Wednesday, 04 February 2026
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क्यों उठ रहे हैं चुनाव आयोग पर सवाल

हिमाचल और गुजरात के चुनाव परिणाम जब एक ही दिन घोषित हो सकते हैं तो फिर इन चुनावों की घोषणा भी एक ही साथ क्यों नहीं हो सकती थी? यह सवाल कुछ हलकों में प्रमुखता से उभरा है लेकिन इसका कोई जवाब नहीं आया है। पोस्टल मतदान मतगणना के शुरू होने तक आ सकता है और इसमें यह आरोप लगने शुरू हो गये हैं कि पोस्टल मतदान के पात्र सभी लोगों को पर्याप्त समय पर यह सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गयी है। पोस्टल मतदान के लिये यह व्यवस्था नहीं हो पायी है कि यह मतदान भी जरनल मतदान के दिन ही संभव हो पाये। मतदान के दिन ईवीएम और वीवीपैट मशीनों के कई जगह सुचारू रूप से काम न कर पाने की शिकायतें भी बहुत जगहों से आयी हैं। ईवीएम की बजाये पुरानी मतपत्र व्यवस्था से ही मतदान करवाने की मांग लम्बे अरसे से उठती आ रही है। जब ईवीएम के साथ ही वीवीपैट मतदान का लिखित रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है तो ईवीएम के परिणाम का मिलान वीवीपैट की पर्ची से क्यों नहीं करवाया जा सकता? इसमें यदि चुनाव परिणाम घोषित करने में एक या दो दिन का समय ज्यादा लग जाता है तो इसमें किसी को भी क्या आपत्ति हो सकती हैं? एक लम्बे अरसे से ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते आ रहे हैं जिन्हें लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्नीस लाख ईवीएम मशीनें चोरी हो जाने का मामला आज तक लंबित चला रहा है। चुनाव आचार संहिता की उल्लंघना पर तुरन्त प्रभाव से आपराधिक मामला दर्ज किये जाने का प्रावधान अभी तक नहीं हो पाया है। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो आज की चुनाव व्यवस्था को लेकर उठाए जा सकते हैं। हर चुनाव के समय यह सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का काम है। चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के सांगठनिक चुनाव सुनिश्चित करवा रहा है। चुनाव उम्मीदवारों से चुनाव खर्च का हिसाब तलब करता है। क्योंकि उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की सीमा तय है। ऐसे में यह सवाल क्यों नहीं उठना चाहिये कि यही खर्च की सीमा राजनीतिक दलों के लिए भी क्यों न हो। क्योंकि जब राजनीतिक दल इस सीमा से बाहर रह जाते हैं तब सारा चुनाव ही धनबल का नंगा प्रदर्शन हो कर रहे जाता है। राजनीतिक दल यह चुनाव खर्च दल के सदस्यों के सदस्यता शुल्क या उनके चन्दे से नहीं जुटाते हैं। बल्कि यह धन इन दलों के पास कारपोरेट घरानों से आता है। किस कारपोरेट घराने ने किस दल को कितना धन चुनावी चन्दे के रूप में दिया है इसकी कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं आ पायी है। क्योंकि इसके चन्दे के लिये इलैक्शन बॉण्डज जारी किये जाते हैं। यह चुनावी बॉण्डज किस कॉर्पाेरेट घराने ने कितने खरीदे और किस दल को दिये इसकी जानकारी केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और आरबीआई को ही रहती है। इन चुनावी बॉण्डज को लेकर जब मामला सर्वाेच्च न्यायालय में आया था तब इसमें चुनाव आयोग की भूमिका बहुत ही निराशाजनक रही है। जबकि इस धन की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहनी चाहिये थी ताकि जनता को यह पता चल पाता कि किस घराने ने किस दल को कितना पैसा दिया है। क्योंकि दल सरकार बनने पर इन्हीं घरानों के पक्ष में नीतियां बनाते हैं आम आदमी इस पूरे सिस्टम में ‘‘दूध से मक्खी’’ की तरह बाहर निकल जाता है।
