Wednesday, 04 February 2026
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क्या सरकार दिशा भटक रही है

इस समय देश की अर्थव्यस्था एक ऐसे में मोड़ पर पहुंच चुकी है कि कोरोना महामारी से भी बड़ा संकट बनता नज़र आ रहा है। लाकडाऊन के कारण बेरोज़गारी का राष्ट्रीय आंकड़ा कुल जनसंख्या का करीब 25%हो गया है। कुछ राज्यों में तो बेरोज़गारी 40% से लेकर 49% तक पहुंच गयी है। 130 करोड़ की जनसंख्या में से 30 करोड़ जब बेरोजगार होंगे तो उस समय स्थिति क्या और कैसी होगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। यह सब क्यों और कैसे हो गया आज इस पर बहस  करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसका हल कैसे होगा। किसी भी समस्या का समाधान खोजने के लिये यह आवश्यक होता है कि उसका आकलन कितना सही है। इस आकलन का पता इससे चलेगा कि जिन लोगों पर इसका हल खोजने की जिम्मेदारी है वह इस बारे में क्या सोचते हैं। इस पर उनकी समझ क्या है। आज तक यह जिम्मेदारी सबसे पहले देश के प्रधानमन्त्री पर आती है और उसके बाद वित्त मन्त्री पर। प्रधानमन्त्री ने जब इस संकट में बीस लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की और इसका विस्तृत विवरण देश के सामने रखा तो उन्ही के दिये आंकड़े के अनुसार यह बीस लाख करोड़ न होकर केवल ग्याहर लाख करोड़ निकला। इस ग्याहर लाख करोड़ को भी अर्थव्यस्था की रेंटिग करने वाली ऐजैन्सीयों ने 1.8 लाख करोड़ बताया है और इसका कोई खण्डन वित्त मन्त्रालय की ओर से नही आया है। देश के सामने ऐसी गलत ब्यानी क्यों की गयी इसका भी जवाब नही आया है।
वित्त मन्त्राी ने जब बीस लाख करोड़ के आंकड़े के डिटेल सामने रखे है तब यह सामने आया है कि जिस एमएसएम ई क्षेत्र के लिये 50,000 करोड़ का इक्विटी फण्ड जारी किया गया है उसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की परिभाषा भी बदल दी गयी है। इस बदली परिभाषा के अनुसार अब एक करोड़ के निवेश वाला उद्योग सूक्ष्म 10 करोड़ का निवेश लघु और 20 करोड़ के निवेश वाला मध्यम उद्योग होगा। वित्तमन्त्री के मुताबिक एमएसएम ई क्षेत्र में 45 लाख उद्योग ईकाईयां पंजीकृत हैं। अब जो 30 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं यदि उनमें से आधे लोग भी सूक्ष्म उद्योग लगाकर अपना रोज़गार शुरू करना चाहें तो उन्हे क्या एक करोड़ प्रति व्यक्ति के हिसाब से ऋण मिल पायेगा? क्या इतना पैसा बैंकों और सरकार के पास है? क्या आज एक करोड़ बेरोज़गार को एक करोड़ प्रति व्यक्ति देने की स्थिति है? शायद यह कभी संभव नही हो सकता। लेकिन घोषणा कर दी गयी है क्योंकि इस पर यह सवाल पूछने वाला नही है कि ऐसी अव्यवहारिक घोषणाएं करके समाज को ठगा क्यों जा रहा है।
उद्योगों की इस परिभाषा के बाद वित्त्मन्त्री ने समाज के लोअर मिडिल क्लास की परिभाषा सामने रखी है। उनके मुताबिक छः लाख से अठारह लाख कमाने वाला व्यक्ति लोअर मिडिल क्लास में आता है। वित्तमन्त्री के मुताबिक कम से कम छः लाख प्रतिवर्ष अर्थात 50,000/-रूपये प्रमिमास कमाने वाला लोअर मिडिल क्लास में आता है। वित्तमन्त्री के इस आकलन से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आज कितने लोग ऐसे है जो पचास हजार प्रतिमाह कमा पा रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि समाज को लेकर सरकार का आकलन कतई व्यवहारिक नही है। शायद इन्ही आकलनों के आधार पर बीपीएल और एपीएल के मानक बदले गये हैं और एपीएल परिवारों को सस्ते राशन की पात्रता से बाहर कर दिया गया है।
इन आकलनों के बाद वित्तमन्त्री ने देश के बैंकों से कहा है कि उन्हे सीबीआई, सीबीसी और सीएजी से डरने की आवश्यकता नही। बैंकों को यह अभयदान देते हुए वित्तमन्त्री ने यह निर्देश दिये हैं कि वह बिना किसी डर के लोगों को ऋण उपलब्ध करवायें। यदि यह ऋण एनपीए भी हो जाते हैं तो कोई भी बैंक प्रबन्धन को इसके लिये जिम्मेदार नही ठहरायेगा क्योंकि इसकी गांरटी सरकार देगी। अभी जो राहत पैकेज घोषित किया गया है उसमें सभी वर्गों को ऋण सुविधा ही दी गयी है। बैंको को खुले मन से ऋण देने के निर्देश दिये गये हैं। अब ऐसे में कितना ऋण बंट जायेगा और फिर इसमें से कितना वापिस आ पायेगा वह भी तब जब एनपीए होने पर गांरटी सरकार ले रही है। इससे स्पष्ट है कि अब बड़े स्तर पर बैंकों में अधिकारिक तौर पर एनपीए होने के लिये भूमिका बना दी गयी है। इससे पहले भी प्रधानमन्त्री मुद्रा ऋण योजना के तहत दस लाख करोड़ से अधिक के ऋण बांटे गये हैं जिनमें से  70% से अधिक एनपीए हो चुके हैं। ऐसे में अब जो कुछ वित्तमन्त्री के इन निर्देशों के बाद घटेगा उसकी कल्पना की जा सकती है। इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी या कुछ लोग ही इससे लाभान्वित हो पायेंगे इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा। लेकिन इससे यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या इन निगरान ऐजैन्सीयों को इस तरह से पंगू बनाना देशहित में होगा या नही। क्योंकि यह स्वभाविक है कि जब निगरान ऐजैन्सीयों का डर न तो ऋण देने वालो पर रहेगा और न ही ऋण लेने वालों पर तब स्वतः ही एक अराजकता का वातावरण तैयार नही हो जायेगा।

