Wednesday, 04 February 2026
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सत्ता के आठ वर्षों में उभरे कुछ सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की सत्ता संभाले आठ वर्ष पूरे हो गये हैं। इन आठ वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने पर प्रधानमंत्री ने इसे गरीब कल्याण सम्मेलन का नाम देते हुये देश को संबोधित किया। इस संबोधन के लिये शिमला का चयन किया गया था। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर एक बड़ी बात यह कही है कि आठ वर्षों में उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिस पर देश को शर्मिंदा होना पड़ा। प्रधानमंत्री केे इस दावे का आकलन करने के लिए 2014 के अन्ना आंदोलन के दौरान देश के सामने क्या परोसा गया था उस पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। उस समय की सरकार को भ्रष्टाचार का पर्याय प्रचारित किया गया था। क्योंकि उस समय 2G स्पेक्ट्रम पर सीएजी की रिपोर्ट आ गई थी। इस रिपोर्ट में 2G स्पेक्ट्रम के आवंटन में 176000 करोड़ का घपला होने का खुलासा किया गया था। लेकिन इस पर चली जांच में उसी सी ए जी विनोद राय ने यह कहा कि उन्हें इस गणना में गलती लगी है और कोई घपला नहीं हुआ है। इसके लिए विनोद राय ने अदालत से क्षमा याचना भी की है। उसके खिलाफ मानहानि का मामला इसलिए नहीं बना क्योंकि विनोद राय संवैधानिक पद पर थे। अन्ना का आंदोलन संघ का प्रायोजित था यह सब जानते हैं। इस एक कदम झूठे मामले से देश की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। क्या इस झूठ के बेनकाब होने पर आंदोलन के प्रायोजकांे को देश से क्षमा नहीं मांगनी चाहिए थी। आज गरीब के लिए जिन योजनाओं पर सम्मेलन को संबोधित किया जा रहा है क्या उसका एक सच यह नहीं है कि इस गरीब को जो उसके जमा पर 2014 में जो ब्याज मिलता था वहां अब आधा क्यों रह गया है? शुन्य बैलेंस के नाम से खोले गए जन-धन खातों में 1000 और 500 के न्यूनतम शेष की शर्त क्यों लगा दी गई? उस न्यूनतम पर खाता धारक को कोई लाभ क्यों नही मिलता? उज्जवला योजना के तहत बांटे गये गैस सिलेंडरों को हिमाचल में ही 65% लाभार्थी रिफिल नहीं करवा पाये हैं क्या यह गर्व करने का विषय है या शर्म महसूस करने का? गरीब के कल्याण के नाम पर क्या गरीब को ही महंगाई और बेरोजगारी की मार से सबसे ज्यादा नहीं ठगा गया? नोटबंदी जब घोषित की गयी थी तब प्रधानमंत्री ने इसके लाभ गिनवाते हुए यह दावा किया था कि भविष्य में जाली नोट छपने बंद हो जाएंगे। नए नोटों में कई सुरक्षात्मक प्रावधान होने के दावे किए गए थे। लेकिन इसका सच यह रहा है कि 99.6% पुराने नोट नये नोटों से बदल लिए गये। शेष बचे 0.4 नेपाल में नोटबन्दी प्रभावी न होने से नहीं बदले जा सके। इस तरह क्या शत प्रतिश्त पुराने नोट नये नोटों से नही बदले गये? फिर अब रिजर्व बैंक ने 2021-22 के लिये जो रिपोर्ट जारी की है उसमें साफ स्वीकारा गया है कि 10 रूपये के नोट से लेकर 2000 रूपये तक के हर मूल्य के जाली नोट अब भी छप रहे हैं। पूरे आंकड़े जारी किये गये हैं। 500 रूपये के नोटों में यह आंकड़ा 101.7% बताया गया है। क्या नोटबंदी के बाद भी जाली नोटों का छपना जारी रहना किसी भी तर्क से गर्व का विषय हो सकता है? अब जब कोरोना आया तब सबसे पहले आरोग्य सेतु एप डाउनलोड करना अनिवार्य किया गया। ऐसा न करने पर बहुत सारी बंदिशे घोषित की गयी। लेकिन जब यह मामला अदालत तक पहुंचा तो सरकार ने इस पर पूरी अनभिज्ञता प्रकट करते हुये साफ कहा कि सरकार ने इसे जारी नहीं किया है। इसी तरह टीकाकरण को लेकर हर तरह की बंदिशे जारी हुई। लेकिन यह मामला भी जब सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंचा तो सरकार ने अपने जवाब में कहा कि टीका लगवाना अनिवार्य नहीं किया गया है यह एकदम ऐच्छिक है। कोरोना को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी घोषित नहीं किया है यह सामने आ चुका है। लेकिन इसी कोरोना को भगाने के लिये प्रधानमंत्री के आग्रह पर देश ने ताली थाली बजायी दीपक जलाये। क्या किसी और देश ने बीमारी को भगाने के लिये ऐसा कदम उठाया है? क्या इस पर आप शर्म कर पायेंगे? प्रधानमत्री की व्यक्तिगत बौद्धिकता को लेकर तो कई सवाल चर्चा में है। जिस विषय ‘टोटल पॉल्टिकल साइंस’ में स्नातकोतर होने का दावा करते हैं वह देश के किस विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता है यह आज तक सामने नहीं आया है। आज जब शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर देश के सामने इस तरह के दावे किये जाएंगे तो स्वभाविक रूप से आर्थिक स्थिति को लेकर दर्जनों सवाल पूछे जाएंगे। वह सारे सवाल और दावे उछलेंगे ही जो 2014 के आंदोलन के दौरान पूछे जा रहे थे। जिस संसद को अपराधियों से मुक्त करवाने का दावा किया गया था वहां लोकसभा के 539 चयनित माननीय में से 43% अपराधिक छवि के हैं। इसमें कोई भी दल अछूता नहीं है। भाजपा 133 के आंकड़े के साथ शीर्ष पर है क्या यह सब गर्व का विषय है यह निर्णय आप स्वयं करें क्योंकि संभव है कि आपके हिंदुत्व के आगे यह कुछ भी न हो।

क्या जयराम भी मान की तर्ज पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई करेंगे


पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद भगवंत मान ने सबसे पहले उस सुरक्षा स्थिति का नये सिरे से आकलन किया जिसके तहत कुछ राजनेताओं और अन्य लोगों को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध करवाई गयी थी। इस आकलन में प्रशासन द्वारा दिये गये फीडबैक के बाद यह सुरक्षा हटा ली गयी और उन लोगों के नाम भी सार्वजनिक कर दिये गये जिनकी सुरक्षा हटायी गयी थी। अब यह सुरक्षा हटाये जाने के बाद पंजाब कांग्रेस के नेता सिद्धू मूसेवाला की कुछ लोगों ने सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी है। यह हत्या निंदनीय है विपक्ष इस हत्या के लिये मुख्यमंत्री और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल को जिम्मेदार मानते हुये उन पर भी गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने की मांग कर रहा है। इससे पता चलता है कि राजनीति अब नया मोड़ लेने वाली है। मेरे विचार में पंजाब सरकार से मांगी यह की जानी चाहिये कि वह दोषियों को जल्द से जल्द पकड़े यहां इस पर भी विचार किया जाना चाहिये कि संसद से लेकर विधानसभाओं तक कितने अपराधिक छवि के लोग माननीय बनकर पहुंच चुके हैं और इससे कोई भी राजनीतिक दल अछूता नहीं है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि हर दल ऐसे ही लोगों को अपने यहां स्थान दे रहा है। यही लोग माननीय बनकर सुरक्षा घरों में घूमते हैं जिसकी कीमत आम आदमी की सुरक्षा में कमी करके चुकायी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा दावा किया था कि वह संसद को अपराधियों से मुक्त करवायेंगे। लेकिन इस दावे के विपरीत भाजपा ने भी हर चुनाव में अपराधिक छवि के लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया है क्यों? इसलिए इस हत्या के बाद अपराधिक छवि के लोगों के राजनीति में प्रवेश को लेकर एक खुली बहस आयोजित किया जाना आवश्यक है। इस हत्या से पहले पंजाब सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करते हुये जिस तरह से अपने स्वास्थ्य मंत्री को न केवल पद से ही हटाया बल्कि जेल भी