यह चर्चा और सवाल इस समय इसलिए प्रसांगिक हो जाते हैं क्योंकि इस समय सर्वाेच्च न्यायालय की संविधान पीठ में चुनाव आयोग को लेकर चर्चा चल रही है। यह सवाल पूरी बेबाकी से सामने आ गया है कि जिस संस्था पर चुनावों और उनसे जुड़ी हर प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी हैं उसके अपने ही गठन की प्रक्रिया में निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे पड़े हैं। चुनाव आयुक्त अरुण कुमार गोयल की नियुक्ति को लेकर संविधान पीठ ने जो सवाल उठाये हैं वह आने वाले दिनों में देश के हर बच्चे की जुबान पर होंगे यह तय है। क्योंकि यह देश के भविष्य से जुड़े सवाल हैं। अब वह समय आ गया है कि जब चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्तियों के लिए एक प्रक्रिया तय हो जानी चाहिये जिसमें प्रधानमन्त्री के साथ नेता प्रतिपक्ष और सर्वाेच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की पूरी भागीदारी रहनी चाहिये। इसके लिये केवल सरकारी सेवाओं में बैठे बड़े अधिकारियों की ही पात्रता नहीं रहनी चाहिए बल्कि अन्य पक्षों से जुड़े विद्वानों को भी अधिमान दिया जाना चाहिये। आज चुनावों को धनबल और बाहुबल से मुक्ति दिलाना पहली जिम्मेदारी होनी चाहिये।

राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका-कुछ सवाल

किसी भी राष्ट्र के आधार उसकी कार्यपालिका, व्यवस्थापालिका और न्यायपालिका माने जाते हैं। राष्ट्र की व्यवस्था चाहे लोकतांत्रिक हो या राजशाही हो इन आधारों का सीधा रिश्ता राष्ट्र के जनमानस से होता है। मीडिया इन आधारों और जनता के बीच एक सशक्त माध्यम के रूप में मौजूद रहता है। राष्ट्र की व्यवस्था चाहे जैसी भी हो उसका अंतिम प्रतिफल जनता का व्यापक हित होता है। क्योंकि जब यह हित किन्हीं कारणों से आहत होता है तो व्यवस्था को लेकर व्यवधान और सवाल दोनों एक साथ पैदा होते हैं। यही व्यवधान राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया बनते हैं। यहीं से मीडिया की भूमिका का आकलन शुरू हो जाता है। यह देखा जाता है कि मीडिया किसकी पक्षधरता निभा रहा है। यह पक्षधरता ही इस निर्माण में उसकी भूमिका तय करती है। इस परिपेक्ष में जब भारत के संद्धर्भ में चिंतन और चर्चा आती है तब सबसे पहले लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ध्यान आकर्षित होता है। लोकतंत्र में विपक्ष और सत्तापक्ष आवश्यक सोपान हैं। लेकिन जब सत्ता पक्ष विपक्ष से मुक्त व्यवस्था की कामना करता हुआ व्यवहारिक तौर पर ही विपक्ष को रास्ते से हटाने के सक्रिय प्रयासों में लग जाता है तो वहीं से लोकतंत्र पर पहला ग्रहण लग जाता है। विपक्ष को हटाने के लिये जब धर्म को भी राजनीति का अभिन्न अंग बनाकर एक सामाजिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया जाता है तो उसकी कीमत आने वाली कई पीढ़ियों को चुकानी पड़ जाती हैं।
