Wednesday, 04 February 2026
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क्या बढ़ते चुनाव खर्च पर रोक लगाई जा सकती है

शिमला/शैल। इन दिनों ‘‘एक देश एक चुनाव’’ पर एक चर्चा चल रही है। यह सुझाव महामहिम राष्ट्रपति ने अपने संसद के संबोधन में दिया था। आज इस पर देश के चुनाव आयोग ने कह दिया है कि वह इसके लिये तैयार है। विधि आयोग ने इस पर राजनीतिक दलों के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं। कुछ दलों ने इससे सहमति जताई है तो कुछ ने असहमति। भाजपा और कांग्रेस ने इस पर अपना पक्ष आयोग के सामने नहीं रखा है। जिन दलों ने सहमति व्यक्त की है उन्होंने भी यह कहा है कि यह 2019 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव में ही हो जाना चाहिये। यह विचार अमली शक्ल ले पाता है या जुमला बनकर ही रह जाता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन राष्ट्रपति के माध्यम से बाहर आये इस विचार पर सत्तारूढ़ भाजपा की सहमति रही है या नहीं, या यह राष्ट्रपति का ही एक आदर्श विचार रहा है यह भी सामने नहीं आ पाया है। लेकिन यह विचार भाजपा के लिये एक बड़ा सवाल बन जायेगा क्योंकि इस विचार के लिये तर्क दिया जा रहा है कि इससे समय और धन दोनों की बचत होगी। व्यवहारिक रूप से यह कदम सही है कि पांच साल के कार्यकाल में केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक को विधानसभा /लोकसभा/शहरी निकायों और ग्राम पंचायतों के चुनावों का सामना करना पड़ता है। हर चुनाव में आदर्श संहिता लागू होती है और उतने समय तक विकास कार्य प्र्र्रभावित होते हैं। इस गणित से सारे नहीं तो कम से कम लोकसभा और विधानसभा के चुनाव तो एक साथ हो जाने चाहिये। राजनीतिक दलों को अपने राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हित में यह फैसला सर्वसम्मति से ले लेना चाहिये।
इस समय अधिकांश राज्यों में भाजपा की ही सरकारे हैं। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के पास बहुत कम राज्य है। बल्कि राष्ट्रीय दलों के नाम पर आज भाजपा और कांग्रेस दो ही दल रह गये हैं। क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्य से बाहर नहीं हैं। इस नाते भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही राष्ट्रहित में यह फैसला लेकर ‘‘एक देश एक चुनाव’’ को सार्थक बनाने में आगे आना चाहिये। यदि सही में ही हम समय और धन दोनों को बचाना चाहते हैं। इस समय चुनाव कितना महंगा हो गया है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने अधिकारिक तौर पर हिमाचल जैसे राज्य के लिये लोकसभा के लिये यह खर्च सीमा 70 लाख कर रखी है। इसका अर्थ यह है कि चुनाव आयोग भी मानता है कि लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिये 70 लाख रूपये खर्च हो सकते हैं। खर्च की यह सीमा उम्मीदवार पर व्यक्तिगत तौर पर लागू होती है, राजनीतिक दल पर नहीं। राजनीतिक दल प्रति उम्मीदवार कई करोड़ खर्च कर सकता है उसके लिये कोई सीमा नहीं है। यहां पर यह सवाल सामने आता है कि ऐसे कितने लोग हैं जो 70 लाख सफेद धन खर्च करके चुनाव लड़ सकता हो, शायद कोई भी नहीं। इसका यह अर्थ है कि चुनाव लड़ने के लिये व्यक्ति को किसी न किसी दल का सहारा लेना ही पड़ेगा। क्योंकि राजनीतिक दलों में आज चुनाव जीतने के लिये विचारधारा की बजाये चुनाव खर्च ही प्रमुख बन गया है। बल्कि इसके लिये होड़ लग जाती है कि कौन कितना अधिक खर्च करता है। राजनीतिक दलों के पास यह धन उद्योगपतियों से कैसे आता है और सरकार बनने पर किस शक्ल में वापिस किया जाता है और उसका भ्रष्टाचार, मंहगाई और बेरोज़गारी पर कैसे प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है इस पर महींनो बहस की जा सकती है और ढ़ेरों लिखा जा सकता है।
