मोदी सरकार राष्ट्रीय उच्च मार्गों, रेलवे संपत्तियों, बिजली की ट्रांसमिशन लाईनो और हाइड्रो, सोलर तथा पवन विद्युत परियोजनाओं का मौद्रीकरण करके छः लाख करोड़ जुटाने का प्रयास कर रही है। इसके लिये वित्त मन्त्रा सीतारमण ने एनएमपी योजना की घोषणा की है और इसके लिये कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक सचिव कमेटी का गठन किया गया है। वित्त मन्त्रा ने कहा है कि इसके लिये इन संपत्तियों की ज़मीन नहीं बेची जायेगी। बल्कि इसके तहत इन संपत्तियों का पूर्ण मौद्रिक उपयोग सुनिश्चित किया जायेगा। इसके लिये प्राईवेट सैक्टर का सहयोग लिया जायेगा। इसमें 90,000 कि.मी. राष्ट्रीय उच्च मार्गों से 1.6 लाख करोड़, 400 रेलवे स्टेशनों, 150 ट्रेनो और अन्य रेलवे संपतियों से 1.5 लाख करोड़, 67000 करोड़ ट्रांसमिशन लाईनों, 32,000 करोड़ एनएचपीसी, एनटीपीसी और नवेली लिंगनाइट विद्युत परियोजनाओं से जुटाया जायेगा। इसके अतिरिक्त दिल्ली स्थित नेशनल स्टेडियम तथा सार्वजनिक उपक्रमों के रैस्ट हॉऊसों को भी मौद्रीकरण में शामिल किया गया है। विपक्ष इसे इन संपत्तियों को प्राईवेट सैक्टर को बेचना करार दे रहा है। विपक्ष के इस आरोप के जवाब में सरकार ने कहा है कि प्राईवेट सैक्टर को केवल चार वर्ष के लिये ही यह संपत्तियां दी जा रही हैं और उसके बाद इन्हें वापिस ले लिया जायेगा।
सरकार के आश्वासन और विपक्ष के आरोप के परिप्रेक्ष में मौद्रीकरण की नीति और देश की आर्थिक स्थिति को समझना आवश्यक हो जाता है। मानेटरी पॉलिसी हर देश का केन्द्रिय बैंक लाता है। इस नाते इसकी घोषणा आरबीआई को करनी चाहिये थी परन्तु यह घोषणा वित्त मन्त्री के माध्यम से आयी है। मानेटरी पॉलिसी वह प्रक्रिया है जिसके तहत केन्द्रिय बैंक अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति का प्रबन्ध करता है। इसके माध्यम से कीमतों और ग्रोथ में स्थिरता बनाये रखने का प्रयास किया जाता है। इसमें प्राईवेट सैक्टर का सहयोग लिया जाता है और इसका प्रभाव कर्ज के मंहगा होने तथा ब्याजदरों पर पड़ता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि ऐसे क्या कारण हो गये कि अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति करने के लिये सरकारी संपत्तियों का इस तरह मौद्रीकरण करने की अनिवार्यता आ खड़ी हुई है। क्या इन संपत्तियों से इस समय सरकार को आमदन नहीं हो रही थी? क्या इन संपत्तियों से छः लाख करोड़ जुटा कर अर्थव्यवस्था में डालने से यह संकट हमेशा के लिये टल जायेगा? जब प्राईवेट सैक्टर इनमें निवेश करके सरकार को भी छः लाख करोड़ देगा और अपने लिये भी निश्चित लाभ कमायेगा तो क्या इसका असर उपभोक्ता पर नहीं पड़ेगा? क्या इससे सड़क और रेल दोनों से यात्रा करना स्वभाविक रूप से ही मंहगा नहीं हो जायेगा। जब ट्रांसमिशन लाईने और विद्युत परियोजनाएं दोनो ही प्राईवेट के पास चली जायेंगी तो क्या यह सबकुछ और मंहगा नहीं होगा। क्या सरकार द्वारा इस नीति को मौद्रीकरण का नाम देने से इनकी मंहगाई का असर आम आदमी पर नहीं पड़ेगा। फिर जब चार वर्ष के लिये ही इन संपत्तियों को प्राईवेट सैक्टर को देने की बात की जा रही है तो यह सैक्टर इन्हे सुधारने के लिये इनमें निवेश ही क्यों करेगा?
