देश को आजाद हुए पचहत्तर वर्ष हो गये हैं इसलिए इसे स्वर्ण जयन्ती कहा जा रहा है। लेकिन इसी के साथ इसे अमृत काल की संज्ञा भी दी जा रही है। समय के गणित से तो यह अवसर स्वर्ण जयन्ती बन जाता है लेकिन इसे अमृत काल क्यों कहा जा रहा है यह समझना कुछ कठिन हो रहा है। इसलिये इस कालखण्ड पर एक मोटी नजर डालना अवश्यक हो जाता है। देश को आजादी अंग्रेजों के तीन सौ वर्ष के शासनकाल से 1947 में मिली। अंग्रेज व्यापारी बनकर देश में आये और शासक बन कर गये। व्यापारी से शासक बन जाना अपने में ही बहुत कुछ कह जाता है। इससे यह भी समझ आता है कि व्यापारी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है। तीन सौ से अधिक रियासतों में बंटे देश में एक व्यापारी कैसे शासक होने तक पहुंच गया यह अपने में ही एक बड़ा सवाल बन जाता है। इसी सवाल के परिपेक्ष में अंग्रेज के शासन का ‘‘मूल मन्त्र फूट डालो और राज करो’’ इस मन्त्र को समझने और इसका विश्लेषण करने पर बाध्य कर देता है। करोड़ों की जनसंख्या और सैकड़ों राजाओं वाले देश में एक व्यापारी तीन सौ वर्ष तक राज कर जाये यह महत्वपूर्ण है। क्योंकि संख्या बल के रूप में तो अंग्रेज बहुत ही नगण्य थे। फिर उन्होंने किसमें फूट डाली। स्वभाविक है कि इस फुट का आधार यहीं के लोगों को बनाया गया। एक राजा को दूसरे से श्रेष्ठ बताया गया। एक धर्म और जाति को दूसरे धर्म और जाति से श्रेष्ठ बताया गया। इसी श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिये सब में आपसी वैमनस्य बढ़ता चला गया। इसके सैकड़ों प्रमाण इन तीन सौ वर्षों के इतिहास में उपलब्ध है। इस श्रेष्ठता के अहंकार को सामान्य करने में भी बहुत लोगों का बहुत समय लगा है और इसके भी सैकड़ों प्रमाण उपलब्ध है। अंग्रेजी शासन का तीन सौ वर्ष का इतिहास इस तथ्य से भरा पड़ा है कि जाति-धर्म और भाषा की श्रेष्ठता की होड़ समाज में ऐसी दूरियां खड़ी कर देती हैं जिन्हें पारना आसान नहीं होता है। इसी तीन सौ वर्ष के इतिहास में यह भी मौजूद है कि जब अंग्रेज को यह लगने लगा कि यह जाति, धर्म और भाषा की श्रेष्ठता का हथियार ज्यादा देर तक नहीं चल पायेगा तब उसने इन्हीं आधारों पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को उभार दिया और राजनीतिक संगठन खड़े करवा दिये। इन संगठनों ने आजादी की लड़ाई के बीच ही अपने लिये अलग-अलग राज्यों की मांग तक कर डाली कुछ संगठनों के कार्यकर्ता तो यहां तक चले गये कि वह स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध अंग्रेज के मुखबिर तक बन गये। देश का विभाजन इसी सब का परिणाम है। धार्मिक श्रेष्ठता और उससे उपजी राजनीतिक महत्वकांक्षा ने मिलकर पाकिस्तान का सृजन किया है। इस परिदृश्य में आजाद हुये देश की नई सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ था। नया संविधान बनाया जाना था। रियासतों को देश में मिलाना था। बहुजातीय, बहुभाषी और बहुधर्मी देश में यह सब आसान नहीं था। क्योंकि देश का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ था। इसलिये इस बहुविधता को सामने रखते हुये देश और सरकार को धर्मनिरपेक्ष रखा गया। संविधान सभा में बहुमत से यह फैसला लिया गया था। इसके बाद देश के विकास की ओर कदम बढ़ाया गया। देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग अति पिछड़ा था इसे मुख्यधारा में लाने के लिये उसकी पहचान करने और उपाय सुलझाने के लिये काका कालेलकर की अध्यक्षता ने एक कमेटी बनाई गयी जिसने आरक्षण का सुझाव दिया। इसी के साथ भू-सुधारों का मुद्दा आया। बड़ी जमीदारी प्रथा को खत्म करने के लिये कानून बने। फिर बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिये कदम उठाये गये। संसद में कानून बनाया गया। जब यह सारे उपाय किये जा रहे थे तभी एक वर्ग इसका विरोध करने पर आ गया। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बड़े बहुमत से बनी सरकार के मुिखया के चुनाव को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। चुनाव रद्द हो गया और देश में आपातकाल की नौबत आ गयी। 1977 में जनता पार्टी की सरकार ऐतिहासिक बहुमत से बनी। लेकिन 1980 में यह सरकार दोहरी सदस्यता के नाम पर टूट गयी। जिस दोहरी सदस्यता के कारण सरकार टूटी उसका खुला रूप मण्डल बनाम कमण्डल आंदोलन में सामने आया। आज यही रूप डॉ. मोहन भागवत के नाम से कथित रूप से लिखे गये संविधान के वायरल रूप में सामने आया है। लेकिन सरकार से लेकर संघ तक किसी ने भी इसका खण्डन नहीं किया है। सारे आर्थिक संसाधन योजनाबद्ध तरीके से प्राइवेट सेक्टर के हवाले किये जा रहे हैं। बैंक पुनः निजी क्षेत्र को सौंपने की तैयारी है। आम आदमी आज भी बीमारी का इलाज ताली थाली बजाने में ही ढूंड रहा है। नई शिक्षा नीति की प्रस्तावना में ही कह दिया गया है कि हमारे बच्चे खाड़ी के देशों में बतौर हेल्पर समायोजित हो जायेंगे। अच्छी शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। सतारुढ़ दल कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के बाद सारे क्षेत्रीय छोटे दलों के खत्म हो जाने की भविष्यवाणी का चुका है। लेकिन इस सब के बाद भी यह काल अमृत काल कहा जा रहा है और हम स्वीकार कर रहे हैं। पाठको और देशवासियों को स्वर्ण जयन्ती और अमृत काल की शुभकामनाओं के साथ यह आग्रह रहेगा कि इन बिन्दुआंे पर कुछ चिन्तन करने का प्रयास अवश्य करें।












लेकिन इस परिदृश्य में महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री को यह कहने की बाध्यता क्यों आयी? क्या प्रधानमंत्री को केजरीवाल के मुफ्ती मॉडल की बढ़ती लोकप्रियता से डर लगने लगा है। जबकि मुफ्ती के सही मायनांे में जनक प्रधानमंत्री और उनकी भाजपा है। क्या प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में बांटा गया 18.50 लाख करोड कर्ज रेवड़ी बांटना नहीं है? क्या सरकारी बैंकों का आठ लाख करोड़ का एन पी ए वहे खाते में डालना मुफ्ती नहीं है। किसान सम्मान निधि और उज्जवला योजनाएं मुफ्ती नहीं हैं। मुफ्त बिजली, पानी और बसों में महिलाओं को आधे किराये में छूट देना सब मुफ्ती में आता है। इस मुफ्ती की कीमत महंगाई बढ़ाकर और कर्ज लेेकर पूरी की जाती है। यह सारा कुछ 2014 में सत्ता पाने और उसके बाद सत्ता में बने रहने के लिये किया गया। जिसे अब केजरीवाल और अन्य ने भी सत्ता का मूल मन्त्र मान लिया है। इसलिये इसमें किसी एक को दोष देना संभव नहीं होगा।
सत्ता में बने रहने के लिये बांटी गयी इन रेवडी़यों का काला पक्ष अब सामने आने वाला है और इसी की चिन्ता में प्रधानमंत्री को यह चेतावनी देने पर बाध्य किया है। क्योंकि आर बी आई देश के तेरह राज्यों की सूची जारी कर चुका है जिनकी स्थिति कभी भी श्रीलंका जैसी हो सकती है। आर बी आई से पहले वरिष्ठ नौकर शाह प्रधानमंत्री के साथ एक बैठक में यही सब कुछ कह चुके हैं। इन लोगों ने जो कुछ कहा है वह सब आई एम एफ की अक्तूबर 2021 में आयी रिपोर्ट पर आधारित है। आई एम एफ की इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि सरकार द्वारा लिया गया कर्ज जी डी पी का 90.6 प्रतिशत हो गया है। इस कर्ज में जब सरकारी कंपनीयों द्वारा लिया गया