Wednesday, 04 February 2026
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जीडीपी की गिरावट का जवाब खिलौनों/कुत्तों की चर्चा नहीं हो सकता

इस समय देश की जीडीपी शून्य से भी 24% नीचे आ गया है। जीडीपी की यह गिरावट एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेत है। फिर यह 24% का आंकड़ा तो संगठित क्षेत्र की वस्तुओं और सेवाओं के आकलन का है। इसमें कितना उत्पादन और सेवाएं कम हुई है, यह उसका आकलन है। जब इसमें असंगठित क्षेत्र का आकलन जुड़ेगा तब यह आंकड़ा इसके दो गुणे से भी बढ़ने की आशंका हैं जीडीपी से हर व्यक्ति परोक्ष/अपरोक्ष में प्रभावित होता है। सरकारें विकास कार्यों के लिये कर्ज के माध्यम से जो धन जुटाती है। वह सीधे जीडीपी से प्रभावित होता है। राज्य सरकारेें सामान्यतः अपने जीडीपी का 3.5% ही कर्ज ले सकती है। यह एफआरवीएम अधिनियम की बंदिश है। अब कोरोना के चलते कर्ज की यह सीमा केन्द्र ने 5% तक बढ़ी दी है। अब जब केन्द्र ने राज्यों को उनका जीएसटी का हिस्सा देने में असमर्थता जताई है तब यह कहा है कि राज्य अपने स्तर पर धन का प्रबन्ध करें या कर्ज ले। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब देश का सकल घरेलू उत्पाद ही शून्य से 24% तक नीचे चला गया है तब आदमी पर करों का भार बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही होगा। ऐसे में जब वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन ही नही रहा है तब आम आदमी टैक्स भी कैसे दे पायेगा। इस समय ही 12 करोड़ नौकरियां खत्म हो चुकी हैं तो आने वाले समय में क्या होगा यह सोचकर ही डर लगता है। इसका सीधा प्रभाव मनरेगा में देखा जा सकता है जहां 120 दिन के रोजगार को घटाकर 90 दिन कर दिया गया है। जिन प्रवासी मज़दूरों का रोज़गार छिन गया था उन्हे मनरेगा में काम देने का भरोसा दिया गया था। अब उन करोड़ो लोगों को इन काटे गये 30 दिन में से काम दिया जायेगा। इसके लिये मनरेगा का बजट दस हजा़र करोड़ बढ़ा कर 2019-20 के बराबर कर दिया गया है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इसमें किसके हिस्से में कितना रोज़गार आ पायेगा और उससे जीडीपी में बढौत्तरी कैसे संभव हो पायेगी।
वित्त मंत्री सीता रमण ने इस स्थिति को ईश्वर की देन कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात संबोधन में इसका जिक्र तक नही किया। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर बनने के लिये खिलौने बनानेे और कुत्ते पालने का नया दर्शन लोगों के सामने रख दिया है। खिलौने बनाने और कुत्ते पालने से जीडीपी को स्थिरता तक पहुंचने में ही कितने दशक लगेंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के इन वक्तव्यों से समझा जा सकता है कि वह इस समर्थता के प्रति कितने गंभीर और ईमानदार हैं। क्योंकि इस तरह की धारणाओं का सीधा अर्थ है कि आम आदमी को इस संकट के समय उसके अपने ही सहारे छोड़ दिया गया है। स्पष्ट है कि जब किसी चीज़ को Act of God कह दिया जाता है कि उसका अर्थ कि प्रबन्धन ने यह मान लिया है कि वह इसमे कुछ नही कर सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के वक्तव्यों के बाद सरकार और संगठन में से किसी ने भी आगे कुछ नही कहा है। इसका सीधा अर्थ है कि पूरी सरकार और संगठन का यही मत है।
