Saturday, 21 March 2026
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क्या बिहार चुनाव देश के भविष्य की दशा तय करेंगे?

बिहार विधानसभा चुनावों का देश की राजनीति पर दुरगामी प्रभाव पड़ेगा यह निश्चित है। बल्कि इन चुनावों सेे देश का राजनीतिक चरित्र ही बदल जायेगा यह कहना ज्यादा सही होगा। क्योंकि इन चुनावों से पूर्व देश के चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर बहुत ही गंभीर आरोप लग चुके हैं। इन आरोपों का व्यवहारिक प्रभाव केंद्र सरकार और शीर्ष न्यायपालिका पर भी देखने को मिल गया है। केंद्र सरकार चुनाव आयोग के साथ खड़ी हो गयी है और शीर्ष अदालत ने उस याचिका को अस्वीकार कर दिया है जिसमें इन आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित करने की मांग की गयी थी। जब चुनाव आयोग शीर्ष अदालत और केंद्र सरकार सब एक साथ विश्वसनीयता के संकट में आ जाये तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस सब का अंतिम परिणाम क्या होगा। बिहार में हुये एस आई आर पर ही इन चुनावों से पूर्व शीर्ष अदालत कोई अंतिम फैसला नहीं दे पायी है इसको आम आदमी कैसे देखेगा यहां अंदाजा लगाया जा सकता है। बिहार चुनावों की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री ने बिहार की 75 लाख महिलाओं के खातों में दस-दस हजार ट्रांसफर करने का फैसला लिया है। इससे प्रधानमंत्री का ‘चुनावी रेवड़ी’ संस्कृति पर भी व्यवहारिक पक्ष सामने आ जाता है। पिछले लोकसभा चुनावों से पूर्व राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का परिणाम था कि भाजपा अपने दम पर केंद्र में सरकार नहीं बना पायी उसे नीतीश और नायडू का सहयोग लेना पड़ा है। लोकसभा चुनावों के बाद हुये हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर इतना कुछ देश के सामने लाकर खड़ा कर दिया कि इसके कारण राहुल गांधी को चुनाव आयोग पर हमला बोलने के लिये पर्याप्त सामग्री मिल गयी। राहुल गांधी के चुनाव आयोग के खिलाफ जिस तरह के प्रमाणिक साक्ष्य जुटाकर पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से हमला बोला है उससे पूरे प्रदेश में ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ अभियान चल निकला है। पिछले ग्यारह वर्षों में केंद्र सरकार ने जो कुछ किया है उस पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। सारे चुनावी वायदे आज सवालों के घेरे में आ खड़े हुये हैं। बेरोजगारी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड ़दी है। अभी सरकार ने जीएसटी संशोधन से जो राहत आम आदमी को पहुंचाने का फैसला लिया है उसका आम आदमी को कोई लाभ नहीं मिला। क्योंकि बाजार में वस्तुओं के दाम व्यवहारिक रूप से कम नहीं हो पाये हैं। इस पृष्ठभूमि में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव हर राजनीतिक दल, नेता और आम आदमी सबकी व्यक्तिगत परीक्षा होगी यह तय है। बिहार में कुल 7.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें से 1.63 करोड़ मतदाता वह हैं जो बीस से अठाईस वर्ष के हैं और चौदह लाख वह हैं जो पहली बार वोट डालेंगे। यह वह लोग हैं जो बेरोजगारी से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। जिनके लिये अब तक चुनावी वायदे आज सत्ता से सवाल बन गये हैं। बिहार में राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा में यह लोग ही सबसे बड़े भागीदार थे। इनका भविष्य ही सबसे ज्यादा दाव पर लगा है। इसी युवा ने नेपाल और बांग्लादेश में सत्ता के खिलाफ सफल लड़ाई लड़ी है। इसलिये आज बिहार चुनाव में आम आदमी के सामने सारे राष्ट्रीय प्रश्न खुलकर खड़े हैं। इन चुनावों के परिणाम देश की राजनीतिक स्थिति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा करने वाले हैं जिसका परिणाम दूरगामी होगा।

इस अराजकता का अन्तिम परिणाम क्या होगा?

चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर जिस तरह के प्रमाणिक आरोप राहुल गांधी अपनी पत्रकार वार्ताओं पर लगाते जा रहे हैं और इन आरोपों की विधिवत जांच करवाये जाने की बजाये जिस तरह का रुख चुनाव आयोग और केन्द्र सरकार इस मुद्दे पर अपनाती जा रही है वह अब चिंताजनक होता जा रहा है। क्योंकि चुनाव आयोग के रुख के बाद जब यह मुद्दा सर्वाेच्च न्यायालय में इस मांग के साथ पहुंचा कि राहुल गांधी के आरोपों की जांच के लिये एक एसआईटी गठित की जाये और शीर्ष अदालत ने इस मांग को अस्वीकारते हुये इसे आयोग के समक्ष ही उठाने का निर्देश दिया तब केन्द्र सरकार चुनाव आयोग और सर्वाेच्च न्यायालय सब एक साथ सवालों के दायरे में आ जाते हैं। क्योंकि देश में लोकतांत्रिक सरकार के गठन की जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव के माध्यम से चुनाव आयोग को सौंपी गयी है। चुनाव आयोग का गठन एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था के रूप में संविधान के प्रावधानों के तहत किया गया है। चुनाव के दौरान सारा प्रशासनिक तंत्र चुनाव आयोग को जवाब देह होता है। सरकार चुनाव आयोग को हर तरह से सहयोग करने के लिये बाध्य होती है। ऐसी संवैधानिक व्यवस्था के होते हुये भी यदि चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप लग जायें और सर्वाेच्च न्यायालय भी इसकी निष्पक्ष जांच करवाये जाने से पीछे हट जाये तो यह स्वीकारना ही होगा कि देश किसी अप्रत्याशित की ओर बढ़ता जा रहा है। वोट चोरी के आरोप जिस तरह के दस्तावेजी प्रमाणों के साथ लगाये जा रहे हैं उन पर देश का बहुसंख्यक वर्ग विश्वास करता जा रहा है। क्योंकि केन्द्र सरकार इस मुद्दे पर जिस तरह से पीछे हट गयी है उससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि यह वोट चोरी सत्तारूढ़ सरकार के लिये ही की जा रही है। इसका सबसे निराशाजनक पक्ष तो यह है कि शीर्ष अदालत भी अपरोक्ष में संविधान की रक्षक होने की बजाये सरकार की रक्षक होती जा रही है। ऐसे में जब केन्द्र सरकार चुनाव आयोग और देश का सर्वाेच्च न्यायालय भी एक ही स्वर में गायन करना शुरू कर दे तो आम आदमी कहां और किसके पास जाये यह बड़ा सवाल हो जाता है। आज जो स्थितियां निर्मित होती जा रही हैं उनमें अनायास ही आम आदमी पिछले ग्यारह वर्षों में जो कुछ घटा है उस पर नजर दौड़ना शुरू कर देता है। आम आदमी के सामने जब यह आता है कि जिस भी दल के किसी भी नेता पर अपराध और भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उसने अपने दल को छोड़कर भाजपा में शरण ले ली तो उसके खिलाफ सारी जांच बन्द हो गयी। आज भाजपा में दूसरे दलों से आये नेताओं की संख्या मूल भाजपाइयों से ज्यादा बढ़ गयी है। आज भाजपा का राजनीतिक चरित्र सत्ता में बने रहने के लिये कुछ भी करने वालों की श्रेणी में आ गया है। भाजपा के इस सता मोह ने भाजपा को अपने ही आकलन में बहुत नीचे ला खड़ा कर दिया है। जिस पच्चहतर वर्ष की आयु सीमा के स्वघोषित सिद्धांत से लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा आदि को मार्गदर्शक मण्डल में भेज दिया गया था वह नियम आज अपने लिये अप्रसांगिक हो गया है। जिस तरह की परिस्थितियों निर्मित होती जा रही है उससे हर चुनाव में किया गया वायदा अब जवाब मांगने लग गया है। हर एक के खाते में पन्द्रह लाख आने, हर साल दो करोड़ नौकरियां उपलब्ध करवाने का वायदा हर जुबान पर आ गया है। महंगाई पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ गयी है। रुपया डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। जो लोग बैंकों का हजारों करोड़ लेकर विदेश भाग गये थे उनमें से एक भी आज तक वापस नहीं आया है। किसानों की आय दोगुनी नहीं हो पायी है। सबका साथ सबका विश्वास और सबका विकास के नाम पर देश की दूसरी बड़ी जनसंख्या मुस्लमानों में से भाजपा के कितने सांसद और विधायक हैं? क्या इसका जवाब आ पायेगा। कोविड काल में जो संविधान डॉ.भागवत के नाम से वायरल हुआ था उसमें महिलाओं और अनुसूचित जातियों के लोगों को किस तरह के अधिकार दिये गये थे उसकी झलक देश के मुख्य न्यायाधीश पर भरी अदालत में जूता उछाले जाने से सामने आ चुकी है। आज पूरा दलित समाज इस पर चर्चाओं में जुट गया है। यह जूता कांड देश के दूसरे भागों में भी फैलने लग गया है। क्योंकि इसकी निंदा करने की बजाये जिस तरह से इसे जायज ठहराया जा रहा है वह अपने में चिंता जनक है। कुल मिलाकर देश में बड़े स्तर पर अराजकता का वातावरण पैदा किया जा रहा है जिसके परिणाम घातक होंगे। वोट चोरी के आरोपों की जांच निश्चित रूप से होनी चाहिये। इस जांच से बचने का जितना प्रयास किया जायेगा वह घातक होगा। इससे अराजकता ही फैलेगी।

