Saturday, 21 March 2026
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एस आई आर पर उठते सवाल

बिहार में जब एस आई आर चल रहा था तब इस पर उठते सवालों का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। लेकिन सर्वाेच्च न्यायालय इस पर अन्तिम फैसला नहीं दे पाया था। मामले को बिहार चुनावों के बाद सुनवाई के लिये रख लिया गया। लेकिन इन्हीं चुनावों के दौरान चुनाव आयोग ने एस आई आर को देश के बारह राज्यों में करवाये जाने का ऐलान कर दिया और वहां पर इसका काम शुरू भी हो चुका है। परन्तु इसी बीच जो परिणाम बिहार चुनाव के आये हैं उसमें एस आई आर पर सवाल उठाने वाले महागठबंधन को शर्मनाक हार और एनडीए को प्रचण्ड बहुमत हासिल हुआ है। परन्तु इन चुनाव परिणाम का अध्ययन करने के बाद अधिकांश सीटों पर हार जीत के अन्तर से वहां पर एस आई आर में कांटे गये वोटरों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। इससे अनायास ही यह सन्देश चला गया कि एस आई आर की प्रक्रिया में सत्ता पक्ष के विरोधियों के ही वोट काटे जा रहे हैं।
इस पर एस आई आर के खिलाफ एक बड़ा विरोध खड़ा हो गया है। एस आई आर को तुरन्त प्रभाव से बन्द करने की मांग उठ गयी है। इसी मांग के साथ एस आई आर के काम में लगे बी एल ओ पर अत्याधिक दबाव और तनाव आ गया है। इसके कारण कई स्थानों पर बी एल ओज द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के समाचार भी आ गये हैं। यह भी समाचार आया है कि मध्य प्रदेश में भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी बी एल ओज की सूची में शामिल है। एस आई आर के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कई शिकायतें भी दायर हो चुकी हैं। ऐसी संभावना है कि यदि इन शिकायतों पर समय रहते पूरी निष्पक्षता के साथ सुनवाई नहीं हुई तो यह राजनीतिक दल चुनावों तक का बहिष्कार कर सकते हैं। क्योंकि जब चुनाव निष्पक्षता से होने ही नहीं है तो उनमें भागीदारी से कोई लाभ नहीं हो सकता। ऐसे में देश की जनता के सामने इस सच को पूरी नग्नता के साथ रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
अब जब बिहार चुनावों के लगभग एक तरफा परिणाम आने के बाद ही चुनाव आयोग पर उठते सवाल शान्त नहीं हुये हैं तब देश के दो सौ सतर पूर्व न्यायाधीशों, राजनयिकों और वरिष्ठ नौकर शाहों ने राहुल गांधी के नाम खुला पत्र जारी करके उसकी मंशा पर सवाल उठाते हुये उसके आरोपों को चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश करार दिया है। तब पूरा देश इन लोगों की निष्ठाओं पर सवाल उठाने लग गया है। यह आरोप लग रहा है कि यह लोग किसी न किसी रूप में इस सरकार के विशेष लाभार्थी रहे हैं। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट में राहुल के आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित किये जाने की मांग की गयी थी और शीर्ष अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुये इस मुद्दे को उसी चुनाव आयोग के पास उठाने की राय दी थी जिसके खिलाफ यह आरोप थे। तब यह बुद्धिजीवी लोग क्यों सामने नहीं आये थे? कोई भी यह नहीं कह पाया कि यह सवाल गलत है। आज बिहार के चुनाव परिणामों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रह गया है। पूरे देश में आयोग की नीयत और एस आई आर पर जो सन्देह आम आदमी के मन में घर कर गया है उसे दूर करने के लिये चुनाव आयोग और शीर्ष न्यायालय को उस संदेह को दूर करने के लिए कुछ ठोस व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद ही लोगों का विश्वास है और जब यह विश्वास ही प्रश्नित हो जाये तो फिर लोकतंत्र का बचना कठिन हो जायेगा। यह देश बहुधर्मी और बहुभाषी है। इसमें एक धर्म को दूसरे से छोटा बात कर आचरण नहीं किया जा सकता। मुस्लिम समुदाय इस देश का अभिन्न हिस्सा है उसे मानने वालों को दूसरे से छोटा आंकना देश के लिये घातक होगा। देश में एक धर्म को दूसरे के विरोध में खड़ा करके देश को नहीं चलाया जा सकता। पिछले कुछ अरसे से सुनियोजित तरीके से धर्म के आधार पर भेदभाव चल रहा है और देश की जनता अब इसे समझने भी लग पड़ी है। इसलिये लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिये इसमें संवैधानिक संस्थाओं को अपना आचरण व्यवहारिक रूप से सुधारना होगा। यदि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को प्रमाणित नहीं कर सकता तो फिर जन आन्दोलन को रोकना असंभव हो जायेगा। इस निष्पक्षता के लिये एस आई आर की प्रक्रिया पर समय रहते बदलाव न किये गये तो परिणाम बहुत अराजक हो जाएंगे यह तय हैं।

बिहार परिणामों से निकलता सन्देश

बिहार चुनावों पर सारे देश की निगाहें लगी हुई थी क्योंकि इस चुनाव से पहले चुनाव आयोग को लेकर कुछ राष्ट्रीय प्रश्न देश के सामने उछल चुके थे। चुनाव के दौरान भी और अब इस चुनाव के परिणाम आने के बाद वह राष्ट्रीय प्रश्न और भी गंभीर हो गये हैं। यह चुनाव परिणाम पूरी तरह एक तरफा है। विपक्ष को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा है। लेकिन परिणाम पर जो प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दी है उसमें उन्होंने कांग्रेस का नया नामकरण किया है ‘‘मुस्लिम लीग माओवादी’’ कांग्रेस। प्रधानमंत्री की इस प्रतिक्रिया से स्पष्ट हो जाता है कि वह अभी भी कांग्रेस से कहीं न कहीं डरते हैं। संभव है कि इस डर के प्रतिफल के रूप में कांग्रेस के अन्दर एक विभाजन हो जाये। कांग्रेस की कुछ सरकारें इस संभावित विभाजन की भेंट चढ़ जायें। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को इसी तरह का चुनावी परिणाम गैर भाजपाई राज्यों में आगे होने वाले चुनावों में प्रदर्शित करना होगा। चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों को आजीवन कानूनी संरक्षण प्राप्त है। उनके खिलाफ कहीं भी कोई भी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता है। इसलिये चुनाव आयोग को भी सत्ता के इशारे पर नाचने की विवशता आ खड़ी होगी। क्योंकि बिहार में हुये एस आई आर का मामला अभी भी सर्वाेच्च न्यायालय में लंबित है। बिहार में पैंसठ लाख नाम मतदाता सूचियों से काट दिये गये। बाईस लाख वोटर जोड़ दिये गये। चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद मतदान होने के बाद जो सूची आयोग ने जारी की उसमें तीन लाख वोटर और सूचियों में जोड़ दिये गये। यह सामने आ गया है कि एक सौ अठ्ठाईस सीटों पर जहां एनडीए के उम्मीदवार विजयी हुये हैं वहां जीत का अंतर मतदाता सूची से हटाये गये मतदाताओं की संख्या से बहुत ही कम है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि यदि यह नाम सूची से न हटाए गये होते तो इन सीटों पर एनडीए का जीतना संभव नहीं था।