जब किसी परिवार पर आर्थिक संकट आता है तो सबसे पहले वह अपने अनावश्यक खर्चों को कम करता है। यही स्थिति सरकार की होती है वह अपने खर्चे कम करती हैं लेकिन मोदी सरकार इस स्थापित नियम से उल्ट चल रही है। उसका खर्च पहले से 22% बढ़ा हुआ है। प्रधानमंत्री के प्रचार पर ही सरकारी कोष से दो लाख प्रति मिनट खर्च किया जा रहा है। इस समय आरबीआई से लेकर नीचे तक सारी बैंकिंग व्यवस्था संकट और सवालों में है। कर्ज की वसूली ब्याज का स्थगन और एनपीए तक बैंकिंग से जुड़े सारे महत्वपूर्ण मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं। बैंकों को प्राईवेट सैक्टर को देने का फैसला कभी भी घोषित हो सकता है। बैंक में आम आदमी का पैसा कब तक और कितना सुरिक्षत रहेगा इसको लेकर भी स्थिति स्पष्ट नही है। आम आदमी के जमा पर 2014 से लगातार ब्याज कम होता आ रहा है। इस बार तो वित्त मन्त्री ने बजट भाषण में ही कह दिया था कि आम आदमी बैंक में पैसा रखने की बजाये उसे निवेश में लगाये। नोटबंदी से आर्थिक व्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उससे आज तक देश संभल नही पाया है। रियल एस्टेट और आटोमोबाईल जैसे क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज देने के बाद भी उनकी हालत में सुधार नही हो पाया है और यह कोरोना से पहले ही घट चुका है। इसलिये गिरती जीडीपी के लिये ईश्वर पर जिम्मेदारी डालने के तर्क को स्वीकार नही किया जा सकता। फिर इसी वातावरण में अंबानी और अदानी की संपतियां उतनी ही बढ़ी हैं जितना देश का जीडीपी गिरा है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को प्राईवेट सैक्टर के हवाले करने से आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास और घातक सिद्ध होगा। आने वाले दिनों में देश की गिरती जीडीपी और सरकार की आर्थिक नीतियां इक बड़ी बसह का मुद्दा बनेगी यह तय है।

क्या कांग्रेस का संकट प्रायोजित है

इस समय देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जो शायद भारत में पहली बार देखने को मिल रहा है। देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब केन्द्र सरकार ने राज्यों को जीएसटी में उनका हिस्सा दे पाने में असमर्थता जाहिर कर दी है। वित्तमन्त्री सीता रमण ने इस आर्थिक संकट को ईश्वर की देन कह दिया है। वित्त हर गतिविधि का मूल होता है और जब यही गड़बड़ा जाये तो तुरन्त प्रभाव से राष्ट्रीयहित में संसद को भंग करके एक राष्ट्रीय सरकार के गठन की आवश्यकता हो जाती है लेकिन इस समय ऐसा नही किया जा रहा है बल्कि संकट के इस दौर में विपक्ष की सरकारों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बल्कि विपक्ष मुक्त भारत का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे हालात में एक सशक्त और स्पष्ट विपक्ष की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है क्योंकि सत्तापक्ष अपनी नीतियों की समीक्षा के लिये तैयार नही है। वह आज भी अपनी गलतीयों के लिये नेहरू-गांधी काल की नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। मीडिया भी सरकार से सवाल पूछने की बजाये विपक्ष को कमज़ोर करने के काम में लग गया है और इसीलिये उसे गोदी मीडिया की संज्ञा दी जा रही है। उच्च न्यायपालिका का सरोकार भी आम आदमी नही रह गया है। मंहगाई और बेरोज़गारी दोनों का संकट एक साथ झेल रहे आम आदमी की सुध लेने वाला कोई नही रह गया है। यदि कोई सरकार से सवाल पूछने का साहस दिखाता है तो उसे तुरन्त देशद्रोह करार देकर उसके पीछे जांच एजैन्सीयों को लगा दिया जाता है।