पहुंचा दिया। भ्रष्टाचार की जानकारी केवल मुख्यमंत्री तक ही थी। मीडिया और विपक्ष को इसकी भनक तक नहीं थी। लेकिन भगवंत मान ने इस पर पर्दा डालने की बजाय मंत्री के खिलाफ कारवायी करके देश की सारी सरकारों के लिये एक चुनौती खड़ी कर दी है। आज भ्रष्टाचार जिस तरह कैंसर की शक्ल ले चुका हैं उसके परिदृश्य में मान का कदम अति सराहनीय है। आज तक केंद्र से लेकर राज्यों तक कोई भी सरकार ऐसा नहीं कर पायी है। इसलिये मान के इस कदम से आम आदमी में आप की जो विश्वसनीयता बड़ी है उससे दूसरे राजनीतिक दलों का गणित गड़बड़ाना आवश्यक है। क्योंकि आप ने दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा दोनों को लगातार दो बार हराया है। पंजाब में भी यह दोनों दल हारे हैं। इससे आज आप भाजपा और कांग्रेस के विकल्प की शक्ल लेने लग गयी है। आप की जिन मुफ्ती योजनाओं पर अपरोक्ष में चर्चा उठाते हुये कुछ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को यहां तक कह दिया था कि यदि राज्यों को ऐसा करने से न रोका गया तो यहां भी श्रीलंका जैसे हालात हो सकते हैं। लेकिन इसी बैठक के बाद हिमाचल के मुख्यमंत्री ने चुनाव के परिदृश्य में कई मुफ्ती की घोषणाएं करके भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर संकट में डाल दिया। मुफ्ती की घोषणाएं केंद्र से लेकर राज्यों तक हर सरकार चुनावी लाभ के लिये कर रही है। इन्हीं मुफ्ती घोषणाओं का परिणाम महंगाई और बेरोजगारी है। इसीलिए मुफ्ती संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाय उसकी निंदा की जानी चाहिये। आप के नेतृत्व से जब यह प्रश्न पूछा गया था कि मुफ्ती के लिये संसाधन कहां से आयेंगे तो जवाब आया था कि यदि भ्रष्टाचार पर कुछ नियंत्रण कर लिया जाये तो संसाधन स्वतः बन जायेंगे। मान ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कदम उठाकर ‘आप’ का संदेश स्पष्ट कर दिया है। आज इसकी तुलना जयराम के प्रशासन से की जाने लगी है। जय राम के कई मंत्री और दूसरे लोग पत्र बम्बों के माध्यम से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। स्वास्थ्य निदेशक गिरफ्तार हुये। स्वास्थ्य मंत्री से विभाग ले लिया गया। आज भी एक डॉक्टर एम सी जैन ने प्रदेश के ड्रग कंट्रोलर के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुये प्रधानमंत्री तक पत्र लिखा है। डॉक्टर जैन जांच की मांग कर रहा है यहां तक कहा है कि यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो वह कोई भी सजा भुगतने को तैयार है। यह शिकायत कोई गुमनाम नहीं है। लेकिन जयराम सरकार इस जांच के लिए तैयार नहीं हो पा रही है। बल्कि शिकायतकर्ता और उसकी शिकायत को जनता के सामने रखने वाले समाचार पत्र को भी धमकियां दी जा रही है। भ्रष्टाचार के ऐसे दर्जनों मामले प्रदेश सरकार के संज्ञान में लाये जा चुके हैं। जिन पर कोई कारवाई नहीं हो पायी है। इसलिए आज जनता को यह स्वयं फैसला करना होगा कि वह भ्रष्टाचार को कैसे आंकती है। क्या मान की तर्ज पर जयराम से भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई की मांग करेगी जनता क्योंकि जयराम का तो सिर्फ प्रशासन ही गंभीर आरोपों के घेरे में है।

क्या अब बनेगा भ्रष्टाचार केंद्रीय मुद्दा

