
शिमला/शैल। अन्ना हजारे ने पहली दिसम्बर को प्रधानमन्त्री कार्यालय में तैनात राज्य मन्त्री जितेन्द्र सिंह को पत्र लिखकर सूचित किया है कि बार -बार आश्वासन दिये जाने के बाद भी सरकार लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्तियां नही कर रही है। इसलिये वह अपने गांव रालेगन सिद्धि में 30 जनवरी 2019 से आन्दोलन करने जा रहे हैं। अन्ना ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि 2011 में उनके साथ देश के करोड़ों लोगो ने इसके लिये आन्दोलन किया था। इस आन्दोलन पर 27 अगस्त 2011 को तत्कालीन सरकार ने लिखित आश्वासन और 2013 में इसके लिये कानून भी बना दिया। इससे लोगों को उम्मीद बंधी थी कि अब लोकपाल/लोकायुक्त नियुक्त हो जायेंगे और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जायेगा। लेकिन इसके बाद सरकार बदल गयी और अब इस सरकार का कार्यकाल समाप्त होने में पांच माह का समय बचा है लेकिन अभी तक यह नियुक्तियां नही हो पायी है। अन्ना ने यह भी लिखा है कि उन्होंने तीस बार इस विषय पर मोदी सरकार से पत्राचार किया लेकिन एक बार भी जवाब तक नही आया है।
अन्ना ने अपने पत्र में जो कुछ लिखा है वह सही है। इसी से सरकार की नीयत पर सवाल खड़े़ होते हैं और इसी से कुछ सवाल अन्ना की ओर भी उछलते हैं। यह पूरा देश जानता है कि केन्द्र मेें मोदी सरकार और दिल्ली प्रदेश की केजरीवाल सरकार दोनों ही अन्ना आन्दोलन के ही प्रतिफल हैं। केन्द्र की मोदी सरकार का कामकाज कैसा रहा है इसका प्रमाणपत्र अन्ना का यह पत्र ही बन जाता है जिसमें कहा गया है कि तीस बार पत्राचार करने के बावजूद एक बार भी जवाब तक नही आया। यही नही इससे भी बड़ा प्रमाणपत्र है मोदी सरकार द्वारा भ्रष्टाचार निरोधी अधिनियम को ही संशोधित कर देना। नये संशोधित अधिनियम के जुलाई 2018 से लागू हो जाने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी शिकायत करना आसान नही होगा। बल्कि यदि कहीं किसी शिकायत की जांच के बाद किसी के खिलाफ मामला खड़ा भी हो जाता है तो उसे आगे चलाने के लिये सरकार की पूर्व अनुमति चाहिये। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार व्यवहारिक रूप से भ्रष्टाचार के प्रति कितनी गंभीर है। सरकार के कार्यकाल के अन्तिम दिनों में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच ऐजैन्सीयां कितनी सक्रिय हो उठी हैं उससे यही सामने आता है कि भ्रष्टाचार केवल राजनीतिक विरोधीयों को दबाने का ही एक साधन रह गया है, इससे अधिक कुछ नही। इस सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ है या नही इसका प्रमाण राफेल सौदा और सीबीआई के शीर्ष अधिकारियोें के झगड़े से बड़ा और क्या हो सकता है।
इस परिदृश्य में सवाल उठता है कि क्या आज लोकपाल/लोकायुक्त नियुक्त होने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? नहीं इसके लिये तो मौजुदा कानून भी पर्याप्त है लालू यादव और ओम प्रकाश चैटाला को सज़ा के लिये लोकपाल की आवश्यकता नही पड़ी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिबद्धता चाहिये। आज की सरकार आम आदमी के प्रति कितनी गंभीर है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित करने में 3000 करोड़ खर्च किया गया है यह सामने आया है। इस देश की आबादी 125 करोड़ है यदि यह प्रतिमा लगाने की बजाये हर व्यक्ति को एक- एक करोड़ दे दिया जाता तो देश की स्थिति वैसे ही बदल जाती। यह दिया जा सकता था लेकिन ऐसा हुआ नही क्योंकि आम आदमी को संपन्न बनाना उद्देश्य नही है उसको केवल वोट के लिये इस्तेमाल करना ही मकसद है। अभी चुनावों में राजनीतिक दलों ने जिस तरह के वायदे मतदाताओं से किये हैं वह सब प्रलोभन की परिभाषा में आते हैं। लेकिन हमारा चुनाव आयोग इन प्रलोभनों पर पूरी तरह खामोश है। चुनाव प्रचार के लिये एक आचार संहिता जारी कर दी जाती है। लेकिन इसकी उल्लंघना करने पर सजा कोई नही है क्योंकि इसे अभी तक अपराध अधिनियम के दायरे में नही लाया गया है। इस पर केवल चुनाव जीतने वाले के खिलाफ याचिका ही दायर की जा सकती है जिसका फैसला अगले चुनावों से पहले आने की कोई संभावना नही होती है। चुनाव आयोग ने चुनाव का खर्च इतना बढ़ा दिया है कि केवल राजनीतिक दल ही चुनाव लड़ सकते हैं आम आदमी नहीं।
