Saturday, 21 March 2026
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युवाओं को नशे से बचाना सरकार और समाज की कठोर परीक्षा

हिमाचल प्रदेश की पहचान हमेशा से शांत वादियों, सुदृढ़ सामाजिक मूल्यों और अनुशासित जीवनशैली से रही है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस पहचान को गहरी चोट पहुंचाई है। चिट्टा, स्मैक, सिंथेटिक ड्रग्स और शराब की लत ने युवाओं को तेजी से अपनी गिरफ्त में लिया है। यह केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक ढांचे और भविष्य पर सीधा हमला है। ऐसे में सरकार की भूमिका, उसकी नीतियों की प्रभावशीलता और समाज की जिम्मेदारी-तीनों की कड़ी परीक्षा हो रही है।
नशा किसी एक कारण से पैदा नहीं होता। इसके पीछे बेरोजगारी, असफलता का डर, मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा का दबाव, पारिवारिक संवाद की कमी और आधुनिक जीवनशैली की खोखली चमक जैसे कई कारक हैं। हिमाचल जैसे पर्यटन और सीमावर्ती राज्य में मादक पदार्थों की आसान उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना देती है। ऐसे में यह भ्रम पालना कि केवल पुलिस कारवाई से नशे को जड़ से खत्म किया जा सकता है, एक खतरनाक आत्मसंतोष होगा।
यह सच है कि हिमाचल सरकार ने नशे के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। चिट्टा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ पुलिस और विशेष टास्क फोर्स की कारवाई ने कई नेटवर्क तोड़े हैं और यह संदेश दिया है कि राज्य में नशे के कारोबार के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दमनात्मक कारवाई नशे की समस्या का केवल एक पहलू है, समाधान नहीं। जब तक मांग बनी रहेगी, आपूर्ति के रास्ते नए-नए रूपों में निकलते रहेंगे।
सरकार ने इस सच्चाई को कुछ हद तक स्वीकार करते हुए जागरूकता अभियानों और पुनर्वास पर ध्यान दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी कार्यक्रम, सार्वजनिक अभियानों के जरिए संदेश और पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था-ये सभी सकारात्मक कदम हैं। नशे को अपराध नहीं, बल्कि बीमारी मानकर उपचार की ओर बढ़ना एक जरूरी और मानवीय दृष्टिकोण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रयास पर्याप्त गहराई तक पहुंच पा रहे हैं, या फिर ये भी कई बार औपचारिकता बनकर रह जाते हैं?
सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि नशा निवारण को अब भी अक्सर अभियान की तरह देखा जाता है, जबकि यह एक लंबी और निरंतर सामाजिक प्रक्रिया है। स्कूलों और कॉलेजों में स्थायी काउंसलिंग व्यवस्था का अभाव गंभीर चिंता का विषय है। जब तक युवाओं के मानसिक दबाव, असुरक्षा और अवसाद को समय रहते नहीं समझा जाएगा, तब तक नशा उनके लिए आसान पलायन बना रहेगा।
परिवारों की भूमिका पर भी सख्ती से आत्ममंथन जरूरी है। माता-पिता की व्यस्तता, संवाद की कमी और कई बार सामाजिक दिखावे की दौड़ में बच्चों की वास्तविक स्थिति अनदेखी रह जाती है। जब परिवार ही शुरुआती संकेत नहीं पहचान पाएगा, तो सरकार या पुलिस से चमत्कार की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।
समाज और समुदाय की निष्क्रियता भी उतनी ही चिंताजनक है। पंचायतें, युवक मंडल और सामाजिक संगठन यदि केवल दर्शक बने रहेंगे, तो नशे के खिलाफ लड़ाई कभी निर्णायक नहीं हो सकती। यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब समाज खुद नशे के खिलाफ खड़ा हो और इसे सामूहिक अपमान के रूप में देखे।
डिजिटल युग में नशे की चुनौती भी डिजिटल हो चुकी है। ऑनलाइन नेटवर्क, सोशल मीडिया और नए तरीकों से फैलता नशा सरकार की पारंपरिक रणनीतियों को बार-बार चुनौती दे रहा है। इसके मुकाबले के लिए उतनी ही आक्रामक और आधुनिक सोच की जरूरत है।
हिमाचल में नशे के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार की नहीं है। सरकार नीति बना सकती है और कानून लागू कर सकती है, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी। यदि आज भी हम इसे दूसरों की समस्या समझकर टालते रहे, तो कल इसकी कीमत पूरे राज्य को चुकानी पड़ेगी। युवाओं को नशे से बचाना विकल्प नहीं, अनिवार्यता है-और इसमें सरकार, समाज और परिवार, तीनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी।

हिमाचल का आर्थिक संकट क्यों?

