क्या हिमाचल का घटनाक्रम कांग्रेस हाईकमान के लिये एक चेतावनी है? यह सवाल इसलिये प्रसांगिक है कि हाईकमान ने उसके पास सुक्खू सरकार को लेकर आ रही शिकायतों का समय रहते संज्ञान नहीं लिया। यह संज्ञान न लेने का परिणाम प्रदेश वर्तमान घटनाक्रम है। कांग्रेस जब विपक्ष में थी तब जयराम सरकार के खिलाफ यह आरोप लगाती थी कि इस सरकार ने प्रदेश को कर्ज के चक्रव्यूह में डाल दिया है। कर्ज के इन आरोपों का अर्थ था कि कांग्रेस को प्रदेश की वित्तीय स्थिति का पूरा ज्ञान था। लेकिन कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिये दस गारंटीया जारी कर दी। सरकार ने इन गारंटीयों पर कोई कदम न उठाने के लिये प्रदेश की जनता के श्रीलंका जैसे हालात होने की चेतावनी दे दी। यह चेतावनी देने के बाद सरकार ने छः सीपीएस और एक दर्जन से अधिक गैर विधायकों को सलाहकार आदि बनाकर अपने खर्च बढ़ा लिये। दूसरी ओर आम आदमी के लिये सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ाकर उस पर बोझ डाल दिया। इस तरह सरकार की कथनी और करनी का विरोधाभास साफ सामने आ गया। ऊपर से पार्टी के कार्यकर्ताओं का सरकार में समायोजन न होने से अधिकांश लोग हताश होकर घर बैठ गये। इसी के साथ सरकार ने हर माह एक हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज लेना शुरू कर दिया। इस स्थिति ने विपक्षी भाजपा को आक्रामक होने का अवसर दे दिया और उसने आरटीआई के माध्यम से कर्ज के तथ्य जुटाकर सार्वजनिक कर दिये। इस वस्तुस्थिति से कांग्रेस के अन्दर भी विचार-विमर्श चला लेकिन मुख्यमंत्री स्थिति का सही आकलन नहीं कर पाये। जब मुख्यमंत्री के स्तर पर कुछ नहीं हुआ तब शिकायतें हाईकमान के पास पहुंची। लेकिन अंतिम परिणाम वहां भी शून्य रहा। लोकसभा चुनाव के परिदृश्य में सरकार के खिलाफ उभरता रोष हर कांग्रेस जन के लिये चिन्ता का कारण बनता गया। क्योंकि फील्ड से यह स्पष्ट संकेत उभरने लगे की पार्टी चारों सीटों पर हार जायेगी। कोई भी मंत्री लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये तैयार नहीं हुआ। क्योंकि सरकार एक भी फैसला जनहित का प्रमाणित नहीं हुआ। यह विभिन्न वर्गाे के धरने प्रदर्शनों से रोज सामने आ रहा था। मुख्यमंत्री व्यवस्था परिवर्तन के जुमले से बाहर नहीं निकल पाये। प्रदेश की इस स्थिति पर हाईकमान पर कुछ सीधे सवाल उठते हैं। क्या दस गारंटीयां जारी करते हुये प्रदेश की वित्तीय स्थिति का ज्ञान नहीं था? क्या इन गारंटीयों को पूरा करने के लिए प्रदेश पर और कर्ज भार बढ़ाने का रास्ता चुना गया था? क्या कर्ज लेने के बाद भी कोई गारंटी पूरी हो पायी है? क्या गारंटीयां अंतिम वर्ष में पूरी करने का वायदा किया गया था। जब प्रदेश की वित्तीय स्थिति ठीक नही थी तो फिर सीपीएस और सलाहकारों का ब्रिगेड खड़ा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या पार्टी का प्रभारी भी इस वस्तु स्थिति का आकलन नहीं कर पाया? जब हाईकमान के पास प्रदेश को लेकर शिकायतें जा रही थी तो उनका संज्ञान लेकर चीजें सुधारने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? आज प्रदेश की जो परिस्थितियां हैं क्या उनमें कांग्रेस को अपनी राज्य सरकारों पर बराबर नजर नही रखनी चाहिये थी? राज्य सरकारों का आचरण ही हाईकमान की नीतियों का आईना बनता है। पांच राज्यों के चुनाव में भी हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स रिपोर्ट कार्ड चर्चा में रहा है। छत्तीसगढ़ में हिमाचल की गारंटीयों पर विशेष चर्चा हुई है। इस समय प्रदेश की चारों सीटों पर कांग्रेस की हार पुख्त्ता हो गयी है। नाराज विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आज हाईकमान ने मुख्यमंत्री न बदलकर प्रदेश से कांग्रेस को लम्बे समय के लिये सत्ता से बाहर रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। क्या मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री कार्यकर्ताओं को संदेश देने के लिये लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार होंगे? यदि इस संकट के लिये बागी दोषी हैं तो इसका जवाब इन मंत्रियों या इनके परिजनों को लोस उम्मीदवार बनाकर ही दिया जा सकता है अन्यथा नेतृत्व परिवर्तन के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका अन्य राज्य पर भी प्रभाव पड़ेगा यह तय है।





