Wednesday, 04 February 2026
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क्या अप्रसांगिक हो रही है आईएएस व्यवस्था

भारत सरकार ने पैट्रोलियम, वित्त, आर्थिक मामले कृषि और स्टील आदि कुछ मन्त्रालयों में संयुक्त सचिवों के दस पद भरने के लिये निजिक्षेत्र में काम कर रहे लोगां से आवेदन मांगे हैं। यह पद तीन वर्ष के अनुबन्ध पर भरे जायेंगे और अनुबन्ध की अवधि दो वर्ष बढ़ाई जा सकती है। निजिक्षेत्र से अनुभवी लोगों को पहले भी ऐसी एक-आध नियुक्तियां दी जाती रही है। बल्कि भारत सरकार में सचिव स्तर तक ऐसे लोग सेवाएं दे चुके हैं। पैट्रोलियम और वित्त मंत्रालयों में निजिक्षेत्र से आये लोग सचिव रह चुके हैं। लेकिन ऐसे लोगों को जब भी लाया गया तो उन्हें स्थायी नियुक्तियां दी गयी थी। अनुबन्ध के आधार पर ऐसी नियुक्तियांं का प्रयोग पहली बार हो रहा है। इन लोगों का चयन संघ लोक सेवा आयोग नहीं बल्कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में बनी कमेटी करेगी। एक साथ दस लोगों को विभिन्न मन्त्रालयों में संयुक्त सचिव के पद पर तीन वर्ष के अनुबन्ध पर नियुक्ति किये जाने से स्वभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में कोई नियोजित प्रयोग करने जा रही है। यदि यह प्रयोग सरकार के अघोषित लक्ष्यों की पूर्ति के मानदण्ड पर सफल रहता है तो क्या आईएएस की जगह कोई नयी प्रशासनिक व्यवस्था देखने को मिलेगी? ऐसे बहुत सारे सवाल सरकार के इस फैसले के बाद उठ खड़े हुए हैं। क्योंकि इस फैलले से पहले यह भी एक फैसला चर्चा में रहा है कि अब आईएएस को लोकसेवा आयोग के चयन पर ही राज्यों का आबंटन नही हो जायेगा बल्कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद जो परिणाम रहेगा उसके आधार पर आवंटन किया जायेगा।
सरकार के इन फैसलों से पहली चीज तो यह उभरती है कि सरकार आईएएस की मौजूदा व्यवस्था को उपयोगी नही मान रही है। इसके विकल्प के रूप में कुछ नया लाना चाहती है। इस समय जो लोग इन पदों पर अनुबन्ध के आधार पर नियुक्त होंगे वह निश्चित तौर पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी या किसी बड़े औद्यौगिक घराने में अपनी सेवायें दे रहे होंगे। क्योंकि इन पदों के लिये योग्यता की शर्त यही है कि वह इसके लिये अपने को Talented मानते हों। आईएएस बनने के लिये शैक्षणिक योग्यता आज भी स्नातक ही है चाहे वह किसी भी स्ट्रीम से स्नातक हो। आईएएस हो जाने के बाद सोलह वर्ष के कार्यकाल के बाद संयुक्त सचिव बन जाता है लेकिन निजिक्षेत्र से आने वाले का न्यूनतम अनुभव कितने वर्ष का होगा यह स्पष्ट नही किया गया है। इसका आकलन यह चयन कमेटी ही करेगी। आईएएस एक प्रशासनिक सेवा है उसका प्रशिक्षण प्रशासन चलाने के उद्देश्य से किया जाता है। प्रशासन में सबसे निचले कर्मचारी से लेकर शीर्ष अधिकारी तक सबके दायरे अधिकार और कर्तव्य पूरी तरह परिभाषित हैं। हम एक वेल्फेयर स्टेट हैं जहां हर कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सबसे लोक कल्याण के हित में काम करना अपेक्षित रहता है। इसमें "Public interest " सर्वोपरि रहता है। इसीलिये सरकार में हर अधिकारी /कर्मचारी को उसकी सेवानिवृति उसे सेवा की सुरक्षा मिली हुई है।
