र्ज कहां निवेश हुआ है उस पर श्वेत पत्र जारी किया जाये। जितनी भी घोषणाएं की जा रही है सबकी पूर्ति जमीन पर शून्य है। इसलिये चुनाव के दौरान जो गारंटियां दी गई थी उन्हें लागू करने के लिये सबके साथ कुछ शर्ते जोड़ दी गयी हैं। मनरेगा के काम लम्बे अरसे से बंद पड़े हैं। किसानों के दूध की खरीद का मूल्य बढ़ाने के साथ मिल्कफैड के दूध के दाम बढ़ा दिये गये हैं। घी तो सीधा सौ रूपये बढ़ा दिया गया है। इन दो वर्षों में जनता पर करों और शुल्कों का बोझ डालकर 5200 करोड़ से अधिक का राजस्व इकट्ठा किया गया है। इस वित्तीय वर्ष में सरकार के कर्ज लेने की सीमा 7000 करोड़ जो छः माह में ही पूरी हो जायेगी। अभी मुख्यमंत्री और उनकी टीम ने केंद्र से प्रदेश के कर्ज लेने की सीमा दो प्रतिशत बढ़ाने का आग्रह किया था जिसे स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि नियम इसकी अनुमति नहीं देते। कुछ राज्यों ने कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिये सर्वाेच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली है।











ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है देश और संसद या सर्वदलीय बैठक में स्थिति स्पष्ट करने की बजाये विदेशों में अपना पक्ष रखने का विकल्प क्यों चुना गया। क्योंकि जब आई एम एफ ने पाकिस्तान को एक बिलियन डॉलर का ऋण पहलगाम की घटना के बाद स्वीकार किया तब एक देश ने इसका विरोध नहीं किया। जबकि इस कमेटी में भारत समेत पच्चीस देश सदस्य थे। भारत ने इसके विरोध में मतदान करने की बजाये बैठक का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। किसी भी देश का समर्थन इस बैठक में हासिल क्यों नहीं कर पाया इसका जवाब भारत कैसे देगा? भारत-पाक के रिश्ते इस आतंक को लेकर तो देश के विभाजन के बाद से ही बिगड़ने शुरू हो गये थे। हर आतंकी घटना में पाक की परोक्ष/अपरोक्ष में भूमिका रही है। फिर प्रधानमंत्री मोदी पिछले ग्यारह वर्षों में इस विषय पर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को क्यों नहीं समझा पाये हैं? जबकि भारत तो विश्व गुरु होने का दावा करता आया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जिस तरह से विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री और उनके परिवार को ट्रोल किया गया उसका क्या जवाब है? कर्नल सोफिया कुरैशी को जिस भाषा में मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह ने अपशब्द कहे हैं उसका अदालत ने तो कड़ा संज्ञान ले लिया लेकिन भाजपा संगठन की इस बारे में आज तक खामोशी का क्या जवाब है। प्रधानमंत्री इस ट्रोल पर क्यों खामोश हैं?
अभी जो सांसद विदेश डैलीगेशन में भेजे जा रहे हैं उनके चयन में उनके दलों को विश्वास में क्यो नहीं लिया गया? जो नाम दलों ने भेजे उनकी जगह सरकार ने दूसरे ही लोगों का चयन क्यों कर लिया? क्या इसमें दलों की सहमति नहीं रहनी चाहिये थी। क्या इसे राजनीति के आईने में नही देखा जायेगा। जब विदेश में इस ट्रोल को लेकर पूछा जायेगा तो क्या जवाब दिया जायेगा? क्योंकि यह वीडियोज तो पूरे विश्व में देखे जा रहे होंगे। पाक पर कारवाई का विदेश मंत्री का वीडियो जिसमें वह कह रहे हैं कि हमने हम्लों की सूचना पहले ही पाकिस्तान को दे दी थी। इसका क्या जवाब दिया जायेगा। आज सबसे पहले अपने देश की जनता, सभी राजनीतिक दलों और संसद के सामने सारी स्थितियां स्पष्ट की जानी चाहिये थी क्योंकि पूरा देश सरकार और सेना के साथ खड़ा रहा है। इसलिये ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठे सवालों पर यहां जवाब दिया जाना आवश्यक हो जाता है।











