हिमाचल सरकार अपने कर्मचारियों और पैन्शनरों को तय समय पर वेतन तथा पैन्शन का भुगतान नहीं कर पायी है। विधानसभा चुनावों के दौरान 18 से 60 वर्ष की आयु वर्ग की हर महिला को प्रतिमाह पन्द्रह सौ रूपये देने की भी गारंटी दी गई थी। इसे अब हर महिला की जगह परिवार की एक महिला कर दिया गया है और उसमें भी पात्रता के लियं कई शर्तें लगा दी गयी। चुनावों के दौरान दी गई गारंटीयों पर अमल कर पाने के बजाये जो सुविधा पहले से मिल रही थी उनमें भी किसी न किसी तर्क से कटौती की जा रही है। यही नहीं सरकार हर माह एक हजार करोड़ से अधिक का कर्ज ले रही है। यह सरकार दिसंबर 2022 में सत्ता में आयी थी सत्ता में आने आते ही प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो जाने की चेतावनी दी थी। जिसका अर्थ है कि सरकार को वित्तीय स्थिति की जानकारी उस समय हो गई थी। सरकार वित्तीय कुप्रबंधन की जिम्मेदारी पूर्व सरकार पर डाल रही है। केन्द्र द्वारा प्रदेश सरकार के कर्ज लेने की सीमा में भी कटौती कर देने का आरोप लगाया जा रहा है। लेकिन यह नहीं कहा जा रहा है कि इसमें प्रदेश के साथ ज्यादती कहां हुई है।
इस समय स्थिति यहां पहुंच गयी है की कर्ज लेकर कब तक गुजारा किया जा सकता है। जब कर्ज लेने की सीमा पूरी हो जायेगी तब क्या किया जायेगा? जो कर्ज अब तक लिया गया है उसका निवेश कहां हुआ है? जब विधानसभा में पारित बजट के अनुसार वर्ष 10783.87 करोड़ के घाटे से बन्द हो रहा था तो फिर इससे अधिक कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी? क्या बजट आकलनों में कोई गड़बड़ हो गयी है? क्योंकि आम जनता की जेब पर भार डालकर ज्यादा समय तक चला नहीं जा सकता। आज आम आदमी इस बात पर नजर जमाये हुये हैं कि सरकार अपने खर्चों में कब और क्या कटौती करती है। यदि सरकार के अपने खर्चों में कोई कटौती न हुई तो इससे सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।
यदि यह मान लिया जाये कि पूर्ववर्ती सरकारों ने जो योजनाएं बनायी है और कर्ज लिया जिसके चलते आज स्थिति यहां तक पहुंच गयी है तो उस पर भी एक खुली बहस होनी चाहिए। यदि पूर्व का प्रबंधन वर्तमान स्थितियों के लिए जिम्मेदार है तो आज का प्रबंधन तो कहीं चर्चा में ठहरता ही नहीं है। क्योंकि मित्रों की सरकार का तमगा इसी सरकार के नाम लगा है। मित्रों को जितने कैबिनेट रैंक इस सरकार ने बांटे हैं इतने पहले नहीं बंटे हैं। बल्कि सरकार के खर्चों से यह लगता ही नहीं की प्रदेश में कोई वित्तीय संकट है। यह तो मुख्यमंत्री द्वारा सदन में यह जानकारी रखने से की दो माह के लिए मंत्रियों के वेतन भत्ते विलंबित किए जा रहे हैं वितीय संकट रिकॉर्ड पर आया है। वैसे तो यह जानकारी सदन में रखने के बाद मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि कोई संकट नहीं है यह फैसला व्यवस्था सुधारने के लिये लिया गया है। इस परिदृश्य में यह सवाल और रोचक हो जाता है कि क्या ऐसे फैसलों से सही में व्यवस्था सुधर जायेगी? जब कोई वित्तीय प्रबंधन किन्ही कारणों से बिगड़ जाता है तो हर आदमी ऐसी स्थिति का आकलन अपनी अपनी समझ के अनुसार करने लग जाता है। सरकार के फैसलों की तात्कालिक व्यवहारिकता चिंतन का विषय बन जाती है।