इसके विपरीत निजिक्षेत्र में यह नही है कि उसके अधिकारी/कर्मचारी को एक निश्चित अवधि तक सेवाकाल की सुरक्षा नही है। निजिक्षेत्र में वेल्फेयर स्टेट की अवधारणा भी लागू नही होती है। वहां तो नौकर को मालिक वेल्फेयर की पूर्ति करनी है। उसे मालिक को अधिक से अधिक लाभ कमाकर देना है। निजिक्षेत्र लाभ की अवधारणा पर चलता है जबकि सरकार वेल्फेयर की। सबका हित- सबका कल्याण, सबका विकास यह वेलफेयर स्टेट के मूल उद्देश्य हैं। इसमें लाभ से पहले कल्याण रहता है लेकिन निजिक्षेत्र में यह कल्याण और लाभ एक व्यक्ति, एक कंपनी या एक औ़द्यौगिक घराने तक ही सीमित रहता है। ऐसे में जिस व्यक्ति को तीन या पांच वर्ष के अनुबन्ध पर नियुक्त किया जायेगा उसे प्रशासन की सारी बारिकियां समझने में समय लगेगा। बल्कि वह तो जिस भी संस्थान से पूर्व में जुड़ा रहा होगा उसी कार्य संस्कृति से प्रभावित रहेगा और उन्ही उद्देश्यों की पूर्ति के लिये कार्य करेगा। सयुंक्त सचिव कृषि के पद पर बैठकर वह किसान के हित में स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करवाने में नीति के स्तर पर क्या योगदान दे पायेगा। वह किसान का कर्जा माफ किये जाने की वकालत कैसे कर पायेगा वित्त और आर्थिक मामलों का संयुक्त सचिव क्या एनपीए की व्यवस्था को समाप्त करने की राय दे पायेगा। क्या वह बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के हितों से विपरीत जा पायेगा। यदि कोई अंबानी- अदानी औद्यौगिक घरानों से जुड़ा व्यक्ति पैट्रोलियम या रक्षा उत्पादन में संयुक्त सचिव हो जाता है तो क्या वह पैट्रोलियम को जीएसटी के दायरे में लाने की वकालत करेगा। रक्षा उत्पादन में क्या वह शफेल डील पर सवाल उठा पायेगा? इसलिये सरकार को यह प्रयोग करने से पहले इसके निहित उद्देश्यों की जानकारी जनता के सामने रखनी होगी।
यदि सरकार को लगता है कि आईएएस व्यवस्था अप्रसांगिक होती जा रही है और उसे हर मन्त्रालय में विषय विशेषज्ञ चाहिये तो उसे आईएएस व्यवस्था में अलग से सुधार करने चाहिये। जिन क्षेत्रों में विशेषज्ञ चाहिये उनके लिये आईएएस मे ही पोस्टल, राजस्व और आडिट की तर्ज पर अलग सेवाआें की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिये शैक्षणिक योग्यताएं भी स्नातक से बढ़ाकर विषय विशेषज्ञता की तय करनी होंगी, अन्यथा जो प्रयोग अब किया जाने लगा है उससे यही संदेश जायेगा कि सरकार संघ की विचारधारा से जुड़े लोगों को कुछ प्रमुख पदों पर बैठाने की जुगाड़ भिड़ा रही है।

सम्पर्क से समर्थन तक

भाजपा ने इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर ‘‘संपर्क से समर्थन’’ की एक रणनीति योजना शुरू की है। इसके तहत पार्टी ने अपने मन्त्रिायों सहित तमाम बड़े नेताओं को निर्देश दिये हैं कि वह अपने अपने राज्यों में विभिन्न क्षेत्रों के बड़े लोगों से मिलकर उनसे पार्टी के लिये समर्थन हासिल करें। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस रणनीति की शुरूआत महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे व अन्य लोगों तथा पंजाब में प्रकाश सिंह बादल से मिलकर की है। केन्द्र में भाजपा की मोदी सरकार को 26 मई को सत्ता में आये चार साल हो गये हैं। 2014 में जब लोकसभा के चुनाव हुए थे तब इन चुनावों से पूर्व राम देव और अन्ना हज़ारे के आन्दोलनों से देश में बड़े स्तरों पर हो रहे भ्रष्टचार के खिलाफ एक बड़ा जनान्दोलन खड़ा हो गया था। इस आन्दोलन की जमीन तैयार करने में प्रशांत भूषण ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाकर कर एक बड़ी भूमिका निभाई थी। क्योंकि अदालत ने इन मामलों की सीबीआई जांच के आदेश देकर इसकी गंभीरता और विश्वसनीयता बढ़ा दी थी। इसी परिदृश्य में सिविल सोसायटी ने लोकपाल की मांग उठाई थी। इस तरह कुल मिलाकर जो वातावरण उस समय देश के अन्दर खड़ा हो गया था उससे तब सत्तारूढ़ यूपीए सरकार के खिलाफ बदलाव का माहौल खड़ा हुआ। इसका लाभ भाजपा को मिला जो अकेले अपने दम पर 283 सीटें जीत गयी। उस समय विदेशों में पड़े लाखों करोड़ों के कालेधन की वापसी से हर व्यक्ति के खाते में पन्द्रह लाख आने के दावों और अच्छे दिनों के वायदे ने भाजपा को यह सफलता दिलाई थी। उस समय भाजपा को बड़े लोगों से संपर्क करके समर्थन मांगने की आवश्यकता नही पड़ी थी।