इसलिये आज भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये लोकपाल का नियुक्त होना कोई उपाय नही रह गया है। इसके लिये सबसे पहले चुनाव प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। आचार संहिता उल्लंघन को दण्डनीय अपराध बनाने की आवश्यकता है और इसमें उम्मीदवार के साथ ही संबंधित राजनीतिक दल के खिलाफ भी दण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिये। जिसके भी खिलाफ कहीं कोई आपराधिक मामला दर्ज हो उसे चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिये। आज जिन माननीयों के खिलाफ मामले हैं वह दशकों तक इनकी जांच और फैसला नही होने देते। यदि चुनाव लड़ने पर रोक लग जाये तो यह लोग स्वयं अपने मामलों के शीघ्र निपटारे का प्रचार करेंगे। राजनीतिक दलों के खर्च की सीमा तय होनी चाहिये और किसी भी दल का चुनावी वायदा व्यक्तिगत प्रलोभन के दायरे में नही आना चाहिये इसकी व्यवस्था की जानी चाहिये। इसलिये अन्ना से यह अनुरोध है कि वह लोकपाल को मुद्दा बनाने की बजाये इन चुनाव सुधारों को मुद्दा बनाये। इसके लिये जन आन्दोलन का आह्वान करें। अन्यथा आज जो आन्दोलन का आह्वान किया जा रहा है उससे कोई परिणाम नही निकलेगा। उल्टे इससे सत्तारूढ़ दल को ही लाभ मिलेगा और फिर यह आरोप लगेगा कि यह प्रस्तावित आन्दोलन भी संघ/ भाजपा का प्रायोजित है यही आरोप पहले भी लग चुका है।
ऐसे में आज यदि अन्ना सही में भ्रष्टाचार पर लगाम लगती देखना चाहते हैं तो उनके आन्दोलन का मुद्दा लोकपाल की जगह यह चुनाव सुधार होना चाहिये। जिस सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन करके शिकायत करने का रास्ता कठिन बना दिया और अन्ना जैसे व्यक्ति के पत्रों का जवाब तक नही दिया उस सरकर की नीयत का खुलासा इससे अधिक और क्या हो सकता है। इसलिये आज नैतिकता की मांग यह हो जाती है कि अन्ना इस सरकार को ही सत्ता से बाहर करने का आह्वान करें ताकि आम आदमी को यह विश्वास हो जाये की जो सरकार उनके ही आन्दोलन का प्रतिफल रही है। अन्ना गुण दोष के आधार पर उस सरकार का भी विरोध कर सकते हैं।

देश की शीर्ष जांच ऐजैन्सी सीबीआई के शीर्ष अधिकारियों के बीच उभरे विवाद और इस विवाद के कारण जो कुछ घटा वह सब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच चुका है और इस पर सुनवाई चल रही है। इस सुनवाई और उसके अन्तिम परिणाम पर पूरे देश की नज़रें लगी हुई हैं। कानून की बारीकियों पर परत दर परत सवाल और बहस हो रही है और इसका जो भी परिणाम परिणाम रहेगा उसका देश पर दूरगामी असर पड़ेगा इसमें कोई दो राय नही है। अस्थाना के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर कानून की नजर में कैसे आंकलित होती है और आलोक वर्मा तथा अस्थाना को सीबीआई द्वारा छुट्टी पर भेजना जायज़ था या नही? इन सब सवालों के जवाब इस विवाद के फैसले में आ जायेंगें लेकिने क्या इस फैसले का असर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच पर पड़ेगा? यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय देश की संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक सैंकड़ो में ऐसे लोग जब प्रतिनिधि होकर बैठे हैं जिनके खिलाफ वर्षों से आपराधिक मामले लंबित चल रहे हैं इन मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय चिन्ता व्यक्त करते हुए अधिनस्थ न्यायपालिका को ऐसे लोगों के मामले दैनिक आधार पर सुनवाई करते हुए एक वर्ष के भीतर निपटाने के निर्देश दे चुका है। इसके लिये विशेष अदालतें तक गठित करने के निर्देश हैं? लेकिन क्या इन निर्देशों की अनुपालना हो पायी है? क्या माननीयों के खिलाफ मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर हो पायी है? क्या सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्देशों की अनुपालना पर रिपोर्ट तलब की है?