इस सरकार ने युवाओं को सौर ऊर्जा ईकाईयां स्थापित करने के लिए बड़ी योजना घोषित की थी जिसके कोई परिणाम अब तक सामने नहीं आये हैं। नए उद्योग आने की जगह पुराने पलायन करने पर आ गये हैं। जिस तरह से दो व्यावसायिक परिसर ग्यारह-ग्यारह मंजिल के शिमला में स्थापित किये जाने का फैसला लिया गया है उससे कितनी राजस्व आय होगी इसका कोई आकलन सामने नहीं आया है। उल्टे पर्यावरण को लेकर सवाल खड़े होने लग गये हैं। सरकार की ऐसी योजना सामने नहीं आयी है जिससे इसी कार्यकाल में राजस्व में बढ़ौतरी देखने को मिल जायेगी। लेकिन सारी योजनाओं पर अपने हिस्से के निवेश के लिये कर्ज जरूर खड़ा हो जायेगा। भविष्य के लिए वर्तमान को किस हद तक गिरवी रखा जाना चाहिए यह सवाल सार्वजनिक बहस की मांग करता है। इस समय वित्तीय संकट से निपटने के लिये सबसे सरल रास्ता है कि सरकार अपनी लाखों कनाल उस जमीन को लूट से बचाये जो उस सीलिंग एक्ट के तहत मिली है। अकेले नादौन में ही एक लाख कनाल से अधिक की सरकारी जमीन लूट का शिकार बनी हुई है। सर्वाेच्च न्यायालय में स्व. इन्द्र सिंह ठाकुर द्वारा दायर एक मामले में एक समय प्रदेश सरकार ने स्वीकारा है कि उसके पास तीन लाख बीघे जमीन लैण्ड सीलिंग एक्ट में आयी है। लेकिन यह जमीन कहां है और इसका क्या उपयोग हो रहा है इसकी कोई जानकारी सरकार के पास नहीं है। यदि सरकार अपनी इन जमीनों को ही लूट से बचा ले तो शायद वह एक मुश्त कर्ज से छूट जाये। सरकारी जमीनों को यदि लूट से बचा लिया जाये तो प्रदेश का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।



अब जब वेतन भत्ते निलंबित करने की जानकारी अधिकारिक तौर पर सदन के पटल पर जा पहुंची है और नेता प्रतिपक्ष ने इसमें यह जोड़ दिया है कि कर्मचारियों को वेतन का भुगतान 5 तारीख को तथा पैन्शनरों को पैन्शन का भुगतान 10 तारीख को होने की जानकारी है तो उससे स्थिति और गंभीर हो गयी है। क्योंकि यह भी जानकारी आ गयी है कि कर्मचारियों के जीपीएफ पर भी सरकार कर्ज ले चुकी है। वैसे तो सरकार की बजट में दिखाई गई पूंजीगत प्राप्तियां जीपीएफ और लघु बचत आदि के माध्यम से जुटाया गया कर्ज ही होता है। लेकिन यह कर्ज कभी इस तरह से चर्चित नहीं होता था। वेतन भत्ते निलंबित करने का फैसला संबंधित लोगों का अपना फैसला है। इस पर सदन में कोई नीतिगत फैसला नहीं लिया जा सकता। शायद ऐसा फैसला सदन के पटल पर रखने की आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि दो माह बाद यह वेतन भत्ते एक साथ ले लिये जायेंगे। वेतन भत्तों के निलंबन से कोई स्थाई तौर पर राजस्व नहीं बढ़ेगा बल्कि यह जानकारी अधिकारिक तौर पर केन्द्र सरकार तक पहुंच जायेगी कि राज्य सरकार समय पर वेतन भत्तों का भुगतान करने की स्थिति में नहीं रह गयी है। केन्द्र इस स्थिति का अपने तौर पर आकलन करके संविधान की धारा 360 के तहत कारवाई करने तक की सोच सकता है।