घातक है आपदा को अवसर मानने की मानसिकता

 

प्रधानमन्त्री ने जो 20 लाख करोड़ का राहत पैकेज  घोषित किया है उसका विस्तृत ब्योरा वित्तमन्त्री ने पांच पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से देश के सामने रखा है। इस ब्योरे में एक तथ्य तो यह सामने आया है कि आर बी आई ने जो 9,94,403 करोड़ के पैकेज इस घोषणा से बहुत पहले ही जारी कर रखे थे वह भी इस 20 लाख में फिर से जोड़ दिये गये हैं। इस तरह यह घोषणा केवल 11,02,650 करोड़ की ही रह जाती है। इस 20 लाख की घोषणा मेें यह दावा किया गया था कि यह राहत जीडीपी का 10% है जबकि रेटिंग ऐजैन्सी फिच्च के मुताबिक यह राहत 10% न होकर केवल 1.8% ही है। प्रधानमन्त्री ने जब 20 लाख करोड़ की घोषणा की थी तब उन्होने अपने ब्यान में यह भी देश को बताया था कि कोरोना आपदा के बाद ही यहां पर पीपीई किट्स का निर्माण शुरू हुआ है। जबकि इस आपदा से पहले ही भारत से यह किट्स निर्यात किये जा रहे थे और यह निर्यात अब 24 मार्च के बाद बन्द हुआ है और सभी इसे जानते हैं। ऐसे में प्रधानमन्त्री की पीपीई किट्स और 20 लाख करोड़ के आंकड़े को लेकर देश के सामने रखी गयी जानकारियां तथ्यों के आधार पर सही नही हैै। स्वभाविक है कि प्रधानमन्त्री को ऐसी जानकारी प्रशासन की ओर से ही दी गयी होगी और उन्होने इसे देश के सामने वैसे ही रख दिया। ऐसी आपदा के समय पर भी जब देश के  सामने तथ्यहीन जानकारियां रखी जायेंगी तो उसका सीधा प्रभाव प्रधानमन्त्री की व्यक्तिगत छवि पर पडेगा और यह संदेश जायेगा कि या तो प्रधानमन्त्री को प्रशासन की ओर से सही तथ्य ही उपलब्ध नही करवाये जा रहे हैं या वह जनता को बहुत ही हल्के से ले रहे हैं। लेकिन यह दोनों ही स्थितियां देश और प्रधानमंत्री के लिये भी अच्छी नही हैं।
इस समय तात्कालिक आवश्यकता तो उस प्रवासी मज़दूर की है जो सड़कों पर है। क्योंकि उसके पास घर पहुंचने का कोई भी साधन नही है। उसे तो तत्काल उसके हाथ में नकद पैसा चाहिये था और वह ही उसे नही दिया गया।  इसमें तो राहत के नाम पर भविष्य की योजनाओं का एक सपना दिखाया गया है जो इस समय उसके किसी काम का नही है। इससे हटकर भी यह राहत का पैकेज भविष्य के लिये आर्थिक सुधारों की एक रूप रेखा है। इसमें भी जिस तरह से हर क्षेत्र में प्राईवेट सैक्टर को आमन्त्रित किया गया है उससे यह लगता है कि सरकार इस समय राहत उपायों से ज्यादा भविष्य के आर्थिक सुधारों की रूप रेखा तैयार करने में लगी है। यह प्रस्तावित आर्थिक सुधार देश की आवश्यकता है या नहीं इस पर एक व्यापक सार्वजनिक बहस की आवश्यकता होगी। क्योंकि जिस देश में जनसंख्या जितनी अधिक होगी वहां पर सबसे पहले हर पेट को भरपूर भोजन की आवश्यकता है। इसके बाद कपड़ा और मकान तथा शिक्षा और स्वास्थ्य आते हैं। आज भी इस देश के 20 लाख से अधिक बच्चे सड़कों पर हैं जिन्हे भोजन तक उपलब्ध नही है। इन्हीं लोगों के लिये सामुदायिक किचन की व्यवस्था करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर हुई थी। जिस पर राज्य सरकारों ने समय पर अदालत में जवाब तक दायर नही किया और इसके लिये शीर्ष अदालत में जुर्माना तक भरा। हिमाचल भी जुर्माना भरने वाले प्रदेशों में शामिल है। इससे शासन और प्रशासन की संवदेनशीलता का पता चल जाता है। आज प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिये सरकारों की बजाये आम जनता इसी संवदेनशीलता के कारण ज्यादा सामने आयी है। इसलिये आज की पहली चिन्ता तो यह होनी चाहिये कि हर हाथ को काम कैसे सुनिश्चित हो पायेगा। क्योंकि यदि काम ही नहीं होगा तो उसे रोटी नसीब नही होगी और रोटी के अभाव में हिंसा ही उसके पास एक मात्र विकल्प रह जायेगा। लेकिन सरकार की प्राथमिकता शायद यह सब नही है वह तो इस आपदा को सुधारो का एक अवसर मानकर चल रही है।
 आपदा को अवसर मानने की मानसिकता का परिणाम है कि सरकार हर क्षेत्र में प्राईवेट सैक्टर को आमन्त्रित कर रही है। इस आमन्त्रण के लिये सरकारी उपक्रमों को विनिवेश के लिये खोल दिया गया है। जबकि हर प्रधानमन्त्री के काल में सरकारी उपक्रम जोडे गये। 1952 के नेहरू काल से लेकर डा.मनमोहन सिंह के काल तक जो 195 सरकारी उपक्रम खड़े किये गये हैं उन्हें बनाने में हर प्रधानमन्त्री ने योगदान दिया है। लेकिन इन उपक्रमों को बेचने का सिलसिला अब मोदी काल में शुरू हुआ है। अब तक 2,79,619 करोड़ विनिवेश से कमा लिये गये हैं और दो लाख करोड़ तो 2020-21 के बजट में लक्ष्य ही रखा गया है। हो सकता है कि आपदा के चलते यह लक्ष्य और बढ़ा दिया जाये। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यही आरएसएस एक समय स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से एफडीआई का विरोध करता था परन्तु आज रक्षा उत्पादन में भी 74% एफडीआई के फैसले पर एकदम खामोश बैठा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या संघ के विचारक तब सही थे या आज सही हैं। क्योंकि दोनों ही समय में ठीक होना संभव नही है। आज सबसे गंभीर पक्ष तो यह है कि सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य में प्राईवेट सैक्टर के लिये और छूट दे दी है। इस महामारी के संकट में जब प्राईवेट सैक्टर के अस्पतालों को कोविड का टैस्ट मुफ्त करने  के लिये कहा गया था तब इसका कितना विरोध इन्होने किया था यह सबके सामने है। भविष्य में भी इनका सहयोग इसी तरह रहेगा यह तय है। ऐसे में यह स्वभाविक है कि प्रवासी मज़दूरों की शक्ल में देश की आबादी का जो आधा भाग सामने आया है इस वर्ग को इस प्राईवेट क्षेत्र द्वारा संचालित स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की आपूर्ति में कोई सहयोग नही मिल पायेगा। लेकिन डिजिटल भारत का सपना परोसने वाली सरकार के सामने तो यह मज़दूर वर्ग कहीं है ही नही। इसकी आवश्यकता तो केवल वोट के लिये है जो किसी भी नये नारे के हथियार से हथिया लिया जायेगा।

