Wednesday, 04 February 2026
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क्या प्रदेश के मुद्दों पर लड़ा जायेगा चुनाव

प्रदेश विधानसभा के लिये चुनावों की तिथियां घोषित होने के बाद प्रमुख दलों भाजपा कांग्रेस तथा आप के उम्मीदवारों की सूचियां आने के साथ ही इनके स्टार प्रचारकों की सूचियां भी जारी हो चुकी हैं। नामांकन वापसी के बाद मतदान तक चुनाव प्रचार के लिये इस बार बहुत कम समय रखा गया है यह संयोगवश है या इसके पीछे कोई विशेष वैचारिक धरातल रहा है क्योंकि मतदान और परिणाम के बीच बहुत अन्तराल रखा गया है। चुनाव प्रचार में जिस संख्या में केन्द्रीय नेताओं को उतारा गया है उसके परिदृश्य में प्रदेश के नेताओं की भूमिका बड़ी संकुचित होकर रह जायेगी। स्टार प्रचारकों की सूचियों से तो यही इंगित होता है कि चुनाव प्रदेश के मुद्दों पर नहीं केंद्र के मुद्दों पर लड़ा जायेगा। क्योंकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस जयराम सरकार के पूरे कार्यकाल में कोई आरोप पत्र तक जारी नहीं कर पाया है। ऐसे में कांग्रेस के केन्द्रिय नेताओं के पास प्रदेश के मद्दों की कोई बड़ी व्यवहारिक जानकारी स्वाभाविक रूप से हो नहीं पायेगी। आम आदमी पार्टी 2014 में अपने गठन से लेकर आज तक प्रदेश में गंभीर और ईमानदार हो नहीं पायी है। क्योंकि हिमाचल में आप की ज्यादा सक्रियता भाजपा के लिये नुकसानदेह होगी। इसीलिए आप हिमाचल में दिल्ली मॉडल का सूत्र अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को रटाने से आगे नहीं बढ़ी है। केजरीवाल उसी तर्ज पर दिल्ली मॉडल की बात करता है जिस तर्ज पर आज तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता को अपने ही मन की बात सुनाते आये है।ं दोनों विज्ञापन जीवियों की श्रेणी में आते हैं। जबकि केजरीवाल की मुफ्ती पर आरबीआई से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक की चिंता व्यक्त कर चुके हैं और इस पर कभी भी कोई कड़े निर्देश आ सकते हैं। आप की गुजरात में बिलकिस बानो प्रकरण में चल रही चुप्पी से कई सवाल खड़े होते जा रहे हैं।
इस परिप्रेक्ष में यह लगता है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश के मुद्दों पर बात करने के बजाय इसी से काम चलाने का प्रयास करेगा कि रुपया नहीं गिर रहा है बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। इस समय बिलकिस बानो के हत्यारों की सजा मुआफी के मामले में जिस तरह से केन्द्र की भूमिका बेनकाब हुई है उससे क्या आज भाजपा के हर नेता से यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिये कि हत्यारों और बलात्कारियों का सार्वजनिक महिमामण्डन किस संस्कृति का मानक है। क्या मुस्लिम होने से उन्हें न्याय का अधिकार नहीं रह जाता है। क्या आज यह राष्ट्रीय प्रश्न नहीं बन जाता है। क्या संघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इसी का नाम है? इसी तरह आज नोटबंदी पर आई हुई 58 याचिकाओं पर सुनवाई के माध्यम से एक सार्वजनिक बहस का वातावरण निर्मित हो रहा है। सर्वाेच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और आरबीआई को नोटिस जारी किया है। इसमें यह सामने आ चुका है की नोटबंदी का अधिकार आरबीआई एक्ट के तहत सरकार को था ही नहीं। इस बहस से यह सवाल फिर उछलेंगे कि नोटबंदी के समय घोषित लाभ कितने क्रियात्मक हो पाये हैं। नोटबंदी पर क्या आज सवाल नहीं पूछे जाने