अब इन चार वर्षों में जो कुछ घटा है और अच्छे दिनों के वायदे के तहत लोगों को जो जो लाभ मिले हैं उसी की व्यवहारिकता का परिणाम है भाजपा इस दौरान हुए लोकसभा के अधिकांश उपचुनाव हार गयी है। देश के सबसे बडे़ राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। भाजपा के अपने ही घटक दलों के साथ रिश्ते अब बिखरास पर आ गये हैं। इस परिदृश्य में भाजपा को आज ‘‘संपर्क से समर्थन’’ की योजना पर उतरना पड़ा है। 2014 में किये गये वायदे कितने पूरे हुए हैं यह हर आदमी के सामने आ चुका है। संघ-भाजपा की वैचारिक स्वीकार्यता कितनी बन पायी है और इस विचारधारा की सोच कितनी सही है इसका एक बहुत बड़ा खुलासा संघ मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति महामहिम प्रणव मुखर्जी के भाषण के बाद सामने आ गया है। इस तरह कुल मिलाकर जो वातावरण आज भाजपा के खिलाफ खड़ा होता जा रहा है उसी का परिणाम है कि भाजपा नेताओं को सामज के बुद्धिजीवि वर्ग के लोगों से संपर्क बढ़ाने और समर्थन मांगने की आवश्यकता आ खड़ी हुई है।
इसी कड़ी में केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा को शिमला आकर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज लोकेश्वर पांटा, प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एसएस परमार, पूर्व जज अरूण गोयल, पूर्व नौकरशाह जोशी और लेखक एसआर हरनोट के यहां दस्तक देनी पड़ी है। यह लोग कोई सक्रिय राजनीति के कार्यकर्ता नहीं है और न ही किसी बड़े समाजिक आन्दोलन के अंग हैं जो भाजपा की नीतियों और विचारधारा से आश्वस्त होकर आम आदमी में उसकी पक्षधरता की वकालत करेंगे या संघ भाजपा के पक्ष मे कोई बड़ा ब्यान देकर किसी बहस को अंजाम देंगे। नड्डा ने इन लोगों से मिलकर पार्टी की ओर से दी गयी जिम्मेदारी निभा दी है और अखबारों में इसकी खबर छपने से उनको इसका प्रमाण पत्र भी मिल गया है। लेकिन इसी परिदृश्य में नड्डा से बतौर केन्द्रिय मन्त्री कुछ सवाल प्रदेश की जनता की ओर से पूछे जाने आवश्यक है। सवाल तो कई हैं लेकिन मैं केवल दो सवाल ही उठाना चाहूंगा। पहला सवाल है कि प्रधानमन्त्री मोदी से लेकर नड्डा तक भाजपा के हर बड़े नेता ने पिछले लोकसभा चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक वीरभद्र के भ्रष्टाचार को प्रदेश की जनता के सामने एक बड़ा मुद्दा बनाकर उछाला था। यह कहा था कि इनके तो पेड़ों पर भी पैसे लगते हैं। नड्डा जी इन आरोपों की जांच आपकी केन्द्र की ऐजैन्सीयों ने ही की है इन ऐजैन्सीयों ने वीरभद्र के साथ बने सहअभियुक्तों आनन्द चौहान और वक्कामुल्ला को तो इसलिये गिरफ्तार कर लिया कि इन्होने भ्रष्टचार करने में वीरभद्र का सहयोग किया। लेकिन जिसको इस सहयोग से लाभ मिला उस वीरभद्र को तो आप हाथ नही लगा सके। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? क्या वीरभद्र के खिलाफ जानबूझ झूठे मामले बनाये गये थे या कुछ और था क्या इसका कोई जवाब आप प्रदेश की जनता को दे पायेंगे?