दूसरी ओर प्रदेश के अन्दर राज्य सरकार के अपने खर्चों पर चर्चाएं चल पड़ेंगी। अभी यह सवाल उठने लग पड़ा है कि सरकार ने जो राजनीतिक नियुक्तियां कैबिनेट रैंक में कर रखी है उनका क्या औचित्य है। मुख्य संसदीय सचिवों के औचित्य पर सवाल खड़े होने लग पड़े हैं। अभी कामगार बोर्ड के अध्यक्ष का मानदेय 30 जुलाई को 30,000 से बढ़कर 1,30,000 कर दिया गया जबकि एक माह के भीतर ही निलंबन तक की स्थिति पहुंच गयी। इसी के साथ बड़ा सवाल तो यह खड़ा हो रहा है कि संसाधन बढ़ाने के नाम पर आम आदमी की सुविधाओं पर तो कैंची चला दी गयी परन्तु राजनेताओं की ओर तो आंख तक नहीं उठायी गयी। अभी प्रदेश सचिवालय के कर्मचारी आन्दोलन की राह पर है। सरकार की फिजूल खर्ची पहले ही उनके निशाने पर रह चुकी है। आगे यह आन्दोलन क्या आकार लेता है यह विधानसभा सत्र के बाद पता चलेगा। वेतन भत्तों के निलंबन से दो करोड़ की राहत मिलने का दावा किया गया है। यदि इस समय राजनीतिक नियुक्तियां पाये लोग स्वेच्छा से अपने पद त्याग दें तो प्रतिमाह इतनी बचत हो सकती है। क्योंकि आने वाले समय में कर्ज के निवेश को लेकर सवाल उठेंगे और तब यह कहना आसान नहीं होगा की कर्ज से कर्मचारियों के वेतन का भुगतान किया गया है। वेतन भत्तों के निलंबन की जानकारी सदन के पटल पर आना कहीं वितीय आपात का न्योता न बन जाये इसकी आशंका बढ़ती नजर आ रही है।
सुक्खू सरकार ने दिसम्बर 2022 में प्रदेश की सत्ता संभाली थी। सत्ता संभालते ही प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर जनता को चेतावनी दी थी की हालत कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं। इस चेतावनी के बाद पहले कदम के रूप में पिछली सरकार द्वारा अंतिम छः माह में लिये गये फैसले पलट दिये थे। पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाया। नगर निगम क्षेत्र में पानी गारबेज के रेट बढ़ाये। सरकार और मुख्यमंत्री को राय देने के लिए मुख्य संसदीय सचिवों, सलाहकारों और विशेष कार्याधिकारियों की टीम खड़ी की। सेवानिवृत नौकरशाहों की सेवाएं ली। सरकार पर उठते सवालों को व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र से शान्त करवा दिया। कर्ज लेने के जुगाड़ लगाये और हर माह करीब हजार करोड़ का कर्ज लेने की व्यवस्था कर ली। यह सब कर लेने के बाद अब पन्द्रह अगस्त को साधन संपन्न लोगों से प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये हर तरह की सब्सिडी त्यागने का आग्रह किया है। सरकार के घोषित/अघोषित सलाहकारों ने जन सुविधाओं पर अब तक चलाई गई कैंची को सधे हुए कदम करार देकर इसकी सराहना की है। कांग्रेस के अन्दर जो स्वर कल तक कार्यकर्ताओं की अनदेखी पर मुखर होते थे अब इस संद्धर्भ में एकदम चुप हैं। साधन संपन्नता की परिभाषा पचास हजार वार्षिक आय कर दी है। आज गांव में मनरेगा के तहत मजदूरी करने वाला भी इस आय वर्ग में आ जाता है। जिस सरकार को राजस्व बढ़ाने के लिये इस तरह के फैसले लेने पड़ जायें और उपाय सुझाने के लिए एक मंत्री स्तरीय कमेटी गठित हो उसके चिन्तन और चिन्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार सत्ता में है और उसे कार्यकाल तक सहना ही पड़ेगा।