हिमाचल सरकार जिस तरह के आर्थिक संकट में घिर गयी उसने हर व्यक्ति का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रखा है। क्योंकि इस समय सरकार का कुल कर्जभार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। चिन्ता और चिन्तन इस बात की है कि हमारे माननीय विधायकों ने एक भी विधानसभा सत्र में इस पर कोई चर्चा नहीं की कि इस बढ़ते कर्ज से कैसे मुक्ति मिल सकती है। जबकि अपने वेतन भत्ते बढ़ाने के लिये सभी ध्वनि मत से एक थे। सुक्खू सरकार ने जब कार्यभार संभाला था तो प्रदेश पर पचहतर हजार करोड़ का कर्ज था और दस कजार करोड़ की देनदारियां पिछली सरकार विरासत में छोड़ गयी थी। सुक्खू सरकार अब तक 29046 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। अगले 2 वर्षों में इतना ही कर्ज और लेना पड़ेगा। क्योंकि आगे तो चुनावी वर्ष होगा सरकार चुनाव की नजर से कर्ज लेगी। यह एक स्थापित सत्य है कि बढ़ते कर्ज के कारण सरकार को अपना राजस्व व्यय कम करना पड़ता है जिसका सीधा प्रभाव स्थायी सरकारी रोजगार पर पड़ेगा और हिमाचल में सरकार ही सबसे बड़ी रोजगार प्रदाता है। जो सरकार इस समय ही मल्टीटास्क वर्कर भर्ती से मित्रा योजना तक पहुंच गयी है उसे यह मित्र योजनाएं भी बन्द करनी पड़ेगी। सुक्खू सरकार ने अब तक 26683 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है जिसका अर्थ है कि यह सरकार हर बार कर्ज मुक्त बजट देकर इतने का करभार प्रदेश की जनता पर लाद चुकी है। इस राजस्व जुटाने से क्या आम आदमी को कोई राहत मिलती है शायद नहीं। प्रदेश का कर्जभार जीडीपी के 44% से बढ़ गया है जबकि यह पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिए। इसी के साथ प्रदेश के 90% लोगों के बैंक खाते हैं और कर्ज केवल 4% ने ही ले रखा है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार है और कर्ज एक लाख है जिस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार हो क्या उस प्रदेश में सरकार पर आर्थिक संकट होना चाहिये? क्या उस प्रदेश के आम आदमी को सरकार के सस्ते राशन पर निर्भर रहना चाहिए? व्यवहारिक रूप से शायद नहीं। लेकिन आज हिमाचल बेरोजगारी में छठे स्थान पर पहुंच चुका है और आम आदमी की सस्ते राशन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसा इसलिये है कि इन आंकड़ों का आम आदमी से कोई लेना देना नहीं है। यह आंकड़े सरकार को प्रभावित करते हैं। एक बड़े निवेश से सरकार का जीडीपी बढ़ जाता है और उससे सरकार की कर्ज लेने की सीमा बढ़ जाती है जिसका आम आदमी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सरकारें कर्ज लेकर और एक दूसरे को दोष देकर अपना काम निकाल लेती हैं लेकिन कालान्तर में इसका कुप्रभाव आम आदमी पर पड़ता है। इसलिये यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि कहीं सरकार की सोच और योजनाएं ऐसी तो नहीं रही जिनका प्रदेश के आम आदमी के साथ कोई लेना देना ही नहीं था। क्योंकि स्व. रामलाल ठाकुर के कार्यकाल तक प्रदेश पर कोई कर्ज भार नहीं था। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है और इस नाते कृषि और बागवानी के लिये तो अनुकूल है पर शायद औद्योगिकरण के लिये नहीं। क्योंकि उद्योग के लिये कच्चा माल और उपभोक्ता दोनों में से एक का प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है और यह दोनों तत्व प्रदेश में बड़ी मात्रा में उपलब्ध नहीं है। प्रदेश में खनिज के रूप में सीमेंट बनाने के लिये पर्याप्त कच्चा माल है। लेकिन संयोग से इस उद्योग में हिमाचल सरकार की अपनी कोई इकाई स्थापित नहीं है। सीमेंट के अतिरिक्त प्रदेश में नदी जल की काफी उपलब्धता है। इसका दोहन जल विद्युत परियोजनाओं के लिये हुआ। लेकिन इसमें भी जब 1980 के दशक में बिजली बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन स्व.