इस कड़ी में मेरा दूसरा सवाल यह है कि मोदी जी ने मण्डी की चुनावी जनसभा में प्रदेश की वीरभद्र सरकार से 72 हजार करोड़ का हिसाब मांगा था। यह कहा था कि उनकी सरकार ने केन्द्र की ओर से 72000 करोड़ की आर्थिक सहायत दी है मोदी ने वीरभद्र से पूछा था कि उन्होने यह पैसा कहां खर्च किया। अखबारों में यह बड़ी खबर छपी थी क्योंकि यह बड़ी जानकारी थी आम आदमी के लिये। लेकिन अब प्रदेश में आपकी सरकार बन गयी उसके बाद आये अपने पहले ही बजट भाषण में मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने केन्द्र से प्रदेश को मिली सारी धनराशी का आंकड़ा 46000 करोड़ कहा है। जयराम का बजट भाषण सदन के रिकार्ड में मौजूद है। मोदी और जयराम के आंकड़ो में 26,000 करोड़ का अन्तर है। मोदी के भाषण की रिकार्डिंग भी उपलब्ध है। ऐसे में नड्डा जी क्या आप बतायेंगे कि मोदी और जयराम में कौन सही और सच्च बोल रहा है। इसी तरह के कई सवाल जयराम सरकार से भी उठाये जायेंगे। लेकिन अभी नड्डा जी से इतना ही अनुरोध है कि इन सवालों के परिदृश्य में मोदी सरकार समर्थन की कितनी हकदार है।

फिर हुई भाजपा की वैचारिक हार

शिमला/शैल। कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद देश में चार लोकसभा और ग्यारह विधानसभा सीटों के लिये उपचुनाव हुआ है। इस उपचुनाव में भाजपा लोकसभा की तीन और विधानसभा की दस सीटें हार गयी है। कर्नाटक चुनाव के बाद जद(एस) और कांग्रेस ने मिलकर उस समय सरकार बनायी जब भाजपा सदन में अपना बहुमत सिद्ध नही कर पायी। लेकिन भाजपा और उसके पक्षधरों ने जिस तरह से इस गठबन्धन को लोकतन्त्र की हत्या करार दिया तथा इसके तर्क में पूर्व के सारे राजनीतिक इतिहास को जनता के सामने परोसा उसमें लगा था कि अब भाजपा एक भी उपचुनाव अन्य दलों को जीतने नही देगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया था कि वह पिछला उपचुनाव अति विश्वास के कारण हारे हैं लेकिन आगे हम कोई भी सीट नही हारेंगे पूरी ताकत और रणनीति से लड़ेंगे। सही में इस उपचुनाव में योगी सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी यहां तक की बागपत में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की एक रैली तक करवाई। इस रैली में हर तरह की घोषणाएं प्रधानमन्त्री से यहां के लोगों के लिये करवाई। लेकिन इस सब के बावजूद यूपी की दोनों सीटों पर भाजपा हार गयी। बिहार में नीतिश भाजपा की सरकार होने के बावजूद वहां पर आरजेडी भारी बहुमत से जीत गयी।
भाजपा की यह हार क्या विपक्ष की एक जूटता के प्रयासों का परिणाम है या यह हार संघ भाजपा की नीयत -नीति और विचारधारा की हार है। यह एक बड़ा सवाल इन उपचुनावों के बाद विश्लेष्कों के सामने खड़ा हो गया है। क्योंकि भाजपा ने पिछले चुनावों में किसी भी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार नही बनाया था। फिर पिछले दिनों जिस तरह तीन तलाक के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया और उसे भाजपा ने केन्द्र सरकार की एक बड़ी सफलता करार दिया तथा दावा किया कि मुस्लिम समाज उनके साथ खड़ा हो गया है। आज यूपी में आरएलडी के उम्मीदवार के रूप में एक मुस्लिम महिला का चुनाव जीत जाना भाजपा के दावे और धारणा दोनों को नकारता है। यूपी से शायद पहली मुस्लिम महिला सांसद बनकर संसद में पहुंची है। इस उपचुनाव से पहले आरएलडी प्रमुख अजीत चौधरी के खिलाफ मुकद्दमा तक दर्ज किया गया। बिहार में लालू परिवार के खिलाफ तो मामले आगे बढ़ाये गये लेकिन नीतिश कुमार के खिलाफ बने आपराधिक मामले में एक दशक से भी अधिक समय से कोर्ट का स्टे चल रहा है। रविशंकर प्रसाद जब विधानसभा चुनावों के दौरान शिमला आये तब उनकी प्रैस वार्ता में मैने उनसे यह सवाल पूछा था। उन्होनें इस स्टे को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था। यह संद्धर्भ यहां इसलिये प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि बिहार की जनता के सामने लालू और नीतिश -भाजपा में किसी एक को चुनने का विकल्प था। बिहार की जनता ने दूसरी बार लालू की आरजेडी को उपचुनाव में समर्थन दिया है।