सरकार के इन उपायों पर सवाल उठाने का कोई लाभ नहीं है। क्योंकि ऐसे फैसले राजनीतिक समझदारी से ज्यादा प्रशासनिक तंत्र की प्रभावी भूमिका की झलक प्रदान करते हैं। इन फैसलों की कीमत आने वाले वक्त में जनता और सत्ताधारी दल को उठानी पड़ेगी प्रशासनिक तंत्र को नहीं। यह फैसले उस समय स्वतः ही बौने हो जाते हैं जब सरकार पर उठने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का आकार इनसे कहीं बड़ा हो जाता है। नादौन में ई-बस स्टैंड के लिये 6,82,04 520/- रुपए में खरीदी गयी जमीन के दस्तावेज इसका बहुत बड़ा प्रमाण है। भ्रष्टाचार के इस मामले पर प्रशासनिक तंत्र राजनीतिक नेतृत्व और विपक्ष सब एक बराबर जिम्मेदार हैं। ऐसे में राजस्व आय बढ़ाने के लिये जनता की सुविधाओं पर कैंची चलाकर किये गये उपायों की विश्वसनीयता क्या और कितनी होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदेश को बिजली राज्य बनाने की योजनाओं का आज कितना लाभ मिल रहा है? यही सवाल पर्यटन राज्य बनाने की योजनाओं पर है? पूरी उद्योग नीति पर उस समय स्वतः ही सवाल उठ जाते हैं जब यह सामने आता है कि उद्योगों की भेंट प्रदेश की वित्त निगम, खादी बोर्ड, एक्सपोर्ट निगम और एग्रो पैकेजिंग आदि कई निगमें भेंट चढ़ चुकी है और कई कगार पर खड़ी हैं।
हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने के लिये यहां की कृषि और बागवानी तथा वन संपदा को बढ़ाने की आवश्यकता है। लेकिन इस और ध्यान दिया ही नहीं गया। स्व. डॉ. परमार की त्रीमुखी वन खेती की अवधारणा शायद आज के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र के लिए एक पहेली होगी। इसी अवधारणा को मजबूत आधार प्रदान करने कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी। इन विश्वविद्यालयों के अनुसंधान को खेत तक ले जाने का प्रयास सरकारों ने नहीं किया क्योंकि प्रशासन को मेहनत करनी पढ़नी थी। बागवानी विश्वविद्यालय ने एक अनुसंधान में यह दावा किया था कि इससे प्रदेश की आर्थिकी में पांच हजार करोड़ का बढ़ावा होगा। जिस पर कोई कदम नहीं उठाये गये। ऐसे ही कई अनुसंधान कृषि विश्वविद्यालय के रहे हैं। प्रदेश में जियोट्राफा के उत्पादन से डीजल तैयार करने की तीस करोड़ की योजना केंद्र से मिली थी। ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन और सिरमौर के निचले क्षेत्र शामिल किये गये थे। ऊना में कुछ लोगों की निजी भूमि पर भी जियोट्रोफा की खेती कर दी गयी। यदि उस योजना पर ईमानदारी से अमल किया जाता तो उसी से प्रदेश का नक्शा बदल जाता। लेकिन इसमें ठेकेदारी और कमीशन की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसलिये शुरू होते ही इसका गला घोंट दिया गया। विधानसभा में इस पर आये सवालों पर चुप्पी साध ली गयी। इस योजना का जिक्र इसलिये कर रहा हूं ताकि आज नेतृत्व भविष्य के नाम पर वर्तमान को गिरवी रखने की मानसिकता से बाहर निकल कर ईमानदारी से प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को बढ़ावा देकर उसे खेत तक ले जाने का ईमानदारी से प्रयास करे। यदि कृषि विश्वविद्यालय की जमीन पर टूरिज्म विलेज बसाने का प्रयास किया जायेगा तो उसके परिणाम कर्ज के चक्रव्यूहं को और मजबूत करना होगा।