जयराम सरकार को प्रदेश में घटे पुलिस भर्ती पेपर लीक मामले की जांच अन्ततः सी बी आई को देनी पड़ी है। क्योंकि अब तक 73 लोगों की गिरफ्तारी करीब आठ लाख की रिकवरी और वाराणसी तथा बिहार के दलालों का पकड़ा जाना ऐसे बिंदु रहे हैं जिनके परिदृश्य में प्रदेश की एसआईटी के लिये इस मामले की जांच कर पाना आसान नहीं रह गया था। फिर प्रदेश उच्च न्यायालय में इस आश्य की एक याचिका भी दायर हो चुकी थी। इसलिए गुड़िया मामले की तर्ज पर उच्च न्यायालय के निर्देश आने से पहले ही सरकार को ऐसा फैसला लेना पड़ा है। सी बी आई जांच कब पूरी होती है और उसमें क्या सामने आता है तथा अदालत का उस पर क्या फैसला आता है इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा। सरकार यह जांच सी बी आई को देकर अपनी निष्पक्षता का प्रचार कर रही है तो विपक्ष इसे अपने दबाव की जीत बता रहा है। सरकार और विपक्ष के इन दावों में कोई हारा है तो वह है आम आदमी। यह सही है कि इस मामले ने भ्रष्टाचार को चुनावों में केंद्रीय मुद्दा बनाये जाने के स्पष्ट संकेत दे दिये हैं। क्योंकि इस मामले ने जयराम के कार्यालय में घटे हर मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित कर लिया है। प्रदेश में अब तक पेपर लीक के पांच प्रकरण घट चुके हैं। पुलिस में ही जो 2019 के प्रकरण में संलिप्त पाये गये थे उनकी अब भी सक्रिय भूमिका सामने आ गयी है। शिक्षा विभाग में किस तरह से पेपर लीक को प्रश्न पत्रों का जल जाना कहा गया यह जांच में सामने आ गया है। कॉलेज प्रवक्ताओं कि 2017 से कोई भर्ती नहीं हुई है और अब उसके लिए जो पद भरने की अधिसूचना जारी की गयी है उसमें इस भर्ती के मानक प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा एच ए एस, एच पी एस, एच एफ एस आदि सेवाओं के लिये निर्धारित किये गये मानकों से अलग कर दिये गये हैं। जयराम सरकार इस दौरान जितने लोग विभिन्न विभागों में सेवानिवृत्त हुये हैं उतने पद भी नियमित रूप से भर नहीं पायी है। यह विधानसभा में पूछे गये प्रश्नांे और उनमें आये उत्तरों के आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है। पुलिस भर्ती प्रकरण में कांगड़ा के जिस व्यक्ति का नाम चर्चा में आ रहा है उसके संबंध शासन और प्रशासन के शीर्ष में बैठे किन लोगों से हैं यह सवाल आने वाले दिनों में उछलना तय है।
प्रदेश में घटा यह पेपर लीक मामला उस परिदृश्य में और भी संवेदनशील हो जाता है जब यह सामने आता है कि हिमाचल का नाम बेरोजगारी में देश के टॉप छः राज्यों में आ जाता है। यह उस प्रदेश की हालत है जिस पर देश में जनसंख्या के अनुपात में सिक्किम के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देेने का आरोप लगा था। केंद्रीय वित्त आयोग ने उसका संज्ञान लेकर इसे कम करने के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों पर फेयर लान्ज में प्रदेश के अधिकारियों की वित्त आयोग के साथ तीन दिन की बैठक हुई थी। जिसमें दो वर्ष से खाली चले आ रहे पदों को समाप्त करने का फैसला लिया था। विधानसभा में ऐसे फैसले के लिये कांग्रेस और भाजपा ने एक दूसरे की सरकारों को जिम्मेदार ठहराया था। आज प्रदेश की जो हालत हो गयी है उसमें शासन और प्रशासन के शीर्ष पर बैठे लोगों को पूर्व में घटे इस सब का स्मरण रखना चाहिये था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और प्रदेश कर्ज तथा बेरोजगारी के मुकाम पर पहुंच गया। प्रदेश की जनता इस सब का कैसे और क्या संज्ञान लेगी यह आने वाला वक्त बतायेगा।
इस समय यह सवाल इसलिये अहम हो जाते हैं कि प्रदेश में इसी वर्ष विधानसभा के लिये चुनाव होने हैं और नई सरकार बनेगी। भाजपा सत्ता में वापसी करने के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार होगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश का अगला चुनाव जयराम के नेतृत्व में लड़ा जायेगा। क्योंकि भाजपा पुष्कर सिंह धामी और जयराम जैसे युवाओं को भविष्य के नेतृत्व का प्रयोग कर रही है। धामी को हार के बाद भी नेता बना देना और धूमल की हार के कारणों की जांच से साफ इंकार कर देना इसके स्पष्ट प्रमाण है। जयराम पांचवी बार के विधायक हैं और उनके परिवार से कोई राजनीति में नहीं है। इससे यह माना गया था कि उनके कामकाज में व्यक्तिगत हित कभी प्रभावी नहीं रहेंगे। उनके अपने परिवार के किसी सदस्य का राजनीतिक दखल कभी चर्चा में नहीं आया है। लेकिन इसके बावजूद उनके कार्याकाल में प्रदेश का बहुत अहित हुआ है। जो आज चुनावी वर्ष में पेपर लीक प्रकरण से भाजपा और जयराम दोनों को सवालों के कटघरे में खड़ा कर देता है। यह सवाल जवाब मांगेंगे कि प्रदेश का यह कर्ज कहां निवेशित हुआ? मुख्यमंत्री बनने के बाद चंडीगढ़ में आयोजित पत्रकार वार्ता में हिमाचल के 7.19% शेयर के फैसले पर अमल करवाने के दावों का क्या हुआ। इन्वेस्टर मीट के दावों और कई मामलों में श्रेष्ठता के प्रमाण पत्रों के बाद अब कठिन जन योजनाओं के प्रचार के लिये दिल्ली में मीडिया सेंटर स्थापित और प्रचार एजेंसी की सेवायें लेने की व्यवस्था क्यों आयी? क्या नेतृत्व के ऐसे प्रयोग प्रदेश के आम आदमी की कीमत पर किये जायेंगे? शीर्ष प्रशासन के खिलाफ कोई भी कदम न उठा पाने की व्यवस्था क्यों है? निश्चित है कि आने वाले दिनों में भाजपा संघ जयराम और उनके सलाहकारों से यह सवाल पूछे ही जायेंगे। ऐसे में नेतृत्व के ऐसे प्रयोगों से प्रदेश की जनता कितनी देर और भ्रमित रह पायेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

चिंतन के बाद कांग्रेस से अपेक्षाएं

बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के साथ ब्याज दरों तथा ई एम आई का बढ़ना और शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का पलायन कुछ ऐसे संकेत है जिनसे यह लगने लगा है कि कहीं भारत के हालात भी पड़ोसी देश श्रीलंका जैसे तो नहीं होने जा रहे हैं। क्योंकि इस सब के कारण विदेशी मुद्रा भंडार का संतुलन भी बिगड़ गया है। अर्थ शासन के सारे विकल्प गड़बड़ा चुके हैं। आने वाले दिनों में कारपोरेट सैक्टर को या तो 15 से 20% तक नौकरियों में या वेतन में कटौती करनी पड़ेगी। यह वह हालात है जिनमें से देश की बहुसंख्या को गुजरना ही पड़ेगा। चाहे वह सरकार की नीतियों के जितने भी समर्थक रहे हों। देश इस दिशा में क्यों पहुंचा है इस पर कभी खुली बहस नहीं हो पायी है। बैंकों का एनपीए क्यों बढ़ता गया? कर्जदार कर्ज लेकर देश से बाहर कैसे चले गये? कंपनियों को दिवालिया होने की सुविधा देते हुये उनके संचालकों को व्यक्तिगत जिम्मेदारियों से क्यों मुक्त रखा गया? बैंकों का कितना एनपीए राइट ऑफ करके उस घाटे को आम आदमी के जमा पर ब्याज दरें घटाकर पूरा करने का प्रयास किया गया। कैसे जीरो बैलेंस के खातों में न्यूनतम निवेश की शर्त डाली गयी? नोटबंदी से जब उद्योग प्रभावित हुये तब उनको उबारने के लिये कर्ज की शक्ल में आर्थिक पैकेज देने के बावजूद वह संकट से बाहर क्यों नहीं आ पाये? कोरोना में आये लॉकडाउन से उत्पादन को प्रभावित होने से क्यों नहीं बचाया जा सका? जब यह सब घट रहा था तब देश में हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, गाय, लव जिहाद, तीन तलाक और धारा 370 जैसे मुद्दों पर जनता को व्यस्त रखा गया। अधिकांश मीडिया भी सरकार की अंधभक्ति में व्यस्त हो गया। असहमति जताने वाले हर स्वर को दबाने कुचलने के लिये देशद्रोह झेलने का डर दिखाया गया। हर चुनाव में ईवीएम पर खड़े सवालों को आज तक नजरअंदाज किया गया। चुनावी रणनीतिकार राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने के सूत्र तो सुझाते रहे लेकिन समाज इस संकट से कैसे बाहर निकले यह आज तक उनके लिये मुद्दा नहीं बन पाया है। जबकि राजनीतिक दलों के लिये यह पहला मुद्दा होना चाहिये