इस परिदृश्य में भाजपा की हार का विश्लेषण किया जाना आवश्यक हो जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश के इन उप चुनावों में पचास से अधिक केन्द्रिय मन्त्रीयों की बूथ वाईज़ डयूटीयां लगायी गयी थी। एक मन्त्री राही ने जनता को संबोधित करते हुए यहां तक कह दिया था कि यदि आप भाजपा को वोट नही दोगे तो मै तुम्हे श्राप दे दुंगा और उससे तुम्हें पीलिया हो जायेगा। न्यूज चैनल ने मन्त्री का यह संबोधन लाईव दिखाया था। इसी मन्त्री की तरह संघ भाजपा के कई कट्टर कार्यकर्ता सोशल मीडिया में नेहरू गांधी परिवार को गाली देने के लिये जिस तरह की हल्की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जिस तरह सेे इतिहास के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर मनचाही व्यख्या दे रहे उससे उनके मानसिक स्तर का ही पता चलता है। प्रधानमन्त्री स्वयं जिस तरह से कई बार इतिहास की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और एकदम हल्की भाषा का प्रयोग करते हैं उस पर तो कर्नाटक चुनावों के बाद पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह स्वयं राष्ट्रपति को पत्र लिख चुके हैं। संघ अपने को इस देश की संस्कृति का एक मात्र ध्वज वाहक मानता है। इस देश की सांस्कृतिक विरासत में भाषा की शालीनता सर्वोपरि रही है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज अपने को संघ स्वयंसेवक करार देने वाले सोशल मीडिया की पोस्टों में भाषाई मर्यादा का उल्लंघन कर रहें हैं। ऐसे लोग जिस तरह का झूठ परोस रहे हैं उससे अन्ततः संघ और भाजपा का ही नुकसान हो रहा है। क्योंकि जिस तरह के तथ्य नेहरू गांधी परिवार को लेकर परोसे जा रहे हैं उस पर जनता विश्वास करने की बजाये परोसने वालों के प्रति ही एक अलग धारणा बनाती जा रही है। मेरा स्पष्ट मानना है कि अतार्किक ब्यानों और हल्की भाषा के प्रयोग से केवल यही संदेश जाता है कि आप केवल सत्ता हथियाने के लिये ही ऐसे ओछे हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज यह आम माना जाने लगा है कि भाजपा के आई टी सैल में नियुक्त हजा़रों लोग केवल गोयल के इसी प्रयोग पर अमल कर रहे हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलने से वह सच बन जाता है।
आज प्रधानमन्त्री यह दावा कर रहे हैं कि देश में रिकार्ड विदेशी निवेश हुआ है जबकि दूसरी ओर मूडीज़ ने सरकार के विकास दर 7.5% रहने के आकलन को 7.3% आंका है। यदि प्रधानमन्त्री का विदेशी निवेश का दावा सच्च है तो फिर विकास दर तो 8ः से ऊपर होनी चाहिये थी। आज जनता ने प्रधानमन्त्री के दावों और ब्यानों को गंभीरता से लेने की बजाये शुद्ध शब्द जाल करार देना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर अच्छे दिनो का जो भरोसा देश की जनता को दिया गया था वह पूरी तरह टूट चुका है। यूपी के उपचुनावों की हार योगी से अधिक मोदी की हार है। भाजपा के पास मोदी और शाह के अतिरिक्त कुछ भी नही है और यह दोनों अपनी विश्वनीयता तेजी से खोते जा रहे हैं। क्योंकि इस उपचुनाव में कैराना में हुई हार पर भाजपा समर्थकों की यही प्रतिक्रिया आई है कि यह हिन्दुत्व की हार है। ऐसी प्रतिक्रिया पर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या यह चुनाव यह जानने के लिये हो रहा था कि हिन्दु मुस्लिम में से कौन अच्छा इन्सान है या देश की संसद के लिये एक अच्छा सांसद चुनकर भेजने के लिये हो रहा था। इस उपचुनाव में जिस तरह जिन्ना का प्रकरण लाया गया और उसपर मुख्यमन्त्री योगी की यह प्रतिक्रिया आना कि हम यहां पर जिन्ना की फोटो नही लगने देंगे। एक मुख्यमन्त्री की इस तरह का वैचारिक हल्कापन जब सार्वजनिक रूप से सामने आता है तब संगठनों को लेकर एक अलग ही आंकलन का धरातल तैयार होता है आज भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण यही बनता जा रहा है।