इन सवालों का यदि निष्पक्षता और निर्भिकता से आंकलन किया जाये तो शायद जवाब नही मे ही होगा क्योंकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में ही जहां पर माननीयों के खिलाफ केवल सात दर्जन के करीब मामले दर्ज हैं वहां पर ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार न कोई सुनवाई हो पायी है और न ही कोई फैसला आ पाया है। यहां पर सरकार और उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत के गठन कीे आवश्यकता इसलिये नही समझी थी क्योंकि मामलों की संख्या कम थी। लेकिन क्या जो मामलें हैं उनकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार नही हो जानी चाहिये थी परन्तु ऐसा हुआ नही है बल्कि कई माननीयों के मामलों को अदालत से वापिस लेने के प्रयास किये जा रहे हैं यदि हिमाचल में यह स्थिति हो सकती है तो देश के अन्य राज्यों में भी ऐसा ही होगा ऐसा माना जा सकता है। कई मामलों में अदालत से कई अधिकारियों/कर्मचारियों के खिलाफ कारवाई करने के निर्देश सरकार को मिले हैं। लेकिन सरकार की ओर से कोई कारवाई नही की गयी है। इसमें सबसे ताजा उदाहरण कसौली कांड का है। जिसमें एनजीटी ने कुछ लोगों को नामतः चिन्हित करते हुए उनके खिलाफ कारवाई करने के निर्देश प्रदेश के मुख्य सचिव को दिये थे। एनजीटी के इस फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी मोहर लगा दी है। लेकिन इन निर्देशों पर आज तक कोई कारवाई नही हुई है। इसी तरह धर्मशाला के मकलोड़गंज बस अड्डा प्रकरण पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश के मुख्य सचिव को दोषी कर्मचारियों/अधिकारियों को चिन्हित करके उनके खिलाफ कारवाई के निर्देश दिये थे। फिर इस मामले में जब एक अपील सर्वोंच्च न्यायालय में आयी तब शीर्ष अदालत ने अपने निर्देशों को संशोधित करते हुये यह जिम्मेदारी मुख्य सचिव की वजाये सत्रा न्यायधीश कांगड़ा धर्मशाला को दे दी थी। तीन माह में यह रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में जानी थी जो कि आज तक नही जा पायी है और इन निर्देशों को हुए करीब दो वर्ष हो गये हैं। ऐसे ही प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देशों पर एक अभय शुक्ला कमेटी गठित हुई थी इस कमेटी ने अपनी रिर्पोट में खुलासा किया है। चम्बा में 65 किलोमीटर तक रावी हाईडल परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुकी है। ऐसी ही एक एसआईटी जेपी उद्योग थर्मल प्लांट को लेकर एडीजीपी के तहत गठित की गयी थी। यह एसआईटी भी अपनी रिर्पोट उच्च न्यायालय को सौंप चुकी है। लेकिन इन रिर्पोटों पर आज तक कोई कारवाई नही हुई है। इससे यह जन धारणा बन जाती है कि कुछ भी करते रहो अन्ततः कोई कारवाई नही होती है क्योंकि इन मामलों में ऐसा ही हुआ है जबकि यह अति संवेदनशील और गंभीर मामले थे।
जब शीर्ष अदालत के निर्देशों को सरकारी तन्त्र ऐसे हल्के से लेगा तब भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी कोई ईमानदारी से गंभीरता आ पायेगी यह उम्मीद करना ही बेमानी हो जाता है। जब देश की शीर्ष ऐजैन्सी के शीर्ष लोगों के खिलाफ ही एक दूसरे द्वारा रिश्वतखोरी तक के आरोप जनता के सामने आ जाये तो फिर आम आदमी किस पर और कैसे भरोसा करे। जो स्थिति इस समय सामने है उस पर एक बार फिर आम आदमी की नजरें सर्वोच्च न्यायालय पर लगी हुई हैं। सवाल शीर्ष ऐजैन्सी की विश्वनीयता बहाल करने का ही नही है। बल्कि आम आदमी को आश्वस्त करने का है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीरता है और देाषी को अवश्य सजा मिलेगी। इस संद्धर्भ में यह सुझाव है कि जब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई शिकायत आती है उस पर तुरन्त मामला दर्ज किया जाये जो अबतक नही हो रहा है। मामला दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी को छः माह से एक वर्ष के भीतर जांच पूरी करके चालान दायर करने के निर्देश दिये जायें जब तक जांच पूरी न हो जाये और अदालतत से फैसला न आ जाये तब तक जांच अधिकारी को मामले से ना बदला जाये जो अधिकारी मामला दर्ज करे वही अदालत में उसकी पैरवी के समय मामले से संवद्ध रहे। जब तक जांच अधिकारी और उसके कन्ट्रोलिंग अधिकारी को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार बनाना होगा बल्कि जांच अधिकारी की पदोन्नति इस पर आधारित की जाये कि उसने कितने मामलों मे जांच की और उसमें दोषीयों को सजा मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे निर्देश जारी भी कर रखे हैं कि यह देखा जाये कि कोई आपराधिक मामला अदालत में यदि सिद्ध नही हो पाया तो उसमें देखा जाये कि जांच में कमी रहने के कारण या सरकारी वकील द्वारा ठीक से पैरवी न करने के कारण मामला असफल हुआ है। जिसका भी दोष निकले उसके खिलाफ कारवाई की जाये। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नही रहा है। दशकों तक मामले जांच में लंबित रह रहे हैं। कई कई अधिकारी बदल जाते हैं और इससे किसी की भी जिम्मेदारी नही रह जाती है। ऐसे में यदि हम सही में भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर और ईमानदार हैं तो इन मामलो की जांच को समयवद्ध करने के साथ ही जांच अधिकारी और सरकारी वकील को इसमें जवाबदेही बनाना होगा। यह जवाबदेह तन्त्र सरकारों से उम्मीद करना संभव नही रह गया है। इसके लिये सर्वोच्च न्यायालय को ही कोई व्यवस्था खड़ी करनी होगी। यदि ऐसा न हो पाया तो देश में शीघ्र ही अराजकता फैल जायेगी क्योंकि सीबीआई विवाद से सरकार और ऐजैन्सी दोनों पर से ही आम आदमी का विश्वास उठ चुका है।
शिमला/शैल। अभी देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इनमें किसकी सरकारें बनेगी इसका पता परिणाम आने पर ही लगेगा। इन चुनावों के बाद अगले वर्ष मई में लोकसभा के लिये चुनाव होंगे। मोदी सरकार का सत्ता में इस कार्यकाल का यह अन्तिम वर्ष चल रहा है। इस चुनावी परिदृश्य को लेकर अभी तक केवल एक ही बात स्पष्ट है कि 2014 में मोदी भाजपा के पक्ष मे जो माहौल बन गया था वैसा आज बिल्कुल नही है। इस दौरान जिन राज्यों में भी लोकसभा के लिये उपचुनाव हुए हैं वहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। इसके अतिरिक्त भी पिछले दिनों गुजरात और कर्नाटक विधानसभाओं के लिये हुए चुनावों में भी गुजरात में भले ही भाजपा की सरकार बन गयी है लेकिन वहां कांग्रेस को भी बड़ी जीत हासिल हुई है। बल्कि इसी जीत के परिणामस्वरूप कर्नाटक में भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी। इस परिदृश्य में पांच राज्यों में हो रहे चुनाव बहुत हद तक लोकसभा की तस्वीर साफ कर देंगे। यदि इन राज्यों में भाजपा सत्ता में न आ पायी तो उसके लिये लोकसभा में जीत हासिल कर पाना आसान नही होगा। इस दृष्टि से इन राज्यों में हो रहे चुनाव प्रचार और उसमें उभर रहे मुद्दों पर नज़र रखना आवश्यक हो जाता है क्योंकि यही मुद्दे लोकसभा चुनावों में भी केन्द्रिय मुद्दे होंगे।
2014 के लोकसभा चुनावों में यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार इतना बड़ा मुद्दा बन गया था कि सरकार भ्रष्टाचार का पर्याय ही प्रचारित हो गयी थी। इसी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन आया और लोकपाल की स्थापना मुख्य मांग बन गयी। सरकार को संसद में इस आश्य का बिल लाना पड़ा और यह विधेयक अन्ततः पारित भी हो गया। विधेयक आने के साथ ही अन्ना का आन्दोलन भी समाप्त हो गया और फिर सत्ता भी लोगों ने पलट दी। लेकिन नयी सत्ता अपने पूरे कार्यकाल में लोकपाल की नियुक्ति नही कर पायी। उल्टे भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन कर दिया गया। संशोधित कानून के तहत कोई भ्रष्टाचार की शिकायत कर पायेगा इसको लेकर कई सवालिया निशान खड़े हो गये हैं। इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों पर लोगों ने सत्ता पलटी थी उनमें से एक भी मुद्दे पर मोदी के कार्यकाल में कोई परिणाम नही आया है। उल्टे आज देश की शीर्ष जांच ऐजैन्सीयों पर इन्हीं ऐजैन्सीयों के शीर्ष अधिकारियों ने एक दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के जिस तरह से आरोप लगाये हैं उससे न कवेल इनकी अपनी ही विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गये बल्कि आम आदमी के विश्वास को गाहरा आघात लगा है।