चाहियं? नफरती बयानों पर जिस तरह का कड़ा संज्ञान सर्वाेच्च न्यायालय ने लेते हुए प्रशासनिक निष्क्रियता को अदालती अवमानना करार दिया है उससे पूरे समाज में एक नयी संवेदना और संचेतना का वातावरण निर्मित हुआ है। नफरती बयानों के लिए सबसे अधिक सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोग जिम्मेदार हैं। नफरती बयानों पर भी भाजपा नेतृत्व से सवाल पूछे जाना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि यह सारे आज के राष्ट्रीय प्रश्न बन चुके हैं। इनके कारण अर्थव्यवस्था पूरी तरह तहस-नहस हो चुकी है। इन प्रश्नों से ध्यान हटाने के लिए राम मन्दिर, तीन तलाक धारा 370 हटाने जैसे मुद्दे परोसे जायेंगे।
हिमाचल के संद्धर्भ में भी इस सवाल का जवाब नहीं आयेगा कि प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में ही 2541 करोड़ रूपया बांटे जाने के बाद भी प्रदेश बेरोजगारी में देश के
टॉप छः राज्यों में क्यों आ गया। प्रदेश का कर्ज भार हर रोज बढ़ता क्यों जा रहा है? प्रदेश को दिये गये 69 राष्ट्रीय राजमार्ग और कितने चुनावों के बाद सैद्धांतिक स्वीकृति से आगे बढ़ेंगे। मनरेगा में इस वर्ष अभी तक कोई पैसा क्यों जारी नहीं हो पाया है? प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना क्यों बंद हो गयी? इसके तहत निर्माणधीन 203 सड़को का भविष्य क्या होगा। विधानसभा का यह चुनाव बहुत अर्थों में महत्वपूर्ण होने जा रहा है इसलिये यह कुछ प्रश्न आम आदमी के सामने रखे जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री और केंद्रीय एजैन्सियों के सहारे चुनाव जीतने की रणनीति

हिमाचल और गुजरात विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में करीब एक माह का अंतराल है। अब तक यह प्रथा रही है कि जिन राज्यों की विधानसभाओं का छः माह के भीतर कार्यकाल समाप्त हो रहा होता है उनके चुनावों की घोषणा चुनाव आयोग एक साथ करता रहा है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है। बल्कि हिमाचल चुनाव के लिये भी जो तारीखें घोषित हुई हैं उनके मुताबिक चुनाव प्रचार के लिये दिये गये समय से मतदान और परिणाम के बीच रखे गये अंतराल का समय बहुत अधिक है। प्रचार के लिये कम समय दिये जाने का प्रभाव छोटे दलों और निर्दलीयों पर पड़ेगा। इस पर कुछ दलों ने चुनाव आयोग को पत्र भी लिखा है। चुनाव आयोग के इस आचरण को कुछ लोग सत्तारूढ़ दल के दबाव के तौर पर देख रहे हैं। मतदान और परिणाम के बीच रखे गये लम्बे अंतराल को कुछ लोग ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंकाओं की संभावनाओं के साथ ही जोड़ कर देख रहे हैं। यह आशंकायें कितनी सही निकलती है और हिमाचल के चुनाव परिणामों का असर गुजरात पर कितना पड़ेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन विश्लेषकों के लिए ऐसी स्थिति पहली बार सामने आयी है।
हिमाचल में पीछे हुए विधानसभा के मानसून सत्र के बाद जयराम सरकार ने विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों के सम्मेलन किये हैं। हर सप्ताह मंत्रिमण्डल की बैठक करके प्रदेश भर में करोड़ों की योजनाएं घोषित की हैं। मुख्यमंत्री की इन जनसभाओं के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने भी कार्यकर्ताओं और जनता का मन टटोलने का प्रयास किया है। क्योंकि जयराम के राजनीतिक संरक्षक के रूप में नड्डा का नाम ही सबसे पहले आता रहा है। आज नड्डा जयराम बनाम धूमल खेमे में भाजपा पूरी तरह बंटी हुई है यह सब जानते हैं। बल्कि इसी खेमे बाजी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी पांच जिलों में जनसभाएं आयोजित की गयी। चम्बा की सभा के लिये जो पोस्टर लगे थे उनमें राज्यसभा सांसद इन्दु गोस्वामी का फोटो नही था। इसकी जानकारी जब दिल्ली पहुंची तब रातों-रात इन्दु के फोटो वाले पोस्टर लगे।