महागठबन्धन से चुभन क्यों

शिमला/शैल। कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस और जनता दल (एस) ने भाजपा को उसी रणनीतिक शैली में जवाब दिया है जो उसने गोवा, मणिपुर, मेघालय और बिहार में अपनायी थी। कांग्रेस जद(एस) के मुख्यमन्त्री और उप-मुख्यमन्त्री के शपथ समारोह में देश के कई राजनीतिक दलों के बड़े नेता एक साथ आये हैं। इन नेताओं ने भाजपा को हराने के लिये इकट्ठे होने का संकल्प लिया है। माना भी जा रहा है कि यदि यह गठबन्धन का प्रस्ताव सफल हो जाता है तो भाजपा निश्चित रूप से सत्ता से बाहर हो जायेगी। लेकिन इस गठबनधन की आहट मात्र से ही भाजपा-संघ और उसके पैरोकार परेशान हो उठे हैं। भाजपा-संघ समर्थित मीडिया भी बहुत आहत हो रहा है। सब इस संभावित गठबन्धन को शक्ल लेने से पहले ही इसकी भ्रूण हत्या के प्रयास में जुट गये हैं। जो लोग सक्रिय राजनीति में हैं उनका पहला ध्येय येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाना होता है और इसके लिये वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। भाजपा के पक्षधर दल इस दिशा में जो भी कर रहे हैं उसे राजनीति की भाषा में गलत नही कहूंगा। लेकिन आज मीडिया का एक वर्ग और उससे जुड़े लोग जब राजनीतिक दलों की ही भाषा बोलने और लिखने लग जाते हैं तो दुःख होता है।
मैं महागठबन्धन की वकालत नही करूंगा लेकिन इसका विरोध करने वालों से कुछ सवाल जरूर करना चाहूंगा। इसके लिये मैं आपका ध्यान आपातकाल की ओर आकर्षित करना चाहूंगा। क्योंकि कर्नाटक के घटना में जब भाजपा पर यह आरोप आया कि उसने देश में लोकतन्त्र की हत्या कर दी है तब इस आरोप का जवाब कांग्रेस को आपातकाल का स्मरण करके दिया गया। यह सही है कि उस समय लोकतन्त्र को चोट पहुंचाई गयी थी। इस चोट का प्रतिकार करने के लिये उस समय का विपक्ष इकट्ठा हुआ था और जनता पार्टी गठित हुई थी। 1980 में यह जनता पार्टी जनसंघ घटक की दोहरी सदस्यता के कारण क्यों टूटी और शिमला के रिज मैदान पर तत्कालीन केन्द्रिय मन्त्री राजनारायण की गिरफ्तारी क्यों हुई तथा उसका जनता पार्टी के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ा था मैं इसकी व्याख्या में नही जाना चाहता। लेकिन यह सवाल जरूर उठाना चाहता हूं कि क्या आज भी आपातकाल जैसे हालात नही बनते जा रहे हैं? क्या आडवाणी जी ने भी इसका संकेत नही दिया है? आज क्या एनडीए में भाजपा के साथ अन्य दल नही है? क्या पीडीपी और नीतिश के जद (यू) के साथ चुनाव परिणामों के बाद गठबन्धन नही बने हैं।
इसलिये आज यदि इस संभावित आपातकाल का सामना करने के लिये एक महागठबन्धन आकार ले रहा है तो इसमें बुराई क्या है। क्या आज यह स्मरण नही किया जाना चाहिये कि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देश की जनता के साथ जो अच्छे दिनों के वायदे किये गये थे उनमें से कितने पूरे हुए हैं। उस समय मोदी जी ने यह कहा था कि वह प्रधानमंत्री नही वरन् प्रधान चैकीदार बनकर देश की सेवा करेंगे। लेकिन क्या इस चैकीदार के सामने से ललित मोदी, विजय माल्या, मेहुल चैकसी और नीरव मोदी जैसे लोग देश का हजारों करोड़ लेकर फरार नही हुए हैं। जिस कालेधन और भ्रष्टाचार को ढ़ोल पीटकर सत्ता में आये थे क्या उस दिशा मेें एक भी ठोस कदम उठाया गया है। आज सरकारी बैंको का एनपीए सात लाख करोड़ से भी ऊपर जा पहुंचा हैं। क्या यह जनता के पैसे की दिन दिहाड़े डकैती नही हैं। क्या इस एनपीए को वसूलने के लिये कोई कदम उठाया गया है। बल्कि जिन नौजवान बैंक मैनजरों