इसलिये आज जब यह मुद्दा राष्ट्रपति के माध्यम से सार्वजनिक बहस का विषय बना है तो इस पर ईमानदारी और गंभीरता से विचार कर लिया जाना चाहिये। इस संद्धर्भ में इसी के साथ जुड़े कुछ प्रसांगिक विषयों पर भी बात कर ली जानी चाहिये। इस समय विधानसभाओं से लेकर संसद तक आपराधिक छवि के सैंकड़ो माननीय बन कर बैठे हुए हैं। हर चुनाव के बाद यह आंकड़े आते हैं, चिन्ता व्यक्त की जाती है लेकिन परिणाम कोई नहीं निकलता। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह निर्देश दे रखे हैं कि माननीयों से जुड़े आपराधिक मामलों में एक वर्ष के भीतर फैसला आ जाना चाहिये चाहे इसके लिये दैनिक आधार पर सुनवाई क्यों न करनी पड़े। इसके लिये विशेष अदालतें तक गठित करने की बात की गयी है लेकिन इसका अब तक कोई परिणाम नहीं निकला है। आपराधिक छवि के व्यक्ति का भी यही तर्क होता है कि वह जनता की अदालत से चुनकर आया है। यहां यह सवाल उठता है कि क्या जब वह व्यक्ति चुनाव लड़ता है तो क्या उसका सारा रिकॉर्ड जनता के सामने आ पाता है। क्या जनता को पता होता है कि उसके खिलाफ किस तरह के कितने आपराधिक मामले कब से चल रहे हैं। आपराधिक छवि के लोगों को चुनाव लड़ने का अधिकार ही न रहे इसको लेकर अभी तक न तो चुनाव आयोग, न ही सर्वोच्च न्यायालय और न ही संसद कोई व्यवस्था दे पायी है। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने भी देश की जनता को यह वायदा किया था कि वह संसद को अपराधियों से मुक्त करवायेंगे। लेकिन यह वायदा पूरा नहीं हुआ है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि राजनैतिक दलों में इस पर सहमति न बन पाये तो क्या यह विचार जुमला बनकर ही रह जाना चाहिये? आज चुनाव राजनैतिक दलों ने अपने बहुआयामी चुनाव प्रचार अभियानों से इतना महंगा बना दिया है कि यह केवल राजनैतिक दलों के ही बस की बात बनकर रह गया है। इसी कारण से हर राजनैतिक दल अपराधियों को अपना उम्मीदवार बना रहा है। धन और बाहुबल के सहारे जनता की अदालत से जीतकर आ रहे हैं। राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिये जनता से ऐसे ऐसे वायदे कर लेते हैं जिन्हें कानूनन सार्वजनिक रिश्वतखोरी की संज्ञा दी जा सकती है लेकिन ऐसे वायदों का संज्ञान न तो चुनाव आयोग ले रहा है और न ही संसद तथा सर्वोच्च न्यायालय। फिर ऐसे वायदों को सरकार बनने के बाद कर्ज लेकर पूरा किया जाता है। ऐसे में राजनीतिक दलों पर बंदिश लगा दी जानी चाहिये कि सार्वजनिक रिश्वतखोरी की परिधि में आने वाले वायदे न किये जायें और ऐसा करने वाले दलों को चुनाव से बाहर कर दिया जाना चाहिये। दूसरा जिस भी व्यक्ति के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला किसी भी स्तर पर लम्बित है उसे भी चुनाव लड़ने का अधिकार न दिया जाये। राजनैतिक दलों पर भी चुनाव खर्च की सीमा होनी चाहिये और आचार संहिता की उल्लंघना को आई पी सी के तहत दण्डनीय अपराध बना दिया जाना चाहिये। यदि यह कदम भी उठा लिये जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारी विधानसभाओं से लेकर संसद तक के चरित्र में एक बड़ा बदलाव आ जायेगा। आज की व्यवस्था में तो उम्मीदवार के साथ आया शपथ पत्र भी सार्वजनिक बहस का विषय नहीं बन पाता है। राजनीतिक दलों के आगे उनके अपने ही उम्मीदवार बौने बन कर रह जाते हैं। आज पहला सुधार तो यह लाना होगा कि उम्मीदवार दलों के व्यवहारिक बन्धक होकर ही न रह जायें।

भाजपा के लिये कसौटी होगा सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

शिमला/शैल। केन्द्रशासित राज्य दिल्ली की चुनी हुई सरकार और एलजी के बीच अधिकारों के वर्चस्व को लेकर चल रही लड़ाई में अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद कानूनी रूप से स्पष्ट हो गया है कि उपराज्यपाल मन्त्रीमण्डल के सर्वसम्मत फैसलो को मानने के लिये बाध्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली सरकार मन्त्रीमण्डल के फैसलों की जानकारी तो एलजी को देगी लेकिन जानकारी देने का अर्थ यह नही होगा कि इन फैसलों पर एलजी की सहमति और स्वीकृति भी आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश पर आधारित पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने 535 पन्नो के फैसले मे पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जनता द्वारा चुनी गयी सरकार के अधिकार सर्वोपरि है। पिछले दिनों जिस तरह से कई बार केजरीवाल केन्द्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैठने और एलजी हाऊस में ही धरने पर बैठ गये थे इस तरह के सारे कृत्यों को भी सर्वोच्च न्यायालय ने अराजकता करार देते हुए इस सबकी भी निन्दा की है। कुल मिलाकर इस ऐतिहासिक फैंसले से यह स्पष्ट हो गया है कि केन्द्र सरकार उप राज्यपालों के माध्यम से केन्द्रशासित राज्यों की