प्रधानमंत्री के बाद गृह मंत्री अमित शाह की रैली भी सिरमौर में आयोजित की गयी। अब चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रधानमंत्री की आधा दर्जन सभाएं करवाये जाने की योजना है।
प्रधानमंत्री की सभाओं और चुनाव आयोग की पुरानी प्रथा से हटने को यदि एक साथ जोड़ कर देखा जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि इस चुनाव में प्रदेश में केंद्रीय एजेंसियों और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका केंद्रीय होने जा रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि प्रदेश का यह चुनाव भी प्रधानमंत्री के चेहरे पर ही लड़ा जायेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस समय प्रधानमंत्री और उनकी सरकार सर्वाेच्च न्यायालय में नोटबंदी तथा चुनावी बाँडस के मुद्दों पर जिस तरह सवालों के घेरे में घिरती जा रही है उसे विपक्ष कितनी सफलता के साथ प्रदेश की जनता के बीच रख पाता है। क्योंकि यह तय है कि खेमों में बंटी प्रदेश भाजपा के किसी भी नेता के नाम पर चुनाव लड़ने का जोखिम केंद्रीय नेतृत्व नहीं उठाना चाहता है।

क्या नोटबंदी सही फैसला था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवम्बर 2016 को देर शाम देश की जनता को नोटबंदी का फैसला सुनाया था। प्रधानमंत्री के देश के नाम इस आश्य के संबोधन के साथ ही 500 और 1000 रुपये के नोट चलन से बाहर हो गये थे। पुराने नोटों को नये नोटों से बदलने में कितना समय लगा? इसके लिये व्यवहारिक तौर पर कितनी परेशानी उठानी पड़ी थी यह सब ने भोगा है। नोटबंदी से कारोबार प्रभावित हुआ है यह भी हर आदमी जानता है। नोटबंदी के बाद रियल स्टेट और ऑटोमोबाईल क्षेत्रों को कितने पैकेज देने पड़े हैं यह भी सब जानते हैं। नोटबंदी क्या आवश्यक थी? नोटबंदी का देश की आर्थिकी पर क्या प्रभाव पड़ा है? नोटबंदी घोषित करते समय इसके जो उद्देश्य गिनाये गये थे क्या वह पूरे हुए हैं? नोटबंदी से कितना कालाधन खत्म हुआ है? क्या नोटबंदी से आतंकवाद की कमर सही में टूट गयी है? क्या नोटबंदी के बाद जाली नोट छपने बन्द हो गये हैं। क्या नोटबंदी मोदी सरकार का सामूहिक फैसला था या कुछ लोगों का फैसला था? यह ऐसे सवाल हैं जिन पर आज तक सार्वजनिक रूप से कोई चर्चा सामने नहीं आयी है? शीर्ष अदालत तक इस पर खामोश रही है। सत्ता पक्ष के लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ.मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता भी इस अहम मुद्दे पर खामोश रहे हैं। बल्कि नोटबंदी के बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नाम पर जितना जन समर्थन भाजपा को मिला है उससे यही सन्देश गया है कि जनता ने मोदी की नीतियों पर अपने समर्थन की मुहर लगा दी है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि जनता नोटबंदी को आज एक काला अध्याय मानकर भूल भी चुकी है। लेकिन इस सब के साथ यह भी उतना ही कड़वा सच है कि नोटबंदी से जो आर्थिकी पटरी पर से उतरी है वह आज तक संभल नहीं पायी है। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी से होने वाली तात्कालिक कठिनाइयां झेलने के लिये जो समय मांगा था वह देश की जनता ने उन्हें दिया लेकिन प्रधानमंत्री आज तक जनता को यह नहीं बता पाये हैं कि उनकी ही नजर में यह फैसला कितना सही था। किन आकलनों के आधार पर यह फैसला लिया गया था। नोटबंदी आज से छः वर्ष पहले लागू हुई थी और छः वर्ष का कालखण्ड इस फैसले का गुण दोष के आधार पर आकलन करने के लिये बहुत पर्याप्त समय हो जाता है। नोटबंदी मोदी कार्यकाल का सबसे बड़ा आर्थिक फैसला रहा है। इस फैसले को लेकर करीब पांच दर्जन याचिकाएं सर्वाेच्च न्यायालय में आ चुकी हैं। इन याचिकाओं पर 12 अक्तूबर से शीर्ष अदालत की पांच जजों पर आधारित खण्डपीठ सुनवाई करने जा रही है। नोटबंदी पर जो भी फैसला आता है उसका असर बीत चुके समय पर तो कोई नहीं होगा। लेकिन इस फैसले का प्रभाव भविष्य में लिये जाने वाले फैसलों पर अवश्य पड़ेगा। इस समय महंगाई और बेरोजगारी पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ कर अपने चरम पर पहुंच चुकी है। इस पर नियन्त्रण लगाने की सारी संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। यह सब इस दौरान के लिये गये आर्थिक फैसलों का परिणाम है। आर्थिक फैसलों का गुण दोष के आधार पर कोई आकलन हो नहीं पाया है। क्योंकि हर फैसले के समानान्तर कुछ न कुछ धर्म एवं जाति पर आधारित घटता रहा है। आवाज उठाने वालों के खिलाफ जांच एजैन्सियों की सक्रियता बढ़ती चली गयी। विरोध के स्वरों को देशद्रोह के नाम पर दबाया जाता रहा है। लेकिन अब जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकले तो इस यात्रा ने संघ प्रमुख डॉ.मोहन भागवत को भी मस्जिद और मदरसे की चौखट पर पहुंचा दिया है। डॉ.भागवत भी यह ब्यान देने पर बाध्य हो गये कि राहुल गांधी को हल्के से न लिया जाये वह भविष्य का नेता है। इस परिदृश्य में जब नोटबंदी जैसे मुद्दे पर कोई बहस सुप्रीम कोर्ट की चौखट से निकालकर सड़क तक आयेगी तो निश्चित है कि और कई स्वरों को मुखर होने का माध्यम मिल जायेगा जिसके परिणाम महत्वपूर्ण होंगे।

अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों के नाम पर महंगाई कब तक

आरबीआई ने मुद्रास्फीति दर निर्धारण पैनल के फैसले के बाद बैंकों को दिये जाने वाले कर्ज की ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। रिजर्व बैंक को पिछले कुछ अरसे में ऐसा चौथी बार करना पड़ा है। आरबीआई का कहना है कि उसे ऐसा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के परिदृश्य में करना पड़ा है। बैंकों को दिये जाने वाले कर्ज की ब्याज दरें बढ़ाने का अर्थ है कि अभी महंगाई और बढ़ेगी यह दरें बढ़ाये जाने के साथ ही यह भी कहा गया कि प्राकृतिक गैस का रेट बढ़ गया है और इसका प्रभाव यह हुआ है कि सी एन जी ने अपने दामों में 40% की वृद्धि कर दी। आरबीआई ने यह स्पष्ट नहीं किया कि भविष्य में ऐसा कब तक चलेगा। यह दरें बढ़ने के साथ ही विकास दर का आकलन भी नीचे आ गया है। महंगाई बढ़ने के कारण ही केंद्र सरकार ने 80 करोड लोगों को दिये जाने वाले मुफ्त अनाज की समय सीमा भी इस वर्ष के अंत से आगे बढ़ाने में असमर्थता जाहिर कर दी है। इस वर्ष तक भी बढ़ौतरी हिमाचल और गुजरात में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के कारण हो पायी है। अगले वर्ष 80 करोड़ लोगों को अनाज खरीदना भी कठिन हो जायेगा यह स्पष्ट