आज जो हालात है यदि उस पर कोई सवाल न भी किया जाये और सरकार के हर फैसले की सराहना की जाये तो क्या उससे स्थितियां अपने आप बदलकर ठीक हो जायेंगी? शायद नहीं। इसलिये आज एक सशक्त विपक्ष अनिवार्य हो गया है इस समय विपक्ष के नाम पर कांग्रेस के अतिरिक्त और कोई राजनीतिक दल ऐसा सामने नही है जो आम आदमी में अपनी स्वीकार्यता बना पाने की स्थिति मेें रह गया हो। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, टीएमसी, एनसीपी और आम आदमी पार्टी सभी ने कांग्रेस तथा भाजपा का विकल्प होने का प्रयास किया है लेकिन कोई भी दल ऐसा हो पाने में समर्थ नही हो पाया है। ऐसा शायद इसलिये हुआ है क्योंकि कोई भी दल देश के समाने कोई स्पष्ट आर्थिक चिन्तन नही रख पाया है। आर्थिक चिन्तन के अभाव में कोई स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन इन दलों का नही बन पाया। इसलिये इनकी स्वीकार्यता नही बन पायी और आज भी यह उसी धरातल पर खड़े हैं। जबकि कांग्रेस और भाजपा तथा वाम दलों का इन तीनो मुद्दों पर अपना-अपना स्पष्ट चिन्तन है। वाम दलों का भी यह दुर्भाग्य रहा है कि स्पष्ट चिन्तन के बावजूद इसको व्यवहारिक बनाने की प्रक्रिया को सर्वस्वीकार्य नही बना पाये। वाम दलों के चिन्तन में दम है इसलियें सत्तारूढ़ दल ने सबसे पहले इस चिन्तन को ही अस्वीकार्य करार देकर इसके कई चिन्तकों को जेलों तक पहुंचा दिया है।
इस तरह जो राजनीतिक परिस्थितियां देश में बनती जा रही है उनसे यह सवाल खड़ा हो गया है क्या ऐसे लोकतन्त्र सुरक्षित रह पायेगा? यह सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण और गंभीर हो जाता है कि सत्तारूढ़ भाजपा संघ परिवार की केवल एक राजनीतिक ईकाई है जिसका संचालन उस संघ के हाथ में है जो अपने में एक पंजीकृत संस्था भी नही है। पंजीकृत न होने के कारण वह देश के कानून के प्रति कितनी जवाबदेह है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। यह संघ के चिन्तन का परिणाम है कि देश के संसाधनों को एक योजनाबद्ध तरीके से नीजि हाथों में सौंपा जा रहा है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर सैंकड़ों विदेशी कंपनीयों से लाखों करोड़ का निवेश देश में करवा दिया गया है। बैंकों में एक वर्ष में 1.84 लाख कराड़ का फ्राड घट चुका है और तीन लाख करोड़ का घाटा बैंकों को अलग से हो गया है। बैंकों की सुरक्षा खतरे में आ खड़ी हुई है और कोई इस पर सवाल उठाने की हिम्मत नही जुटा पा रहा है। सवाल उठाने का दायित्व मीडिया विपक्ष का होता है। जब से गोदी मीडिया की संज्ञा में आ गया है तब से यह जिम्मेदारी अकेले विपक्ष पर आ गयी है। विपक्ष में भी केवल कांग्रेस ही बची है। कांग्रेस की सरकारों को गिराने का जिस तरह से 2014 से लेकर आज 2020 तक प्रयास किया गया है उससे यह संकट और भी गंभीर हो गया है। राजस्थान में सरकार गिराने के लिये भाजपा किस तरह से सक्रिय भूमिका निभा रही थी यह साक्ष्यों सहित सामने आ चुका है। साक्ष्य सामने आने के कारण ही राजस्थान में सरकार नही गिर पायी है। राजस्थान की इस असफलता का ही परिणाम है कि भाजपा ने कांग्रेस के भीतर संेध लगाकर 23 लोगों से पत्र लिखवाने की योजना को कार्यरूप दिलाया। सवाल है कि क्या इन 23 नेताओं में से किसी एक ने भी देश के आर्थिक संकट के लिये प्रधानमन्त्री और भाजपा की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। चीन और नेपाल के मुद्दे पर कांग्रेस के कितने लोगों ने सवाल किया है। कांग्रेस के अन्दर यह अकेले राहुल गांधी ही थे जिन्होने चौकीदार को चोर कहने का साहस किया था लेकिन किसी ने उनका साथ नहीं दिया था। राहुल को गाली देने और उनका चरित्र हनन करने के लिये किस तरह से मीडिया को प्रायोजित किया गया यह कोबरा पोस्ट के स्टिंग आप्रेशन से सामने आ चुका है। इस समय भाजपा संघ को उन्ही की भाषा में जवाब देने की आवश्यकता है। लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस नेतृत्व का एक बड़ा वर्ग इससे बचने का प्रयास कर रहा है।