सरकारों को परेशान करने /अस्थिर करने का प्रयास नही कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की सर्वत्र सराहना की गयी है और इस फैलसे से एक बार फिर न्यायपालिका पर आम आदमी का भरोसा बढ़ा है जो कि अब अन्यथा टूटने लग पड़ा था। लेकिन इस फैसले पर जिस तरह की प्रतिक्रिया भाजपा की उसके प्रवक्ता डा. पात्रा के माध्यम से आयी है और इसी तरह की प्र्रतिक्रिया एलजी और दिल्ली सरकार की वरिष्ठ अफसरशाही की आयी है उससे लग रहा है कि यह टकराव इस फैसले से ही खत्म होने वाला नही है। क्योंकि पिछले दिनों दिल्ली सरकार के आईएएस अधिकारियों का काम पर न आने का मामला अदालत तक पहुंच गया था तथा मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के बीच अभद्र व्यवहार का प्रकरण पुलिस और अदालत तक जा पहुंचा है उससे जो तनाव और अविश्वास पनपा है वह अपरोक्ष में इन प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने आया है। इसी के साथ यह भी खुलकर स्पष्ट हो गया है कि दिल्ली में जो कुछ वरिष्ठ अफसरशाही और एलजी कर रहे थे वह सब केन्द्र द्वारा ही प्रायोजित था। तीन मसलों भूमि, पुलिस और व्यवस्था पर ही केन्द्र फैसले ले सकता है। शेष सारे विभागों पर दिल्ली सरकार का फैसला ही सर्वोपरि होगा। विजिलैन्स भी राज्य सरकार का ही एक विभाग होता है और इस नाते सरकार कोई भी मामला जांच के लिये विजिलैन्स को भेज सकती है। अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट भी मुख्यमन्त्री से ही फाईनल होगी। अधिकारियां की पोस्टिंग, ट्रांसफर पर सरकार का अधिकार होगा एलजी का नही। संभवतः इसी सबको देखते हुए अधिकारी दुविधा में आ गये हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से दिल्ली सरकार का एलजी पर वर्चस्व प्रमाणित हो गया है। अब इस वर्चस्व को स्वीकार करना और उसे अधिमान देने के अतिरिक्त नौकरशाही के पास और कोई विकल्प नही रह गया है। इस फैसले से दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी तथा केजरीवाल का व्यक्तिगत स्तर पर भी मान सम्मान बढ़ा है। आम आदमी पार्टी इस फैसले से मजबूत होगी इसमें किसी को भी शक नही होगा चाहिये। अगर इस फैसले के बाद भी केन्द्र सरकार एलजी और अफरशाही के माध्यम से फिर टकराव जारी रखते हैं तो इससे अब मोदी सरकार की साख ही राष्ट्रीय स्तर तक प्रभावित होगी। यह सही है कि यह केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ही थी जिसने भाजपा को लोकसभा में इतना प्रचण्ड बहुमत मिलने के बाद ही दिल्ली प्रदेश के चुनावों में ‘‘स्कूटर पार्टी ’’ तक सीमित कर दिया था। क्योंकि लोकसभा की जीत के बाद ही जिस तरह से कुछ भाजपा संघ नेताओं के मुस्लिमों को लेकर ब्यान आने शुरू हो गये थे उसी का नज़ला भाजपा पर गिरा था। आज तो चार वर्षों में और भी बहुत कुछ भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया है। लोकसभा चुनाव सिर पर खड़े हैं इन चुनावों के लिये फिर से एक लोक लुभावन भावनात्मक मुद्दें की तलाश जारी है। इसके लिये जम्मू- कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने और एक देश एक-चुनाव की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। लेकिन यह सारी संभावनाएं अर्थहीन हो जायेंगी यदि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को अक्षरशः अधिमान न दिया गया। यह फैसला भाजपा के भविष्य को प्रभावित करेगा क्योंकि इससे यह सामने आयेगा कि पार्टी न्यायालय का कितना मान सम्मान करती है।

किसानों की आय दोगुना करने के लिए सरकार के प्रयास

शिमला/शैल। कृषि हिमाचल प्रदेश के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है और प्रदेश की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। हिमाचल प्रदेश देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां 89.96 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए कृषि व बागवानी पर प्रदेश के लोगों की निर्भरता अधिक है और कृषि से राज्य के कुल कामगारों में से लगभग 62 प्रतिशत को रोज़गार उपलब्ध होता है। कृषि राज्य आय का प्रमुख स्त्रोत है तथा राज्य के कुल घरेलू उत्पाद का लगभग 10 प्रतिशत कृषि तथा इससे सम्बन्धित क्षेत्रों से प्राप्त होता है।