कैलाश महाजन की बोर्ड से बर्खास्तगी के बाद प्रदेश सरकार इस दिशा में अपने स्वामित्व में कोई बड़ी योजना स्थापित नहीं कर पायी है। उस समय बसपा परियोजना बोर्ड से छीनकर जेपी उद्योग को दे दी गयी। इस पर तब तक हुआ सोलह करोड़ का निवेश जे.पी. से कभी वापस नहीं मिला। बल्कि जब यह राशि बढ़कर 92 करोड़ हो गयी तो इस बट्टे खाते में डाल दिया गया। कैग ने इस पर गंभीर सवाल उठाये हैं जिन्हें नजर अन्दाज कर दिया गया। आज जिस मुकाम पर स्थितियां पहुंच चुकी है उससे अब तक के इतिहास पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।

मोदी सत्ता पर उठते सवाल

केन्द्र में जब 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ था उस समय इस परिवर्तन के सबसे बड़े कारक भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ खड़े हुये अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव के आन्दोलन रहे हैं। इन आन्दोलनों ने यह स्थापित कर दिया था कि देश की जनता भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकती है। यह आन्दोलन आर एस एस से पोषित संचालित और नियंत्रित थे। लेकिन देश के आम आदमी को इससे कोई सरोकार नहीं था कि इन आन्दोलनों की रणनीति का नियंत्रक कौन था। आम आदमी के लिये भ्रष्टाचार और काले धन पर उस समय परोसे गये आंकड़े ही सब कुछ थे। इसी आन्दोलन का प्रभाव था कि कांग्रेस समेत हर दल के नेता भाजपा में शामिल हो गये। उस समय भाजपा ने देश की जनता से पांच वर्ष का कार्यकाल मांगा था अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिये। लेकिन आज भाजपा-मोदी का सत्ता में तीसरा कार्यकाल चल रहा है। अब तक के कार्यकाल पर अगर नजर डालें तो यह सामने आता है कि भ्रष्टाचार के नाम पर ईडी, सीबीआई, आयकर और एनआईए सभी एजैन्सियां अति सक्रिय हैं। परन्तु उनके बनाये हुये कितने मामलों में दोष प्रमाणित होकर दोषी को सजा मिल पायी है तो शायद यह आंकड़ा अभी तक पांच प्रतिश्त तक नहीं पहुंच पाया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय से जिस तरह से वरिष्ठ अधिकारियों को निकाला गया उससे बहुत कुछ व्यावहारिक रूप से सामने आ जाता है। अब तक मोदी सरकार अपने कितने चुनावी वादों को पूरा कर पायी है तो शायद सुक्खू सरकार का आंकड़ा मोदी के आंकड़ों से बेहतर होगा। यही नहीं डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। इससे अर्थव्यवस्था का व्यावहारिक पक्ष सामने आ जाता है। कितने किसानों की आय दोगुनी हो पायी है यह आंकड़ा आज तक जारी नहीं हो सका है। मोदी सरकार ने हर चुनाव में नये नैरेटिव उछाले हैं। सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास आज बुलडोजर न्याय तक पहुंच गया है। दो करोड़ नौकरियां जुमला बनकर रह गया है।
लेकिन यह सब होते हुये भी लगातार चुनावी जीत हासिल की है। इस बार के चुनाव में भाजपा अपने ही दम पर सरकार नहीं बना पायी है और इसी से स्पष्ट हो जाता है कि देश की जनता इस जीत के जादू को समझने लग पड़ी है। इस समझ में यह सामने आ गया है कि यह जीत चुनाव आयोग के सहयोग के कारण हो रही है। वोट चोरी कितने सुनियोजित तरीके से की जा रही है इसके दस्तावेजी प्रमाण सामने आ चुके हैं। चुनाव आयोग वोट चोरी के आरोपों पर जिस तरह के तर्क सामने रख रहा है उससे आयोग की निष्पक्षता पूरी तरह प्रश्नित हो गयी है। एसआईआर का मुद्दा सर्वाेच्च न्यायालय में जिस तरह से चल रहा है