हिमाचल प्रदेश में इस बार फिर प्राकृतिक आपदा ने कहर बरसाना शुरू कर दिया है। अभी पिछले वर्ष आर्यी आपदा के जख्म अभी भरे भी नहीं है कि फिर इस आपदा ने प्रदेश को ग्रस लिया है। जब आपदा आती है तो सबसे पहले सरकारी तंत्र का पूरा ध्यान उस ओर केंद्रित हो जाता है। हिमाचल की सुक्खू सरकार ने पिछले वर्ष भी आपदा प्रबंधन पर पूरा ध्यान केंद्रित कर आपदा में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकलने में लगा दिया था और इस बार भी। आपदा में कुल कितना नुकसान हुआ और उसकी भरपाई किन-किन साधनों से की गयी। राज्य सरकार ने अपने साधनों से क्या किया। केंद्र ने कितना सहयोग दिया और जनता ने कितना दिया। इस सबके आंकड़ों पर चर्चा करने से राजनीति तो हो सकती है और शायद हो भी रही है। लेकिन इस चर्चा से कुदरत पसीज नहीं रही है उसका कहर अपनी जगह जारी है। वैसे तो प्रदेश में अनुपाततः वर्षा कम हुई है जिसका असर भविष्य में अलग रूपों में देखने को मिलेगा। लेकिन यह लगने लगा है कि शायद अब हर बरसात में ऐसा ही भोगना पड़ेगा। पर्यावरण विशेषज्ञ इस आपदा को कुदरत का कहर मानने की बजाये इसे मानव निर्मित त्रासदी की संज्ञा दे रहे हैं और यही चिंता और चिंतन का सबसे बड़ा विषय है।
हिमाचल का अधिकांश हिस्सा गहन पहाडी क्षेत्र है। गलेशियरो का प्रदेश है। हर पहाड़ पानी का स्त्रोत है । नदी, नालों का प्रदेश है। इसी पानी की बहुलता और पहाड़ों के नैर्संगिक सौंदर्य से प्रभावित होकर इसे बिजली ऊर्जा राज्य के रूप में प्रचारित प्रसारित किया गया। हर छोटे-बड़े नदी नाले का अध्ययन हुआ और बिजली उत्पादन की क्षमताओं के आंकड़े आते चले गये। चंबा से लेकर सिरमौर तक 504 छोटी बड़ी विद्युत परियोजना चिन्हित हो गई। यह प्रचारित हो गया कि हिमाचल इस बिजली के सहारे ही आत्मनिर्भर राज्य बन जाएगा। विद्युत परियोजनाओं में हिमाचल सरकार केंद्र सरकार और प्राइवेट सैक्टर सब कूद पड़े। इन परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ काट दिए गए। हैडटेल श्रृंखला में दरियाओं का वास्तविक प्रभाव की बदल दिया गया। चंबा में 65 किलोमीटर तक रावी अपने मूल प्रवाह रूट से ही गायब है। अवय शुक्ला की रिपोर्ट में यह सब दर्ज है। परियोजना निर्माताओं के लिए यह अनिवार्य किया गया था कि वह जितने पेड़ काटेंगे उसके 10 गुना उन्हें लगाने पड़ेंगे। लेकिन आज तक इसकी कोई रिपोर्ट नहीं आयी है कि वास्तव में कटे पेड़ों की जगह कितने नए पेड़ लगाए गए हैं। जहां पर स्थानीय लोगों ने किसी परियोजना का विरोध किया तो उस विरोध को कुचल दिया गया। इन परियोजनाओं से जो पर्यावरणीय बदलाव पैदा हुए हैं आज हो रहे नुकसान का शायद पहला मूल कारण यह परियोजनाएं है। फिर इन परियोजनाओं के आधारभूत ढांचा खड़ा करने और दूसरे उपादान देने में जितना निवेश सरकारें कर चुकी है उसके अनुपात में इनसे मिला रोजगार और राजस्व बहुत कम रह जाता है। आज जहां-जहां बादल फटे हैं उसके आसपास कोई न कोई परियोजना स्थल आवश्यक है जो इस तथ्य की पुष्टि करता है। कैग रिपोर्टों के सारे आंकड़े उपलब्ध है। बिजली बोर्ड और दूसरी पावर कॉरपोरेशन जिस घाटे में चल रही है वह भी इसी दिशा में सवाल उठता है।