इस परिदृश्य में कांग्रेस के इन 23 नेताओं के पत्र को किसी भी गणित में जायज़ नही ठहराया जा सकता है। क्योंकि संगठन में चुनावों के जिस मुद्दें को पत्र में उठाया गया है उसे कार्यसमिति की बैठक में वैसे भी उठाया जा सकता था। फिर संगठन में चुनावों की प्रक्रिया तो बहुत पहले से ही शुरू हो गयी थी जिसे लोकसभा चुनावों के कारण लंबित किया गया था। ऐसे में संगठन के चुनावों के नाम पर पार्टी को आम आदमी की नजरों में विवादित बनाना किसी भी तर्क से जायज़ नही ठहराया जा सकता। क्योंकि इस समय राष्ट्रीय बैंकों का अस्तित्व उसी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जिस पर राष्ट्रीयकरण के समय था। इसलिये आने वाले दिनों में यह सबसे प्रमुख मुद्दा होगा और यही नेताओं और दलों की कसौटी बन जायेगा।

जीडीपी की गिरावट का जवाब खिलौनों/कुत्तों की चर्चा नहीं हो सकता

इस समय देश की जीडीपी शून्य से भी 24% नीचे आ गया है। जीडीपी की यह गिरावट एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेत है। फिर यह 24% का आंकड़ा तो संगठित क्षेत्र की वस्तुओं और सेवाओं के आकलन का है। इसमें कितना उत्पादन और सेवाएं कम हुई है, यह उसका आकलन है। जब इसमें असंगठित क्षेत्र का आकलन जुड़ेगा तब यह आंकड़ा इसके दो गुणे से भी बढ़ने की आशंका हैं जीडीपी से हर व्यक्ति परोक्ष/अपरोक्ष में प्रभावित होता है। सरकारें विकास कार्यों के लिये कर्ज के माध्यम से जो धन जुटाती है। वह सीधे जीडीपी से प्रभावित होता है। राज्य सरकारेें सामान्यतः अपने जीडीपी का 3.5% ही कर्ज ले सकती है। यह एफआरवीएम अधिनियम की बंदिश है। अब कोरोना के चलते कर्ज की यह सीमा केन्द्र ने 5% तक बढ़ी दी है। अब जब केन्द्र ने राज्यों को उनका जीएसटी का हिस्सा देने में असमर्थता जताई है तब यह कहा है कि राज्य अपने स्तर पर धन का प्रबन्ध करें या कर्ज ले। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब देश का सकल घरेलू उत्पाद ही शून्य से 24% तक नीचे चला गया है तब आदमी पर करों का भार बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही होगा। ऐसे में जब वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन ही नही रहा है तब आम आदमी टैक्स भी कैसे दे पायेगा। इस समय ही 12 करोड़ नौकरियां खत्म हो चुकी हैं तो आने वाले समय में क्या होगा यह सोचकर ही डर लगता है। इसका सीधा प्रभाव मनरेगा में देखा जा सकता है जहां 120 दिन के रोजगार को घटाकर 90 दिन कर दिया गया है। जिन प्रवासी मज़दूरों का रोज़गार छिन गया था उन्हे मनरेगा में काम देने का भरोसा दिया गया था। अब उन करोड़ो लोगों को इन काटे गये 30 दिन में से काम दिया जायेगा। इसके लिये मनरेगा का बजट दस हजा़र करोड़ बढ़ा कर 2019-20 के बराबर कर दिया गया है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इसमें किसके हिस्से में कितना रोज़गार आ पायेगा और उससे जीडीपी में बढौत्तरी कैसे संभव हो पायेगी।