यह सवाल आने वाले दिनों में उठेंगे यह तय है। लेकिन इनका कोई भी जवाब आयोग की ओर से पहले की तरह नहीं आयेगा यह भी तय है। सर्वाेच्च न्यायालय भी पहले की तरह तारीखें देने से ज्यादा कुछ नहीं करेगा और चुनाव आयोग तो कानूनन कहीं जवाब देह है ही नहीं। आयोग की जगह सरकार और हिन्दू राष्ट्र के पक्षधर जवाब देंगे। ऐसी स्थिति में देश का युवा और आम आदमी क्या करेगा? क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के पक्षधरों को तो हिन्दू राष्ट्र के आगे सरकार पर उठने वाला हर सवाल राष्ट्र विरोधी नजर आयेगा। इसमें यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष अपनी इस हार पर किस तरह की प्रतिक्रिया देता है और जनता के बीच क्या लेकर जाता है। इन परिणामों के बाद क्या सरकार महंगाई पर नियंत्रण पायेगी? क्या बेरोजगारी का सवाल हल हो पायेगा? शायद यह सारे सवाल हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना में दफन हो जायेंगे।
आज इन चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष के हर दल को अपने अन्दर झांकने की आवश्यकता है क्योंकि हर दल में भाजपा संघ के स्लीपर सैल मौजूद हैं। कांग्रेस में तो राहुल गांधी ने इन स्लीपर सैलों को चेतावनी भी दी थी लेकिन व्यवहारिक तौर पर कोई कारवाई नहीं हुई। कांग्रेस को अब अपनी विचारधारा को लेकर अपने कार्यकर्ताओं को जागरूक करना होगा। क्योंकि इस समय कांग्रेस नीत सरकारों में भी ठेकेदारी की मानसिकता प्रबल हो गयी है। कांग्रेस की सरकारें भी अनचाहे ही संघ भाजपा के एजैन्डे पर ही काम कर रही है। इन सरकारों को अपने चुनावी घोषणा पत्र राज्य की आर्थिक स्थितियों के आधार पर लाने होंगे। अन्यथा यह घोषणा पत्र ही इन सरकारों और पार्टी को डुबोने में काफी होंगे। अब कांग्रेस को निष्पक्षता के साथ आत्म मंथन करने की अति आवश्यकता है।

चुनाव आयोग और सरकार पर उठते सवालों का अन्तिम परिणाम क्या होगा?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब चुनाव आयोग और सरकार की विश्वसनीयता दोनों पर एक साथ सवाल उठने शुरू हो जायें तो यह स्थिति एक बड़े खतरे का संकेत मानी जाती है। आज देश में इन्हीं के साथ न्यायपालिका भी सवालों के घेरे में आती जा रही है। क्योंकि सत्ता न्यायपालिका को अपने अनुसार चलाना चाहती हैं। जब सत्ता अपने को श्रेष्ठतम मान लेती है और संविधान द्वारा स्थापित संस्थाएं उनके नियोजकों द्वारा सत्ता के आगे गिरवी रख दी जाती है तब शुद्ध रूप से अराजकता का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। एक समय ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर उठे सवाल आज चुनाव आयोग ही नहीं वरन् स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंच गये हैं। बिहार के पहले चरण के मतदान में जिस स्तर की गड़बड़ियां होने के वीडियो वायरल हुये हैं और इस आशय की शिकायतों पर जो चुप्पी मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपना रखी है उसके बाद कुछ भी कहने के लिये शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि सवाल मुख्य चुनाव आयुक्त से किये जा रहे हैं और उनका जवाब आने की बजाये सत्ता सवाल उठाने वालों पर ही आक्रामक हो उठी है।
राहुल गांधी ने जिस दस्तावेजी प्रमाणिकता के साथ सवाल उठाये हैं उसके कारण देश का ‘‘जन जी’’ उसके साथ खड़ा होता जा रहा है। क्योंकि यह सवाल इस युवा पीढ़ी के भविष्य को प्रभावित करने वाले हैं। केन्द्र से लेकर राज्यों तक जब सरकार वोट चोरी से बनने लग जायेगी तो निश्चित रूप से उन सरकारों की विश्वसनीयता स्थायी नहीं रह पायेगी। ऐसी सरकारें अपने को सत्ता में बनाये रखने के लिये हर मर्यादा लांघने को तैयार हो जायेगी। पिछले ग्यारह वर्षों से जिस तरह की सरकार देश देख रहा है भोग रहा है उसमें महंगाई और बेरोजगारी ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करने वाली सरकार आज विश्व बैंक के कर्जदारों की सूची में पहले स्थान पर पहुंच चुकी है। रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भण्डार हर सप्ताह कम होता जा रहा है। रिजर्व बैंक को सोने तक बेचना पड़ गया है। आने वाले समय में इस सब का देश पर क्या असर पड़ेगा। नयी पीढ़ी जो हर समय इन्टरनेट के माध्यम से हर जानकारी तक पहुंच रही है उसे लम्बे अरसे तक बहलाया नहीं जा सकेगा।
