Wednesday, 04 February 2026
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प्रदेश का वित्तीय संकट कुछ सवाल

इस समय हिमाचल जिस वित्तीय मुकाम पर आ पहुंचा है उसमें कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े हुये हैं जिनको और अधिक समय के लिए नजरअन्दाज कर पाना संभव नहीं होगा। आज प्रदेश के हर व्यक्ति पर 1.17 लाख का कर्ज है। बेरोजगारी में प्रदेश देश के छः राज्यों की सूची में आ पहुंचा है। सरकार को हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। बल्कि इस कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लिया जा रहा है। कर्मचारियों के वेतन और पैन्शन का ही प्रतिमाह प्रतिबद्ध खर्च करीब 2000 करोड़ है। सरकार अप्रैल से दिसम्बर तक केवल 6200 करोड़ का ही कर्ज ले सकते हैं और यह सीमा पूरी हो चुकी है। जनवरी से मार्च की तिमाही में कितना कर्ज मिल पायेगा यह आगे फैसला होगा। पिछले वर्ष 2023-24 में जनवरी से मार्च के बीच केवल 1700 करोड़़ मिला था। अगले वर्ष कर्ज की सीमा 6200 करोड़ से कम रहेगी। इस गणित से यदि जनवरी से मार्च में 1700 करोड़ भी मिल जाता है तब भी गुजारा नहीं हो पायेगा क्योंकि वेतन और पैन्शन के लिये ही प्रतिमाह 2000 करोड़ चाहिए। इस वस्तुस्थिति से स्पष्ट हो जाता है कि वित्तीय संकट का आकार कितना बड़ा है और इसके परिणाम कितने गंभीर होंगे। इस वस्तुस्थिति में यह सवाल उठता है कि इस संकट के लिये जिम्मेदार कौन है? हिमाचल में 1977 के बाद उद्योगों को प्रदेश में आमंत्रित करने की योजना बनाई गई। इस योजना के तहत औद्योगिक क्षेत्र चिह्नित किये गये। उद्योगों को हर तरह की सब्सिडी दी गई। प्रदेश की वित्त निगम से कर्ज दिया गया। खादी बोर्ड ने भी इसमें सहयोग दिया। लेकिन आज इन उद्योगों की सहायता करने वाले वित्त निगम और खादी बोर्ड जैसे आदारे खुद डूब चुके हैं। इन्हें अपने कर्जदारों को ढूंढने के लिये इनाम योजनाएं तक लानी पड़ी। अधिकांश उद्योगों का आज पता ही नहीं है कि वह कहां है। सस्ते बिजली की उपलब्धता, सस्ती जमीन की उपलब्धता और सब्सिडी मिलने के नाम पर स्थापित हुए उद्योगों का व्यवहारिक सच यह है कि जितनी भी सब्सिडी राज्य और केन्द्र से इन्हें दी जा चुकी है उसका आंकड़ा उनके मूल निवेश से कहीं ज्यादा है। कैग रिपोर्ट और उद्योग विभाग की अपनी रिपोर्ट में यह दर्ज है। रोजगार के नाम पर भी इनका आंकड़ा सरकार के रोजगार से कहीं कम है। उद्योग की सफलता के दो मूल मानक हैं कि या तो क्षेत्र में कच्चा माल उपलब्ध हो या तैयार माल का उपभोक्ता हो। परन्तु हिमाचल में यह दोनों ही स्थितियां नहीं है। इसलिये यह उद्योग प्रदेश पर भारी पड़ रहे हैं। सरकार की थोड़ी सी सख्ती से पलायन पर आ रहे हैं। उद्योगों के साथ ही हिमाचल को पर्यटन हब बनाने की कवायत शुरू हुई। इसमें होटल उद्योग आगे आया। इसके लिए जमीन खरीद को आसान बनाने के लिए धारा 118 में कई रियायतें दी गई। जिस पर एक समय हिमाचल ऑन सेल के आरोप तक लगे। इन आरोपों की जांच के लिये तीन बार जांच आयोग गठित हुई है। लेकिन आयोग की जांच रिपोर्ट पर क्या कारवाई हुई है कोई नहीं जानता। पर्यटन के साथ ही हिमाचल को बिजली राज्य बनाने की मुहिम चली। प्राइवेट सैक्टर को इसमें निवेश के लिए आमंत्रित किया गया। बिजली बोर्ड से प्रोजेक्ट लेकर प्राइवेट निवेशों को दिये गये। इनमें जो बिजली बोर्ड का निवेश हो चुका था उसे ब्याज सहित लौटाने के अनुबंध हुये। परन्तु यह निवेश वापस नहीं आया। कैग की प्रतिकूल टिप्पणीयांे