था। क्योंकि राजनीतिक दलों की ही यह पहली जिम्मेदारी है। जब राजनीतिक दल यह जिम्मेदारी निभाने में असफल हो जायेंगे तब यहां भी श्रीलंका की तरह जनता सड़कों पर उतरने को विवश हो जायेगी। यह याद रखना होगा कि श्रीलंका में 2017 में धार्मिक और दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रताड़ना का चलन शुरू हुआ था। जो आज जनक्रांति बनकर सामने आया है। इस समय यह चर्चा उठाना इसलिये आवश्यक है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अभी तीन दिन का चिंतन मन्यन करके लौटी है। इस चिंतन में अल्पसंख्यकों को लेकर चिंता व्यक्त की गयी है। उनमें विश्वास जगाने के लिए कुछ क्रियात्मक कदम उठाने की बात की गई है इसी के साथ कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्षा ने कांग्रेसजनों से कुछ त्याग करने की मांग भी की है। यह कहा गया कि पार्टी ने उन्हें जो कुछ दिया है उसे अब लौटाने की आवश्यकता है। यह स्वीकारा गया है कि इस समय देश असाधारण परिस्थितियों से गुजर रहा है जिनमें कठिन फैसले लेने आवश्यक होंगे। त्याग की मांग पर कितने नेता अमल कर पाते हैं और कितने इसी के कारण पार्टी से बाहर भी चले जाते हैं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन आज जो मुख्य मुद्दा है वह बढ़ते आर्थिक असंतुलन का है जिसमें कुछ लोगों की संपत्ति तो इस संकट काल में भी कई गुना बढ़ गयी है और अधिकांश साधनहीन होता जा रहा है। आम आदमी के पेट के लिये जब व्यवस्था संकट खड़ा कर देती है तब वह व्यवस्था की नीयत और नीति के जागरूक होने का प्रयास करता है। आज व्यवस्था की नीयत और नीति के हर पहलु पर आम आदमी को जानकार तथा जागरूक करने की आवश्यकता है। 2014 में जिस भ्रष्टाचार का सरकार को पर्याय प्रचारित कर सत्ता परिवर्तन हुआ था उस पर आज क्या स्थिति है यह सवाल पूछने का साहस हर आदमी में जगाने की आवश्यकता है। आज सत्तारूढ़ दल के वैचारिक आधारों पर बहस उठाने की जरूरत है। यह समझाने की आवश्यकता है कि चयन के स्थान पर मनोनयन परिवारवाद से ज्यादा घातक होता है। यह धारणा हिलानी होगी कि केवल संभ्रान्त को ही शासन का अधिकार है। प्राकृतिक संसाधनों की स्वायत्तता के खतरों पर खुली बहस आयोजित करने की जरूरत है। क्योंकि सत्तारूढ़ दल के लिये संघ स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद इन धारणाओं के लिये वैचारिक धरातल तैयार करने में लगा रहा है। जिसके परिणाम इस तरह से सामने आ रहे हैं। आज हर राजनीतिक दल के लिये इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। इसके लिये कांग्रेस की जिम्मेदारी सबसे बड़ी हो जाती है।

जब डूबेगी कश्ती तो डूबेगें सारे न तुम ही बचोगे न साथी तुम्हारे

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता का लगातार हनन हो रहा है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों की सूची में इस वर्ष 150वेें स्थान पर आ गया है। पिछले वर्ष 142 वें स्थान पर था। एक वर्ष में आठ स्थान पर नीचे आ गया है। यह उस समय हो रहा है जब देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार के हाथ में शासन व्यवस्था है संविधान के में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पिलर माना गया है। संविधान में प्रेस को बाकी तीनों से अलग रखा गया है। इस पर इसमें से किसी का भी सीधा हस्तक्षेप नहीं है। यह इसलिए है ताकि प्रेस समाज के प्रति जवाबदेह हर व्यक्ति से सीधा सवाल कर सके। पूछे हुये सवाल और उसके जवाब तथा उससे जुड़ी जमीनी सच्चाई को पूरी बेबाकी से जनता के सामने रखना प्रेस का कर्म और धर्म दोनों है। प्रेस जनता और शासन व्यवस्था के बीच एक माध्यम एक मीडिया की भूमिका अदा करता है। जब कोई व्यक्ति अदालत तक पहुंचने में भी असमर्थ हो जाता है तब वह अपनी फरियाद लेकर मीडिया के पास आता है ताकि उसकी बात जनता की अदालत तक पहुंच जाये। लोकलाज के चाबुक से शासन और प्रशासन दोनों सजग हो जायें शायद इसलिये जनता को एक बड़ी अदालत की संज्ञा दी गई है। इसी के लिए तो यह कहा गया है ‘‘कि गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’’