 

 

20 लाख करोड़ का ज़मीनी सच

 

कोरोना तालाबन्दी के कारण एक उद्योगपति से लेकर मज़दूर तक हर आदमी प्रभावित हुआ है क्योंकि सारी आर्थिक गतिविधियों पर विराम लग गया था। इसमें हुए नुकसान से उबरने के लिये प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सरकार की ओर से बीस लाख करोड़ की राहत के पैकेज की घोषणा की है। इस पैकेज में किस वर्ग को क्या और कैसे मिलेगा इसका विवरण वित्तमन्त्री ने अलग से घोषित किया है। 20 लाख करोड़ एक बहुत बड़ा आंकड़ा है और स्वभाविक है कि जब प्रधानमन्त्री किसी राहत की घोषणा करेंगे तो उसका आकार भी उस पद के अनुरूप होगा। इससे आम आदमी को कितनी उम्मीद बंधी होगी इसका अन्दाजा लगाना बहुत कठिन नहीं हैं। लेकिन अगर यह पैकेज आम आदमी की उम्मीदों के अनुरूप ज़मीनी शक्ल न ले पाया तब स्थिति क्या और कैसी हो जायेगी शायद इसका अन्दाजा इस समय नहीं लगाया जा सकता। इसलिये इस पैकेज से उम्मीदें बांधने से पहले यह समझना आवश्यक हो जाता है कि सरकार की अपनी वित्तिय सेहत कैसी है।