का भी कोई असर नहीं हुआ। जल विद्युत परियोजनाओं के कारण पर्यावरण का जो नुकसान हुआ है उस पर अभय शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। पिछले दिनों जो प्राकृतिक आपदाएं प्रदेश पर आयी थी। बादल फटने की घटनाएं इसका कारण भी इन परियोजनाओं का क्षेत्र ही ज्यादा रहा है। जिस बिजली उत्पादन से प्रदेश की सारी आर्थिक समस्याएं हल हो जाने का सपना देखा गया था। आज उसी के कारण प्रदेश का संकट गहराता जा रहा है। हिमाचल की करीब 60% जनसंख्या कृषि और बागवानी पर निर्भर है। लेकिन इसके लिए कोई कारगर योजनाएं नहीं हैं। एक समय स्व.डॉ. परमार ने त्री मुखी वन खेती की वकालत की थी। इसी के लिए बागवानी और कृषि विश्वविद्यालय स्थापित हुये थे लेकिन आज इनकी रिसर्च को खेत तक ले जाने की कोई योजनाएं नहीं है। यदि 60% जनसंख्या को हर तरह से आत्मनिर्भर बना दिया जाये तो प्रदेश का संकट स्वतः ही हल हो जायेगा। वोट के लिये छोटे-छोटे वोट बैंक बनाने और उन्हें मुफ्ती का लालच देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके लिए सरकार को ठेकेदारी की मानसिकता से बाहर आना होगा।

हार के लिये ईवीएम कब तक जिम्मेदार रहेगी

महाराष्ट्र में कांग्रेस शिवसेना उद्धव ठाकरे और एनसीपी का गठबंधन विधानसभा चुनाव हार गया है। लोकसभा चुनाव में जितनी सफलता इस गठबंधन को मिली थी उसको सामने रखते हुये विधानसभा का परिणाम गठबंधन के लिये एक शर्मनाक हार है। इस हार के लिये एक बार फिर चुनाव आयोग और उसकी ईवीएम मशीनों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा है। जबकि इसी आयोग और इन्हीं मशीनों के चलते झारखण्ड में भाजपा की करारी हार हुई है। हरियाणा में भी हार के लिये ईवीएम मशीनों पर दोष डाला गया था। हरियाणा में इस संबंध में लम्बे चौड़े सबूत जुटाकर चुनाव आयोग से शिकायत की गयी थी। लेकिन चुनाव आयोग ने जो जवाब दिया वह एक तरह से कांग्रेस पर ही प्रहार था। आयोग के जवाब के बाद मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंचा दिया गया है। ईवीएम मशीनों और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लम्बे समय से सवाल उठते आ रहे हैं। इन सवालों की शुरुआत भी एक समय भाजपा ने ही की थी जब वह विपक्ष में थी। हर चुनाव के बाद ईवीएम मशीनों पर सवाल उठते आये हैं। सवाल भी गंभीर होते हैं। सवालों के साथ प्रमाण भी सौंप जाते हैं। लेकिन चुनाव आयोग से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक ने इन्हें सही नहीं माना है। हरियाणा और महाराष्ट्र में मशीनों की बैटरी चार्जिंग के आरोप लगे हैं। इन आरोपों को लेकर आम आदमी भी आयोग की कार्यप्रणाली पर सन्देह करने लग गया है। लेकिन चुनाव आयोग और ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने के बावजूद किसी भी दल ने आज तक इस मुद्दे पर चुनाव का बहिष्कार नहीं किया है।
देश में उन्नीस लाख ईवीएम मशीने गायब होने की जानकारी एक आरटीआई के माध्यम से सामने आयी थी। मामला पुलिस और अदालत तक भी पहुंचा। लेकिन संसद में कभी इस पर प्रश्न नहीं आये और न ही यह किसी नियोजित सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना। चुनाव परिणामों पर सवाल उठ रहे हैं। मतदान खत्म होते ही जो आंकड़े जारी किये जाते हैं वही आंकड़े मतगणना के समय बदल जाते हैं यह तथ्य भी जनता के सामने आ चुके हैं। बाहर हर देश मत पत्र से चुनाव करवाने लग गया है। हमारे यहां भी पूरी चुनावी प्रक्रिया में लम्बा समय लगता आ रहा है। मत पत्र से