उससे शीर्ष अदालत पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लग पड़े हैं। चुनाव आयोग और सर्वाेच्च न्यायालय दो शीर्ष संवैधानिक स्वायतः संस्थान हैं जो सिर्फ संविधान के प्रावधानों से संचालित होते हैं। लेकिन पहली बार देश का विश्वास इन संस्थानों पर प्रश्नित होने लगा है। उनकी निष्पक्षता पर उठते सन्देह कालान्तर में लोकतंत्र के लिये घातक प्रमाणित होंगे यह तय है। सरकार की मंशा पर लगातार सवाल खड़े होते जा रहे हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सरकार येन केन प्रकारेण हिन्दू राष्ट्र के ऐजैण्डे पर चल निकली है। इसी ऐजैण्डे के लिये संविधान में बदलाव की तैयारी की जा रही है। इसी ऐजैण्डे के तहत सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। इसी के तहत यह पहली सरकार है जिनके कार्यकाल में कोई भी नया सार्वजनिक संस्थान स्थापित नहीं हुआ है। अब जब वोट चोरी का सच देश के हर कोने तक पहुंच गया है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि अब इस मुद्दे को जनान्दोलन बनने से हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा भी नहीं रोक पायेगी। क्योंकि यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ बताकर सत्ता नहीं चलाई जा सकती। अभी वन्दे मातरम की चर्चा के दौरान जो दस्तावेजी प्रमाण संसद के पटल पर आये हैं वह देर सवेर पढ़े जायेंगे और यह सच सामने आयेगा कि इतिहास को इतिहास लेखन प्रकोष्ठों के लेखन से बदला नहीं जा सकता। देश की स्वतंत्रता में जिन लोगों का योगदान रहा है उसे बदला नहीं जा सकता यह एक स्थापित सच है आज मोदी सत्ता पर उठते सवाल इसी कारण से गंभीर होते जा रहे हैं।
 
मोदी सत्ता पर उठते सवाल
केन्द्र में जब 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ था उस समय इस परिवर्तन के सबसे बड़े कारक भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ खड़े हुये अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव के आन्दोलन रहे हैं। इन आन्दोलनों ने यह स्थापित कर दिया था कि देश की जनता भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकती है। यह आन्दोलन आर एस एस से पोषित संचालित और नियंत्रित थे। लेकिन देश के आम आदमी को इससे कोई सरोकार नहीं था कि इन आन्दोलनों की रणनीति का नियंत्रक कौन था। आम आदमी के लिये भ्रष्टाचार और काले धन पर उस समय परोसे गये आंकड़े ही सब कुछ थे। इसी आन्दोलन का प्रभाव था कि कांग्रेस समेत हर दल के नेता भाजपा में शामिल हो गये। उस समय भाजपा ने देश की जनता से पांच वर्ष का कार्यकाल मांगा था अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिये। लेकिन आज भाजपा-मोदी का सत्ता में तीसरा कार्यकाल चल रहा है। अब तक के कार्यकाल पर अगर नजर डालें तो यह सामने आता है कि भ्रष्टाचार के नाम पर ईडी, सीबीआई, आयकर और एनआईए सभी एजैन्सियां अति सक्रिय हैं। परन्तु उनके बनाये हुये कितने मामलों में दोष प्रमाणित होकर दोषी को सजा मिल पायी है तो शायद यह आंकड़ा अभी तक पांच प्रतिश्त तक नहीं पहुंच पाया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय से जिस तरह से वरिष्ठ अधिकारियों को निकाला गया उससे बहुत कुछ व्यावहारिक रूप से सामने आ जाता है। अब तक मोदी सरकार अपने कितने चुनावी वादों को पूरा कर पायी है तो शायद सुक्खू सरकार का आंकड़ा मोदी के आंकड़ों से बेहतर होगा। यही नहीं डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। इससे अर्थव्यवस्था का व्यावहारिक पक्ष सामने आ जाता है। कितने किसानों की आय दोगुनी हो पायी है यह आंकड़ा आज तक जारी नहीं हो सका है। मोदी सरकार ने हर चुनाव में नये नैरेटिव उछाले हैं। सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास आज बुलडोजर न्याय तक पहुंच गया है। दो करोड़ नौकरियां जुमला बनकर रह गया है।