किसी भी सकरार की वित्तिय सेहत को समझने के लिये सबसे प्रमाणिक साक्ष्य उसका बजट दस्तावेज होता है। क्योंकि इस दस्तावेज में यह दर्ज रहता है कि एक वित्तिय वर्ष में सरकार का कुल खर्च, कुल आय और कुल ऋण दायित्व कितना है। इस संद्धर्भ में वित्तिय वर्ष 2020-21 के लिये जो बजट संसद द्वारा पारित किया गया उस पर नज़र डालना आवश्यक हो जाता है। इस वर्ष के बजट दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2020-21 में सरकार का कुल खर्च 37,14,893.47 करोड़ होगा। इसमें स्थापना का खर्च 6,09,584.79 करोड़ पैन्शन 2,10,682 करोड़ और ब्याज भुगतान 7,08,203 करोड़ रहेगा। यह कुल खर्च ही 15,28,469.79 करोड़ हो जाता है और शायद इस खर्च में कोई कटौती करना संभव नही होता है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार को इस आपदा में अपनी ओर से 20 लाख करोड़ की राहत प्रदान करने के लिये अपने सारे विकासात्मक खर्चों पर पूर्ण विराम लगाना पड़ता है। लेकिन अभी तक सरकार ने ऐसा कुछ भी देश को नही बताया है कि वह अपने कौन से खर्चों में कटौती करने जा रही है। बल्कि 20 हज़ार करोड़ के सैन्ट्रल बिस्टा कार्यक्रम को रोकने का फैसला नही लिया गया है जबकि पुराना संसद भवन एकदम ठीक है। उसके स्थान पर नया भवन बनाने की कोई आवश्यकता नही है। ऐसे कई प्रौजैक्ट हैं जिन्हें वर्तमान हालात में शुद्ध रूप से अनुपादक खर्चे कहा जा सकता है। इस वित्तिय वर्ष में सरकार की कुल अनुमानित आय 30,95,232.91 करोड़ है लेकिन आय के यह अनुमान जब लगाये गये थे तब देश में कोई कोरोना नहीं था कोई तालाबन्दी नही थी। जबकि 24 मार्च को तालाबन्दी लगाने से एक सप्ताह में ही कर संग्रह में 6000 करोड़ की कमी आई है। अप्रैल में यह कितनी और कम हुई है इसके आंकड़े अभी तक नही आये हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की जो वित्तिय स्थिति इन बजट दस्तावेजों से सामने आती है उनके आधार पर 20 लाख करोड़ सरकारी कोष से दे पाना किसी भी गणित से संभव नही है।
इस आपदा में सबसे ज्यादा मज़दूर वर्ग प्रभावित हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 23 करोड़ प्रवासी मज़दूर सरकार के रिकार्ड पर हैं। संभव है कि इतने ही और होंगे जो शायद सरकार के रिकार्ड से बाहर हैं। यह लोग अपने घरों को वापिस जाना चाहते हैं लेकिन इनके पास किराया तक नही है। जो 20 लाख करोड़ की राहत का पैकेज दिया गया है उसमें से इन मज़दूरों के लिये सिर्फ एक हज़ार करोड़ है। यह एक हज़ार करोड़ 23 करोड़ मज़दूरों में यदि बांटा जाये तो प्रत्येक के हिस्से में 50 रूपये भी नही आते है। फिर अभी सरकार ने लेबर नियमों में बदलाव कर दिया है। इस बदलाव से मज़दूरों को आठ घन्टे की जगह बारह घन्टे काम करना पड़ेगा। इस तरह के फैसलों का व्यवहारिक पक्ष क्या रहेगा इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा। यह मज़दूर गांव वापिस आ रहे हैं यह उम्मीद है कि इन्हें मनरेगा में तो काम मिल जायेगा। लेकिन मनरेगा का सच यह है कि वर्ष 2019-20 में इसके लिये 71002 करोड़ का प्रावधान था और 2020-21 में इसे घटाकर 61500 करोड़ कर दिया गया है और अब पैकेज में भी इसमें कोई और बढ़ौत्तरी नही की गयी है। राहत पैकेज में किसी भी वर्ग को हाथ में कैश नही दिया गया है। किसान और रेहड़ी फड़ी वाले से लेकर उद्योगपति तक को बैंको से ऋण सुविधा का प्रावधान किया गया है कुछ को बिना किसी गंारटी के यह ऋण लेने का प्रावधान किया है। एक साल तक किस्त न चुकाने की सुविधा रहेगी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या बैंकों के पास इतना पैसा है कि वह यह सारे ऋण दे पायेंगे। फिर देश में ऋण माफी का ऐजैण्डा तो 1977 मेें बनी जनता पार्टी की सरकार से शुरू हो गया था। यह ऐजैण्डा तब से लेकर अब तक किसी न किसी शक्ल में चल ही रहा है। बल्कि आज तो दिवालिया कानून के तहत बड़े बड़े उद्योग घराने हज़ारों करोड़ के ऋण खत्म करवा चुके हैं।
ऐसे में यह सवाल फिर अपनी जगह खड़ा रह जाता है कि क्या सरकार का यह राहत पैकेज आने वाले दिनों मेे बैंकों के लिये एक बड़ा संकट पैदा करने वाला है। क्योंकि 2018 में जो मुद्रा ऋण योजना शुरू की गयी थी उसमें लाखों करोड़ का ऋण बिना किसी गांरटी के दिया गया था जिसमें से शायद 70%से भी अधिक एनपीए हो चुका है। हिमाचल में भी इस योजना के तहत 2500 करोड़ से अधिक के ऋण दिये गये थे लेकिन इसमें से कितने एनपीए हो चुके हैं इसका कोई रिकार्ड सरकार के पास अब तक नही है। इसलिये फिर यह सवाल खड़ा रहता है कि जब सरकार के पास पैसा नही है बैंक पहले ही एनपीए के संकट में हैं तब प्रधानमन्त्री के इस ऐलान को अमली जामा कैसे पहनाया जायेगा यह सवाल उठना स्वभाविक है। फिर जो पैकेज दिया गया है यदि उस पर ईमानदारी से अमल किया जाये तो उससे उत्पादन ही बढ़ेगा जबकि आवश्यकता तो मांग के बढ़ने की है। मांग तब बढे़गी जब उपभोक्ता की क्रय शक्ति बढ़ेगी। परन्तु यह जो करोड़ों प्रवासी मज़दूर है यह उपभोक्ता का सबसे बड़ा आंकड़ा हैं और इसकी क्रय शक्ति पांच किलो अनाज़ से तो बढे़गी ही नही। फिर जिन हालात में इसे अब निकलना पडा़ है उससे इसका मनोबल एकदम टूट गया है। यह मज़दूर पूराने काम पर आसानी से लौट आयेगा इसकी संभावना इन परिस्थितियों में एकदम नही के बराबर है। ऐसे में इसका कोई जवाब नही दिखता है कि पैकेज से मांग कैसे बढ़ेगी। क्योंकि ऐसे पैकेज तो उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों को कोरोना से बहुत पहले से दिये जाते रहे हैं और उनसे मांग पर कोई असर नही पड़ा है उल्टा आम आदमी के जमा पर बैंक लगातार ब्याज दरें कम करते आये हैं और संभव है कि इस पैकेज के बाद फिर इस जमा पर ब्याज दरें कम की जाये क्योंकि बैंकों के पास यही जमा आज आसानी से उपलब्ध है।