आज सीबीआई का मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंचा हुआ है। इसी मामले में सीबीआई के ही उसी डीआईजी ने जो विशेष निदेशक अस्थाना के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच कर रहा है ने सर्वोच्च न्यायालय में वाकायदा शपथपत्र देकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सीजीसी केन्द्र सरकार के कानून सचिव और पीएमओ के ही राज्य मन्त्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी के खिलाफ जो रिश्वतखोरी के आरोप लगाये हैं वह सबसे अधिक चिन्ता का विषय बन जाता है। आज तक मोदी सरकार यह दावा करती रही है कि उसके किसी अधिकारी या मन्त्री पर भ्रष्टाचार के सीधे आरोप नही लगे हैं। लेकिन आज सीबीआई के कार्यरत डीआईजी मुनीष कुमार सिन्हा ने शपथपत्र दायर करके सर्वोच्च न्यायालय में सीधे उन लोगों पर आरोप लगाये हैं जो सीधे प्रधानमन्त्री मोदी से जुड़े हैं। इस डीआईजी के आरोप और निदेशक आलोक वर्मा का सीबीआई के पास दिया गया ब्यान सबकुछ जनता की अदालत में पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय इससे खफा है वह ऐजैन्सी की विश्वसनीयता बहाल करना चाहती है। लेकिन आज शीर्ष अदालत को भी यह समझना होगा कि यह मुद्दा केवल अधिकारियों की प्रतिष्ठा उनके स्थानान्तरण तक का ही नही रह गया है। आज इन आरोपों की निष्पक्ष जांच देश की जनता के सामने आनी चाहिये और उसे यह लगना भी चाहिये कि सही में जांच हुई है। देश की जनता के भरोसे को अरूणाचल के स्व. मुख्यमन्त्री कालिखोपुल के आत्महत्या से पूर्व लिखे पत्र से बहुत ठेस लगी है इस पत्र का भी हर पन्ना हस्ताक्षरित है और यह पत्र भी जवाब मांग रहा है यह जवाब भी सर्वोच्च न्यायालय को ही देना होगा। इसी पत्र के साथ पत्रकार राणा अयूब की किताब ‘‘गुजरात फाइल्ज़’’ में दर्ज सारा कथ्य भी जवाब चाहता है क्योंकि राणा अयूब ने दावा किया है कि यह किताब नही बल्कि एक स्टिंग आॅप्रेशन है। इस किताब पर आज तक संघ /भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नही आई है।
इस तरह आज डीआईजी सिन्हा का शपथपत्र, कालिखोपुल का सुसाईड नोट और राणा अयूब की ‘‘गुजरात फाईल्ज़’’ जो कथ्य और तथ्य देश की जनता के सामने रख रहे हैं उसे गंभीरता से लेते हुए प्रधानमंत्री और देश की शीर्ष अदालत की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस पर कोई जवाब देश की जनता के सामने रखे। क्योंकि प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय इस सबसे सीधे जुड़े हैं।
शिमला/शैल। राम मन्दिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद एक लम्बे अरसे से देश की राजनीति का एक केन्द्रिय मुद्दा बना हुआ है। दिसम्बर 1992 को देश के भाजपा शासित राज्यों की सरकारें कैसे राम मन्दिर आन्दोलन की बलि चढ़ गयी थी यह सब हम देख चुके हैं। उसके बाद राममन्दिर कैसे चुनावी मुद्दा बन गया और इसी मुद्दे पर केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हो गया यह भी देश देख चुका है। लेकिन राम मन्दिर के नाम पर सत्ता परिवर्तन होने के बावजूद आजतक मन्दिर का निर्माण नही हो पाया है। यह निर्माण न हो पाने के लिये अदालत में इस मुद्दे के लंबित होने को कारण बताया जा रहा है। स्मरणीय है कि इस मुद्दे पर 30 सितम्बर 2010 को इलाहबाद उच्च न्यायालय की तीन जजों पर आधारित पीठ का फैसला आया था। इस फैसले में इसकी 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन बराबर हिस्सो में बांट दिया गया था। एक हिस्सा जहां पर राम की मूर्ति विराजमान है उसे रामलल्ला विराजमान को, राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्माेही अखाड़े को और बचा हुआ एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया था। इलाहबाद उच्च न्यायालय में इसकी सुनवाई के दौरान 524 दस्तावेज, संस्कृत, पाली, फारसी, अरबी, उर्दू और हिन्दी के 42 ग्रंथों के संद्धर्भ में 87 गवाहों के कई हजार पृष्ठों में दर्ज ब्यान रिकार्ड पर आ चुके हैं। इसके अतिरिक्त पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1970, 1976-77, 1992 और 2003 में की गयी खुदाई में मिले विभिन्न प्रमाणों को भी इसका हिस्सा बनाया गया है। इस सबकी समीक्षा करने के बाद पीठ ने यह फैसला दिया है लेकिन मामले के तीनों पक्षकार इस फैसले से सहमत नही हुए और तीनों ही सर्वोच्च न्यायालय में अपील में हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अबतक की