आज देश की जो स्थिति निर्मित होती जा रही हैं उसमें पहली बार लोकतंत्र के स्थायी आधारों पर गंभीर सवाल उठते जा रहे हैं। कार्यपालिका को जो स्थायी चरित्र दिया गया था उस पर स्वयं सत्ता पक्ष द्वारा सवाल उठाते हुए उसमें कॉरपोरेट घरानों के नौकरशाहों को कार्यपालिका में जगह दी जा रही है। इसमें रोचक यह है कि इस पर किसी भी मंच पर कोई सार्वजनिक विचार-विमर्श तक नहीं हुआ है। कार्यपालिका का स्टील फ्रेम मानी जाने वाली अखिल भारतीय सेवा संवर्ग ने इसे सिर झुका कर स्वीकार कर लिया है। इसी स्वीकार का परिणाम है कि ईडी आयकर और सीबीआई जैसी संस्थाओं पर राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं। व्यवस्था पालिका में संसद से लेकर विधानसभाओं तक में हर बार आपराधिक छवि के माननीयों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। संसद और विधानसभाओं को अपराधियों से मुक्त करवाने के सारे दावे जुमले सिद्ध हुए हैं। अब तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर भी गंभीर आक्षेप लगने शुरू हो गये हैं। यह शुरुआत स्वयं देश के कानून मंत्री ने की है। जब लोकतंत्र के इन आधारों पर ही इस तरह के गंभीर आरोप लगने शुरू हो जायें तो क्या यह सोचना नहीं पड़ेगा कि वह आम आदमी इस व्यवस्था में कहां खड़ा है जिसके नाम पर यह सब किया जा रहा है।
आम आदमी के हित की व्याख्या जब शीर्ष पर बैठे कुछ संपन्न लोग करने लग जाते हैं तब सारी व्यवस्थायें एक-एक करके धराशायी होती चली जाती हैं। बड़ी चालाकी से इसे भविष्य के निर्माण की संज्ञा दे दी जाती है। नोटबंदी और लॉकडउन के समय श्रम कानूनों में हुए संशोधन तथा विवादित कृषि कानून इसी निर्माण के नाम पर लाये गये थे। इन सारे सवालों पर जब मीडिया ने सत्ता पक्ष की पक्षधरता के साथ खड़े होने का फैसला ले लिया तो क्या उसी से राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका स्पष्ट नहीं हो जाती हैं। आज जब मीडिया सत्ता पक्ष के प्रचारक की भूमिका में आ खड़ा हो गया है तो उससे किस तरह की भूमिका की अपेक्षा की जा सकती है। इसी कारण से आज निष्पक्ष मीडिया को देशद्रोह और सरकारी विज्ञापनों पर रोक जैसे हथियारों से केंद्र से लेकर राज्यों तक की सरकारें प्रताड़ित करने के प्रयासों में लगे हुए हैं। इस हमाम में सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष तक की सारी सरकारें बराबर की नंगी हैं। इस परिदृश्य में राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका पर चर्चा करना एक प्रशासनिक औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं रह जाता है।

वोट डालने के साथ ही जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती

मतदान और मतगणना के बीच 25 दिन का अन्तराल है। इतना लम्बा अन्तराल शायद इससे पहले नहीं रहा है और न ही इतने लम्बे अन्तराल का कोई तर्क दिया गया है। मतदान के बाद मत पेेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। लेकिन जिस तरह से रामपुर में ईवीएम मशीनें एक अनाधिकृत वाहन में मिली है और उसके बाद घुमारवीं से भी कांग्रेस प्रत्याशी राजेश धर्माणी ने स्ट्रांग रूम में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ किये जाने का आरोप लगाया है उससे कई गंभीर सवाल अवश्य खड़े हो जाते हैं। क्योंकि 19 लाख ईवीएम मशीनें गायब हो जाने का सवाल अभी तक अदालत में लंबित चल रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाये बिना भी यह आशंका तो बराबर बनी रह सकती है कि रामपुर जैसे तत्व कहीं भी पाये जा सकते हैं। ऐसे में चुनाव प्रत्याशियों के अतिरिक्त आम मतदाता की भी यह ज्यादा जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इस