है। जब महंगाई बढ़ती है तो उसी अनुपात में बेरोजगारी भी बढ़ती है यह सामान्य सिद्धांत है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का तर्क देकर आम आदमी को इस बढ़ती महंगाई पर सवाल पूछने से रोका जा सकेगा? कितनी बार अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का तर्क देकर महंगाई और बेरोजगारी परोसी जाती रहेगी? क्योंकि नोटबंदी से लेकर आज तक देश की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गयी है लेकिन सरकार की नीतियों पर सवाल नही उठने दिये गये। आज यह सामने आ चुका है कि 9 लाख करोड़ मूल्य के 2000 के नोट गायब हैं। परन्तु इस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है इसका कोई जवाब नहीं आया है। 2014 के बाद से हर तरह के बैंक जमा पर ब्याज दरें क्यों कम होती गयी हैं? आज जो बैंक हर सेवा का शुल्क ग्राहक से वसूल रहे हैं तो फिर जमा पर ब्याज दरें कम करने की नौबत क्यों आयी? जीरो बैलेन्स के नाम पर खोले गये जनधन के खातों पर न्यूनतम बैलेन्स की शर्त लगाकर जुर्माना लगाने का फैसला क्यों लिया गया? आज जो न्यूनतम बैलेन्स के नाम पर आम आदमी का 500 और 1000 रुपए के रूप में हजारों करोड़ों का बैंकों और डाकघरों में उस पर क्या दिया जा रहा है? बड़े कर्जदारों का लाखों करोड बट्टे खाते में डाल दिया गया। नीरव मोदी जैसे कितने लोग बैंकों का हजारों करोड लेकर भाग गये हैं लेकिन उनको वापस लाने और उनसे वसूली के सारे प्रयास असफल क्यों होते जा रहे हैं? क्या यह लाखों करोड़ देश का इस तरह लूटने से बचा लिया जाता तो इससे आरबीआई को यह फैसले न लेने पड़ते।
आज सरकार को यह जवाब देना होगा कि 2022-23 के बजट में ग्रामीण विकास के आवंटन में 38% की कटौती क्यों की गयी थी? क्या इसी के कारण आज मनरेगा में कोई पैसा गांव में नहीं पहुंच पा रहा है। पीडीएस के बजट में भी भारी कटौती की गयी थी और उसी कारण से आज 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन देने का संकट आ रहा है। बजट में यह कटौती तो उस समय कर दी गयी थी जब रूस और यूक्रेन में युद्ध की कोई संभावनाएं तक नहीं थी। इसलिए आज बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के परिदृश्य में सरकार की नीयत और नीति पर खुली बहस की आवश्यकता हो जाती है।

क्यों बना है नफरती ब्यानों का वातावरण

नफरती ब्यानों से हुई वस्तुस्थिति पर उभरी चिन्ताओं पर चिन्तन को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय के जस्टिस के.एम.जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश राय की खण्डपीठ के पास सुदर्शन टीवी द्वारा दिखाये यूपीएससी जिहाद शो और धर्म संसदों में दिये गये ब्यानों तथा कोविड महामारी के दौरान एक समुदाय विशेष को चिन्हित व इंगित करते हुए सोशल मीडिया के मंचों पर आयी टिप्पणियों पर आयी याचिकाएं निपटारे के लिये लगी हैं। शीर्ष न्यायालय ने इस पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुए यह प्रश्न उठाया है कि आखिर देश जा कहां जा रहा है? अदालत ने इस पर सरकार की मुकदर्शिता पर भी चिन्ता व्यक्त करते हुये इस संद्धर्भ में एक सख्त नियामक तंत्र गठित किये जाने पर आवश्यकता पर बल दिया है। सरकार से इस पर अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। सर्वाेच्च न्यायालय में उठे सवालों में ही कमीशन की सिफारिश और चुनाव आयोग के सुझाव भी चर्चा में आये हैं। यह भी सामने आया है कि कानून