केन्द्र में जब 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ था उस समय इस परिवर्तन के सबसे बड़े कारक भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ खड़े हुये अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव के आन्दोलन रहे हैं। इन आन्दोलनों ने यह स्थापित कर दिया था कि देश की जनता भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकती है। यह आन्दोलन आर एस एस से पोषित संचालित और नियंत्रित थे। लेकिन देश के आम आदमी को इससे कोई सरोकार नहीं था कि इन आन्दोलनों की रणनीति का नियंत्रक कौन था। आम आदमी के लिये भ्रष्टाचार और काले धन पर उस समय परोसे गये आंकड़े ही सब कुछ थे। इसी आन्दोलन का प्रभाव था कि कांग्रेस समेत हर दल के नेता भाजपा में शामिल हो गये। उस समय भाजपा ने देश की जनता से पांच वर्ष का कार्यकाल मांगा था अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिये। लेकिन आज भाजपा-मोदी का सत्ता में तीसरा कार्यकाल चल रहा है। अब तक के कार्यकाल पर अगर नजर डालें तो यह सामने आता है कि भ्रष्टाचार के नाम पर ईडी, सीबीआई, आयकर और एनआईए सभी एजैन्सियां अति सक्रिय हैं। परन्तु उनके बनाये हुये कितने मामलों में दोष प्रमाणित होकर दोषी को सजा मिल पायी है तो शायद यह आंकड़ा अभी तक पांच प्रतिश्त तक नहीं पहुंच पाया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय से जिस तरह से वरिष्ठ अधिकारियों को निकाला गया उससे बहुत कुछ व्यावहारिक रूप से सामने आ जाता है। अब तक मोदी सरकार अपने कितने चुनावी वादों को पूरा कर पायी है तो शायद सुक्खू सरकार का आंकड़ा मोदी के आंकड़ों से बेहतर होगा। यही नहीं डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। इससे अर्थव्यवस्था का व्यावहारिक पक्ष सामने आ जाता है। कितने किसानों की आय दोगुनी हो पायी है यह आंकड़ा आज तक जारी नहीं हो सका है। मोदी सरकार ने हर चुनाव में नये नैरेटिव उछाले हैं। सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास आज बुलडोजर न्याय तक पहुंच गया है। दो करोड़ नौकरियां जुमला बनकर रह गया है।





इसी परिदृश्य में यह समझना भी आवश्यक हो जाता है कि भ्रष्टाचार और काले धन के जिन आंकड़ों पर अन्ना और रामदेव के आन्दोलन हुये थे उनका व्यावहारिक सच क्या है? काले धन के आंकड़ों में बढ़ौतरी हुई है और जिस भी भ्रष्टाचारी पर जितने बड़े आरोप लगे वह भाजपा में शामिल होते ही पाक साफ हो गया। आज भाजपा खुद कांग्रेस युक्त हो गयी है। हर दल का बड़ा भ्रष्टाचारी भाजपा में शामिल होकर पाक साफ हो गया है। पिछले एक दशक में न्याय बुलडोजर जस्टिस तक पहुंच गया है। चुनावों में लगातार सफलता का श्रेय देश के चुनाव आयोग के नाम जाता है क्योंकि वोट चोरी के आरोपों ने यह सच देश के सामने पूरे प्रमाणिक दस्तावेजों के साथ परोस दिया है। वोट चोरी का आरोप आज हर आदमी की जुबान पर आ गया है। भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस को अपने दम पर नेता प्रतिपक्ष के मुकाम तक पहुंचा दिया है। अब यह ‘‘वोट चोर गद्दी छोड़’’ कांग्रेस को और सशक्त बनाएगा यह तय है।
लेकिन इसी वस्तुस्थिति में कांग्रेस को अपने ही भीतर बैठे भाजपा और दूसरे दलों के स्लीपर सैलों से सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योंकि हर चुनाव के दौरान कांग्रेस का कोई न कोई नेता ऐसा ब्यान देता आया है जिसने पार्टी को अर्श से फर्श पर लाने का काम किया है। राहुल गांधी ने जब कांग्रेस के अन्दर बैठे स्लीपर सैलों को ललकारा था उन्हें अब सही में पार्टी से बाहर करने का समय आ गया है। आज के कांग्रेसियों को संघ के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक चिन्तन के बारे में कोई बुनियादी जानकारी नहीं है। उन्हें संघ के चिन्तन की जानकारी देनी होगी। क्योंकि भाजपा का संघ के बिना कोई बुनियादी आधार ही नहीं है। यदि कांग्रेस यह नहीं कर पाती है तो देश और पार्टी दोनों के का ही बड़ा अहित होगा। कांग्रेस को संघ के चिन्तन को समझना होगा।