सरकार द्वारा प्रदेश में कृषि क्षेत्र को नई दिशा प्रदान करने के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं तथा अनेक नई योजनाएं चलाई जानी प्रस्तावित हैं ताकि लोगों को इस क्षेत्र में अधिक से अधिक रोज़गार प्राप्त हो तथा साथ ही कृषि उत्पादन में बढ़ौतरी होने से किसानों की आय में भी वृद्धि हो सके। प्रधानमंत्री ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुणी करने की घोषणा की है। प्रदेश सरकार प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप पूर्ण निष्ठा से किसानों-बागवानों की आर्थिकी को सुदृढ़ करने के हर संभव प्रयास कर रही है।
किसानों-बागवानों कि आय तभी बढ़ेगी जब उनके उत्पाद में वृद्धि होगी। कृषि व बागवानी उत्पाद में वृद्धि के लिए पर्याप्त सिचाई सुविधाओं का होना आवश्यक है। सिचाई सुविधाओं में वृद्धि के उद्देश्य से इस वर्ष तीन नई सिचाई योजनाएं-‘जल से कृषि को बल’, ‘बहाव सिचाई योजना’ व ‘सौर सिचाई योजना’ आरम्भ की जा रही हैं जिसके तहत क्रमशः 250, 150 व 200 करोड़ रुपये व्यय किए जाएंगे। प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना के तहत 338 करोड़ रुपये की लागत से 111 लघु सिचाई योजनाओं के लिए एक नई इकाई मंजूर की गई है जिसके अंतर्गत केन्द्रीय सहायता के रूप में 49 करोड़ रुपये की पहली किस्त प्राप्त हो गई है। इसके साथ ही प्रदेश में लघु सिचाई योजनाओं के विकास के लिए 277 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है। किसानों को सिचाई सुविधा प्रदान करने के लिए ही प्रदेश की पुरानी पेयजल व सिचाई योजनाओं को दुरुस्त किया जाएगा जिसके लिए केन्द्र सरकार को 800 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा जा रहा है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा कृषकों को सिचाई के लिए बिजली की वर्तमान दर 1 रुपये प्रति यूनिट से घटाकर 75 पैसे प्रति यूनिट की जा रही है जिससे प्रदेश के लाखों किसान लाभान्वित होंगे।
प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने के दृष्टिगत मंत्रिमंडल की गत बैठक में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने तथा कृषि लागत कम करने के लिए प्रदेश में ‘प्राकृतिक खेती-खुशहाल किसान’ योजना के कार्यान्वयन के दिशा-निर्देशों को मंजूरी प्रदान कर दी गई है। इस योजना के लिए 25 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना से प्राकृतिक कृषि को नई दिशा मिलेगी तथा किसानों द्वारा खेतों में रासायनिक खादों के उपयोग में कमी आएगी। प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा इस योजना के कार्यान्वयन के लिए पैकेज ऑफ प्रैक्टिसिज तैयार किया जाएगा।
कृषकों की आय बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में फल एवं सब्जी उत्पादन के अंतर्गत अतिरिक्त क्षेत्र को लाया जाएगा। वर्तमान में प्रदेश के 5 जिलों में 300 करोड़ रुपये की जीका (JICA) फसल विविधिकरण योजना लागू की गई है। अब इस योजना के द्वितीय चरण को 1000 करोड़ रुपये की लागत से सभी जिलों में लागू किया जाएगा। इससे प्रदेश में कृषि क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी।
प्रदेश में सुरक्षित खेती को बढ़ावा देने के लिए ‘वाई.एस.परमार किसान स्वरोज़गार योजना’ के तहत पॉली हाऊस के निर्माण के लिए वर्ष 2018-19 में दौरान 23 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है। किसानों की फसलों को बन्दरों, जंगली जानवरों व आवारा पशुओं से बचाने के लिए ‘मुख्यमंत्री खेत संरक्षण योजना’ के तहत सामूहिक तौर पर सोलर बाड़ लगाने के लिए इस वर्ष 85 प्रतिशत अनुदान के प्रावधान के साथ 35 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया है।
इसके साथ-साथ कृषि से सम्बन्धित अन्य क्षेत्रों जैसे फूलों की खेती, मौन पालन, मत्स्य पालन, डेयरी उत्पादन जैसी गतिविधियों को विस्तार देकर भी किसानों की आय को दोगुना करने के लिए प्रदेश सरकार प्रयासरत है।
मजदूरों की कमी के कारण कृषि का यन्त्रीकरण समय की मांग है। ऊँचे दाम के कारण बहुत से कृषक ट्रैक्टर, पॉपर वीडर, पॉवर टिल्लर जैसे उपकरण नहीं खरीद पा रहे हैं। इसके लिए प्रदेश में ‘कृषि उपकरण सुविधा केन्द्र’ स्थापित किए जाएंगे, जिनमें किसान-बागवान किराए पर उपकरण प्राप्त कर सकेंगे। इन केन्द्रों की स्थापना के लिए प्रदेश के किसानों एवं युवा उद्यमियों को 25 लाख रुपये की राशि तक की मशीनरी पर सरकार 40 प्रतिशत उपदान प्रदान करेगी। कृषकों व बागवानों को पॉवर वीडर, पॉवर टिल्लर तथा अन्य उपकरणों पर उपदान के लिए 32 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है।