लेकिन यह सब होते हुये भी लगातार चुनावी जीत हासिल की है। इस बार के चुनाव में भाजपा अपने ही दम पर सरकार नहीं बना पायी है और इसी से स्पष्ट हो जाता है कि देश की जनता इस जीत के जादू को समझने लग पड़ी है। इस समझ में यह सामने आ गया है कि यह जीत चुनाव आयोग के सहयोग के कारण हो रही है। वोट चोरी कितने सुनियोजित तरीके से की जा रही है इसके दस्तावेजी प्रमाण सामने आ चुके हैं। चुनाव आयोग वोट चोरी के आरोपों पर जिस तरह के तर्क सामने रख रहा है उससे आयोग की निष्पक्षता पूरी तरह प्रश्नित हो गयी है। एसआईआर का मुद्दा सर्वाेच्च न्यायालय में जिस तरह से चल रहा है उससे शीर्ष अदालत पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लग पड़े हैं। चुनाव आयोग और सर्वाेच्च न्यायालय दो शीर्ष संवैधानिक स्वायतः संस्थान हैं जो सिर्फ संविधान के प्रावधानों से संचालित होते हैं। लेकिन पहली बार देश का विश्वास इन संस्थानों पर प्रश्नित होने लगा है। उनकी निष्पक्षता पर उठते सन्देह कालान्तर में लोकतंत्र के लिये घातक प्रमाणित होंगे यह तय है। सरकार की मंशा पर लगातार सवाल खड़े होते जा रहे हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सरकार येन केन प्रकारेण हिन्दू राष्ट्र के ऐजैण्डे पर चल निकली है। इसी ऐजैण्डे के लिये संविधान में बदलाव की तैयारी की जा रही है। इसी ऐजैण्डे के तहत सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। इसी के तहत यह पहली सरकार है जिनके कार्यकाल में कोई भी नया सार्वजनिक संस्थान स्थापित नहीं हुआ है। अब जब वोट चोरी का सच देश के हर कोने तक पहुंच गया है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि अब इस मुद्दे को जनान्दोलन बनने से हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा भी नहीं रोक पायेगी। क्योंकि यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ बताकर सत्ता नहीं चलाई जा सकती। अभी वन्दे मातरम की चर्चा के दौरान जो दस्तावेजी प्रमाण संसद के पटल पर आये हैं वह देर सवेर पढ़े जायेंगे और यह सच सामने आयेगा कि इतिहास को इतिहास लेखन प्रकोष्ठों के लेखन से बदला नहीं जा सकता। देश की स्वतंत्रता में जिन लोगों का योगदान रहा है उसे बदला नहीं जा सकता यह एक स्थापित सच है आज मोदी सत्ता पर उठते सवाल इसी कारण से गंभीर होते जा रहे हैं।
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क्या देश का हर आदमी 4.8 लाख का कर्जदार है

इस समय देश के हर व्यक्ति पर करीब 4.8 करोड़ का कर्ज है। 2014 में देश पर करीब 49 लाख करोड़ का कर्ज था जो अब बढ़कर 185.94 लाख करोड़ हो गया है। कर्ज के यह आंकड़े राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में आये हैं। व्यापार में आयात लगातार बढ़ रहा है और निर्यात कम होता जा रहा है। रूपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि डॉलर की कीमत 100 रूपये तक जा सकती है। आर्थिकी के यह आंकड़े किसी को भी विचलित कर सकते हैं क्योंकि बढ़ता कर्ज हर अनुमान को तहस-नहस कर सकता है। इसी बढ़ते कर्ज का परिणाम है कि महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन क्या देश की सरकार इसके प्रति चिंतित है? क्या सरकारी ईमानदारी से इस समस्या को हल करने का प्रयास कर रही है? बढ़ते कर्ज, महंगाई और बेरोजगारी का अंतिम परिणाम क्या होगा? पिछले दस वर्षों में कर्ज में चार गुना से भी अधिक की