋण दे नही रहे है। यह शायद इसलिये है कि अब बैंकों के पास जनता का ही जमा धन रह गया है। सरकार ने जिस तरह से बैंकों को थ्री सी से न डरने का अभयदान दिया है उससे स्पष्ट है कि यह ऋण भी यदि दे दिया जाता है तो एनपीए ही होगा। जिस तरह प्रधानमन्त्री मुद्रा ऋण में हुआ है। अब यह देखना शेष है कि बैंक कितना ऋण दे पाते हैं। लेकिन पिछले एनपीए पर सरकार की गंभीरता का इसी से पता चल जाता है कि विजय माल्या को भारत वापिस लाने के लिये यहां तक खबरें छप गयी कि हवाई जहाज चला गया है और कभी भी लैण्ड कर सकता है। परन्तु यह खबर ही रह गयी हकीकत नही बन पायी। इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक हालात शायद नोटबन्दी के बाद से ही बिगडने लग गये थे। आज यदि कोरोना न भी होता तो भी शायद यही स्थिति होती।




वित्त मन्त्राी ने जब बीस लाख करोड़ के आंकड़े के डिटेल सामने रखे है तब यह सामने आया है कि जिस एमएसएम ई क्षेत्र के लिये 50,000 करोड़ का इक्विटी फण्ड जारी किया गया है उसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की परिभाषा भी बदल दी गयी है। इस बदली परिभाषा के अनुसार अब एक करोड़ के निवेश वाला उद्योग सूक्ष्म 10 करोड़ का निवेश लघु और 20 करोड़ के निवेश वाला मध्यम उद्योग होगा। वित्तमन्त्री के मुताबिक एमएसएम ई क्षेत्र में 45 लाख उद्योग ईकाईयां पंजीकृत हैं। अब जो 30 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं यदि उनमें से आधे लोग भी सूक्ष्म उद्योग लगाकर अपना रोज़गार शुरू करना चाहें तो उन्हे क्या एक करोड़ प्रति व्यक्ति के हिसाब से ऋण मिल पायेगा? क्या इतना पैसा बैंकों और सरकार के पास है? क्या आज एक करोड़ बेरोज़गार को एक करोड़ प्रति व्यक्ति देने की स्थिति है? शायद यह कभी संभव नही हो सकता। लेकिन घोषणा कर दी गयी है क्योंकि इस पर यह सवाल पूछने वाला नही है कि ऐसी अव्यवहारिक घोषणाएं करके समाज को ठगा क्यों जा रहा है।
उद्योगों की इस परिभाषा के बाद वित्त्मन्त्री ने समाज के लोअर मिडिल क्लास की परिभाषा सामने रखी है। उनके मुताबिक छः लाख से अठारह लाख कमाने वाला व्यक्ति लोअर मिडिल क्लास में आता है। वित्तमन्त्री के मुताबिक कम से कम छः लाख प्रतिवर्ष अर्थात 50,000/-रूपये प्रमिमास कमाने वाला लोअर मिडिल क्लास में आता है। वित्तमन्त्री के इस आकलन से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आज कितने लोग ऐसे है जो पचास हजार प्रतिमाह कमा पा रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि समाज को लेकर सरकार का आकलन कतई व्यवहारिक नही है। शायद इन्ही आकलनों के आधार पर बीपीएल और एपीएल के मानक बदले गये हैं और एपीएल परिवारों को सस्ते राशन की पात्रता से बाहर कर दिया गया है।
इन आकलनों के बाद वित्तमन्त्री ने देश के बैंकों से कहा है कि उन्हे सीबीआई, सीबीसी और सीएजी से डरने की आवश्यकता नही। बैंकों को यह अभयदान देते हुए वित्तमन्त्री ने यह निर्देश दिये हैं कि वह बिना किसी डर के लोगों को ऋण उपलब्ध करवायें। यदि यह ऋण एनपीए भी हो जाते हैं तो कोई भी बैंक प्रबन्धन को इसके लिये जिम्मेदार नही ठहरायेगा क्योंकि इसकी गांरटी सरकार देगी। अभी जो राहत पैकेज घोषित किया गया है उसमें सभी वर्गों को ऋण सुविधा ही दी गयी है। बैंको को खुले मन से ऋण देने के निर्देश दिये गये हैं। अब ऐसे में कितना ऋण बंट जायेगा और फिर इसमें से कितना वापिस आ पायेगा वह भी तब जब एनपीए होने पर गांरटी सरकार ले रही है। इससे स्पष्ट है कि अब बड़े स्तर पर बैंकों में अधिकारिक तौर पर एनपीए होने के लिये भूमिका बना दी गयी है। इससे पहले भी प्रधानमन्त्री मुद्रा ऋण योजना के तहत दस लाख करोड़ से अधिक के ऋण बांटे गये हैं जिनमें से 70% से अधिक एनपीए हो चुके हैं। ऐसे में अब जो कुछ वित्तमन्त्री के इन निर्देशों के बाद घटेगा उसकी कल्पना की जा सकती है। इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी या कुछ लोग ही इससे लाभान्वित हो पायेंगे इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा। लेकिन इससे यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या इन निगरान ऐजैन्सीयों को इस तरह से पंगू बनाना देशहित में होगा या नही। क्योंकि यह स्वभाविक है कि जब निगरान ऐजैन्सीयों का डर न तो ऋण देने वालो पर रहेगा और न ही ऋण लेने वालों पर तब स्वतः ही एक अराजकता का वातावरण तैयार नही हो जायेगा।