सुनवाई में यह कह दिया है कि इसमें और कोई दस्तावेज या अन्य प्रमाण नही सौंपे जायेंगे। जो कुछ इलाहबाद उच्च न्यायालय के सामने आ चुका है उसी पर विचार किया जायेगा। इस तरह यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है। 21 मार्च 2017 तत्कालीन प्रधान न्यायधीश जे एस खेहर की पीठ ने इसे संवदेनशील और जन भावनाओं से जुड़ा मामला माना था और सभी पक्षकारों को सलाह दी थी कि ऐसे संवदेनशील मुद्दों का सबसे अच्छा हल आपसी बातचीत से ही निकाला जा सकता है। लेकिन इस सुझाव पर कोई अमल नही हो पाया। खेहर के बाद दीपक मिश्रा मुख्य न्यायधीश बने उन्होंने कहा था कि वह जनभावनाओं या आस्था के आधार पर फैसला नही कर सकते और किस मामले की सुनवाई कब की जानी चाहिए इसका फैसला न्यायालय अपने विवेक से तय करता है। यदि उसे लगता है कि मामला त्वरित सुनवाई योग्य है तो उस पर तुरन्त पीठ गठित करके सुनवाई शुरू कर देता है। लेकिन इस अयोध्या मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने त्वरित सुनवाई के योग्य न तब माना था और न ही अब माना है। अब मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई की पीठ ने इस पर जनवरी 2019 तक के लिये सुनवाई टाल दी है। जनवरी में इसकी सुनवाई के लिये पीठ गठित की जायेगी और फिर यह करनी है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस रूख पर कुछ हिन्दु संगठनों की तीव्र प्रतिक्रियाएं आयी हैं। इससे जुड़ा साधु समाज पूरी तरह आक्रोशित है। सरकार को अल्टीमेटम तक दे दिये गये हैं। यह मांग की जा रही है कि सरकार इस पर एक अध्यादेश लाकर इस जमीन का अधिग्रहण करके मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे। भाजपा के योगी आदित्यनाथ जैसे नेता भी करके तुरन्त मन्दिर निर्माण शुरू करने की बात कर रहे हैं। इस समय पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इन चुनावों के बाद मई 2019 में लोकसभा चुनाव आने हैं। राम मन्दिर निर्माण को लेकर भाजपा पर यह सवाल दागा जा रहा है कि मन्दिर का निर्माण कब होगा ‘‘मन्दिर वहीं बनायेंगे लेकिन तारीख नही बतायेंगे’’ यह व्यंग्य सुनने को मिल रहा है। यह सवाल अबतक अलग शक्ल लेता जा रहा है कि भाजपा/संघ को राम मन्दिर के बनने में उतनी रूची नही है जितनी आवश्यकता मन्दिर मुद्दे को बनाये रखने की है। मन्दिर बन जाने के बाद मुद्दा समाप्त हो जायेगा और इसका लगातार चुनावी लाभ ले पाना संभव नही रह जायेगा। यदि भाजपा/संघ सही मन्दिर निर्माण के प्रति गंभीर होते तो मोदी सरकार जब केन्द्र में सत्ता में आयी थी तभी से इस दिशा में तुरन्त कदम उठाये होते तो शायद सरकार के कार्यकाल के शुरू के ही दो तीन वर्षों में मन्दिर बन भी चुका होता। लेकिन सरकार ने न तो अदालत में इस मामले की शीघ्र सुनवाई किये जाने के कोई प्रयास किये और न ही जब जमीन अधिग्रहण करने का प्रयास किया गया। भाजपा/संघ ने जब राहूल गांधी के मन्दिरों में जाने, उसके हिन्दु होने और मानसरोवर यात्रा आदि पर सवाल उठाये थे तब से यह धारणा पुख्ता हो गयी है कि इन्हे मन्दिर /मस्जिद, हिन्दु/मुस्लिम केवल चुनावी मुद्दों के लिये चाहिये। आज जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं वहां भाजपा ने कितने मुस्लमानों को चुनाव में उम्मीदवार बनाया है? शायद किसी को नही। इसी से मोहन भागवत के उस ब्यान की सच्चाई पर खीज सकती है कि मुस्लिमों के बिना देश संभव ही नही है। धारा 370 से लेकर युनिफाईड सिविल कोड जैसे जितने मुद्दों पर 2014 के चुनावों तक बाते की जाती थी उन पर सत्ता में आने के बाद क्या कदम उठाये गये। जिस आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक स्पष्ट फैसला दे दिया था उसे संसद में लाकर पलट दिया गया क्योंकि संसद में आपका प्रचण्ड बहुमत था। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि आरक्षण पर यह किया जा सकता था तो इसी प्रचण्ड बहुमत का सहारा लेकर मन्दिर से धारा 370 तक के मुद्दों को क्यों नही सुलझा लिया गया? जवाब सीधा है कि यदि यह सब सुलझ गया होता तो आज देश बेरोजगारी, मंहगाई और भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर सरकार को घेर लेती। लेकिन आज मन्दिर, हिन्दु-मुस्लिम के फर्जी मुद्दों के सहारे राफेल और नोटबंदी जैसे गंभीर मुद्दों से बचने का जो प्रयास किया जा रहा है वह शायद संभव नही होता।