बढ़ौतरी हुई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह कर्ज कहां निवेश हो रहा है? क्योंकि इस अवधि में सरकार ने कोई नया सार्वजनिक उपक्रम तो स्थापित नहीं किया है उल्टे पहले से चले आ रहे संस्थानों को प्राइवेट सेक्टर के हवाले करने का ही काम किया है। विश्व की तीसरी, चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के जो सपने परोसे गये हैं क्या उसका परिणाम है यह बढ़ता कर्च? आर्थिकी के यह आंकड़े हर व्यक्ति के सामने रहने चाहिये क्योंकि इसी दौर में देश ने नोटबंदी भी भोगी है। इन्हीं आंकड़ों के आईने में सरकार के चुनावी वायदों को तोलना होगा। यह फैसला करना होगा कि एक सौ चालीस करोड़ के देश में अस्सी करोड़ लोगों की सरकारी राशन पर निर्भरता एक उपलब्धि है या अभिशाप।
इसी परिदृश्य में यह समझना भी आवश्यक हो जाता है कि भ्रष्टाचार और काले धन के जिन आंकड़ों पर अन्ना और रामदेव के आन्दोलन हुये थे उनका व्यावहारिक सच क्या है? काले धन के आंकड़ों में बढ़ौतरी हुई है और जिस भी भ्रष्टाचारी पर जितने बड़े आरोप लगे वह भाजपा में शामिल होते ही पाक साफ हो गया। आज भाजपा खुद कांग्रेस युक्त हो गयी है। हर दल का बड़ा भ्रष्टाचारी भाजपा में शामिल होकर पाक साफ हो गया है। पिछले एक दशक में न्याय बुलडोजर जस्टिस तक पहुंच गया है। चुनावों में लगातार सफलता का श्रेय देश के चुनाव आयोग के नाम जाता है क्योंकि वोट चोरी के आरोपों ने यह सच देश के सामने पूरे प्रमाणिक दस्तावेजों के साथ परोस दिया है। वोट चोरी का आरोप आज हर आदमी की जुबान पर आ गया है। भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस को अपने दम पर नेता प्रतिपक्ष के मुकाम तक पहुंचा दिया है। अब यह ‘‘वोट चोर गद्दी छोड़’’ कांग्रेस को और सशक्त बनाएगा यह तय है।
लेकिन इसी वस्तुस्थिति में कांग्रेस को अपने ही भीतर बैठे भाजपा और दूसरे दलों के स्लीपर सैलों से सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योंकि हर चुनाव के दौरान कांग्रेस का कोई न कोई नेता ऐसा ब्यान देता आया है जिसने पार्टी को अर्श से फर्श पर लाने का काम किया है। राहुल गांधी ने जब कांग्रेस के अन्दर बैठे स्लीपर सैलों को ललकारा था उन्हें अब सही में पार्टी से बाहर करने का समय आ गया है। आज के कांग्रेसियों को संघ के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक चिन्तन के बारे में कोई बुनियादी जानकारी नहीं है। उन्हें संघ के चिन्तन की जानकारी देनी होगी। क्योंकि भाजपा का संघ के बिना कोई बुनियादी आधार ही नहीं है। यदि कांग्रेस यह नहीं कर पाती है तो देश और पार्टी दोनों के का ही बड़ा अहित होगा। कांग्रेस को संघ के चिन्तन को समझना होगा।

एस आई आर पर उठते सवाल

बिहार में जब एस आई आर चल रहा था तब इस पर उठते सवालों का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। लेकिन सर्वाेच्च न्यायालय इस पर अन्तिम फैसला नहीं दे पाया था। मामले को बिहार चुनावों के बाद सुनवाई के लिये रख लिया गया। लेकिन इन्हीं चुनावों के दौरान चुनाव आयोग ने एस आई आर को देश के बारह राज्यों में करवाये जाने का ऐलान कर दिया और वहां पर इसका काम शुरू भी हो चुका है। परन्तु इसी बीच जो परिणाम बिहार चुनाव के आये हैं उसमें एस आई आर पर सवाल उठाने वाले महागठबंधन को शर्मनाक हार और एनडीए को प्रचण्ड बहुमत हासिल हुआ है। परन्तु इन चुनाव परिणाम का अध्ययन करने के बाद अधिकांश सीटों पर हार जीत के अन्तर से वहां पर एस आई आर में कांटे गये वोटरों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। इससे अनायास ही यह सन्देश चला गया कि एस आई आर की प्रक्रिया में सत्ता पक्ष के विरोधियों के ही वोट काटे जा रहे हैं।