में नफरती ब्यान और अफवाह तक परिभाषित नहीं है। देश के 29 राज्यों में से केवल 14 ने ही इस पर अपने विचार रखे हैं यह सामने आने के बाद सर्वाेच्च न्यायालय ने राज्यों को अपनी राय शीर्ष अदालत में रखने के निर्देश दिये हैं। शीर्ष अदालत में यह सब घटने के बाद कुछ टीवी चैनलों ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस भी आयोजित की है। इस सारे मन्थन से क्या निकल कर सामने आता है यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन आज देश में इस तरह का वातावरण क्यों निर्मित हुआ है? केन्द्र में सत्तारूढ़ पक्ष इस पर क्यों मौन चल रहा है? उसे इससे किस तरह का राजनीतिक लाभ मिल रहा है? इस मन्थन से इन सवालों का कोई सीधा संद्धर्भ नहीं उठाया जा रहा है। जबकि मेरा मानना है कि यह सवाल इस बहस का केन्द्र बिन्दु होने चाहिये। अदालत ने भी सरकार की खामोशी पर सवाल उठाते हुए एक सख्त नियामक तन्त्र के गठन की बात की है। आज केन्द्र में वह राजनीतिक दल सत्तारूढ़ है जिसका वैचारिक नियन्त्रण आर.एस.एस. के पास है। 1947 में देश की आजादी के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने वैचारिक धरातल को विस्तार देने के लिये 1948 और 1949 में ही युवा संगठन के नाम पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का गठन करने के साथ ही हिन्दुस्तान समाचार एजेन्सी का गठन कर लिया। यह वह क्रियात्मक कदम थे जिन से आने वाले वक्त में मीडिया यूथ की भूमिका का आकलन उसी समय कर लिया गया। उसके बाद आगे चलकर इसकी अनुषंागिक इकाइयों संस्कार भारती और इतिहास लेखन प्रकोष्ठ आदि का गठन इस दिशा के दूसरे मील के पत्थर सिद्ध हुए हैं। इसी सबका परिणाम संघ के सनातकों के रूप में सामने आया। मजे की बात तो यह है कि यह स्नातक लाखों की संख्या में तृतीय वर्ष पास करके आ चुके हैं। अधिकांश राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में शामिल हो चुके हैं लेकिन इस पाठयक्रम को लेकर चर्चा नहीं के बराबर रही है। आज के नये राजनीतिक कार्यकर्ताओं से चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से ताल्लुक रखते हो यदि यह पूछा जाये कि संघ का आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन क्या है तो वह शायद कुछ भी न बता पायें। उनकी नजर में यह एक सांस्कृतिक संगठन है जिसकी सांस्कृतिक विरासत मनुस्मृति से आगे नहीं बढ़ती। इसी संस्कृति का परिणाम है कि आज समाज का एक बड़ा वर्ग न्यायपालिका से लेकर राजनेताओं तक हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे में शामिल हो चुका है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 1998 के राष्ट्रीय अधिवेशन में त्रीस्तरीय संसद के गठन का प्रस्ताव पारित होने के बाद आज हालात इन ब्यानों तक पहुंच गये हैं। स्कूलों में मनुस्मृति को पाठयक्रम का हिस्सा बनाने की बात हो रही है। क्योंकि जब गुजरात दीन्नानाथ बत्रा की किताबों को स्कूल पाठयक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा था तब इसकी चर्चा तक नहीं उठाई गयी थी। आज संघ की विचारधारा पर जब तक सार्वजनिक बहस के माध्यम से स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता तक नहीं पहुंचा जाता है तब तक हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे की वकालत के लिए ऐसे नफरती ब्यानों को रोकना आसान नहीं होगा।

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