यह देश बहुभाषी और बहू धर्मी है इस देश में भाषायी और धार्मिक मतभेद खड़े करके बहुत देर तक सत्ता में बने रहना संभव नहीं होगा यह तय है। इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयास देश की एकता और अखण्डता के लिये कालान्तर में एक बड़ा खतरा प्रमाणित होंगे। इस सच्चाई को सत्ता में बैठे लोगों को जल्द से जल्द स्वीकार करना ही होगा। आज वोट चोरी के आरोपों ने देश में ही नहीं विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। हरियाणा में पच्चीस लाख फर्जी वोटों का आरोप है। एक ब्राजील की महिला का नाम एक बूथ में बाईस बार मतदाता सूचियों में आ जाता है। इस आरोप की जांच करवाने का ऐलान करने की बजाये जब आरोप लगाने वाले को ही गाली देना शुरू कर दोगे तो उससे समस्या का हल नहीं निकलेगा। राहुल गांधी ने जितने भी आरोप लगाये हैं उनकी जांच आदेशित करके उसके परिणाम के बाद तो राहुल पर सवाल उठाये जा सकते हैं परन्तु उससे पहले ही सवाल उठाकर सत्ता अपने आप को जनता में हास्य का पात्र बना रही है।
संभव है कि बिहार के परिणाम के बाद देश की राजनीति में बड़ा फेरबदल देखने को मिले। क्योंकि वोट चोरी के आरोप यहीं रुकने वाले नहीं है यह एक जन आन्दोलन की शक्ल लेंगे क्योंकि आरोपों में घिरी सत्ता आसानी से सब स्वीकार नहीं करेगी। इसके लिये बड़े स्तर पर एक बार फिर राजनीतिक दलों में तोड़फोड़ का दौड़ शुरू होगा। क्योंकि आरोप लगाने वालों को सत्ता के काबिज न होने को प्रमाणित करने के लिये कांग्रेस की सरकारों पर हाथ डाला जायेगा क्योंकि हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए पूरे देश में एक ही दल की सरकार लाने का प्रयास किया जायेगा।

बिहार चुनाव के साये में उठतेे राष्ट्रीय सवाल

बिहार चुनाव जिस राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में हो रहे हैं उससे पूरे देश की निगाहें इस पर लग गयी हैं। इन चुनावों में एनडीए या इंडिया गठबंधन को सफलता मिलती है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण इस चुनाव के दौरान उभरे प्रश्न हो गये हैं जिन पर एक सार्वजनिक बहस आवश्यक हो गयी है। बिहार में चुनाव से पूर्व मतदाता सूचियां का गहन सर्वेक्षण करवाया गया था। इन गहन सर्वेक्षण में करोड़ों मतदाताओं का नाम मतदाता सूचीयों से काट दिये जाने का सच सामने आया। चुनाव आयोग ने आधार कार्ड को बड़ा प्रमाण मानने से इन्कार कर दिया और मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पंहुचा। शीर्ष अदालत ने आधार कार्ड को एक वैध प्रमाण माना और चुनाव आयोग को निर्देश दिये कि इसे पहचान और मतदाता पंजीकरण में वैध आधार स्वीकार किया जाये। आज आधार कार्ड एक बुनियादी पहचान पत्र बन चुका है। परन्तु चुनाव आयोग ने इसे वैध प्रमाण मानने से क्यों इन्कार किया इसका जवाब आज तक नहीं आ पाया है। बिहार एसआईआर का मामला अभी तक सर्वाेच्च न्यायालय में लंबित है और फिर भी बिहार में चुनाव करवा दिये गये। क्या ऐसे में यह चुनाव करवाना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल नहीं खड़े करता। क्योंकि इस मामले में शीर्ष अदालत में लंबित होने के बावजूद पूरे देश में एसआईआर लागू कर दिया गया। चुनाव आयोग के इस फैसले का बंगाल और तमिलनाडु में उग्र विरोध हुआ है। चार दर्जन राजनीतिक दल इसके खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय जा रहे हैं।