चुनाव न करवाने का तर्क दिया जाता है कि परिणाम घोषित करने में चार-पांच दिन की देरी हो जायेगी। जब पूरी प्रक्रिया में लम्बा समय लगाया जा रहा है। कई-कई चरणों में चुनाव करवाये जा रहे हैं तब यदि परिणाम घोषित करने में एक सप्ताह का समय और लग जाता है तो उससे किसी का भी नुकसान होने वाला नहीं है। फिर जब मशीन के साथ वी वी पैट लगा हुआ है और उस पर बाकायदा पर्ची सामने आ जाती है तो उसे गिनने में कितना समय और लग जायेगा। इस समय जिस तरह का विश्वास पूरी चुनाव प्रक्रिया पर उभर रहा है। वह कालान्तर में पूरी व्यवस्था के लिए घातक होगा। ऐसे में राजनेताओं को ईवीएम को संसद से लेकर सड़क तक मुद्दा बनाकर जनता के बीच आना होगा। चुनावों के बहिष्कार करने तक आना होगा। जब इस तरह की स्थिति पूरे देश में एक साथ बनेगी तभी मशीन की जगह मत पत्रों पर बात आयेगी। यदि राजनेता और राजनीतिक दल ऐसा करने के लिये तैयार न हों तो उन्हें हर हार के बाद ईवीएम पर दोष डालने का कोई अधिकार नहीं रह जाता है।
इसी के साथ राजनीतिक दलों को अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिये अपनी राज्य सरकारों की परफॉरमैन्स पर भी ध्यान देना होगा। अभी हरियाणा के चुनावों में प्रधानमंत्री ने हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स को मुद्दा बनाया। कांग्रेस जवाब नहीं दे पायी क्योंकि तथ्यों पर आधारित था सब कुछ। अब महाराष्ट्र में भी हिमाचल को प्रधानमंत्री ने मुद्दा बनाया। इसका जवाब देने मुख्यमंत्री महाराष्ट्र गये। फिर मुख्यमंत्री का जवाब देने प्रदेश भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री नेता प्रतिपक्ष और दूसरे नेता महाराष्ट्र जा पहुंचे। इस तरह मुख्यमंत्री के दावों पर विश्वास नहीं बन पाया और परिणाम सामने है। हिमाचल आज पूरे देश में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। यदि कांग्रेस ने समय रहते स्थितियों में सुधार नहीं किया तो फिर कुछ भी हाथ नहीं आयेगा।

प्रैस के बदलते स्वरूप में कुछ सवाल

इस बार राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर चर्चा का विषय था प्रैस का बदलता स्वरूप। इस चर्चा के लिये संवाद गोष्ठी का आयोजन पहले की तरह सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने किया। परन्तु इस बार विभाग ने इस संवाद गोष्ठी के लिये सारे पत्रकारों को आमंत्रित और सूचित करना भी आवश्यक नहीं समझा। इसी से पता चलता है कि सही में प्रैस के प्रति इस सरकार की सोच और समझ क्या है। इस सरकार को सत्ता संभाले दो वर्ष होने जा रहे हैं। इन दो वर्षों में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से लेकर विभाग के निदेशक सचिव मीडिया सलाहकार और प्रभारी मंत्री किसी ने भी मीडिया कर्मियों से कोई औपचारिक बैठक नहीं की है जिसमें मीडिया कर्मी अपनी बात सरकार के सामने रख पाते। बल्कि सरकार ने व्यवहारिक रूप से जिस तरह से पत्रकारों के खिलाफ पुलिस तंत्र का प्रयोग करना शुरू किया है वह पिछली सरकारों से भी कहीं ज्यादा आगे चला गया है। अखबारों के विज्ञापन बन्द करने से लेकर उनके अवासों के किराए में पांच गुना तक बढ़ौतरी कर दी गयी। सरकार के इस चलन से स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार मीडिया को गोदी मीडिया बनाकर रखने का हर संभव प्रयास कर रही है। क्योंकि समाचारों पर स्पष्टीकरण जारी करने या मानहानि के मामले दायर करने की जगह जब सरकार और उसका तंत्र पुलिस का प्रयोग करने पर आ जाता है तो स्पष्ट हो