ने एनपीए को लेकर सख्ती दिखायी उन्हे नीतिश के बिहार में गोली मार दी गयी। क्या एनपीए के नाम पर शीर्ष बैंक प्रबन्धन अपनी बईमानी को छिपा सकता है। क्या यह सही नही है कि इसी एनपीए के कारण बैंको में पैसे की कमी का प्रभाव सरकार के राजस्व पर भी पड़ा है। क्योंकि इसी एनपीए वालों को अपरोक्ष में लाभ देने के लिये ही तो नोटबंदी लायी गयी थी। यदि कालेधन को लेकर सरकार का आकलन और सूचना सही होती तो स्थिति ही कुछ और होती। पुराने नोट बन्द करने के बाद जब वही नोट पूरी करंसी का करीब 90% वापिस आ गया और उसे बदलना पड़ा तो सारा गणित गड़बड़ा गया। इसी कारण से आज सरकार तेल की कीमतें बढाकर अपना राजस्व इकट्ठा कर रही है। तेल को इसी कारण से जीएसटी के तहत नहीं लाया जा रहा है। इस तरह के आज अनेकों कारण ऐसे खड़े हो गये हैं जो आपातकाल से भी बदत्तर स्थिति बन गयी है। विरोध की हर आवाज़ को देशद्रोह कहने का चलन शुरू हो गया है।
इस परिदृश्य में आज देश को मन्दिर-मस्जिद, हिन्दु-मुस्लिम और दलित बनाम अन्य के नाम पर ज्यादा देर तक नही चलाया जा सकता। किसान आत्महत्या के कगार पर पहुंचा हुआ है। लाखों टन अनाज खुले में बर्बाद हो रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। क्या यह सारे कारण एक नये राजनीतिक गठबन्धन की आवश्यकता नही बन जाते? इस संभावित गठबन्धन को नेता के प्रश्न पर जिस तरह तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है और उसमें मीडिया का भी एक वर्ग सक्रिय भूमिका निभाने में लग गया है वह चिन्ता और निंदा का विषय है।

कर्नाटक में सत्ता ही नही नीयत और नीति भी हारी भाजपा

कर्नाटक में अन्ततः सत्ता भाजपा के हाथ नही आ पायी है। भाजपा की यह हार सत्ता से अधिक उसकी नीयत और नीति की हार है। क्योंकि जिस तर्क से उसने गोवा, मणीपुर, मेघालय और बिहार में सरकारें बनायी थी उसी तर्क पर उसके हाथ से कर्नाटक की सत्ता निकल गयी। गोवा, मणिपुर, मेघालय और बिहार में सभी जगह चुनाव परिणामों के बाद गठबन्धन बनाकर सत्ता हासिल की गयी थी लेकिन जब कर्नाटक में कांग्रेस और जद (एस) ने उसी रणनीति का सहारा लेकर चुनावों के बाद गठबन्धन बनाकर अपना बहुमत बना लिया और राज्यपाल ने गठबन्धन को सरकार बनाने के लिये आमन्त्रित न करके भाजपा को सबसे बड़े दल के रूप में यह न्यौता दे दिया तब सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला पहुंच गया। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के फैसले पर अपना कोई अन्तिम फैसला न देते हुए उसमें आंशिक सुधार करके बहुमत सिद्ध करने के लिये 15 दिन के समय को घटाकर शनिवार चार बजे तक का समय कर दिया। सदन की कार्यवाही चलाने के लिये अध्यक्ष का होना आवश्यक होता है लेकिन अध्यक्ष का विधिवत चुनाव सदस्यों द्वारा शपथ लेने के बाद ही होता है और शपथ दिलाने के लिये राज्यपाल प्रोटम अध्यक्ष की नियुक्ति करता है। यहां राज्यपाल ने जिस विधायक को प्रोटम स्पीकर नियुक्त किया उस पर कांग्रेस और जद (एस) ने एतराज उठाया। मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने प्रोटम स्पीकर को तो नही हटाया लेकिन सदन की सारी कारवाई के लाईव टैलीकास्ट के आदेश कर दिये। इस तरह जब सदन की कारवाई चली और मुख्यमन्त्री येदियुरप्पा ने विश्वास मत का प्रस्ताव रखा तब इस प्रस्ताव पर मतदान होने से पूर्व ही अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस तरह चुनाव परिणामों से लेकर मुख्यमन्त्री के त्यागपत्र देने तक जो कुछ घटा है उससे स्पष्ट हो गया है कि भाजपा ने सत्ता हथियाने के लिये कोई कोर- कसर नही छोड़ी थी। इन प्रयासों में मीडिया चैनलों और सोशल मीडिया में सरदार पटेल से लेकर आपातकाल और बुटा सिंह प्रकरण तक का सारा राजनीतिक इतिहास देश के सामने अपने ही तर्कों के साथ परोसा गया। यह कहने का प्रयास किया गया