चुनाव आयोग पर वोट चोरी के जो आरोप पूरे प्रमाणिक दस्तावेजों के साथ राहुल गांधी ने लगाये हैं उन पर आयोग की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं आ पाया है। कर्नाटक में इस वोट चोरी पर मामला दर्ज कर एसआईटी को इसकी जांच सौंप दी गयी है। एसआईटी ने अब तक अपनी जांच में जो तथ्य जुटाये हैं उनसे भाजपा के कुछ नेताओं पर आंच आने की संभावना बढ़ गयी है और वह लोग अग्रिम जमानते हासिल करने के प्रयास में लग गये हैं। वोट चोरी के आरोप एक राष्ट्रीय अभियान की शक्ल लेते जा रहे हैं। क्योंकि केंद्र सरकार और भाजपा आयोग के पक्ष में खड़े हो गये हैं इससे अनचाहे ही संदेश चला गया है की चुनाव आयोग की पक्षधरता का लाभ भाजपा को मिल रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल देश में लोकतंत्र के भविष्य के सवाल बनते जा रहे हैं।
चुनावों में मुफ्ती की घोषणाओं के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय तक ने भी चिंता जताई है। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं इसके खिलाफ एक समय आवाज उठा चुके हैं। लेकिन बिहार चुनावों की पूर्व संध्या पर जब प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं बिहार की 75 लाख महिलाओं के खातों में दस-दस हजार डालने की घोषणा कर दी तब मफ्ती को लेकर प्रधानमंत्री की करनी और कथनी का अन्तर सामने आ गया। लेकिन यह पैसा चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद खातों में डाला जाने लगा। इस पर राजद के मनोज झा ने चुनाव आयोग को एक लम्बी चौड़ी शिकायत भेज दी। इस शिकायत पर आयोग खामोश बैठ गया है। यही नहीं इस फैसले के बाद विदेशी मुद्रा भण्डार में आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक साठ हजार करोड़ की कमी आ गयी। डॉलर के मुकाबले रुपया और गिर गया। आरबीआई को बाजार स्थिर रखने के लिये पैंतीस टन सोना बेचना पड़ गया। सोने की इस बिक्री ने सरकार की आर्थिक स्थिति के दावों को सवालों में लाकर खड़ा कर दिया है। इसका देश पर दीर्घकालिक प्रभाव पडना आवश्यक है। संयोगवश यह सब कुछ बिहार चुनावों के दौरान घटा है इसका मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। इस परिदृश्य में हो रहे बिहार चुनाव निश्चित रूप से ऐसे सवाल छोड़ रहे हैं जिन्हें नजरअन्दाज करना आसान नहीं होगा।

इस बढ़ते कर्ज का अन्तिम परिणाम क्या होगा?

सुक्खू सरकार ने अभी दो सौ करोड़ का कर्ज लिया है। यह कर्ज लेने के बाद अगले दो माह में यह सरकार तीन सौ करोड़ का कर्ज और ले पायेगी। यह कर्ज लेने के बाद प्रदेश का कर्जभार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर जायेगा। अभी जो कर्ज लिया गया है इसकी भरपायी अक्तूबर 31 से शुरू होगी। अभी जो कर्ज लिया गया है उसी के साथ यह भी सामने आया है कि इस सरकार ने पिछले वर्ष 2024-25 में करीब 29000 करोड़ का कर्ज लिया था जिसमें से विकास कार्यों पर केवल 8693 करोड़ ही खर्च हुआ और 20000 करोड़ पिछला कर्ज चुकाने में ही खर्च हो गया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले समय में कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज ही लेना पड़ेगा। हिमाचल जैसे राज्य पर इतना कर्जभार निश्चित रूप से चिन्ता का विषय है। क्योंकि जिस अनुपात में यह कर्ज बढ़ रहा है उसी अनुपात में सरकार में स्थाई रोजगार कम होता जा रहा है। जबकि हिमाचल में सरकार ही सबसे बड़ी रोजगार प्रदाता है। इस बढ़ते कर्जभार के कारण सरकार आउटसोर्स, मल्टी टास्क वर्कर और वन मित्र तथा पशु मित्र जैसी रोजगार व्यवस्थाएं करने पर आ गयी है जहां दस हजार से भी कम पगार मिलेगी। इससे अन्ततः युवाओं में हताशा और रोष का वातावरण निर्मित होगा। 