जाता है कि सरकार हर तरीके से प्रैस को डरा धमका कर रखना चाहती है। इस अवसर पर यह सब इसलिये लिखना आवश्यक हो गया है क्योंकि प्रैस के बदलते स्वरूप के बीच पत्रकारों से पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने का आग्रह किया गया है। पत्रकार हर सरकार का स्थाई विपक्ष माना जाता है। यह पत्रकार को तय करना होता है कि उसने सरकार का रिपोर्ट बनकर सरकार का ब्यान यथास्थिति आम आदमी के सामने रखना है या आम आदमी के लिये सरकार सेे तीखे सवाल करने हैं। क्योंकि सरकार का गुणगान करने के लिये इतना बड़ा विभाग कार्यरत है। हर मंत्री के साथ विभाग के लोग अटैच रहते हैं। हर सार्वजनिक उपक्रम में लोक संपर्क की इकाई स्थापित रहती है। सरकार के पास अपनी बात आम आदमी तक पहुंचाने के लिए दर्जनों साधन हैं। परन्तु आम आदमी के पास उसके सवाल सरकार से पूछने के लिये पत्रकार के अतिरिक्त और कोई नहीं है। जिस सरकार को अपने हर फैसले पर स्पष्टीकरण देने पड़े उन्हें संयोजित करना पड़े उस सरकार से कितने सवाल पूछे जाने चाहिए? उसके हर दावे पर क्या सवाल नहीं उठ रहे हैं। इसलिए जब कोई पत्रकार आम आदमी का पक्ष लेकर सरकार से सवाल करेगा तो उसे सरकार की ताकत के साथ टकराने का साहस रखना ही होगा। एक समय था जब सरकारें लोक लाज से डरती थी। लेकिन आज यह लोक लाज कोई सवाल ही नहीं बचा है। आज तो सत्ता में आकर पांच साल तक सत्ता सुख कैसे भोगना इसका जुगाड़ बैठाने की योजनाएं बनाने में ही समय निकल जाता है। आज तो विपक्ष और सत्ता पक्ष में विरोध प्रदर्शन एक रस्म अदागी से अधिक कुछ नहीं रह गया है। एक समय सरकारें भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करती थी। विपक्ष सत्ता पक्ष के खिलाफ राज्यपाल को आरोप पत्र सौंपता था और सत्ता में आकर उस पर जांच की जाती थी। लेकिन अब व्यवस्था परिवर्तन में भ्रष्टाचार पर कोई बड़ा दावा करना भूतकाल की बात हो गया है। अब तो यदि कोई पत्रकार भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने का साहस करता है तो सबसे पहले उसी के खिलाफ पुलिस बल के प्रयोग का प्रयोग शुरू हो जाता है। व्यवहारिक रूप से बदल रहे इस स्वरूप के बीच भी पत्रकारिता के मूल्य की रक्षा करना सही में एक चुनौती है। शैल का अपने पाठकों से वायदा है कि हम इस चुनौती से डरेंगे नहीं और आम आदमी के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

एकाधिकार पर राहुल गांधी की चिंताएं और कुछ सवाल

पिछले एक दशक में जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की सत्ता संभाली है तेईस सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह प्राइवेट सैक्टर के हवाले कर दिये गये हैं। विनिवेश योजना के तहत बैंकिंग, एलआईसी, रेलवे एयरपोर्ट में भी काफी हिस्सा प्राइवेट को देने की योजना है। विनिवेश के तहत कुछ प्राइवेट कंपनियां बाजार पर एकाधिकार स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हैं। कुछ कंपनियों का करीब दस लाख करोड़ का एनपीए बट्टे खाते में डाल दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अब तक के कार्यकाल में एक भी सार्वजनिक उपक्रम की स्थापना नहीं की है। सार्वजनिक उपक्रमों को विनिवेश के तहत प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने का रोजगार पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इस समय केन्द्र सरकार में करीब एक करोड़ पद खाली हैं। कंपनियों के एनपीए को बट्टे खाते में डालने से करीब दस लाख करोड़ की चपत सरकार को लगी है और इसका पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। 