कि कांग्रेस ने भी भूतकाल में ऐसा ही कुछ किया था इसलिये आज भाजपा को वह सब कुछ दोहराने का दो गुणा हक हासिल हो गया है। इसमें भाजपा के पक्षधरों ने एक बार भी यह नही माना कि जो कुछ उसने गोवा, मणिपुर और मेघालय में किया था वही सबकुछ अब कांग्रेस और जद(एस) कर रहे हैं वह भी जायज है। सत्ता के इस खेल के लिये भाजपा जिस हद तक चली गयी है उससे भाजपा की नीयत और नीति दोनों पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है। क्योंकि इस चुनाव में जिस हद तक मोदी, अमितशाह और योगी चुनाव प्रचार में चले गये थे उससे यह चुनाव एक तरह से केन्द्र सरकार बनाम कांग्रेस होकर रह गया था। चुनाव प्रचार में जिस तरह से भाषायी मर्यादाएं लांघ दी गयी थी उसको लेकर पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह को भी राष्ट्रपति को पत्र लिखने के लिये बाध्य होना पड़ा है। लेकिन इस सारे प्रचार के बावजूद मोदी, शाह और योगी भाजपा को बहुमत नही दिला पाये। बल्कि वोट शेयर में भी कांग्रेस को 38% तो भाजपा को 36% वोट हासिल हुए हैं। प्रधानमन्त्री के इतने प्रयासोें के बाद भी भाजपा को बहुमत न मिल पाना और उसके बाद सत्ता के लिये अपनाई गयी रणनीति का इस तरह असफल हो जाना भाजपा के भविष्य के लिये खतरे का संकेत है। क्योंकि इससे यही संकेत और संदेश जाता है कि भाजपा देश की जनता को दे पायी है कि सत्ता के लिये वह किसी भी हद तक जा सकती है।
कर्नाटक के इस चुनाव के बाद जो कुछ घटा है उसने एक और सवाल खड़ा कर दिया है कि जिन लोगों को राजनीतिक दल अपना टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारते हैं उनमें से अधिकांश अभी तक इसके पात्र नही बन पाये हैं। भाजपा के पास आंकड़ो का बहुमत नही था। यह बहुमत कांग्रेस और जद(एस) के विधायकों को किसी न किसी तरह तोड़कर ही हासिल किया जाना था। इसी व्यवहारिक सच को जानते हुए भी राज्यपाल ने भाजपा को यह सबकुछ करने का मौका दिया इससे राजभवन की मर्यादा को ही नुकसान पहुंचा है जो कि लोकतन्त्र के भविष्य के लिये एक बड़ा खतरा बन गया है। इस सबसे हटकर भी यदि मोदी सरकार का आकलन किया जाये तो भी यह सरकार अपने ही वायदों पर खरी नही उतरती है। 2014 में सत्ता में आने के लिये यह वायदा किया था कि कांग्रेस जो 60 वर्षों में नही कर पायी है वह हम 60 महीनों में कर देंगे। अच्छे दिनों का दावा किया गया था। लेकिन बेरोज़गारी और मंहगाई का जो स्तर 2014 के चुनावों से पहले था आज उससे भी बदत्तर हो चुका है। भ्रष्टाचार के खात्मे के जो दावे किये गये उनमें भी आज तक एक भी मामला अन्तिम परिणाम तक नही पहुंचा है बल्कि इस सरकार में मुख्य अभियुक्त तो खुले घूमते और सत्ता भोगते रहे और उनके सहअभियुक्त बिना फैसले के सलाखों के पीछे रहे। नोटबन्टी के फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को जो व्यवहारिक नुकसान पहुंचाया उससे उबरने के लिये दशकों लग जायेंगे। इसी नोटबन्दी का परिणाम आज सामने आ रही कंरसी की कमी है। सत्ता के लिये सारे स्थापित संस्थानों को विश्वसनीयता के संकट के कगार पर पहुंचा दिया है। इन्ही के साथ यह सवाल भी अभी तक कायम है कि यह सरकार इतने प्रचण्ड बहुमत के बाद भी धारा 370 को हटा नही पायी है बल्कि 35(A) को लेकर जो याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में आयी हैं उन पर अभी तक बन पाया सरकार अपना जबाव दायर नही कर पायी है। राम मन्दिर अभी तक नही बन पाया है और विश्वहिन्दु परिषद् के नेता डा. प्रवीण तोगड़िया ने जो आरोप लगाये हैं उनका भी कोई खण्डन आज तक नही आ पाया है। इस तरह कर्नाटक के घटनाक्रम ने भाजपा की नीयत और नीति पर देश के सामने एक नयी बहस का जो मुद्दा परोस दिया है उसने विपक्ष को नये सिरे से एकजुट होने का मौका दे दिया है।

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