2009-10 में सरकार आउटसोर्स योजना लेकर आयी है। उस समय प्रदेश में 1,89,065 स्थायी, 13050 अंशकालिक, 2167 वर्कचार्ज और 11908 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी थे। आज यह संख्या नियमित 1,85,698 स्थायी, 5726 अंशकालिक, वर्क चार्ज शून्य और दैनिक वेतन भोगी 4593 रह गये हैं। 31 मार्च 2010 को सरकार का कर्जभार सीएजी के मुताबिक 15830 करोड़ था जो अब एक लाख करोड़ हो रहा है। आज आउटसोर्स कर्मचारियों की संख्या 45000 के पास पहुंच चुकी है। इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है की कर्ज और कर्मचारियों के इसी अनुपात से आगे चलकर सरकार में स्थायी रोजगार की स्थिति क्या हो जायेगी।
इसी में एक महत्वपूर्ण पक्ष यह सामने आया है कि सरकार ने 2024-25 में 29046 करोड़ का कर्ज लिया। 2024-25 के बजट का कुल आकार 58443.61 करोड़ था। 2024-25 में राजकोषीय घाटा 10783.87 करोड़ था। बजट के इन आंकड़ों के अनुसार इस बजट को पूरा करने के लिये 10783.87 करोड़ का ही कर्ज लिया जाना चाहिये था जबकि सरकार ने 29046 करोड़ का कर्ज ले लिया। यह ज्यादा कर्ज क्यों लेना पड़ा? क्या विधानसभा पटल पर रखे बजट आंकड़े सही नहीं थे? क्या राज्य की समेकित निधि से अधिक खर्च करना पड़ा है? इन सवालों पर सरकार खामोश है। लेकिन इन आंकड़ों से बजट की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह आ जाता है। यहां यह सवाल स्वभाविक रूप से बड़ा हो जाता है कि जब 31 मार्च 2010 को सरकार का कुल कर्जभार 15830 करोड़ था वह आज एक लाख करोड़ तक कैसे पहुंच गया? जबकि कुल कर्मचारियों की संख्या आज उससे कम है? इस कर्ज का निवेश कहां पर हुआ है और उससे प्रदेश के राजस्व में कितनी वृद्धि हुई है? क्योंकि आज इस सरकार ने तो कार्यभार संभालते ही यह चेतावनी दे दी थी कि प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं। इतने कर्ज के बाद भी सरकार की कर्मचारियों के प्रति देनदारियां यथास्थिती बनी हुई है। यहां तक पैन्शन और मेडिकल के बिलों के लिये कर्मचारियों को आये दिन सड़कों पर आना पड़ रहा है।
इस बढ़ते कर्जभार के कारण सरकार को अपने प्रतिबद्ध खर्चाे पर कटौती करनी पड़ेगी और उस कटौती का पहला शिकार सरकार में स्थायी रोजगार की उपलब्धता होगी? आज सरकार ने राजस्व जुटाने के लिये हर वर्ग और सेवा को निशाना बना रखा है। प्रक्रियाओं को सरलीकरण के नाम पर लगातार उलझाया जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर पूरा राशन नहीं मिल रहा है और इस राशन की कीमतों में पिछले तीन वर्षों में दो गुणे से भी ज्यादा वृद्धि हुई है। आपदा में राहत का बंटवारा सरकार की घोषणाओं से निकलकर अमली शक्ल लेने तक नहीं पहुंच पाया है। यहां तक की भारत सरकार से जो आपदा राहत प्रदेश सरकार को मिल चुकी है वह भी यह तंत्र आम प्रभावित तक नहीं पहुंचा पाया है। कुल मिलाकर सरकार की नीयत और नीति दोनों पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह स्थिति सरकार की सेहत के लिये खतरे का संकेत होती जा रही है।

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