इस पर एस आई आर के खिलाफ एक बड़ा विरोध खड़ा हो गया है। एस आई आर को तुरन्त प्रभाव से बन्द करने की मांग उठ गयी है। इसी मांग के साथ एस आई आर के काम में लगे बी एल ओ पर अत्याधिक दबाव और तनाव आ गया है। इसके कारण कई स्थानों पर बी एल ओज द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के समाचार भी आ गये हैं। यह भी समाचार आया है कि मध्य प्रदेश में भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी बी एल ओज की सूची में शामिल है। एस आई आर के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कई शिकायतें भी दायर हो चुकी हैं। ऐसी संभावना है कि यदि इन शिकायतों पर समय रहते पूरी निष्पक्षता के साथ सुनवाई नहीं हुई तो यह राजनीतिक दल चुनावों तक का बहिष्कार कर सकते हैं। क्योंकि जब चुनाव निष्पक्षता से होने ही नहीं है तो उनमें भागीदारी से कोई लाभ नहीं हो सकता। ऐसे में देश की जनता के सामने इस सच को पूरी नग्नता के साथ रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
अब जब बिहार चुनावों के लगभग एक तरफा परिणाम आने के बाद ही चुनाव आयोग पर उठते सवाल शान्त नहीं हुये हैं तब देश के दो सौ सतर पूर्व न्यायाधीशों, राजनयिकों और वरिष्ठ नौकर शाहों ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र जारी करके उसकी मंशा पर सवाल उठाते हुये उसके आरोपों को चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश करार दिया है। तब पूरा देश इन लोगों की निष्ठाओं पर सवाल उठाने लग गया है। यह आरोप लग रहा है कि यह लोग किसी न किसी रूप में इस सरकार के विशेष लाभार्थी रहे हैं। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट में राहुल के आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित किये जाने की मांग की गयी थी और शीर्ष अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुये इस मुद्दे को उसी चुनाव आयोग के पास उठाने की राय दी थी जिसके खिलाफ यह आरोप थे। तब यह बुद्धिजीवी लोग क्यों सामने नहीं आये थे? कोई भी यह नहीं कह पाया कि यह सवाल गलत है। आज बिहार के चुनाव परिणामों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रह गया है। पूरे देश में आयोग की नीयत और एस आई आर पर जो सन्देह आम आदमी के मन में घर कर गया है उसे दूर करने के लिये चुनाव आयोग और शीर्ष न्यायालय को उस संदेह को दूर करने के लिए कुछ ठोस व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद ही लोगों का विश्वास है और जब यह विश्वास ही प्रश्नित हो जाये तो फिर लोकतंत्र का बचना कठिन हो जायेगा। यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे से छोटा बात कर आचरण नहीं किया जा सकता। मुस्लिम समुदाय इस देश का अभिन्न हिस्सा है उसे मानने वालों को दूसरे से छोटा आंकना देश के लिये घातक होगा। देश में एक धर्म को दूसरे के विरोध में खड़ा करके देश को नहीं चलाया जा सकता। पिछले कुछ अरसे से सुनियोजित तरीके से धर्म के आधार पर भेदभाव चल रहा है और देश की जनता अब इसे समझने भी लग पड़ी है। इसलिये लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिये इसमें संवैधानिक संस्थाओं को अपना आचरण व्यवहारिक रूप से सुधारना होगा। यदि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को प्रमाणित नहीं कर सकता तो फिर जन आन्दोलन को रोकना असंभव हो जायेगा। इस निष्पक्षता के लिये एस आई आर की प्रक्रिया पर समय रहते बदलाव न किये गये तो परिणाम बहुत अराजक हो जाएंगे यह तय हैं।

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