विद्युत के साथ ही प्रदेश को आदर्श पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना तैयार हो रही है । शहरों से गांवों की ओर होमस्टे की अवधारणा को कार्यरूप दिया जा रहा है। देवी देवताओं की भूमि में हर देवस्थान को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने पर काम शुरू हो गया है। इसके लिए अपेक्षित अधोसंरचना तैयार करने में पर्यावरण का संतुलन बिगड़ना स्वभाविक है जिसका अंतिम परिणाम भूस्खलनों के रूप में देर सुबह सामने आयेगा। शिमला सहित सारे पर्यटक स्थलों को जिस तरह से कंकरिट के जंगल में बदल दिया गया है उसको लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक प्रदेश सरकारों को फटकार लगा चुका है। एन.जी.टी. ने तो शिमला से राजधानी को भी किसी दूसरे स्थान पर ले जाने के निर्देश दे रखे हैं लेकिन सरकार पर इन निर्देशों का कोई असर नहीं है। आज सरकारें सिर्फ अपना कार्यकाल किसी न किसी तरह पूरा करने के सोच से आगे बढ़ ही नहीं रही है। शिमला में एक समय रिटैन्शन पॉलिसीयों पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाए थे जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया और अब राजधानी शिफ्ट करने के निर्देशों तक की बात पहुंच चुकी है जिस पर अमल नहीं किया जायेगा। शिमला को इस समय जिस तरह से लोहे के जंगल में बदला जा रहा है उससे इसको लेकर आ चुकी भूकंप की चेतावनियां तो नहीं बदल जायेगी। अगर इन आपदाओं से आज कोई सबक नहीं लिया जाता है तो भविष्य में और भी बड़े संकटों के लिए तैयार रहना होगा ।
नीति आयोग का गठन केन्द्र सरकार ने 2015 में योजना आयोग के पूरक के रूप में किया है। भारत सरकार का यह सर्वाेच्च सार्वजनिक नीति थिंक टैंक है। यह संस्थान भारत की राज्य सरकारों को इसमें शामिल करके आर्थिक विकास और सरकारी संघवाद को बढ़ावा देने के लिये काम करता है। इसके उद्देश्य में सात वर्षीय विभिन्न रणनीति, पन्द्रह वर्षीय रोड मैप और कार्य योजना, अमृत डिजिटल इंडिया, अटल इन्नोवेशन मिशन और चिकित्सा शिक्षा सुधार और कृषि सुधार शामिल हैं। प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र शासित राज्यों के उप-राज्यपाल तथा कुछ विषय विशेषज्ञ इसके सदस्य हैं। अभी केन्द्र का बजट आने के बाद नीति आयोग की बैठक बुलाई गयी थी। कांग्रेस समेत विपक्ष ने इस बैठक के बहिष्कार का फैसला लिया क्योंकि बजट में बिहार और आंध्र प्रदेश को नामत कुछ आर्थिक आबंटन हुआ है। बाकी राज्यों को नामत कोई आबंटन न होने से बहिष्कार का फैसला लिया गया। लेकिन ममता इस फैसले के बावजूद बैठक में शामिल हुई और बीच में ही उठकर चली गयी। यह आरोप लगाया कि उन्हें बोलने का पूरा मौका नहीं दिया गया। विपक्ष ने सामूहिक रूप से समय न दिये जाने की निंदा की है। परन्तु कांग्रेस के ही अधीरंजन ने ममता को झूठी करार दे दिया। इसी तरह हिमाचल के मुख्यमंत्री भी बजट से पहले दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और भूतल परिवहन मंत्री से मिले थे। इन मुलाकातों में प्रदेश के लिये आर्थिक सहायता की मांगे रखी गयी थी। इन मुलाकातों के बाद बजट आया है। केंद्रीय राज्य मंत्री ने शिमला में एक पत्रकार वार्ता में खुलासा किया है कि केंद्रीय बजट में प्रदेश को 13351 करोड़ मिले हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों, सूरंगों और रेलवे विस्तार के लिये प्रदेश को एक मिले आबंटन की डिटेल रखी गयी है। केंद्रीय राज्य मंत्री के दावे के मुख्य मन्त्री के प्रधान सलाहकार मीडिया ने रश्मि तौर पर सवाल उठाये हैं। मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के राष्ट्रीय फैसले के तहत नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार किया है। लेकिन इसी मुख्यमुत्री ने कॉमनवेल्थ मीट के अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा आयोजित भोज में शिरकत की थी जबकि कांग्रेस के दूसरे मुख्यमंत्री इसमें शामिल नहीं हुये थे। तब इस शामिल होने को प्रदेश हित करार दिया गया था। निश्चित तौर पर नीति आयोग की बैठक का आयोजन भोज के आयोजन से प्रदेश हित में एक बड़ा अवसर था। प्रदेश के भविष्य का सवाल था। इस बैठक में शामिल होकर प्रदेश की वित्तीय स्थिति का सर्वाेच्च नीति थिंक टैंक के फोरम पर आधिकारिक तौर पर विवरण रखा जा सकता था लेकिन ऐसा हो नहीं सका। नीति आयोग योजना आयोग के पूरक के रूप में एक सर्वाेच्च नीति निर्धारण मंच है। इस मंच पर प्रदेश की समस्याओं का आधिकारिक रूप से रखा जाना आवश्यक था। क्योंकि सुक्खू सरकार को सत्ता में आये डेढ़ वर्ष का समय हो गया है। विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश की जनता को दस गारंटीयां दी गया थी। यह गारंटीयां देते हुये कोई किन्तु-परन्तु नहीं लगाये गये थे। सरकार के गठन के साथ ही मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों और उसके बाद कैबिनेट रैंक में सलाहकारों और विशेष कार्य अधिकारियों की नियुक्ति कुछ ऐसे फैसले रहे हैं जिनसे यह कतई संदेश नहीं जाता कि प्रदेश में वित्तीय संकट है। लेकिन आज जिस तरह से जनता को पहले से मिले आर्थिक लाभों पर कैंची चलाई जा रही है उससे यह संदेश गया है कि सरकार वित्तीय संकट से गुजर रही हैं। लेकिन अब तक के कार्यकाल में ही जितना कर्ज ले लिया गया है उस गति से कार्यकाल के अन्त तक यह आंकड़ा पूर्व सरकारों द्वारा लियेे गये कर्ज के आंकड़े से भी बढ़ जायेगा। इसलिये आज कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प बनने के लिये अपनी सोच और कार्यशैली दोनों पर पुनःविचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि इस समय कांग्रेस की राज्य सरकारों की परफॉरमैन्स पर जनता अपना एक स्पष्ट मत बना पायेगी। क्योंकि इस समय हिमाचल की सरकार की कार्य प्रणाली से यह संदेश नहीं जा पा रहा है कि कांग्रेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है। नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार वास्तविक रूप से भगाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।