2014 में जब डॉ. मनमोहन सिंह ने सत्ता छोड़ी और नरेन्द्र मोदी ने संभाली तब देश का कुल 55 लाख करोड़ का कर्ज था। जो अब 2024 में आरबीआई के मुताबिक 155 लाख करोड़ हो गया है। इस बढ़ते कर्ज के साथ ही जो लोग बैंकों को धोखा देकर विदेश भाग गये हैं उनमें से किसी को भी यह सरकार अभी तक वापस नहीं ला पायी है। इस सब का देश की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। इस प्रभाव पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एक अरसे से चिन्ता व्यक्त करते आ रहे हैं। उनकी इस चिन्ता में कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी उनके साथ शामिल रहे हैं।
देश की आर्थिक स्थिति का यह गंभीर पक्ष है जिस पर एक सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। राहुल गांधी जब से इन एकाधिकार के प्रयासों में लगी कंपनियों के खिलाफ मुखर हुये हैं देश की जनता ने उनकी चिताओं को समझ कर कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष के पद तक पहुंचा दिया है। राहुल गांधी की चिंताएं जायज हैं और भविष्य के गंभीर प्रश्न हैं। क्योंकि एकाधिकार कहीं पर भी किसी का भी कालांतर में घातक ही सिद्ध होता है। बाजार में इस तरह के प्रयास और वह भी सरकार की नीयत और नीतियों से पोषित हों तो पूरे देश के लिये उसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकते। लेकिन राहुल की चिताओं के साथ कुछ प्रश्न भी स्वतः ही खड़े हो जाते हैं। क्योंकि राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिये मतदाताओं से ऐसे मुफ्ती के वायदे कर रहे हैं जिनमें से एक दो को भी पूरा करने के लिये पूरा बजट गड़बड़ा जाता है। मुफ्ती के वायदों को पूरा करने के लिये या तो जनता पर प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष करों का बोझ डालना पड़ता है या फिर कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। इस समय कांग्रेस केन्द्र में सत्ता में नहीं है। केवल तीन राज्यों में उसकी सरकारें हैं। ऐसे में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि कांग्रेस की यह सरकारें राहुल के मानकों पर कितना खरा उतर रही हैं। क्योंकि कंपनी के एकाधिकार का विकल्प केवल सरकार होती है। जब कोई सरकार कोई भी सेवा प्रदान करने के लिये आउटसोर्स के नाम पर प्राइवेट कंपनी का रुख करती है तो एकाधिकार का सारा विरोध अर्थहीन हो जाता है। सरकारें अपने प्रतिबद्ध खर्चे कम करने के लिये सरकार में कर्मचारियों की भर्ती करने के स्थान पर आउटसोर्स का रास्ता अपना रही है। हर सेवा और उत्पादन में प्राइवेट सैक्टर का रुख किया जा रहा है। कर्ज सरकार के नाम पर और भरपाई जनता से सेवा प्रदान करने के नाम पर के चलन को जब तक नहीं रोका जायेगा तब तक यह एकाधिकार का विरोध केवल कागजी ही रहेगा। क्योंकि आज तो सरकारें कर्ज लेकर होटल का निर्माण करके उसे चलाने के लिए प्राइवेट सैक्टर के हवाले कर देती हैं। क्या प्राइवेट सैक्टर को स्वयं कर्ज लेकर स्वयं निर्माण करके होटल स्वयं नहीं चलना चाहिये? यही स्थिति शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हो रही है। सरकार एक तरह से बड़े सरमायेदार के एजैन्ट की भूमिका तक ही रह गयी है। राहुल गांधी को इस मुद्दे पर अपनी राज्य सरकारों को निर्देशित करके प्राइवेट सैक्टर के दखल को कम करने का प्रयास करना चाहिये।

क्या ऐसा सांई विरोध जायज है?