लेकिन आज जो हालात हर दिन बनते जा रहे हैं उसमें लोकतंत्र के हर पिलर की भूमिका प्रश्नित होती जा रही है। बल्कि कार्यपालिका और व्यवस्था के गठजोड़ के साथ ही इसमें अब न्यायपालिका के भी शामिल होने की चर्चाएं सामने आने लग गयी हैं। यह स्थिति और भी घातक होने जा रही है। क्योंकि जब न्यायपालिका के बीच से ही यह फैसले आने शुरू हो जायें कि अब देश को धर्मनिरपेक्षता छोड़कर धार्मिक देश हो जाना चाहिये तब क्या इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिये। मेघालय उच्च न्यायालय के जस्टिस सेन के फैसले पर सर्वाेच्च न्यायालय से लेकर संसद में सरकार की चुप्पी तक क्या सब कुछ सवालों में नहीं आ जाता है। यदि आज सविधान में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता सरकार और सत्तारूढ़ दल को लग रही है तो उस पर सीधे सार्वजनिक बहस क्यों नहीं उठाई जा सकती। इस बदलाव को एक चुनाव का ही मुद्दा बनाने का साहस सरकार क्यों नहीं दिखा पा रही है। चुनावी मुद्दा बनाकर इस पर जनता का जो भी फैसला आये उसे स्वीकार कर लिया जाये। यह शायद इसलिये नहीं किया जा रहा है कि देश की जनता इसके लिए कतई तैयार नहीं है। क्योंकि जनता ने धर्म का वह रूप भोगा है जहां एक व्यक्ति के छूने मात्र से ही दूसरे का धर्म नष्ट हो जाता था।
लेकिन आज फिर उसी व्यवस्था को लाने की बिसात बिछाई जा रही है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक वार्षिक अधिवेशन में 22 वर्ष पूर्व तीन संदनीय संसद के गठन का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इस प्रस्ताव पर भाजपा नेता डॉ. स्वामी का फ्रंट लाइन में विस्तृत लेख छप चुका है। जिस पर आज तक किसी ओर से कोई प्रतिक्रिया तक नहीं आयी है क्यों? लेकिन इस पर अमल करने के लिए दूसरे धर्मों को कमजोर और हीन दिखाने के एजेंडा पर अमल शुरू कर दिया गया है। इस पर किसी का ध्यान न जाये इसके लिये आम आदमी को आर्थिक सवालों में उलझा दिया गया है। महंगाई और बेरोजगारी लगातार इसलिये बढ़ रही है क्योंकि आय और रोजगार के सारे साधनों को एक-एक करके प्राइवेट सैक्टर को सौंपा जा रहा है। पवन हंस और एलआईसी इसके ताजा उदाहरण है। आज आर्थिकी और धार्मिकता पर जब भी मीडिया में किसी ने भी कोई सवाल पूछने का साहस किया है तो उस पर देशद्रोह तक के मामले बना दिए गये हैं। कई लोगों की नौकरियां चली गई है। सवाल पूछते वालों के विज्ञापन तक बंद करके और मुकद्दमे बना दिये गये हैं। भाजपा शासित हर राज्य इस नीति पर चल रहा है। हिमाचल की जयराम सरकार तक इन हथकंडो पर आ चुकी है। शैल इसमें भुक्तभोगी है। लेकिन आज यह असहमति मीडिया से चलकर राजनेताओं तक पहुंच गयी है। जिग्नेश मेवाणी प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। पेपर लीक की खबर छापने वाले पत्रकार को एक विधायक के इशारे पर गिरफ्तार करने तक का जब हालात पहुंच जायें तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थितियां कहां तक पहुंच चुकी हैं। अब दर्द का हद से गुजरना दवा होने के मुकाम तक पहुंच चुका है। ऐसे में अब यही कहना शेष है कि
‘‘जब डूबेगी कश्ती तो डूबेगें सारे
न तुम ही बचोगे न साथी तुम्हारे’’

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