पर चौकसी बरते। क्योंकि इन घटनाओं पर जिस तरह के तीखे सवाल मीडिया द्वारा पूछे जाने चाहिये थे वह नहीं पूछे गये हैं। इसी के साथ यह सवाल भी स्वतः ही उठ खड़ा होता है कि क्या मतदाता की जिम्मेदारी वोट डालने के साथ ही समाप्त हो जाती है? क्या अगले चुनाव तक वह अप्रसांगिक होकर रह जाता है? क्योंकि उसके पास चयनित उम्मीदवार को वापस बुलाने का कोई वैधानिक अधिकार हासिल नहीं है। चुनाव सुधारों के नाम पर कई वायदे किये गये थे। संसद और विधानसभा को अपराधियों से मुक्त करवाने का दावा किया गया था। एक देश एक चुनाव का सपना दिखाया गया था। लेकिन इन वायदों को अमली शक्ल देने की दिशा में कोई काम नहीं किया गया। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि इन वायदों को उछाल कर ईवीएम पर उठते सवालों की धार को कम करने का प्रयास किया गया है। इसलिये आज के परिदृश्य में लोकतंत्र में जनादेश की निष्पक्षता बनाये रखने के लिये आम आदमी का चौकस होना बहुत आवश्यक हो जाता है। क्योंकि जनादेश को किस तरह जांच एजेंसियों और धनबल के माध्यम से प्रभावित करके चयनित सरकारों को गिराने के प्रयास हो रहे हैं यह लम्बे अरसे से देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसलिए ईवीएम को लेकर जो घटनाएं सामने आ चुकी है उनके परिदृश्य में आम आदमी का सतर्क रहना बहुत आवश्यक हो जाता है। पिछले लम्बे अरसे से गंभीर आर्थिक सवालों से आम आदमी का ध्यान हटाने के लिए समानान्तर में भावनात्मक मुद्दे उछालने का सुनियोजित प्रयास होता आ रहा है। पिछले दिनों मुफ्ती योजनाओं के वायदों को लेकर प्रधानमंत्री से आरबीआई तक ने चिंता व्यक्त की है। क्या उसका कोई असर इन चुनावों में बड़े दलों के दृष्टि पत्र और गारंटी पत्र में देखने को मिला है? इन्हीं चुनाव के दौरान प्रदेश की वित्तीय स्थिति उस मोड़ तक पहुंच गयी थी जहां कोषागार को भुगतान से हाथ खड़े करने पड़ गये थे। इसका असर आम आदमी पर पड़ेगा यह तय है। यह भी स्पष्ट है कि अधिकांश मीडिया के लिये यह कोई सरोकार नहीं रहेगा। दृष्टि पत्र और गारंटी पत्र दोनों की प्रतिपूर्ति आज प्रदेश की आवश्यकता है। सरकार किसी की भी बने लेकिन आम आदमी के सामने प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लाया जाना आवश्यक होगा। यदि श्वेत पत्र नहीं लाया जाता है तो सरकार को वित्तीय स्थिति पर कोई सवाल उठाने का अधिकार नहीं रह जायेगा। सरकार बनने पर यह आम आदमी की जिम्मेदारी होगी कि सरकार को श्वेत पत्र जारी करने के लिए बाध्य करें।

आपका मतदान आपकी बड़ी परीक्षा है

अब चुनाव प्रचार अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के राष्ट्रीय नेताओं की लम्बी टीमें चुनाव प्रचार में उतर चुकी हैं। भाजपा के पास दूसरे दलों की अपेक्षा संसाधनों की बहुतायत है इसमें कोई दो राय नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि भाजपा को जितना भरोसा अपने संसाधनों पर है कांग्रेस को उससे ज्यादा भरोसा आम आदमी की उस पीड़ा पर है जो उसने महंगाई और बेरोजगारी के रूप में इस दौर में भोगी है। 2014 में हुये राजनीतिक बदलाव के लिये किस तरह एक आन्दोलन प्रायोजित किया गया था। किस तरह इस आन्दोलन के नायकों का चयन हुआ और किस मोड़ पर यह प्रायोजित आन्दोलन एक बिखराव के साथ बन्द हुआ। यह सब इस देश ने देखा है और आज तक भोगा है। कैसे पांच वर्ष की मांग से शुरू करके उसे अगले पचास वर्ष के लिये बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है यह सब देश देख रहा है। 