उत्पादन लागत कम करने के उपायों के तहत वर्ष 2018-19 में सभी कृषकों को पोषकों के संतुलित उपयोग के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत लाया जाएगा। प्रदेश की जलवायु गैर-मौसमी सब्जियों के लिए उपयुक्त है। प्रदेश सरकार किसानों को उच्च उत्पादकता वाले बीज वितरित करेगी। अच्छी किस्म वाले अनाज के बीज भी उपदान पर वितरित किए जाएंगे। जैविक कीटनाशक संयन्त्र की स्थापना के लिए 50 प्रतिशत निवेश उपदान देने का प्रावधान किया जा रहा है।
राज्य में 13 अनुसंधान केन्द्रों तथा आठ विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों तथा बागवानों को कृषि तथा बागवानी की उन्नत तथा नवीनतम जानकारियां प्रदान की जा रही हैं। सरकार ने सभी विज्ञान केन्द्रों के साथ अपनी-अपनी परिधि के किसानों-बागवानों को वाट्सएप्प के साथ जोड़ कर एक नवीन पहल की है। इससे जहां किसानों की समस्याओं के शीघ्र समाधान का मार्ग प्रसस्त हुआ है वहीं उन्हें ऋतृवार फसलों से संबंधित जानकारियां भी प्राप्त हो रही हैं। किसानों की समस्याओं व मांगों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने के लिए किसान कृषि विभाग की टोल फ्र्री हेल्पलाईन सेवा 1550 आरम्भ की गई है।

भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश आंकड़ों पर नहीं, अवधारणाओं पर आधारित

शिमला/शैल। थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन ने हाल में एक जनमत सर्वेक्षण किया है जिसका शीर्षक है ‘महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देश 2018’ फाउंडेशन ने कहा है कि भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। यह घोषणा किसी रिपोर्ट या आंकडों पर नहीं बल्कि एक जनमत सर्वेक्षण पर आधारित है।
इस नतीजे तक पहुंचने के लिए रायटर्स ने एक दोषपूर्ण प्रक्रिया का उपयोग किया है। रैकिंग, अवधारणा आधारित है। यह मात्र 6 प्रश्नों के जवाब पर आधारित है। ये परिणाम आंकडों के आधार पर नहीं निकाले गये हैं। ये पूर्णतया विचारों पर आधारित है। इसके अतिरिक्त इस सर्वेक्षण में मात्र 548 लोगों को शामिल किया गया है। रायटर्स के अनुसार ये व्यक्ति महिला संबंधी मामलों के विशेषज्ञ हैं। इन व्यक्तियों के पद, संबंधित देश, अकादमिक योग्यता व विशेषज्ञता आदि के संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये सभी चीजें सर्वेक्षण की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। संगठन द्वारा प्रक्रिया संबंधी दी गयी जानकारी के अनुसार सर्वेक्षण में शामिल कुछ लोग नीति निर्माता है। हालांकि मंत्रालय ने इस सर्वेक्षण के संबंध में कोई जानकारी नहीं मांगी है।
सर्वेक्षण में पूछे गये 6 प्रश्न एक समान रूप से सभी देशों पर लागू नहीं किये जा सकते। जैसे विभिन्न देशों में बाल विवाह की उम्र सीमा अलग-अलग है। इसके अलावा महिला के जनानंगों की विकृति, दोषी व्यक्ति को पत्थर मारना आदि प्रथायें भारत में नहीं हैं।
इसके अतिरिक्त उपलब्ध आंकडों को साझा करना, नीति निर्माण में सुझाव लेना तथा सरकार की पारदर्शी प्रणालियों के आधार पर भारत में महिलाओं की समस्याओं को रेखांकित किया जाता है। सरकार मीडिया, शोधकर्ताओं तथा स्वयं सेवी संगठनों के साथ खुले रूप से विचारों का आदान-प्रदान करती है। इससे आम लोगों को बहस में जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। आम लोग और स्वतां मीडिया, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर खुले रूप से चर्चा कर सकती हैं। ऐसी बहसों को प्रोत्साहित किया जाता है। ऐसी खुली व्यवस्था में महिलाओं से संबंधित मामले भारत में जोर-शोर से उठाये जाते हैं। संभवतः इसी कारण ऐसी अवधारणा बनती है कि देश की स्थिति खराब है।
सर्वेक्षण में स्वास्थ्य देखभाल, भेदभाव, सांस्कृतिक परम्परायें, यौन हिंसा, गैर यौन हिंसा, मानव तस्करी, जैसे विषयों पर 548 व्यक्तियों का जनमत संग्रह किया गया है। इन क्षेत्रों में भारत अन्य देशों की तुलना में बहुत आगे है। इसके अलावा पिछले वर्षों की तुलना में स्थितियां बेहतर हुई है। इसलिए भारत की रैंकिंग स्पष्ट रूप से गलत है।