वित्त मंत्री सीता रमण ने इस स्थिति को ईश्वर की देन कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात संबोधन में इसका जिक्र तक नही किया। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर बनने के लिये खिलौने बनानेे और कुत्ते पालने का नया दर्शन लोगों के सामने रख दिया है। खिलौने बनाने और कुत्ते पालने से जीडीपी को स्थिरता तक पहुंचने में ही कितने दशक लगेंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के इन वक्तव्यों से समझा जा सकता है कि वह इस समर्थता के प्रति कितने गंभीर और ईमानदार हैं। क्योंकि इस तरह की धारणाओं का सीधा अर्थ है कि आम आदमी को इस संकट के समय उसके अपने ही सहारे छोड़ दिया गया है। स्पष्ट है कि जब किसी चीज़ को Act of God कह दिया जाता है कि उसका अर्थ कि प्रबन्धन ने यह मान लिया है कि वह इसमे कुछ नही कर सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के वक्तव्यों के बाद सरकार और संगठन में से किसी ने भी आगे कुछ नही कहा है। इसका सीधा अर्थ है कि पूरी सरकार और संगठन का यही मत है।
जब किसी परिवार पर आर्थिक संकट आता है तो सबसे पहले वह अपने अनावश्यक खर्चों को कम करता है। यही स्थिति सरकार की होती है वह अपने खर्चे कम करती हैं लेकिन मोदी सरकार इस स्थापित नियम से उल्ट चल रही है। उसका खर्च पहले से 22% बढ़ा हुआ है। प्रधानमंत्री के प्रचार पर ही सरकारी कोष से दो लाख प्रति मिनट खर्च किया जा रहा है। इस समय आरबीआई से लेकर नीचे तक सारी बैंकिंग व्यवस्था संकट और सवालों में है। कर्ज की वसूली ब्याज का स्थगन और एनपीए तक बैंकिंग से जुड़े सारे महत्वपूर्ण मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं। बैंकों को प्राईवेट सैक्टर को देने का फैसला कभी भी घोषित हो सकता है। बैंक में आम आदमी का पैसा कब तक और कितना सुरिक्षत रहेगा इसको लेकर भी स्थिति स्पष्ट नही है। आम आदमी के जमा पर 2014 से लगातार ब्याज कम होता आ रहा है। इस बार तो वित्त मन्त्री ने बजट भाषण में ही कह दिया था कि आम आदमी बैंक में पैसा रखने की बजाये उसे निवेश में लगाये। नोटबंदी से आर्थिक व्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उससे आज तक देश संभल नही पाया है। रियल एस्टेट और आटोमोबाईल जैसे क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज देने के बाद भी उनकी हालत में सुधार नही हो पाया है और यह कोरोना से पहले ही घट चुका है। इसलिये गिरती जीडीपी के लिये ईश्वर पर जिम्मेदारी डालने के तर्क को स्वीकार नही किया जा सकता। फिर इसी वातावरण में अंबानी और अदानी की संपतियां उतनी ही बढ़ी हैं जितना देश का जीडीपी गिरा है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को प्राईवेट सैक्टर के हवाले करने से आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास और घातक सिद्ध होगा। आने वाले दिनों में देश की गिरती जीडीपी और सरकार की आर्थिक नीतियां इक बड़ी बसह का मुद्दा बनेगी यह तय है।

जब एक उपक्रम नही चला सकते तो देश कैसे चलायेंगे