इस पर एस आई आर के खिलाफ एक बड़ा विरोध खड़ा हो गया है। एस आई आर को तुरन्त प्रभाव से बन्द करने की मांग उठ गयी है। इसी मांग के साथ एस आई आर के काम में लगे बी एल ओ पर अत्याधिक दबाव और तनाव आ गया है। इसके कारण कई स्थानों पर बी एल ओज द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के समाचार भी आ गये हैं। यह भी समाचार आया है कि मध्य प्रदेश में भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी बी एल ओज की सूची में शामिल है। एस आई आर के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कई शिकायतें भी दायर हो चुकी हैं। ऐसी संभावना है कि यदि इन शिकायतों पर समय रहते पूरी निष्पक्षता के साथ सुनवाई नहीं हुई तो यह राजनीतिक दल चुनावों तक का बहिष्कार कर सकते हैं। क्योंकि जब चुनाव निष्पक्षता से होने ही नहीं है तो उनमें भागीदारी से कोई लाभ नहीं हो सकता। ऐसे में देश की जनता के सामने इस सच को पूरी नग्नता के साथ रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
अब जब बिहार चुनावों के लगभग एक तरफा परिणाम आने के बाद ही चुनाव आयोग पर उठते सवाल शान्त नहीं हुये हैं तब देश के दो सौ सतर पूर्व न्यायाधीशों, राजनयिकों और वरिष्ठ नौकर शाहों ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र जारी करके उसकी मंशा पर सवाल उठाते हुये उसके आरोपों को चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश करार दिया है। तब पूरा देश इन लोगों की निष्ठाओं पर सवाल उठाने लग गया है। यह आरोप लग रहा है कि यह लोग किसी न किसी रूप में इस सरकार के विशेष लाभार्थी रहे हैं। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट में राहुल के आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित किये जाने की मांग की गयी थी और शीर्ष अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुये इस मुद्दे को उसी चुनाव आयोग के पास उठाने की राय दी थी जिसके खिलाफ यह आरोप थे। तब यह बुद्धिजीवी लोग क्यों सामने नहीं आये थे? कोई भी यह नहीं कह पाया कि यह सवाल गलत है। आज बिहार के चुनाव परिणामों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रह गया है। पूरे देश में आयोग की नीयत और एस आई आर पर जो सन्देह आम आदमी के मन में घर कर गया है उसे दूर करने के लिये चुनाव आयोग और शीर्ष न्यायालय को उस संदेह को दूर करने के लिए कुछ ठोस व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद ही लोगों का विश्वास है और जब यह विश्वास ही प्रश्नित हो जाये तो फिर लोकतंत्र का बचना कठिन हो जायेगा। यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे से छोटा बात कर आचरण नहीं किया जा सकता। मुस्लिम समुदाय इस देश का अभिन्न हिस्सा है उसे मानने वालों को दूसरे से छोटा आंकना देश के लिये घातक होगा। देश में एक धर्म को दूसरे के विरोध में खड़ा करके देश को नहीं चलाया जा सकता। पिछले कुछ अरसे से सुनियोजित तरीके से धर्म के आधार पर भेदभाव चल रहा है और देश की जनता अब इसे समझने भी लग पड़ी है। इसलिये लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिये इसमें संवैधानिक संस्थाओं को अपना आचरण व्यवहारिक रूप से सुधारना होगा। यदि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को प्रमाणित नहीं कर सकता तो फिर जन आन्दोलन को रोकना असंभव हो जायेगा। इस निष्पक्षता के लिये एस आई आर की प्रक्रिया पर समय रहते बदलाव न किये गये तो परिणाम बहुत अराजक हो जाएंगे यह तय हैं।