वित्तीय मुहाने पर अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष की चेतावनी ने और डरा दिया है। आई एम एफ के मुताबिक भारत का कर्ज जी डी पी का 100% होने जा रहा है। आर्थिकी को समझने वाले जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था के लिये यह सबसे बड़ा काला पक्ष है। आने वाले चुनाव में युवाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा होगी। हर तीसरा वोटर युवा होगा। सरकार की अपनी रिपोर्ट के मुताबिक तीन युवाओं में से हर दूसरा बेरोजगार है। रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र सरकार के विभागों में ही 90 लाख पद खाली हैं और सरकार इन्हें भरने की स्थिति में नहीं है। यही स्थिति सार्वजनिक उपक्रमों की है। कॉर्पोरेट घरानों में भी रोजगार कम होता जा रहा है कुल मिलाकर देश एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री इन मुद्दों को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना चाहते। इसलिये वह धार्मिक ध्रुवीकरण करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। विपक्षीय एकता को तोड़ने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं और इसके लिये अगले कुछ दिनों में ई डी, सी बी आई और आयकर जैसी ऐजैन्सीयों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। जिस तरह से आयकर विभाग ने कांग्रेस के खातों से 65 करोड़ से अधिक की रकम आयकर के नाम पर निकाल ली है उससे यह स्पष्ट संकेत उभरता है कि कांग्रेस की राज्य सरकारों को भी अस्थिर करने का पूरा प्रयास किया जायेगा। जहां जो सरकारें अपने ही कारणों से कमजोर हो रही हैं उन पर अस्थिरता का प्रयोग किये जाने की बड़ी संभावना है।












लेकिन यह भी एक प्रमाणित सच है कि रात चाहे कितनी भी काली और लम्बी क्यों न हो पर सवेरा आकर ही रहता है। इस समय सारे गंभीर प्रश्नों से ध्यान हटाने का जो प्रयोग धर्म और जातियों में आपसी टकराव खड़ा करके किया जा रहा था उसका एक चरम अभी राम मन्दिर प्राण प्रतिष्ठा के रूप में सामने आ चुका है। इस आयोजन पर शंकराचार्यों से लेकर अन्य विश्लेषको ने जो सवाल उठाये हैं उससे शायद सत्ता को कुछ झटका लगा है। इसलिये इस आयोजन के बाद राहुल गांधी के न्याय यात्रा को असफल करने के लिये हर राज्य में अड़चने पैदा करने का प्रयास किया गया है। इसी के लिये ‘‘इण्डिया’’ गठबन्धन को तोड़ने के सारे प्रयास शुरू हो गये हैं। जिस तरह से गठबन्धन के बड़े घटक दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को सीटे देने के लिये तैयार नही हो रहे हैं उससे स्पष्ट हो जाता है कि चुनावों से पहले ही यह गठबन्धन दम तोड़ देगा। सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़ने की बाध्यता पर आ जायेंगे।
राम मन्दिर प्राण प्रतिष्ठा आयोजन ने हर दल को प्रभावित किया है। बल्कि हर दल में वह लोग स्पष्ट रूप से चिन्हित हो गये हैं जो धर्म की राजनीति में संघ भाजपा के जाल में पूरी तरह फंस चुके हैं। ऐसे में यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि जो राजनीतिक लोग या दल धर्म और राजनीति में ईमानदारी से अन्तर मानते हैं उन्हें बड़े जोर से यह कहना पड़ेगा की राम मन्दिर प्राण प्रतिष्ठा का जो आयोजन हुआ है वह शुद्ध रूप से संघ भाजपा का एक राजनीतिक कार्यक्रम था। इस आयोजन के बाद भाजपा के ही अन्दर उठने वाले सवालों को लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देकर चुप करवाने का प्रयास किया गया है। लेकिन इस आयोजन के बाद जो कुछ बिहार, झारखण्ड और चण्डीगढ़ में घटा है उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि मोदी अभी भी शंकित हैं कि क्या अकेला राम मन्दिर ही उनको सफलता दिला पायेगा? इसी शंका ने उनको ‘‘इण्डिया’’ को तोड़ने के प्रयासों में लगा दिया है। ‘‘इण्डिया’’ में नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, अखिलेश यादव और केजरीवाल की सीट शेयरिंग को लेकर जिस तरह का आचरण सामने आ रहा है उसका भाजपा और कांग्रेस पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर अगले अंक में आकलन किया जायेगा। लेकिन जो कुछ मोदी ने किया है वहां निश्चित रूप से उनके डर का ही प्रमाण है।