 

 

कोरोना से बड़ा हो गया है रोज़गार का संकट

क्या कोरोना से पहले विश्व में कभी इस तरह की महामारी नही आयी हैं जिनमें इस तरह का जानी नुकसान न हुआ हो। इस पर विचार करते हुए जब 1897 का महामारी अधिनियम सामने आता है तो पता चल जाता है कि ऐसी महामारीयां प्रायः आती ही रही हैं। पिछली एक शताब्दी में आठ-दस बार किसी न किसी महामारी का प्रकोप रहा है। ऐसी महामारी विश्व के किसी भी देश से शुरू हुई लेकिन उससे प्रायः हर देश प्रभावित रहा है। अभी निकट भूतकाल में 2009-10 से एच1 एन1 स्वाईफ्लू का प्रकोप विश्वभर में रहा है। इस पर आंकड़ों सहित शैल के पिछले अंक में मैने चर्चा की है। भारत में 2010 से फरवरी 2020 तक इसका कैसा प्रकोप रहा है इसके उपलब्ध आंकड़े पाठकों के सामने रखे हैं। इन आंकड़ो से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वाईनफ्लू की गंभीरता और कोरोना की गंभीरता एक जैसी ही है। लेकिन आज तक किसी भी महामारी में किसी भी सरकार ने तालाबन्दी और कर्फ्यू जैसा कदम नहीं उठाया है। भारत में ही 2014 से भाजपा नीत मोदी सरकार सत्ता में है और इस सरकार ने भी स्वाईनफ्लू को लेकर ऐसा कदम नही उठाया जबकि इस फ्लू से 8000 से अधिक मौतें हो चुकी है।
आज जब कोरोना को रोकने के लिये तालाबन्दी का कदम उठाया गया था तब इसके मामलों का आंकड़ा 500 का था जो अब बढ़कर 50,000 से पार हो गया है। अभी और बढ़ने की आशंका है। तालाबन्दी से करीब  चालीस करोड़ लोग वह प्रभावित हुए है जो प्रवासी मज़दूरों  की संज्ञा में आते हैं। अब जब इन प्रवासी मज़दूरों को अपने घर वापिस जाने की सुविधा दी गयी तब यह जिस संख्या और तरह से बाहर निकले हैं उससे सबसे पहला प्रश्न तालाबन्दी की सार्थकता पर लगा। इसके बाद जब बाज़ार खोले गये तब जिस तरह की लाईने शराब की दुकानों के बाहर देखने को मिली हैं उससे भी तालाबन्दी के फैसले पर ही सवाल खड़े हुए हैं। अब पूरे प्रदेश में व्यवहारिक स्थिति यह हो गयी है कि तालाबन्दी चाहे और कड़ी कर दी जाये तो भी स्वाईनफ्लू ही की तरह कोरोना एक लम्बे समय तक रहेगा ही। क्योंकि यदि यह मान भी लिया जाये कि तालाबन्दी से इसके फैलाव की चेन को रोकने में सफलता मिली थी तो आज उस सफलता को सरकार ने स्वयं ही असफलता में बदल दिया है। क्योंकि कोरोना को लेकर जो भी जानकारी अब तक उपलब्ध है उसमें दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं पहला यह है कि 40% मामले ऐसे हैं जिनका कोई सोर्स नही रहा है कोई ट्रैबल हिस्ट्री नही रही है। दूसरा यह है कि जो मौतें हुई है उनमें भी अधिकांश आंकड़ा यह है कि इन लोगों को कोरोना के अतिरिक्त और भी गंभीर बिमारीयां थी। ऐसे में डाक्टर अभी तक इसका कोई निश्चित पैटर्न तय नही कर पाये हैं। क्योंकि यह भी सामने रहा है कि परिवार में एक आदमी को तो हो गया परन्तु दूसरे बचे रहे। इस परिप्रेक्ष में और अहम सवाल हो जाता है कि इस महामारी के साथ ही देश को गंभीर आर्थिक संकट में डालने का औचित्य क्या है। जब से तालाबन्दी हुई है तब से सारा कारोबार बन्द पड़ा है। अब जब सरकार ने मज़दूरों को अपने घर गांव वापिस जाने की सुविधा दी तब जाने वाले मज़दूरों की संख्या रहने वालों से कई गुणा ज्यादा है जबकि कई उद्योगों को काम काज की अनुमति मिल चुकी है। लेकिन अधिकांश लोग काम पर लौटने की बजाये घर वापिस जाने को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसा इसलिये हो रहा है कि इस बिमारी में भी जिस तरह से कुछ लोगों ने हिन्दु, मुस्लिम का सवाल खड़ा कर दिया है उससे उनका विश्वास ही टूट गया है। इस विश्वास को बनने में वर्षों लगेंगे क्योंकि सरकार की ओर से इस दिशा में कोई कारगर और व्यवहारिक कदम नही उठाये जा रहे हैं। एक तरह से आम आदमी का विश्वास शासन और प्रशासन से लगातार उठता जा रहा है। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि अविश्वास का जो वातावरण नागरिकता संशोधन अधिनियम के परिदृश्य में पैदा हुआ था उसे इस बिमारी ने और बढ़ा दिया है। यह तय है कि आने वाले लम्बे समय तक देश की अर्थव्यस्था को सामान्य होने में कठिनाई आयेगी। क्योंकि मज़दूर अपने घरों को वापिस चले गये हैं उनका लौटना आसानी से संभव नही होगा।
इस समय यदि आर्थिक संकट के आकार का आकलन किया जाये तो यह इस महामारी से कई गुणा बड़ा हो गया है। करोड़ो लोग बेरोज़गार हो गये हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही है कि नोटबन्दी से जो कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा अभी तक सारा बाज़ार उससे ही बाहर नही निकल पाया था कि इस तालाबन्दी ने न केवल पुरानी यादों को ताजा कर दिया हैं बल्कि और गहरा दिया है। जब सरकार को महामारी के नाम पर जनता से सहयोग मांगना पड़ जाये, कर्मचारियों के वेत्तन में कटौती करनी पड़ जाये तो आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाना आसान हो जाता है। लेकिन जब इन सबके साथ यह सामने आये  कि सरकार बीस हज़ार करोड़ खर्च करके नया संसद भवन और अन्य कार्यालय बनाने जा रही है तो उससे सरकार की नीयत और नीति दोनो पर सवाल खड़े हो जाते हैं। जब सरकार पंतजलि उद्योग जैसों का हजारों करोड़ो का कर्जा बट्टे खाते मे डाल सकती है तो सरकार की समझ से ज्यादा उसकी नीयत पर सवाल खड़े होते है। क्योंकि यह बुनियादी बात है कि जब कर्ज की वसूली नही की जायेगी तो एक दिन आपका सारा भण्डार खत्म हो जायेगा यह तय है। आज शायद हालात इस मोड़ पर पहुंच गये हैं । सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े हो गये हैं। यह लग रहा है कि गरीब और मध्यम वर्ग उसके ऐजैण्डे से बाहर है। कुछ अमीर लोगों की हित पोषक होकर रह गयी है सरकार इसीलिये वह बुलेट ट्रेन और सैन्ट्रल बिस्टा जैसे कार्यक्रम को रोकने के स्थान पर कर्मचारीयों तथा पैन्शनरों के मंहगाई भत्त्ते रोकने को प्राथमिकता दे रही है। विश्वभर में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आयी है लेकिन भारत में इसके दाम घटने की बजाये बढ़ते जा रहे हैं। तेल पर 69% टैक्स लिया जा रहा है इसके दाम बढने का अर्थ है कि है कि चीज मंहगी हो जायेगी। यह शायद इसलिये किया जा रहा है क्योंकि चुनाव जीतने के लिये जिस तरह से विभिन्न वर्गों को आर्थिक सहायता दी जाती है उसे पूरा करने के लिये इस तरह के कदम उठाये जाते हैं। आम आदमी सरकार की इस अमीरी प्रस्ती के बारे में सोच ही न सके इसलिये उसे हिन्दु मुस्लिम और मन्दिर मस्जिद के झगड़ों में उलझा दिया जाता है। यही कारण है कि 2014 के चुनाव से पहले जो भ्रष्टाचार के मामले उठाये गये थे उन्हे बाद में गो रक्षा, भीड़, हिंसा और लव जिहाद के नाम पर दबा दिया गया। फिर जब चुनावों मे ई वी एम पर विवाद उठा और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया तब उससे बड़ा नागरिकता संशोधन मुद्दा खड़ा हो गया। लेकिन सबके दौरान बैंको में आम आदमी के जमा पर लगातार ब्याज में कटौती होती गयी और बड़ों का 6.60 लाख करोड़ का कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया गया। लेकिन इसे मुद्दा नही बनने दिया गया। इस वस्तुस्थिति में यह तय है कि जब तक आम आदमी ऐसी महामारी में भी हिन्दु-मुस्लिम में बंटा रहेगा तो कालान्तर मे वह पकौड़े तलने के अतिरिक्त और कुछ करने लायक नही रहेगा।
 