मोदी सरकार विनिवेश और प्रत्यक्ष विदेशी को बढावा देने की नीति पर चल रही हैं विनिवेश में करीब दो दर्जन सरकारी उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी निजिक्षेत्र को बेचने का फैसला है। इन उपक्रमों में रेल और एयरपोर्ट जैसे उपक्रम भी शामिल है। विनिवेश के इस क्षेत्र में दो ही निजि कंपनीयां रिलाॅयंस और अदानी ग्रुप सबसे ज्यदा सफल बोली दात्ता हो रहे है। जिसका अर्थ है कि कई महत्वपणर््ूा उपक्रमों पर आने वाले दिनों में इनका स्वामित्य हो जायेगा। यह सब एक सुनियोजित योजना के तहत हो रहा है या स्वभाविक प्रक्रियाओं एक प्रतिफल है। यह एक महत्वपर्ण विचारणीय बिन्दु हैं लेकिन उसी के साथ यह और भी गंभीर प्रश्न है कि विनिवेश होना भी चाहिये या नही। इसी तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिये लगभग सभी क्षेत्र खोल दिये गय हैं और उसमें कई देशों की सैंकड़ों कंपनीयों का लाखों करोड़ का निवेश देश में आ चुका है। सरकार अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिये कर्ज ले रही है। आज देश पर विदेशी कर्ज 580 बिलियन डालर से पार जा चुका है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस तरह के नीति निर्धारणा पर संसंद के भीतर और बाहर एक विस्तृत बहस हो। लेकिन ऐसा हो नही रहा है बल्कि इस तरह के सवाल उठाने वालों के खिलाफ एक सुनियोजित विरोध खड़ा किया जा रहा है।
इसी विरोध का परिणाम है कि सर्वोच्च न्यायालय प्रशान्त भूषण को वह सवाल उठाने के लिये सत्ता दे रहा है जो सवाल इसी सर्वोच्च न्यायालय के चार कार्यरत न्यायधीश वाकायदा एक पत्र के माध्यम से प्रैस के सामने रख चुके हैं। प्रशान्त भूषण को सज़ा देने के लिये स्थापित न्याययिक प्रक्रिया को भी नज़रअन्दाजा किया गया है। इसी तरह की स्थिति अदानी को दिये जा रहे त्रिवेन्द्रम एयरपोर्ट की है। केरल सरकार इस एयर पोर्ट को स्वयं चलाना चाहती है। इसके लिये शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की गयी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे केरल उच्च न्यायालय में उठाया जाये। केरल सरकार उच्च न्यायालय में आ गयी और उच्च न्यायालय ने इसे यह कह कर रद्द कर दिया कि इसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जायें। केरल सरकार फिर सर्वोच्च न्यायालय जा रही थी कि मोदी सरकार ने इस एयरपोर्ट को अदानी के हवाले करने का फैसला सुना दिया। क्या इस तरह की कारवाई से अदालत पर विश्वास कायम रह सकेगा। केन्द्र सरकार किस तरह की जल्दबाजी मे काम कर रही है इसका एक उदाहरण अपराध दण्ड संहिता में संशोधन करने के लिये गठित की गयी कमेटी में भी सामने आया है। इस कमेटी को संशोधन का यह काम छः माह में पूरा करना है और आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य तीनों अधिनियमों में संशोधन किया जाना है। देश के पहले लाॅ कमीशन ने ऐसे संशोधन के चार चरणों की प्रक्रिया तय की हुई है। लेकिन अब गठित की गयी कमेटी पहले दो चरणों को नजरअन्दाज करके सीधे तीसरे चरण से अपना काम शुरू कर रही है। इस पर सौ से अधिक विषय विशेषज्ञों ने पत्र लिख कर इसका विरोध किया है और इस कमेटी को तुरन्त प्रभाव से भंग करने की मांग की है।
इस तरह पूरे देश के अन्दर एक ऐसा वातावरण बनता जा रहा है जहां शीर्ष संस्थान विश्सनीयता के संकट में आ खड़े हुए है। कोरोना संकट के कारण आज देश की अर्थव्यवस्था एक संकट के मोड पर आ खड़ी हुई है। करोड़ों लोग रोजगार के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे संकट काल में सरकार का अपने उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपना नीयत और नीति दोनों पर गंभीर आक्षेप लगने शुरू हो गये हैं। क्योंकि एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में हर हाथ को काम सरकारी उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपने से नही दिया जा सकता है। क्योंकि निजिक्षेत्र व्यक्तिगत स्तर पर मुनाफा कमाने की अवधारणा पर चलता