इस पर एस आई आर के खिलाफ एक बड़ा विरोध खड़ा हो गया है। एस आई आर को तुरन्त प्रभाव से बन्द करने की मांग उठ गयी है। इसी मांग के साथ एस आई आर के काम में लगे बी एल ओ पर अत्याधिक दबाव और तनाव आ गया है। इसके कारण कई स्थानों पर बी एल ओज द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के समाचार भी आ गये हैं। यह भी समाचार आया है कि मध्य प्रदेश में भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी बी एल ओज की सूची में शामिल है। एस आई आर के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कई शिकायतें भी दायर हो चुकी हैं। ऐसी संभावना है कि यदि इन शिकायतों पर समय रहते पूरी निष्पक्षता के साथ सुनवाई नहीं हुई तो यह राजनीतिक दल चुनावों तक का बहिष्कार कर सकते हैं। क्योंकि जब चुनाव निष्पक्षता से होने ही नहीं है तो उनमें भागीदारी से कोई लाभ नहीं हो सकता। ऐसे में देश की जनता के सामने इस सच को पूरी नग्नता के साथ रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
अब जब बिहार चुनावों के लगभग एक तरफा परिणाम आने के बाद ही चुनाव आयोग पर उठते सवाल शान्त नहीं हुये हैं तब देश के दो सौ सतर पूर्व न्यायाधीशों, राजनयिकों और वरिष्ठ नौकर शाहों ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र जारी करके उसकी मंशा पर सवाल उठाते हुये उसके आरोपों को चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश करार दिया है। तब पूरा देश इन लोगों की निष्ठाओं पर सवाल उठाने लग गया है। यह आरोप लग रहा है कि यह लोग किसी न किसी रूप में इस सरकार के विशेष लाभार्थी रहे हैं। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट में राहुल के आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित किये जाने की मांग की गयी थी और शीर्ष अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुये इस मुद्दे को उसी चुनाव आयोग के पास उठाने की राय दी थी जिसके खिलाफ यह आरोप थे। तब यह बुद्धिजीवी लोग क्यों सामने नहीं आये थे? कोई भी यह नहीं कह पाया कि यह सवाल गलत है। आज बिहार के चुनाव परिणामों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रह गया है। पूरे देश में आयोग की नीयत और एस आई आर पर जो सन्देह आम आदमी के मन में घर कर गया है उसे दूर करने के लिये चुनाव आयोग और शीर्ष न्यायालय को उस संदेह को दूर करने के लिए कुछ ठोस व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद ही लोगों का विश्वास है और जब यह विश्वास ही प्रश्नित हो जाये तो फिर लोकतंत्र का बचना कठिन हो जायेगा। यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे से छोटा बात कर आचरण नहीं किया जा सकता। मुस्लिम समुदाय इस देश का अभिन्न हिस्सा है उसे मानने वालों को दूसरे से छोटा आंकना देश के लिये घातक होगा। देश में एक धर्म को दूसरे के विरोध में खड़ा करके देश को नहीं चलाया जा सकता। पिछले कुछ अरसे से सुनियोजित तरीके से धर्म के आधार पर भेदभाव चल रहा है और देश की जनता अब इसे समझने भी लग पड़ी है। इसलिये लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिये इसमें संवैधानिक संस्थाओं को अपना आचरण व्यवहारिक रूप से सुधारना होगा। यदि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को प्रमाणित नहीं कर सकता तो फिर जन आन्दोलन को रोकना असंभव हो जायेगा। इस निष्पक्षता के लिये एस आई आर की प्रक्रिया पर समय रहते बदलाव न किये गये तो परिणाम बहुत अराजक हो जाएंगे यह तय हैं।