तालाबन्दी-जवाब मांगते कुछ सवाल

 

वर्ष 2009 में एच 1 एन 1 स्वाईन फ्लू विश्व में फैला था। अप्रैल 2009 में इसका पहला मामला कैलिफोर्निया में एक दस वर्ष की लड़की में सामने आया और जून में इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया गया था। सैन्टर फार डजीज कन्ट्रोल एण्ड प्रिवेन्शन (सीडीसी) के मुताबिक यूएसए में ही करीब 61 मिलियन लोग इससे प्रभावित हुए थे जिनमें से 12469 की मौत हो गयी थी। विश्व भर में इस महामारी से करीब 5,75,400 लोगों की मौत होने का अनुमान है। अप्रैल 2009 में शुरू हुई यह महामारी अगस्त 2010 में रूकी थी। लेकिन भारत में इसका प्रकोप वर्ष 2015 से फरवरी 2020 तक ज्यादा रहा। 2015 में इसके 42592 मामले सामने आये जिनमें 2992 की मौत हो गयी। 2017 में 38811 मामले रिपोर्ट हुए और 2270 की मौत। 2018 में 15266 मामले और 1128 मौतें 2019 में 28798 मामले और 1218 की मौत। 2020 में फरवरी तक 1132 नये मामलें और 18 मौत का आंकड़ा रहा है। एनसीडीसी के मुताबिक हिमाचल में ही फरवरी 2019 में 270 परीक्षण किये गये थे जिनमें 86 मामले पाॅजिटिव पाये गये थे। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने प्रदेश की इस स्थिति पर अधिकारियों से चर्चा करके 12 बैड की सुविधा वाला एक आईसोलेशन वार्ड और 4 बैड का एक और आईसीयू की उपलब्धता सुनिश्चित करने के आदेश दिये थे। 2020 में फरवरी तक इसके 11 पाॅजिटिव मामले सामने आये जिनमें से 9 शिमला से तथा एक-एक कांगड़ा और मण्डी से रहा है। यह जानकारी सीडीसी के रिकार्ड पर आधारित है सार्वजनिक है। स्वाईनफ्लू के लक्षण और कोरोना के लक्षण एक जैसे हैं। स्वाईनफ्लू भी इन्फैक्शन से फैलता है और इसके कारण 8000 से अधिक मौतें हो चुकी है।
स्वाईनफ्लू के इन आंकड़ों और आज के कोरोना के आंकड़ों को एक साथ रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वाईनफ्लू की गंभीरता कोरोना से कम नहीं थी। वह भी उतना ही मारक रहा है जितना कोरोना है। लेकिन स्वाईनफ्लू के समय कोई तालाबन्दी नही की गयी थी। कोई कफ्र्यू नही लगाया गया था। क्या उस समय शासन प्रशासन ने स्वाईनफ्लू की गंभीरता का आकलन करने में कोई चूक की थी? क्या 8000 मौतें हो जाने के बाद इसकी भयानकता समझ आयी है? स्वाईनफ्लू के रोगियों का ईलाज और उनकी देखभाल करने वाले डाक्टर तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मी मास्क पहनने, सोशल डिस्टैसिंग रखने तथा सैनेटाईजेशन की अनुपालना करते थे। लेकिन उस समय समाज में इसका भय आज की तरह प्रभावित और प्रसारित नही किया गया था। आज भी बुहत सारे डाक्टर और कई पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह यह कह रहे हैं कि इससे इस तरह आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जिस तरह से तालाबन्दी लागू की गयी और उनकी अनुपालना सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पुलिस को दी गयी तथा अवेहलना करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामले बनाये गये हैं उससे सारी स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि कोई किसी की खुशी और गम में शरीक नही हो पा रहा है। सोशल डिस्टैंसिंग मानसिक डिस्टैसिंग बन गयी है।
24 मार्च को तालाबन्दी घोषित की गयी। उस समय किसी को भी इतना समय नही मिला कि कोई आवश्यक वस्तुएं जुटाकर रख पाता। ‘जो जहां है वह वहीं रहे’ का नियम लागू हो गया। करोडो़ लोग एक झटके में बेकार और बेरोज़गार होकर बैठ गये क्योंकि एक छोटी दुकान से लेकर बड़े से बड़ा कारखाना तक बन्द हो गया। लोगों को खाने का संकट खड़ा हो गया। लोग अपने घरों को वापिस जाना चाहते थे लेकिन अनुमति नही दी गयी। क्योंकि एक दूसरे के साथ मिलने से हर एक के संक्रमित होने का व्यक्तिगत डर बैठ गया था। इसी समय जब दिल्ली के निजा़मुद्दीन मरकज़ में तबलीगी समाज का आयोजन सामने आया तो उससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गयी। इन लोगों को इसका वाहक करार दे दिया गया। आंकडे़ इस ढंग से सामने आये की इन्ही के कारण कोरोना फैल रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसे-ऐसे विडियोज़ वायरल हो गये जिनसे पूरा मुस्लिम समाज कटघरे में खड़ा कर दिया गया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं। लेकिन इस सबके वाबजूद देश के लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया। सरकार के दिशा निर्देशों पर कोई एतराज नही उठाया। लेकिन अब जब सरकार ने प्रवासी मजदूरों और छात्रों को अपने घरों अपने राज्यों में लौटने की राहत दे दी तब पहली बार सरकार के फैसले पर सवाल उठे हैं।