है। इसके लिये वह हाथ को मशीन से हटाने की नीति पर चलता है और कामगारों की छटनी से शुरू करता है। आज सरकार भी उसी नीति पर चलने का प्रयास कर रही है। इसीलिये पचास वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों को काम की समीक्षा के मानदण्ड से हटाने पर विचार कर रही है। भाजपा ने 1990 में ही यह जाहिर कर दिया था जब शान्ता कुमार हिमाचल के मुख्यमन्त्री थे। तब निजिकरण क्यों के नाम से एक वक्तव्य दस्तावेज जारी किया गया था। इस वक्तव्य में यह आरोप लगाया गया था कि सरकारी कर्मचारी काम चोर और भ्रष्ट हैं। इसी आरोप के सहारे प्रदेश बिजली बोर्ड से बसपा परियोजना लेकर जेपी उद्योग समूह को दी गयी थी तय हुआ था कि बिजली बोर्ड के इस परियोजना पर हुए निवेश को जेपी उ़द्योग सरकार को ब्याज सहित वापिस करेगा लेकिन आज तक कैग की टिप्पणीयों के बावजूद एक पैसा तक वापिस नही हुआ है। आज प्रदेश की बिजली नीति और उद्योग नीति के कारण प्रदेश कर्ज के चक्रव्यूह में फंस चुका है। इसी तरह प्रदेश प्रमुख पर्यटक स्थल वाईल्डफलावर हाल दिया गया था जिससे प्रदेश को आज तक कोई लाभ नही मिला है। निजिकरण की देशभर में यही स्थिति है कर्मचारियों पर उस भ्रष्टता का आरोप लगाकर निजिकरण का आधार तैयार किया जाता है जिसकी उन्हे कभी सज़ा नही दी गयी है। इसी कारण से यह सवाल भी नही उठने दिया गया कि यदि सरकार एक उपक्रम नही चला सकती है तो देश कैसे चलायेगी।

2014 से पहले कोरोना होता तो

2014 से पहले कोरोना होता तो प्रधानमन्त्री नेरन्द्र मोदी ने 74वें स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए जनता के सामने यह सवाल रखा है कि यदि 2014 से पहले कोरोना आ जाता तो क्या होता। इस सवाल से बहुत सारे सवालों को जन्म दे दिया है। इन सवालों की गिनती करने और उनके जवाब तलाशने से पहले नरेन्द्र मोदी का 15 अगस्त 2013 का एक दृश्य याद आ जाता है। मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमन्त्री थे। दिल्ली में जब 15 अगस्त 2013 को लाल किले पर प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह का भाषण समाप्त हुआ था उसके आधे घन्टे के बाद नरेन्द्र मोदी का भुज के लालन काॅलिज के प्रांगण से भाषण शुरू हुआ था। काॅलिज के प्रांगण में मंच की पृष्ठभूमि में लाल किले की दिवार का वृहतचित्र लगाया गया था। उस पृष्ठभूमि में भाषण करते हुए नरेन्द्र मोदी ने डा. मनमोहन सिंह से भारत-चीन से सीमा से लेकर डालर के मुकाबले रूपये की गिरती कीमतों तक हर ज्वलंत समस्या पर सवाल पूछे थे। उन्ही सवालों के मसौदे पर अन्ना का आन्दोलन खड़ा हुआ। कांग्रेस सरकार को भ्रष्टाचार का पर्याय करार दिया गया। जनता को अच्छे दिन आने का भरोसा दिया गया और सत्ता परिवर्तन हो गया। इस परिदृश्य में आज जब नरेन्द्र मोदी ने यह सवाल किया है कि यदि 2014 से पहले देश में कोरोना आ जाता तो क्या होता। इस समय देश कोरोना के संकट से गुजर रहा है। इसके कारण अर्थव्यवस्था पर क्या और कितना असर पड़ा है इसको लेकर कुछ विशेषज्ञों की राय में स्थिति 1947 से भी नीचे चली जायेगी। चालीस करोड़ से भी अधिक के रोज़गार पर असर पड़ा है। इसी वर्ष के अन्त तक एनपीए बीस लाख करोड़ हो जाने का अनुमान है। 