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज ने गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करवाने के लिये 22 सितम्बर 2024 को अयोध्या धाम पहुंचकर रामकोट की परिक्रमा करके भारत यात्रा का कार्यक्रम शुरू किया है। इस यात्रा में पूर्वाेत्तर के राज्यों में गौ प्रतिष्ठिा ध्वज की स्थापना की जा चुकी है। महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करके इस आशय का अपनी सरकार का प्रस्ताव जगद्गुरु को सौंप चुके हैं। इस यात्रा की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस यात्रा में देश के सभी राज्यों में जगद्गुरु जाएंगे और सभी जगह गौ ध्वज की स्थापना करके गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग करेंगे। इसी यात्रा की कड़ी में जब जगद्गुरु शिमला पहुंचे तो यहां पर राम मंदिर में गौध्वज स्थापना का कार्यक्रम था परन्तु जैसे ही जगद्गुरु को यह सूचना मिली कि राम मंदिर में तो सांई की मूर्ति स्थापित है तो वह इससे नाराज हो गये और राम मंदिर के कार्यक्रम का बहिष्कार करके हनुमान मंदिर जाखू में गौध्वज की स्थापना की गयी। जब राम मंदिर की संचालन समिति ने यह आश्वासन दिया कि वह मंदिर से सांई की मूर्ति हटा देंगे तब जगद्गुरु ने अपने प्रतिनिधि भेज कर वहां भी गौध्वज की स्थापना की। इस अवसर पर अपने उद्बोधन में शंकराचार्य ने कहा कि सरकार गौ माता को राष्ट्रीय माता घोषित करे। हिंदू समाज केवल गौ रक्षक पार्टियों को ही वोट दे। गौ हत्यारी पार्टियों को वोट देकर गौ हत्या का पाप न ले। जिस दिन गौ हत्या रुक जायेगी उस समय हमारा कर्ज उतरना शुरू हो जायेगा।
पूरे देश में श्री सांई को मानने वालों की संख्या करोड़ों में है और सभी धर्मों और जातियों के लोगों की आस्था सांई में है। आस्था बनने के हरेक के व्यक्तिगत आधार होते हैं। ऐसे में यदि सांई में किसी की आस्था है तो क्या इस आस्था को ऐसे बहिष्कार से तोड़ा जा सकता है। शायद नहीं। जगद्गुरु शंकराचार्य का धर्म में एक शीर्ष स्थान है। हरेक धार्मिक मतभेद में शंकराचार्य का निर्णय सर्वोपरी और अंतिम होता है। लेकिन आस्था कोई धार्मिक प्रश्न नहीं है। यह एक विशुद्ध वैयक्तिक विषय है। गौ माता की हत्या नहीं होनी चाहिये। गौ माता एक धार्मिक प्रतीक भी है। गौ माता को राष्ट्र माता घोषित किये जाने की मांग एक राजनीतिक प्रश्न है। क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। यदि सरकार हिन्दू समाज की एक मांग को अधिमान देती है तो उसी गणित से अन्य धर्म को मानने वालों की मांगों को भी अधिमान देना पड़ेगा। शंकराचार्य ने जब अपने उद्बोधन में गौ हत्या करने वाली पार्टियों को वोट न देने की अपील की है तब उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि हिन्दूवादी पार्टी के शासन में बीफ के कारोबार का आंकड़ा क्यों बड़ा है। गौ हत्यारी पार्टियों को वोट देना गौ हत्या के पाप में भागीदार बने जैसा है। शंकराचार्य का ऐसा उद्बोधन क्या एक राजनीतिक उद्बोधन नहीं बन जाता है। शंकराचार्य का जो स्थान हिन्दू धर्म में है उसके नाते हिन्दू समाज को यह निर्देश देना कि वह अमुक दल को समर्थन दे और अमुक का बहिष्कार करे अपने में ही एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन जाता है। फिर जब हिन्दू धर्म के नाते वोट किसे देना है और किसे नहीं देने के निर्देश ऐसे शीर्ष स्तर पर आने शुरू हो जायें तो यह स्थिति अपने में बहुत हास्यास्पद हो जाती है। क्योंकि इसे राजनीति से सीधे-सीधे दखल देने का निर्देश मान लिया जायेगा।
इस समय वक्फ के प्रस्तावित संशोधन के बाद जो राजनीतिक परिदृश्य उभरा है उसमें शंकराचार्य जैसे शीर्ष स्थान से वोट देने और न देने के निर्देश जारी होना एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन जाता है। वक्फ के प्रस्तावित संशोधन के बाद जिस तरह का राजनीतिक परिदृश्य उभरा है उसके परिपेक्ष में वोट देने न देने के ऐसे शीर्ष स्थान से निर्देश आना एक बड़ा सवाल बन जाता है। गौ माता को राष्ट्र माता घोषित किये जाने का मांग पत्र क्या केन्द्र सरकार को सौंपा जाना चाहिये या राज्य सरकारों को? फिर किस मंच के नाम से यह मांग रखी जायेगी। यदि इसी तर्ज पर ऐसी ही मांगे दूसरे धर्म को मानने वालों से भी आती हैं तो उन्हें सरकार कैसे इन्कार कर पायेगी? क्या कल जब राम मंदिर संचालन समिति सांई बाबा की मूर्ति को वहां से हटाएगी तब क्या वह इसके कारण पूरी स्पष्टता के साथ समाज में रख पायेगी? तब क्या सांई के भगत इस स्थिति को चुपचाप स्वीकार कर पायेंगे? क्या इससे समग्र हिन्दू समाज में ही बिखराव की स्थितियां नहीं उभरेंगी? मेरा मानना है कि सर्वधर्म समभाव की अवधारणा के तहत ऐसे बहिष्कार समय की मांग नहीं है।

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