तालाबन्दी से करोड़ो लोग प्रभावित हुए हैं। कोरोना की जो वस्तुस्थिति 24 मार्च को थी आज उसमें कोई सुधार नही हुआ है। तालाबन्दी के वाबजूद इसके मामले बढे़े हैं। ईलाज के नाम पर मास्क पहनना, सोशल डिस्टैसिंग रखना, सैनेटाईज़र का उपयोग करने का ही परेहज उपलब्ध है। आज सरकार ने इन मज़दूरों को आने जाने की अनुमति दे दी है लाखों का आना जाना हो भी गया है। एक ही शर्त रखी गयी है कि आने जाने वाले का परीक्षण किया जाये और संगरोधन में रखा जाये। बहुत सारे भाजपा नेताओं ने ही सरकार के इस फैसले पर सवाल भी खडे किये हैं। क्योंकि इतने सारे लोगों का परीक्षण करना और उनको संगरोधन में रख पाना व्यवहारिक रूप से ही संभव नही है। क्योंकि आज देश में परीक्षण के लिये जितने भी उपकरण उपलब्ध है यदि उन सबका इस्तेमाल दिन में तीन शिफ्टों में भी किया जाये तब एक टैस्ट करने में कितना समय लगेगा। इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है फिर अब तक 40% मामले तो ऐसे पाये गये हैं जिनमें प्रत्यक्ष लक्षण रहे ही नही है। इसलिये आज जब इन मजदूरों को आने जाने की अनुमति दे दी गयी है तब इनके संक्रमित होने इनसे संक्रमण फैलने की संभावना नही बनी रहेगी? क्या सरकार को इसका कोई अहसास ही नही हो पाया है या फिर सोच समझ कर यह फैसला लिया गया है। क्या इस फैसले से सरकार स्वयं ही तबलीगी समाज की कतार में ही नही खड़ी हो जाती है। यह सवाल लम्बे समय तक सरकार की नीयत और नीति पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता रहेगा।
अब सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप डाऊनलोड़ करना अनिवार्य कर दिया है। लेकिन इसके डाऊनलोड़ करने से आपका डाटा चोरी होने का डर है यह चेतावनी हिमाचल के डीजीपी ने दी है उन्होने इसको बडे़ सावधानी से डाऊनलोड़ करने की राय दी है। इस ऐप से आपके ऊपर निगरानी रखी जायेगी यह आशंका कांग्रेस नेता राहूल गांधी ने भी व्यक्त की है जिस पर रविशंकर प्रसाद ने कड़ा एतराज उठाया है। लेकिन पिछले दिनों सरकार ने टैलिकाॅम कंपनीयों से मोबाईल कालिंग का रिकार्ड मांगा था। इस पर शायद एयरटेल ने एतराज जताया था कि वह ऐसा किस नियम के तहत कर सकते हैं। उसी दौरान सोशल मीडिया में यह चर्चा उठी थी कि एक ऐसा ऐप तैयार किया जा रहा है जिसके माध्यम से संबंधित व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी जुटा ली जायेगी जो एनपीआर के माध्यम से लेने का प्रयास किया जा रहा है। इस चर्चा का कोई खण्डन आज तक आया नही है और यह माना नही जा सकता कि सरकार को इसकी जानकारी न रही हो। आज सरकार ने प्रवासी मज़ूदरों के आने जाने में परीक्षण की शर्त लगाई है।  लेकिन जब इसी आग्रह की एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई थी तब उसकी सुनवाई के समय शीर्ष अदालत ने उसे यह कहकर नही सुना था कि इसमें राजनीति की गंध आ रही है। इस पर बहुत सारे हल्कों पर प्रतिक्रियाएं भी उभरी थी क्योंकि इसी याचिका में पीएम केयर फण्ड पर भी सवाल उठाया गया था। आज देश की आर्थिक स्थिति एक प्रलय के मुहाने पर पहंुच गयी है। यह चेतावनी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रहमण्यम ने दी है। आरटीआई के माध्यम से यह सामने आ चुका है कि कैसे अब तक 6.60 लाख करोड़ के ऋण बट्टे खाते में डाले जा चुके हैं। इन खुलासों से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब स्वाईनफ्लू के दौर में तालाबन्दी जैसे कदमों की आवश्यकता नही समझी गयी थी तो अब कोरोना के समय क्यों?

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