इस समय तात्कालिक आवश्यकता तो उस प्रवासी मज़दूर की है जो सड़कों पर है। क्योंकि उसके पास घर पहुंचने का कोई भी साधन नही है। उसे तो तत्काल उसके हाथ में नकद पैसा चाहिये था और वह ही उसे नही दिया गया। इसमें तो राहत के नाम पर भविष्य की योजनाओं का एक सपना दिखाया गया है जो इस समय उसके किसी काम का नही है। इससे हटकर भी यह राहत का पैकेज भविष्य के लिये आर्थिक सुधारों की एक रूप रेखा है। इसमें भी जिस तरह से हर क्षेत्र में प्राईवेट सैक्टर को आमन्त्रित किया गया है उससे यह लगता है कि सरकार इस समय राहत उपायों से ज्यादा भविष्य के आर्थिक सुधारों की रूप रेखा तैयार करने में लगी है। यह प्रस्तावित आर्थिक सुधार देश की आवश्यकता है या नहीं इस पर एक व्यापक सार्वजनिक बहस की आवश्यकता होगी। क्योंकि जिस देश में जनसंख्या जितनी अधिक होगी वहां पर सबसे पहले हर पेट को भरपूर भोजन की आवश्यकता है। इसके बाद कपड़ा और मकान तथा शिक्षा और स्वास्थ्य आते हैं। आज भी इस देश के 20 लाख से अधिक बच्चे सड़कों पर हैं जिन्हे भोजन तक उपलब्ध नही है। इन्हीं लोगों के लिये सामुदायिक किचन की व्यवस्था करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर हुई थी। जिस पर राज्य सरकारों ने समय पर अदालत में जवाब तक दायर नही किया और इसके लिये शीर्ष अदालत में जुर्माना तक भरा। हिमाचल भी जुर्माना भरने वाले प्रदेशों में शामिल है। इससे शासन और प्रशासन की संवदेनशीलता का पता चल जाता है। आज प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिये सरकारों की बजाये आम जनता इसी संवदेनशीलता के कारण ज्यादा सामने आयी है। इसलिये आज की पहली चिन्ता तो यह होनी चाहिये कि हर हाथ को काम कैसे सुनिश्चित हो पायेगा। क्योंकि यदि काम ही नहीं होगा तो उसे रोटी नसीब नही होगी और रोटी के अभाव में हिंसा ही उसके पास एक मात्र विकल्प रह जायेगा। लेकिन सरकार की प्राथमिकता शायद यह सब नही है वह तो इस आपदा को सुधारो का एक अवसर मानकर चल रही है।
आपदा को अवसर मानने की मानसिकता का परिणाम है कि सरकार हर क्षेत्र में प्राईवेट सैक्टर को आमन्त्रित कर रही है। इस आमन्त्रण के लिये सरकारी उपक्रमों को विनिवेश के लिये खोल दिया गया है। जबकि हर प्रधानमन्त्री के काल में सरकारी उपक्रम जोडे गये। 1952 के नेहरू काल से लेकर डा.मनमोहन सिंह के काल तक जो 195 सरकारी उपक्रम खड़े किये गये हैं उन्हें बनाने में हर प्रधानमन्त्री ने योगदान दिया है। लेकिन इन उपक्रमों को बेचने का सिलसिला अब मोदी काल में शुरू हुआ है। अब तक 2,79,619 करोड़ विनिवेश से कमा लिये गये हैं और दो लाख करोड़ तो 2020-21 के बजट में लक्ष्य ही रखा गया है। हो सकता है कि आपदा के चलते यह लक्ष्य और बढ़ा दिया जाये। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यही आरएसएस एक समय स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से एफडीआई का विरोध करता था परन्तु आज रक्षा उत्पादन में भी 74% एफडीआई के फैसले पर एकदम खामोश बैठा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या संघ के विचारक तब सही थे या आज सही हैं। क्योंकि दोनों ही समय में ठीक होना संभव नही है। आज सबसे गंभीर पक्ष तो यह है कि सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य में प्राईवेट सैक्टर के लिये और छूट दे दी है। इस महामारी के संकट में जब प्राईवेट सैक्टर के अस्पतालों को कोविड का टैस्ट मुफ्त करने के लिये कहा गया था तब इसका कितना विरोध इन्होने किया था यह सबके सामने है। भविष्य में भी इनका सहयोग इसी तरह रहेगा यह तय है। ऐसे में यह स्वभाविक है कि प्रवासी मज़दूरों की शक्ल में देश की आबादी का जो आधा भाग सामने आया है इस वर्ग को इस प्राईवेट क्षेत्र द्वारा संचालित स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की आपूर्ति में कोई सहयोग नही मिल पायेगा। लेकिन डिजिटल भारत का सपना परोसने वाली सरकार के सामने तो यह मज़दूर वर्ग कहीं है ही नही। इसकी आवश्यकता तो केवल वोट के लिये है जो किसी भी नये नारे के हथियार से हथिया लिया जायेगा।