29-6 Oct 2025 Shail

भाजपा के राजनीतिक चरित्र पर उठते सवाल


जब सत्तारूढ़ सरकारें जनता का विश्वास खो देती हैं तब ऐसी स्थिति एक जनान्दोलन की शक्ल ले लेती है। किसी भी सरकार को परखने समझने के लिये दस वर्ष का समय बहुत होता है। क्योंकि इतने समय में उसकी वैचारिक समझ के बारे में पूरा खुलासा सामने आ जाता है। सरकार की वैचारिक समझ और नीयत पर जब कोई बुनियादी सवाल खड़े कर देता है और उन सवालों पर जब सरकारों की प्रतिक्रियाएं वैचारिक न रहकर केवल सतही हो जाती है तब अविश्वास और गहरा जाता है। आज देश में केन्द्र से लेकर राज्यों तक सभी सरकारें इस अविश्वास में घिर चुकी हैं। विपक्षी दलों की राज्य सरकारें केन्द्र पर उनके साथ असहयोगी भेदभाव बरतने का आरोप लगा रही हैं। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का तीसरा कार्यकाल चल रहा है और अधिकांश राज्यों में भाजपा की ही सरकारें हैं इसलिये भाजपा के राजनीतिक चरित्र पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। भाजपा संघ परिवार की एक राजनीतिक इकाई है जो जनसंघ से जनता पार्टी में विलय के बाद 1980 में पैदा हुई। वैसे संघ परिवार के 1948 और 1949 में गठित हुए विद्यार्थी परिषद और हिन्दुस्तान समाचार एजैन्सी शायद सबसे पुराने अनुसांगिक संगठन हैं। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार जनसंघ घटक के सदस्यों की आरएसएस के साथ भी सक्रियता रखने के कारण दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर टूटी थी। उसके बाद 1990 में वीपी सिंह सरकार में भाजपा भागीदार थी। लेकिन मण्डल आयोग की सिफारिशें केन्द्र द्वारा लागू करने के मुद्दे पर भाजपा की वीपी सिंह सरकार के विरोध में खड़ी हो गयी। मण्डल के विरोध में कमण्डल खड़ा हो गया। मण्डल आयोग के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले 27% आरक्षण का विरोध कमण्डल आन्दोलन ने किया। अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के विरोध में खड़े हुए आन्दोलन में आत्मदाह तक हुए। शिमला में भी आत्मदाह की घटनाएं घटी हैं। परिणाम स्वरुप केन्द्र में सरकार गिर गयी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में तीन बार भाजपा नीत सरकारें तेरह दिन तेरह माह और फिर एक टर्म के लिये बनी। 2004 से 2014 तक केन्द्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार दो टर्म के लिये रही।

डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ भाजपा/संघ प्रायोजित अन्ना और रामदेव के आन्दोलन आये। इन आन्दोलनों में भ्रष्टाचार और काले धन के भरोसे गये आंकड़ों ने आग में घी का काम किया। 2G स्पेक्ट्रम पर सीएजी विनोद राय की रिपोर्ट आयी जिसमें 1,76,000 करोड़ का घपला होने का आरोप लगा। इसी के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स का मुद्दा जुड़ गया। बाबा रामदेव ने काले धन के लाखों करोड़ के आंकड़े परोसे। लोकपाल की मांग इस आन्दोलन की केन्द्रीय मांग बन गयी। भ्रष्टाचार और काले धन के आंकड़े के प्रचार प्रसार में केन्द्र में सरकार बदल गयी। 2014 में कांग्रेस और अन्य दलों से बड़ी संख्या में नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया। लेकिन भ्रष्टाचार और काले धन के आरोपों पर क्या जांच हुई यह आज तक सामने नहीं आया है। जबकि विनोद राय का अदालत में यह बयान सामने आया है कि उन्हे गणना करने में चूक हो गई थी और कोई खपला नहीं हुआ है। कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हुये घपलेे के आरोप में भी क्लीन चिट मिल गयी है। काले धन का आंकड़ा पहले से दो गुना हो गया है। लोकपाल में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला गया हो ऐसा भी कुछ सामने नहीं आया है।
इस सरकार ने 2014 और 2019 के चुनाव में जो वायदे किये थे वह कितने पूर्व हुये हैं? दो करोड़ युवाओं को प्रतिवर्ष नौकरी देने का वायदा कितना पूरा हुआ है? महंगाई 2014 के मुकाबले आज कहां खड़ी है? इसका कोई जवाब नहीं आ रहा है। जबकि देश में इन दस वर्षों में दो बार नोटबन्दी हो चुकी है। सरकार ने सभी कमाई वाले सार्वजनिक उपक्रमों को प्राइवेट सैक्टर को थमा दिया है। इस सरकार ने कोई बड़ा संस्थान खोला हो ऐसी कोई जानकारी सामने नहीं है। आज रुपया डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है जबकि कर्जदारों की सूची में भारत विश्व बैंक में पहले स्थान पर पहुंच गया है। आज देश को हिन्दू-मुस्लिम के मतभेद और ई.डी. सी.बी.आई. और आयकर जैसी एजैन्सियों के डर से चलाया जा रहा है। जिस लोकप्रिय मतदान से इस सरकार के बनने का दावा आज तक किया जाता रहा है उस दावे की हवा राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों ने पूरी तरह से निकाल दी है। आज प्रधानमंत्री स्वयं व्यक्तिगत आरोपों में घिरते जा रहे हैं। पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर स्व घोषित सिद्धांत पर भाजपा को ही पूर्ववरिष्ठ नेतृत्व जिस तर्ज में सवाल दागने लग गया है उसके परिणाम भयानक होंगे। इन्हीं कारणों सेे आज भाजपा अपना नया राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं चुन पा रही है। आज भाजपा के राजनीतिक चरित्र पर उठते सवाल उसके आकार से ही बड़े होते जा रहे हैं। इन सवालों से ज्यादा देर तक बच पाना आसान नहीं होगा।

चुनाव आयोग की वकालत सरकार क्यों कर रही है?

चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर एक लंबे समय से सवाल उठते आ रहे हैं जो अब वोट चोरी के आरोप तक जा पहुंचे हैं। ईवीएम मशीनों की अविश्वसनियता पर सबसे पहले लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने सवाल उठाये थे और एक पुस्तिका तक जारी कर दी थी। फिर डॉ. स्वामी ने सवाल उठाये और सर्वाेच्च न्यायालय तक जा पहुंचे और इन मशीनों में वीवीपैट यूनिट जोड़ा गया। इसी दौरान आर.टी.आई. के माध्यम से यह सूचना बाहर आयी की उन्नीस लाख मशीने गायब हैं। यह मामला भी पुलिस जांच और अदालत तक गया। लेकिन इसका अन्तिम परिणाम क्या निकला आज तक सामने नहीं आ पाया है। हर चुनाव के बाद निष्पक्षता और पारदर्शिता पर देश के राजनीतिक दलों ने सवाल उठाये और चुनाव मत पत्रों के माध्यम से करवाये जाने की मांग रखी। एडीआर और अठारह राजनीतिक दलों ने सर्वाेच्च न्यायालय में इस संदर्भ में दस्तक दी। सर्वाेच्च न्यायालय ने मत पत्रों के माध्यम से चुनाव करवाये जाने के आग्रह को तो स्वीकार नहीं किया लेकिन यह प्रावधान कर दिया कि चुनाव प्रक्रिया का सारा डिजिटल रिकॉर्ड पैन्तालीस दिनों तक सुरक्षित रखा जायेगा और चुनाव में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को उपलब्ध करवाया जायेगा यदि वह चुनाव याचिका में जाता है और इस संदर्भ में आने वाले खर्च को जमा करवाता है। लेकिन चुनाव आयोग ने सर्वाेच्च न्यायालय के इस प्रावधान की अनुपालना नहीं की। हरियाणा की एक विधानसभा का मामला पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय जा पहुंचा। उच्च न्यायालय ने रिकार्ड उपलब्ध करवाने के निर्देश दिये। लेकिन इन निर्देशों के बाद इस आशय के नियमों में ही संशोधन करके रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं करवाया।
जब सर्वाेच्च न्यायालय के ही निर्देशों की अनुपालना में इस तरह का व्यवहार आयेगा तो यह स्थिति किसी को भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का पूरी गहनता के साथ पड़ताल करने को बाध्य कर देगा। इसी वस्तु स्थिति ने राहुल गांधी और उनकी टीम को इन सवालों की पड़ताल करने के लिये बाध्य किया। राहुल गांधी ने इस संदर्भ में जो तथ्यात्मक प्रमाण जनता के सामने रखे हैं उनको चुनाव आयोग ने बिना किसी जांच के ही खारिज करते हुये राहुल गांधी से इस में ज्ञापन पत्र मांग लिया। सवाल चुनाव आयोग पर उठे और उसकी वकालत में पूरी भाजपा उतर आयी। बिहार में करवायी गयी एस आई आर में पैंसठ लाख वोट डिलीट किये जाने का मामला उठा और केंद्र सरकार ने बिहार की पच्चहतर लाख महिलाओं को सीधे दस-दस हजार रुपए उनके बैंक खातों में ट्रांसफर करवा दिये। वोट चोरी के आरोप जिस दस्तावेजी प्रमाणिकता के साथ सामने आये हैं उससे यह एक जन आन्दोलन की शक्ल में बदलता नजर आ रहा है। इस संदर्भ में राहुल गांधी की जनसभाओं को रद्द करवाने की रणनीति पर सरकार आ गयी है। एक भाजपा प्रवक्ता पर यह आरोप लग रहा है कि उसने राहुल गांधी की छाती में गोली मार दिये जाने की बात मंच से कही है और केन्द्र सरकार इस आरोप पर चुप है।
वोट चोरी के आरोपों के साथ पिछले ग्यारह वर्षों में जो कुछ देश में घटा है वह सब सामने सवाल बनकर खड़ा होता जा रहा है। देश का युवा प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियों के वायदे पर सवाल पूछ रहा है। आज जीएसटी में संशोधन करके महंगाई से राहत की बात की जा रही है। लेकिन इसी के साथ यह सवाल उठ रहा है कि जिन वस्तुओं पर नौ वर्ष पहले टैक्स जीरो था क्या उनके दाम आज उसी के बराबर हैं? हर चुनाव में किया गया वायदा आज व्यवहारिकता में जवाब मांगने लगा है। देश के सारे सार्वजनिक उपक्रम आज प्राइवेट हाथों में जा पहुंचे हैं। देश विश्व बैंक के कर्जदारों में पहले स्थान पर पहुंच गया है। इस बढ़ते कर्ज से महंगाई और बेरोजगारी ही बढ़ेगी यह तय है। देश का युवा जो आज सूचना प्रौद्योगिकी के कारण हर चीज की जानकारी रख रहा है और वही बेरोजगारी से सबसे ज्यादा पीड़ित है उस युवा के आक्रोश को दबाना आसान नहीं होगा। सवाल पूछने पर गोली मारने के विकल्प के मायने बहुत गंभीर और दूरगामी होंगे यह तय है।

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