2014 से आज तक देश में कोई भयंकर सूखा और बाढ़ नहीं आयी है जिसके कारण अन्न का उत्पादन प्रभावित हुआ हो। लेकिन इसके बावजूद आज खाद्य पदार्थों की महंगाई कैसे इतनी बढ़ गयी है यह सवाल हर किसी को लगातार कुरेद रहा है। प्रतिवर्ष दो करोड़ स्थाई नौकरियां देने का वायदा आज सेना में भी चार वर्ष की ही नौकरी देने तक कैसे पहुंच गया यह बेरोजगार युवाओं की समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन इसी देश में सरकारी नीतियों के सहारे आपदा काल में एक व्यक्ति आदाणी कैसे सबसे बड़ा अमीर बन गया इस पर सवाल तो सबके पास है परन्तु जवाब एक ही आदमी के पास है जो अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुनता।
2014 के प्रायोजित आन्दोलन से हुये बदलाव के बाद कितने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जांच पूरी करके उनके मामले अदालतों तक पहुंचाये जा सके हैं तो शायद यह गिनती शुरू करने से पहले ही बन्द हो जायेगी। लेकिन इसके मुकाबले दूसरे दलों के कितने अपराधी और भ्रष्टाचारी भाजपा की गंगा में डुबकी लगाकर पाक साफ हो चुके हैं यह गिनती सैकड़ों से बढ़ चुकी है। पहली बार मीडिया पर गोदी मीडिया होने का आरोप लगा है। सीबीआई, आयकर और ईडी जैसी जांच एजैन्सियों पर राजनीतिक तोता होने का आरोप लगना अपने में ही एक बड़ा सवाल हो जाता है। यह सरकार जो शिक्षा नीति लायी है उसकी भूमिका के साथ लिखा है कि इससे हमारे बच्चों को खाड़ी के देशों में हैल्पर के रूप में रोजगार मिलने में आसानी हो जायेगी। इस पर प्रश्न होना चाहिये या सर पीटना चाहिये आप स्वयं निर्णय करें। क्योंकि इसी शिक्षा नीति में मनुस्मृति को पाठयक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है।
धनबल के सहारे सरकारें पलटने माननीयों की खरीद करने की जो राजनीतिक संस्कृति शुरू हो गयी है इसके परिणाम कितने भयानक होंगे यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। ऐसे में आज जब मतदान करने की जिम्मेदारी आती है तो वर्तमान राजनीतिक संस्कृति में मेरी राय में न तो निर्दलीय को समर्थन देने और न ही नोटा का प्रयोग किये जाने की अनुमति देती है। आज वक्त की जरूरत यह बन गयी है कि राष्ट्रीय दलों में से किसी एक के पक्ष में ही मतदान किया जाये। यह मतदान राष्ट्र के भविष्य के लिये एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है। जुमलों और असलियत पर परख करना आपका इम्तहान होगा।

बैक फुट पर है भाजपा

प्रदेश विधानसभा चुनावों का प्रचार अभियान अपने चरम पर पहुंच चुका है। सभी राजनीतिक दल और निर्दलीय अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। यह दावा करना उनका धर्म और कर्तव्य दोनों है जिसे वह निभा रही हैं। वैसे मुख्य प्रतिद्वंदिता सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल ने ही मानी जा रही है। इस नाते प्रदेश में भी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही माना जा रहा है। टिकट आवंटन पर दोनों पार्टियों में बगावत भी उभरी और अन्त में कांग्रेस से तीन गुना ज्यादा भाजपा के बागी चुनाव मैदान में हैं। यह एक सैद्धांतिक सच है कि चुनाव में मुख्य मुद्दा सत्तारूढ़ दल की कारगुजारी ही रहती है। सरकार की यह कारगुजारी विधानसभा के हर सत्र में