उदाहरण के लिए जून 2018 में जारी नमूना पंजीयन सर्वे (एसआरएस) के अनुसार प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु दर में 2013 की तुलना में 22 प्रतिशत की कमी आयी है। इसके अलावा जन्म के समय लिंग अनुपात भी बेहतर हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि लिंग आधारित गर्भपात की संख्या में भी कमी आयी है।
आर्थिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। महिलाओं की आजीविका के लिए लगभग 45.6 लाख स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया गया है और इसके लिए 2 हजार करोड रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई गयी है। बालिकाओं के वित्तीय समावेश के लिए सुकन्या समृद्ध योजना के तहत 1.26 करोड़ बैंक खाते खोले गये हैं। कुल जनधन खातों में से आधे महिलाओं के हैं। प्राथमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़के और लड़कियों के नामांकनों की संख्या समान है। इस प्रकार यह कहना गलत है कि भारत ने महिलाओं को आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
बाल विवाह की संख्या में भी महत्वपूर्ण कमी आयी है। 0-9 वर्ष की आयु सीमा में बाल विवाह की संख्या शून्य है। 15 से 19 वर्ष की आयु सीमा में लड़कियों के मां बनने या गर्भवती होने की संख्या में भी कमी आयी है। यह 2005-06 में 16 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 7.9 प्रतिशत हो गयी है।
एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार 2016 में दुष्कर्म के 38,947 मामले दर्ज किये गये हैं। 2014 और 2015 में क्रमशः 36735 और 34651 मामले दर्ज किये गये थे। मामलों की संख्या में वृद्धि पुलिस तक आसानी से पहुंचने का परिणाम है। इसके अतिरिक्त भारत में दुष्कर्म की दर प्रति हजार पर 0.03 है, जबकि यूएस में यह प्रति हजार पर 1.2 है। तेजाब फेंकने के मामले भी गिने चुने हैं। जैसा कि पहले कहा गया है कि दोषियों को पत्थर मारने तथा महिलाओं के जननांगों को विकृत करने की प्रथा भारत में नहीं है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हिंसा के मामले में भारत विश्व का सबसे खतरनाक देश नहीं है।
बंधुआ मजदूरी और जबरन मजदूरी के मामलों में भी कमी आयी है। अपराध की रिपोर्ट होने पर सख्ती से कार्रवाई की जाती है। मानव तस्करी (रोकथाम, सुरक्षा और पुर्नवास) अधिनियम, 2018 के अंतर्गत मानव तस्करी की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है।
भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश घोषित करने का प्रयास केवल भारत की छवि को धूमिल करने जैसा है। यह प्रयास महिलाओं के पक्ष में हो रहे वास्तविक प्रगतियों से ध्यान हटाने जैसा है।
2012 के दुर्भाग्य पूर्ण घटना के पश्चात पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग है तथा उन्हें घर में, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तथा समाज में बराबरी का हक देने के लिए कृत संकल्प है। सरकार इस दिशा में नेतृत्व प्रदान कर रही है।
यौन हिंसा से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012, अपराध कानून संशोधन अधिनियम 2013 तथा अपराध कानून संशोधन अध्यादेश, 2018 के तहत बलात्कार के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इसकी परिभाषा को विस्तार दिया गया है और इसमें तेजाब से हमला, स्टॉकिंग, यौन उत्पीड़न, महिला के सम्मान को चोट पहुंचाना, 18 साल से कम उम्र के लड़कों से किया गया यौन अपराध आदि को शामिल किया गया है। किशोर न्याय अधिनियम 2015 में भी बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की जरूरत को विस्तार दिया गया है और इसमें उन बच्चों को भी शामिल किया गया है जिन पर बाल विवाह का खतरा है। इस अधिनियम में 16 वर्ष या इससे अधिक के किशोरों को व्यस्क के समान माने जाने का प्रावधान है यदि वे बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त पाये जाते हैं।