कर्ज भी शामिल किया जायेगा तो इसका आंकड़ा 100 प्रतिशत से भी बढ़ जाता है। आई एम एफ की रिपोर्ट का ही असर है कि विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार से अपना निवेश निकालना शुरू कर दिया। इसी के कारण डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट आयी। खाद्य पदार्थों पर जी एस टी लगाना पड़ा है। देश का विदेशी मुद्रा भण्डार भी लगातार कम होता जा रहा है क्योंकि निर्यात के मुकाबले आयात बहुत ज्यादा है। अगले वित्त वर्ष में जब 265 अरब डॉलर का कर्ज वापिस करना पड़ेगा तब सारी वित्तीय व्यवस्था एकदम बिगड़ जायेगी यह तय है। तब जो महंगाई और बेरोजगारी सामने आयेगी तब उसमें समर्थक और विरोधी दोनों एक साथ और एक बराबर झेलेंगे।






द्रौपदी मुर्मू देश की पन्द्रहवीं राष्ट्रपति बनी है। आजाद भारत में पैदा हुई और आदिवासी समाज से आने वाली मुर्मू का प्रारम्भिक जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। पति और बेटों की मौत के बाद एक लिपिक के रूप में अपना जीवन शुरू करके शिक्षक बनी और वहीं से राजनीतिक शुरुआत करके इस पद तक पहुंची हैं। यह आदिवासी होना ही इस चयन का आधार बना है। क्योंकि देश में 10 करोड़ आदिवासी हैं और बहुत सारे राज्यों में जीत का गणित आदिवासियों के पास है। इसी गणित के कारण झारखण्ड सरकार ने राजनीति में कांग्रेस के साथ होने के बावजूद राष्ट्रपति के लिए आदिवासी मुर्मू को अपना समर्थन दिया। पश्चिम बंगाल में भी करीब सात प्रतिश्त आदिवासी हैं इसी के कारण ममता को यह बयान देना पड़ा था कि यदि एन.डी.ए. ने मुर्मू की पूर्व जानकारी दे दी होती तो टी.एम.सी. भी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन कर देती। पिछली बार जब एन.डी.ए. ने रामनाथ कोविन्द को उम्मीदवार बनाया था तब दलित वर्ग से ताल्लुक रखने का तर्क दिया गया था। इस तरह के तर्कों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अब राष्ट्रपति जैसे सर्वाेच्च पद के लिये भी संविधान की विशेषज्ञता जैसी अपेक्षाओं की उम्मीद करना असंभव होगा। जिस दल के पास सत्ता होगी अब राष्ट्रपति भी उसी दल की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध एक बड़ा कार्यकर्ता होगा। दल के नेता के प्रति निष्ठा ही चयन का आधार होगी।
इस समय देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही संकट से गुजर रही है। सरकार को साधारण खाद्य सामग्री पर भी जीएसटी लगाना पड़ गया है। रुपये की डॉलर के मुकाबले गिरावट लगातार जारी है। संसद में महंगाई और बेरोजगारी पर लगातार हंगामा हो रहा है। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अब आम आदमी में भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा मुस्लिम मुक्त हो चुकी है। संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक भाजपा में एक भी मुस्लिम सदस्य नहीं है। सर्वाेच्च न्यायालय के जजों तक को सोशल मीडिया में निशाना बनाया जा रहा है। नई शिक्षा नीति में मनुस्मृति को पाठयक्रम का हिस्सा बनाने की बात हो रही है। इस परिदृश्य में भी सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास के दावे किये जा रहे हैं। यशवन्त सिन्हा लगातार यह सवाल जनता के सामने रख रहे थे और द्रौपदी मुर्मू लगातार चुप्पी साधे चल रही थी। आदिवासी समाज के सौ से अधिक लोग कैसे बिना कसूर के पांच वर्ष जेल में रहे हैं यह सच भी सामने आ गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान की रक्षा मुख्य मुद्दा बनेगी या मनुस्मृति को पाठयक्रम का हिस्सा बनाना।