2022 तक बैंकों के संकट में आने की आशंका खड़ी हो गयी है। वित्त मन्त्री के निर्देशों के बावजूद बैंक ऋण देने में असमर्थता व्यक्त करने लग गये हैं। अन्र्तराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने के बावजूद पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाये जा रहे हैं। डालर के मुकाबले में रूपये की कीमत सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है। अर्थव्यवस्था की यह स्थिति और भी बदतर होने की संभावना है क्योंकि कोरोना का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। इस आतंक के कारण अनलाॅक थ्री में भी बाजा़र 30% तक ही रिस्टोर हो पाया है। इसे 100% तक होने में लंबा समय लगेगा और अब कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालने की एडवायजरी जारी की जाने लगी है। क्या अर्थ व्यवस्था के इन पक्षों पर मोदी सरकार की कोई चिन्ता और चिन्तन देश के सामने आ रहा है। शायद नही क्योंकि भाजपा का सरोकार अपने लिये संगठन हर जिले में हाईटैक कार्यालय बनाना, वर्चुअल रैलियां करने और चुनी हुई सरकारे गिराना है। आज कोरोना से निपटने में सरकार कितनी सफल रही है इसकी जांच के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका के माध्यम से आयोग गठित किये जाने की कुछ पूर्व वरिष्ठ नौकरशाहों द्वारा की गयी है। जब कोरोना के मामले का आंकड़ा केवल पांच सौ था तब पूरे देश में लाॅकडाऊन करके सबको घरों के अन्दर बन्द कर दिया गया और जब आंकड़ा पांच लाख पहुंच गया तब इसमें ढील दे दी गयी। सरकार के अन्तः विरोधी फैंसलों के कारण यह लगने लगा है कि कोरोना से ज्यादा इसका प्रचार आतंक का कारण बन गया। कोरोना में ही यह सामने आया है कि छः वर्षों में मोदी सरकार देश में कोई नया बड़ा स्वास्थ्य संस्थान खड़ा नही कर पायी है। जो स्वास्थ्य संस्थान पहले से चल रहे हैं उनमें कितनी क्या सुविधायें हैं इसका खुलासा इसी से हो जाता है कि क्या कोई भी मन्त्री या अन्य बड़ा नेता जो कोरोना की चपेट में आया यह किसी भी सरकारी संस्थान मंे ईलाज के लिये नही गया। क्योंकि यह सरकार सारे संस्थानों को कमजोर करके उन्हें निजि क्षेत्र के हवाले करने की नीति पर चल रही है। इसी नीति का परिणाम है कि 23 सरकारी उपक्रमों को विनिवेश की सूची में डालकर उन्हे प्राईवेट सैक्टर के हवाले किया जा रहा है। शायद यह पहली सरकार है जिसके कार्यकाल में कोई भी सार्वजनिक उपक्रम खड़ा नही किया गया है। सरकार की आर्थिक नीतियों पर कोई सवाल न पूछे जायें इसके लिये बड़े ही सुनियोजित तरीके से प्रयास किये जा रहे हैं इन प्रयासों में मीडिया और उच्च न्यायपालिका भी सरकार का पूरा साथ दे रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रशान्त भूषण के मामले में जिस तरह की भूमिका रही है उससे 1976 के एडीएम जब्बलपुर मामले की याद ताजा हो जाती है जब यह कहा गया था कि आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है। मीडिया में सार्वजनिक मुद्दों पर जिस तरह से बहसे आयोजित की जा रही हैं उसका कड़वा सच कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की मौत के रूप में सामने आ चुका है। आज शायद यह पहली बार हो रहा है कि राजनीतिक सत्ता से लेकर शीर्ष न्यायपालिका और मीडिया सभी पर से एक साथ भरोसा उठ रहा है। मोदी सरकार के आने से पहले भी स्वाईन फ्लू जैसी भयानक महामारीयां देश में आ चुकी हैं जिनमें हजारों लोग मरे भी हैं लेकिन तब लाॅकडाऊन करके लोगों को घरों में कैद करके नहीं रखा गया था। यदि 2014 से पहले कोरोना आ जाता तो शायद हालात इतने बदत्तर न होते। महामारी आती और निकल जाती। लोग रोज़गार और भुखमरी के कगार पर न धकेले जाते।

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