राज्य सरकारें पुलिस बल में महिलाओं की संख्या को 33 प्रतिशत तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। महिलाओं की सहायता के लिए 193 वनस्टॉप केन्द्र तथा 31 राज्यों में हेल्पलाईन की शुरूआत की गयी है। इन हेल्पलाईनों से महिलाओं को 24 घंटे सहायता व सुझाव प्राप्त होते हैं। इनमें पुलिस सहायता, कानूनी सहायता, कानूनी सलाह, मेडिकल सुविधा, मानसिक सामाजिक परामर्श, अस्थाई निवास आदि शामिल है। पिछले तीन वर्षों में संस्थानों ने 12 लाख महिलाओं को सहायता प्रदान की है।
तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाले विधेयक को मंजूरी दी गयी है। यह मुस्लिम महिलाओं को समानता का अवसर उपलब्ध करायेगा। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने के तहत मुद्रा योजना के अंतर्गत 7.88 करोड़ महिला उद्यमियों को 2,25,904 करोड रुपये का ऋण दिया गया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत प्रमाण पत्र प्राप्त करने वालों में 50 प्रतिशत महिलायें हैं। कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है और वे आर्थिक संसाधनों को नियंत्रित कर रही हैं। 5 लाख से अधिक महिलायें कंपनियों में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवासों का आवंटन महिलाओं या संयुक्त रूप से महिला व पुरूष के नाम पर किया जा रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत 2 लाख आवासों का आवंटन महिलाओं के नाम पर किया गया है। पैतृक संपत्ति में भी महिलाओं की हिस्सेदारी मिलने को बढ़ावा दिया जा रहा है।
माध्यमिक और उच्च शिक्षा में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए सरकार ने विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं की शुरूआत की है। इसके सुखद परिणाम सामने आये हैं। स्कूल छोड़ने की संख्या में कमी आयी है। कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करने के संदर्भ में लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है।
माताओं के स्वास्थ्य की स्थिति में भी सुधार हुआ है। एक महत्वपूर्ण कदम के तहत मातृत्व अवकास को बढ़ाकर 6 महीने कर दिया गया है। इससे महिलाओं को नौकरी छोड़ने की नौबत नहीं आयेगी और गर्भावस्था के दौरान उनकी आय में भी कमी नहीं होगी। पूरे देश में माताओं को नकद प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि वे गर्भावस्था का पंजीयन कर सकें, अस्पताल में शिशु का जन्म हो और शिशु के जन्म के पहले और बाद उनकी देखभाल हो।
इन प्रयासों से स्थितियां बेहतर हुई हैं। भारतीय महिलाओं का जीवन बेहतर हुआ है। विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाएं बेहतर स्थिति में हैं। तथ्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश कहना वास्तविकता से परे है।

कर्ज मुक्ति के लिये नीयत और नीति चाहिये

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने एक साक्षात्कार में यह कहा है कि प्रदेश को कर्ज से मुक्ति मिलना संभव नही है। जयराम की सरकार को बने हुए अभी छः माह का समय हुआ है। इन छः महिनों में सरकार ने जनवरी से 31 मार्च तक ही एक हजा़र करोड़ से अधिक का ऋण लिया है। 29 मार्च को जायका के साथ 700 करोड़ का ऋण अनुबन्ध साईन किया है। इसके बाद मई में राज्य विद्युत बोर्ड की ऋण सीमा मे दो हज़ार करोड़ की वृद्धि की है। जून में एशियन विकास बैंक से 437 करोड़ का ण भारत सरकार के माध्यम से स्वीकृत करवाया है। ऋण के इन आंकड़ों का जिक्र इसलिये किया जा रहा है ताकि यह समझ आ सके कि सरकार का पूरा ध्यान इस दौरान ऋण जुटाने की ओर ही ज्यादा केन्द्रित रहा है। सरकार अपनी आय के साधन कैसे बढ़ाये और अपने अनुपयोगी खर्चों में कैसे कमी करे इस ओर शायद ज्यादा ध्यान नही दिया गया है। इसमें सबसे चिन्ताजनक यह है कि युवा मुख्यमन्त्री ने बिना कोई प्रयास किये ही यह मान लिया है कि कर्ज से मुक्ति मिल ही नही सकती है।