इस परिदृश्य में यह बहुत सही है कि अयोध्या मुद्दे का हल अस्था और जन भावनाओं के आधार पर नही करने की जो बात सर्वोच्च न्यायालय ने की है उसका स्वागत किया जाना चहिये। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समाने जो विवाद खड़ा हुआ था यह शुद्ध रूप से ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर है और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसे उसी रूप में सुनने की बात की है यह एक सकारात्मक सोच है। मालिकाना हक का फैसला दस्तावेजों के आधार पर हो जायेगा और उसे उसी रूप में स्वीकार भी किया जाना चहिये। इसमें सर्वोच्च न्यायालय से यह आग्रह रहना चाहिये कि इस मामले में लोकसभा चुनावों से पहले कोई सुनवाई न की जाये और चुनावों के बाद इसे त्वरित आधार पर निपटा दिया जाये ताकि यह फिर किसी चुनाव का मुद्दा न बन पाये। क्योंकि यह विवाद अबतक कई सरकारों और लोगों की बलि ले चुका है और इसमें आगे ऐसा न हो इससे बचने का प्रयास किया जाना आवश्यक है। चुनाव देश के भाग्य का फैसला करता है। देश आगे भविष्य में किस ओर जाने वाला है इसका निर्धारण चुनाव करता है। इसलियेे देश का भविष्य भावनात्मक मुद्दों पर नहीं वरन् गंभीर मुद्दों पर तय किया जाना चाहिये।
जयराम सरकार ने प्रदेश में 80,000 करोड़ का निवेश लाने का एक स्वप्न देखा है और इसे पूरा जमीन पर उतारने के लिये देश के भीतर और प्रदेश के बाहर विदेशों में भी निवेशकों के साथ बैठकें आयोजित करने जा रही है। इस संद्धर्भ में मुख्यमन्त्री/उद्योगमंत्री तथा मुख्य सचिव की अध्यक्षता में दो कमेटीयों का गठन किया जा रहा है। विदेशों में संभावित निवेशकों के साथ यह बैठकें आयोजित करवाने के लिये दूतावासों का भी सहयोग लेगी। इस निवेश के लिये उद्योग, ऊर्जा, पर्यटन एवम् स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र भी सरकार ने चिन्हित कर लिये हैं। इस पूरे देश/विदेश के आयोजन पर करीब 50 करोड़ प्रदेश सरकार खर्च करने जा रही है।
जिस प्रदेश का कर्जभार 50 हजार करोड़ को पहुंच चुका हो उस प्रदेश में 80 हजार करोड़ का देशी /विदेशी निवेश लाने का स्वप्न देखना एक बहुत बड़ी बात है। ईश्वर करे कि यह प्रयास एक दिवा स्वप्न बन कर ही न रह जाये। क्योंकि इस सरकार के पहले पूर्व सरकारों ने भी ऐसे प्रयास किये थे। निवेशकों को सुविधायें उपलब्ध करवाने के लिये कई नियमों/कानूनो का सरलीकरण किया गया था लेकिन अन्तिम परिणाम लगभग शून्य ही रहे हैं। आज उद्योगों के संद्धर्भ में प्रदेश का वर्तमान परिदृश्य क्या है यह देखना और समझना बहुत आवश्यक होगा। वीरभद्र शासन में जब ऐसा प्रयास किया गया था उस समय उद्योग विभाग ने इस आश्य का एक प्रपत्रा तैयार किया था। इस प्रकरण के मुताबिक प्रदेश में छोटे-बड़े पंजीकृत उद्योगों की संख्या 40 हजार कही गयी थी। इनमें निवेशकां का 17 हजार करोड़ निवेश बताया गया था तथा इन उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 2,58000 कही गयी थी। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक इन उद्योगों को 2005 से 2014 के बीच 35000 हजार करोड़ के आद्यौगिक पैकेज भी मिले हैं। इस तरह 52 हजार करोड़ के निवेश से केवल तीन लाख लोगों को ही लाभ मिल पाया है। इसी के साथ एक कड़वा सच्च यह भी है कि प्रदेश का खादी बोर्ड और वित्त निगम जैसे संस्थान जो केवल उद्योगों को वित्तिय एवम् अन्य सुविधायें देने के लिये ही स्थापित किये थे आज बन्द होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। दोनो संस्थान अपने कर्जदारों का अता-पता खोजने के लिये कई योजनाएं तक घोषित कर चुके है लेकिन हर प्रयास असफल ही रहा है। यदि वित्त निगम द्वारा बांटे गये ट्टणों और उनकी वसूली में बरती गयी अनियमितताओं का गंभीरता से संज्ञान लिया जाये तो इसके प्रबन्धन बोर्डों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किये जाने की नौबत आ जायेगी। पर्यटन का पर्याय बन चुके होटल व्यवसाय की अनियमितताओं का संज्ञान सारी शीर्ष अदालतें ले चुकी हैं। इस प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश घोशित करते हुए यह माना और प्रचारित-प्रसारित किया गया था कि अकेले ऊर्जा से प्रदेश के सारे संकट हल हो जायेंगे। लेकिन आज ऊर्जा का व्यवहारिक पक्ष यह है कि हर साल इससे आय में कमी होती जा रही है। सीएजी के मुताबिक ऊर्जा का योगदान प्रदेश के राजस्व में लगातार कम होता जा रहा है इस क्षेत्रा का 2012-13 में 46.28% योगदान गैर कर राजस्व के रूप में था जो कि कर 2016-17 में घटकर 41.95% रह गया है। इसी तरह कर राजस्व 2012-13 में 5.68% से घटकर 2016-17 में 4.54% रह गया है जबकि ऊर्जा के क्षेत्रा में सार्वजनिक क्षेत्रा के कुल निवेश का करीब 86% निवेशित है। ऊर्जा से हर वर्ष कर और गैर कर राजस्व में कमी आ रही है। सीएजी के मुताबिक जब उत्पादन लागत तो 4.50 रूपये यूनिट आ रही है और इसकी बिक्री करीब 2.80 यूनिट हो रही है। तब ऐसे में इस क्षेत्र के सहारे प्रदेश कर्ज के चक्रव्यूह से कैसे और कब बाहर निकल पायेगा?