पक्ष और विपक्ष के विधायकों द्वारा पूछे गये प्रश्नों तथा सरकार द्वारा दिये गये जवाबों के माध्यम से वर्ष में तीन बार सामने आ जाती है। यदि कोई इस कारगुजारी का बारीकी से अध्ययन और विश्लेषण कर ले तो उसे चुनावी निष्कर्षों पर पहुंचने में परेशानी नहीं होगी। क्योंकि विधायकों के यह प्रश्न अपने क्षेत्र की सामान्य समस्याओं बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों से जुड़े रहते हैं। प्रदेश का कोई ऐसा चुनाव क्षेत्र नहीं है जहां स्कूलों में अध्यापकों और अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी न हो। इन कमियों को लेकर पांच वर्षों में दर्जनों मामले प्रदेश उच्च न्यायालय में आ चुके हैं। कर्मचारियों के तबादलों में मंत्रियों और दूसरे नेताओं का दखल कितना बढ़ चुका है इस पर कई मंत्रियों और नेताओं को उच्च न्यायालय नामत लताड़ लगा चुका है। गांव में इन समस्याओं से जूझ रहे लोगों की संख्या दूसरी योजनाओं के लाभार्थियों से कई गुना ज्यादा है। ऊपर से महंगाई और बेरोजगारी की आंच में हर परिवार झुलस रहा है। व्यवहारिक सच को चुनावी आकलनो में बहुत ही कम लोग गणना में ले पाते हैं।
इस जनपक्ष के बाद यदि जयराम सरकार के प्रशासनिक पक्ष पर नजर डाली जाये तो जब यह सामने आता है कि इस सरकार में तो मुख्य सचिव स्तर पर लगातार अस्थिरता बनाये रखी गयी है क्यों छः बार मुख्य सचिव बदले गये? क्यों आज कई मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को बिना काम के बिठाकर सरकार का लाखों रुपया बर्बाद किया जा रहा है। एनजीटी के स्पष्ट फैसले के बाद भी प्रदेश में हजारों अवैध निर्माण खड़े होने दिये गये। एनजीटी के फैसले की अवहेलना करके डवैलप्मैन्ट प्लान बनाते रहे जिसे एनजीटी ने अस्वीकार कर दिया। ऐसे दर्जनों मामले जिनसे सरकार की प्रशासन और भ्रष्टाचार पर समझ तथा पकड़ दोनों पर एक साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं। 2017 के चुनाव में भाजपा ने वित्तीय कुप्रबन्धन का मामला बड़े जोर से उठाया था। सरकार बनने पर अपने पहले ही बजट भाषण से इस कुप्रबन्धन का खुलासा 18000 करोड़ का ऋण बिना पात्रता के लेने के रूप में किया। लेकिन इन आरोपों के बावजूद उसी वित्त सचिव को पद पर बनाये रखा जिस पर यह अपरोक्ष आरोप थे। इसलिये प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर कोई श्वेत पत्र नहीं लाया गया। बल्कि आज सबसे अधिक कर्ज लेने वाले मुख्यमंत्री का तमगा लगा लिया। लोक सेवा आयोग की जिन नियुक्तियों पर हिमाचल मांगे जवाब के नाम से चुनावों में एक पैम्फ्लैट जारी किया था सरकार बनने पर सबसे पहली नियुक्ति उसी आयोग में बिना नियम बदले करके इतिहास रच दिया और आज तक उसका कोई जवाब नहीं बन पा रहा है। बल्कि सवाल ज्यादा गंभीर बनता जा रहा है। 2017 का चुनाव धूमल के नाम पर लड़कर मिली सफलता का इनाम धूमल को हाशिये पर धकेल कर देने का परिणाम आज संगठन में सबके सामने हैं। यह जो कुछ इस कार्यकाल में घटा है उसी के कारण आज कुछ मंत्रियों को अपने को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके चुनाव प्रचार करना पड़ रहा है। ऐसी परिस्थितियां सरकार कांग्रेस के अंदर अपने हर प्रयास के बाद पैदा करने असफल ही नहीं रही बल्कि एक्सपोज भी हो गयी और इसलिए चुनाव में लगातार बैकफुट पर जाती जा रही है।

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