मुख्यमन्त्री ने अपने साक्षात्कार में कर्ज का आंकड़ा 46000 करोड़ का दिया है। राज्य के वित्त की वास्तविक स्थिति क्या है। सरकार के खर्चे कितने उत्पादक और अनुत्पादिक है। राज्य के कर्ज की स्थिति क्या इसका पूरा आकलन करने के लिये नियन्त्रक महालेखा परीक्षक की संवैधानिक जिम्मेदारी है और कैग की रिपोर्ट वाकायदा सदन के पटल पर रखी जाती है। इसलिये कैग की रिपोर्ट को प्रमाणिक माना जाता है। इस बार के बजट सत्र वर्ष 2016-2017 के लेखे सदन में रखे गये हैं। इन लेखों के मुताबिक 31 मार्च 2016 को प्रदेश सरकार का कुल कर्जभार 47,244 करोड़ है। इसमें वित्तिय वर्ष 2017-2018 और 2018-2019 का कर्ज जब जुड़ेगा तब यह कर्जभार 60,000 करोड़ से अधिक हो जायेगा यह तय है। सरकार जब भी कर्ज लेती है तब कर्ज का उद्देश्य विकास कार्यो मे निवेश दिखाया जाता है लेकिन कैग की रिपोर्ट के मुताबिक यह कर्ज विकास की बजाये कर्ज की किश्त देने और दूसरे खर्चों के लिये उठाये जा रहे हैं। 2012-13 से 2016-17 तक हर वर्ष, कर्ज की किश्त और अन्य खर्चों के लिये ऋण उठाया जा रहा है। 2012-13 में 2359, 2013-14 में 2367, 2014-15 में 2345, 2015-16 में 2450 और 2016-17 में 3400 करोड़ का ऋण इन खर्चों के लिये उठाया गया है जबकि एफआरबीएम 2005 की सीधी अवहेलना है। इसमें एक चिन्ताजनक गंभीरता यह है कि कर्ज तय समय पर लौटाया नही जा रहा है। 31 मार्च 2016 को Outstading ऋण का आंकड़ा 32570 करोड़ हो गया है। हर वर्ष यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है यह स्थिति यदि ऐसे ही चलती रही तो यह तय है कि अगले पांच- सात वर्षो में कर्ज उठाने लायक भी स्थिति नही रहेगी।
इसलिये सबसे पहला सवाल यह खड़ा होता है कि कर्ज के सिर पर विकास कब तक किया जाये। इस समय जितना कर्ज प्रदेश पर खड़ा है वह आखिर निवेश कहां हुआ है? क्योंकि आज भी प्रदेश में दस हज़ार अध्यापकों की कमी है, अस्पतालों में डाक्टरों की कमी है। रोजगार कार्यालयों में बेरोजगारों का आंकड़ा आठ लाख से ऊपर पहुंच चुका है। लोगों को पीने का पानी नही है यह अभी सामने आया है। पानी की गुणवत्ता कितनी और कैसी है यह पीलिया से हुई मौतों मे सामने आ चुका है। हां प्रदेश में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों का अांकड़ा 1,67000 का 2002 में उस समय सामने आया था तब अवैध कब्जों को नियमित करने की योजना बनाई गयी थी। इसी तरह का विकास अवैध निर्माणों में हुआ है क्योंकि सरकारें बार-बार रिटैन्शन पॉलिसियां लाती रही। इस समय प्रदेश के सार्वजनिक उपक्रमों के क्षेत्रा में बारह हज़ार करोड़ से कुछ अधिक का कुल निवेश है। इसमें अकेले ऊर्जा के क्षेत्र में ही ग्यारह हजार करोड़ से अधिक का निवेश है लेकिन प्रदेश की चारो ऊर्जा कंपनीयों की स्थिति लगातार घाटे की है। एक भी परियोजना कभी समय पर पूरी नही हुई है। कैग की हर रिपोर्ट में इस ओर ध्यान खिंचता आ रहा है। अभी कशांग परियोजना पर कैग ने साफ कहा है कि आज ही इसकी स्थिति यह हो गयी है कि प्रति यूनिट उत्पादक लागत 4.50 रूपये पहुंच चुकी है जबकि बिजली 2.50 रूपये यूनिट बिक रही है। बिजली बोर्ड की अपनी रिपोर्टों के मुताबिक बोर्ड की सभी परियोजनाओं में हर वर्ष हज़ारों घन्टो का शट डाऊन हो रहा है और इसके कारण प्रतिदिन करोड़ो के राजस्व का नुकसान हो रहा है जबकि निजिक्षेत्र की परियोजनाओं में छः आठ घन्टे से अधिक का साल में शट डाऊन नही है। इस प्रतिदिन हो रहे करोड़ों के राजस्व के नुकसान की ओर संवद्ध प्रशासन से लेकर विजिलैन्स तक का ध्यान नही गया है जबकि इस संद्धर्भ में उसके पास वाकायदा शिकायत रिकॉर्ड पर है। पिछले पांच वर्षों में बिजली की किसी भी बड़ी परियोजना के लिये कोई निवेशक नही आया है। इस तरह की स्थिति प्रदेश में बहुत सारे क्षेत्रों की है। प्रदेश का प्रशासन कितनी सक्षमता और गंभीरता से काम करता रहा है इसका साक्षात प्रमाण राज्य का वित्त निगम है जिसकी अध्यक्षता हर समय प्रदेश के मुख्य सचिव के पास पदेन रही है।
इस वस्तुस्थिति से यही उभरता है कि अब तक हमारी नीयत और नीति कर्ज लेकर घी पीने तक की ही रही है। सारी योजना का मुख्य बिन्दु हर रोज़ कर्ज के नये स्त्रोत तलाशने तक ही रहा है। प्रशासन से लेकर राजनीतिक नेतृत्व तक सभी तदर्थवाद पर ही चलते रहे हैं। किसी ने भी यह चिन्ता करने का प्रयास नही किया कि जिस दिन यह सब कुछ अचानक धराशायी हो जायेगा तो तब क्या होगा। यह कहना कतई गलत है कि प्रदेश के पास संसाधन नही है और यह आत्मनिर्भर नही हो सकता। इसके लिये नीयत और नीति चाहिये। लेकिन शायद तन्त्र की नीयत ‘‘ऋणम् कृत्वा धृतम पीवेत’’ की हो गयी है। नीति के लिये अध्ययन और जानकारी चाहिये। वह थोड़ा कठिन काम है परन्तु असंभव नही। इसलिये युवा मुख्यमन्त्री से यही आग्रह है कि कर्ज की स्थिति से बाहर निकलने के लिये नीयत दिखाओगे तो नीति भी कोई दिखा देगा।

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