आज के व्यवहारिक परिदृश्य में यदि प्रदेश की आद्यौगिक स्थिति का आंकलन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी औद्योगिक नीतियां प्रदेश की स्थितियांं के संद्धर्भ में प्रसांगिक नही रह पायी है क्योंकि जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ तभी आने वाली सरकार नई नीति लेकर आ गयी। यहां तक हुआ है कि 1990 से आज चार बार भाजपा सत्ता में और चारों बार अलग- अगल पॉलिसियां आयी। यही हालत कांग्रेस की रही है। किसी भी सरकार ने प्रदेश की जनता को यह नही बताया कि पिछली पॉलिसी का मूल्यांकन क्या रहा है और उसमें क्या व्यवहारिक कमियां रही है। प्रदेश में 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आयी थी तब पहली बार औद्योगिक पॉलिसी लायी गयी। प्रदेश में चिन्हित हुए हर उद्योग के लिये सब्सिडी दी गयी। लेकिन आज उस समय के लगे उद्योगों में से शायद पांच प्रतिशत भी मौजूद नही हैं। जब - जब उद्योगों को राहतें उपलब्ध रही उद्योग यहां पर रहे और जिस दिन राहत पैकेज समाप्त हो गया उसके बाद उद्योग पलायन कर गये। इसका सीधा सा अर्थ है कि हमारी पॉलिसीयों में व्यवहारिक कमीयां रही हैं।
पिछले दिनों प्रदेश के बैंको के साथ सरकार की बैठक हुई थी बैठक में यह सामने आया था कि हमारे बैंकों के पास लोगों की जितनी जमा पूंजी है उसके अनुपात में क्रैडिट बहुत कम है। क्रैडिट कम होने की चिन्ता करते हुए ऋण प्रक्रिया को और सरल करने तथा कई प्रोत्साहन देने की बात की गयी थी। सरकार ने कई घोषणाएं भी की थी लेकिन व्यवहार में ऐसा कुछ भी नही हो सका है। बैंक ऋण देते हुए सरकार की घोषणाओं से अपने को बांध नही पा रहे हैं क्योंकि बैंको को ऋणों के एनपीए होने का भी बराबर डर बैठा हुआ है। माना जा रहा है कि प्रदेश के बैंकों में जमा पड़े पैसे के निवेश के लिये ही सरकार निवेशकों को आमन्त्रित करने का प्रयास कर रही है। स्वभाविक भी है कि जब निवेशक प्रदेश के बैंको की अच्छी सेहत देखेगा तो वह निवेश के लिये यहां आ जाये। क्योंकि हर निवेशक अपनी जेब से केवल 25 से 30% तक ही निवेशित करता है और शेष वह वित्तिय संस्थानों से ऋण लेता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि क्या यह निवेशक सरकार के प्रोत्साहनों से प्रभावित होकर यहां निवेश करेंगे अन्यथा स्थिति होगी कि जिस दिन प्रोत्साहन खत्म उसी दिन का पलायन।
इसलिये आज सरकार को यह बड़ा प्रयास करने से पहले एक श्वेतपत्र प्रदेश के मौजुदा उद्योगों पर जनता के सामने रखना चाहिये। जिसमें यह दर्ज रहे कि उद्योग का कुल निवेश क्या है और उसमें ऋण का अनुपात कितना है। उसमें कितने लोगों को प्रत्यक्ष /अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध है। उस उद्योग से सरकार को कितना कर और गैर कर राजस्व प्राप्त हो रहा है इस प्रयास पर पचास करोड़ सरकार खर्च करने जा रही है। यह प्रदेश की जनता का पैसा है और वह भी कर्ज का। यह प्रयास कहीं एक सैर सपाटा ट्रिप होकर ही न रह जाये इसलिये प्रदेश की जनता को यह जानने का हक है।