मोदी सरकार ने जब 2014 में सत्ता संभाली थी उस समय मार्च 2014 में केन्द्र सरकार का कुल कर्ज 53.11 लाख करोड़ था। यह कर्ज आज बढ़कर 101.3 करोड़ हो गया है। जिस अनुपात में सरकार का कर्ज बढ़ा है क्या उसी अनुपात में राजस्व में भी बढ़ौत्तरी हुई है? शायद नहीं। फिर क्या सवाल नहीं पूछा जाना चाहिये कि यह कर्ज कहां निवेश किया गया? 2014 से 2021 तक मंहगाई और बेरोज़गारी ने सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। पैट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों का बढ़ना क्या किसी भी तर्क से जायज ठहराया जा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि इस दौरान ऐसी कोई आपदा नहीं आयी है जिससे आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में कोई कमी आयी हो। कोरोना को लेकर भी आज जो स्थिति सरकार के फैसलों के कारण खड़ी हुई है उसमें भी अब बिमारी से ज्यादा राजनीति की गंध आनी शुरू हो गयी है। जिस ढंग से मौद्रीकरण के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों को प्राईवेट हाथों में सौंपने का ताना बाना बुना गया है उसका असर बहुत जल्द मंहगाई और बेरोज़गारी की बढ़ौत्तरी के रूप में सामने आयेगा यह तय है। उस समय आम आदमी कितनी देर शांत होकर बैठा रहेगा यह कहना कठिन है क्योंकि यह कोई भी मानने को तैयार नहीं है कि कोई भी आदमी केवल चार वर्ष के लिये निवेश करके आपकी संपत्ति की दशा-दिशा सुधारकर उसे आपको वापिस कर देगा।
संविधान में हुए 127वें संशोधन से राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची बनाने का अधिकार मिल गया है। इस अधिकार से वह इन वर्गों की अपने राज्य की सूची बनाने के लिये स्वतन्त्र होंगे। इससे अब संविधान की धारा 356(26c) और 338 b(9) में भी संशोधन हो जायेगा। इस संशोधन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव क्या होंगे यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन अभी यह उल्लेखनीय है कि जब 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री वी.पी.सिंह ने संसद में मण्डल आयोग कि सिफारिशें लागू करके अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण सरकारी नौकरीयों मेें देने की घोषणा की थी तब पूरे देश में इसका भयानक विरोध हुआ था। देशभर में करीब 200 युवाओं ने आत्मदाह के प्रयास किये थे और 62 की तो मौत भी हो गयी थी। दिल्ली के देशबन्धु कॉलिज का छात्र राजीव गोस्वामी पहला छात्र था जिसने आत्मदाह का प्रयास किया था। दिल्ली के ही एक बारह वर्षीय सातवीं कक्षा के छात्र अतुल अर्ग्रवाल ने भी आत्मदाह का प्रयास किया था। वह 55% तक जल गया था लेकिन उसे बचा लिया गया। बाद में इसी छात्र ने यह स्वीकार किया था कि उसका यह कदम मूर्खतापूर्ण था। शिमला में भी आत्मदाह के प्रयास हुए थे। शायद यह आत्मदाह करने वाले तो यह जानते भी नहीं थे कि आरक्षण का मुद्दा क्या था। मण्डल सिफारिशों पर उभरे इस विरोध का परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने वी.पी.सिंह सरकार से अपना समर्थन वापिस ले लिया। इससे सरकार गिर गयी और यह विरोध भी समाप्त हो गया। तभी से आरक्षण के विरोध में एक वर्ग खड़ा हो गया और यह धारणा बन गयी कि इस विरोध को भाजपा का संरक्षण और समर्थन हासिल है। इसी आधार पर स्वर्ण आयोग की मांग उठी जो आज विधानसभा के सदन तक पहुंच चुकी है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारी स्वर्ण जातियां अपने लिये भी आरक्षण की मांग करती आ रही है। 2014 के बाद से यह मांग ज्यादा मुखर और नियोजित होकर उठी है। हर मांग में यह कहा गया कि या तो हमें भी आरक्षण दो या सबका आरक्षण खत्म करो। आर.एस.एस. प्रमुख डा.मोहन भागवत बड़े खुले शब्दों में यह कह चुके हैं कि आरक्षण पर नये सिरे से विचार होना चाहिये। स्वभाविक है कि जिन परिवारों के बच्चे मण्डल विरोध में आत्मदाह का प्रयास कर चुके हैं और जो इसमें अपने प्राण गंवा चुके हैं वह कभी नहीं चाहेंगे कि आरक्षण कायम रहे। यह उम्मीद इन लोगों को भाजपा से ही है क्योंकि उस समय मण्डल के विरोध में उभरे कमण्डल आन्दोलन को इसी भाजपा का प्रायोजित कहा गया था। इस पृष्ठभूमि में यदि इस पूरे विषय पर निष्पक्षता से विचार करें तो आज तो स्थिति 127वें संविधान संशोधन तक पहुंच गयी है। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि समाज के पिछड़े वर्गों की चिन्ता और उन पर चिन्तन का काम तो 1906 से ही शुरू हो गया था जब जातियों की सूची तैयार की गयी थी। आज़ादी के बाद सरकार के सामने यह चिन्ता और चिन्तन सबसे पहला कार्य था। इसीलिये 29 जनवरी 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहला आयोग गठित किया गया और शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ों की पहचान की गयी। इस पहचान के लिये 22 मानक तय किये गये। जिस जाति वर्ग के कुल अंक 11 से बढ़ गये उसे ही इसमें शामिल किया गया। इस आयोग ने 2399 ऐसी कुल जातियों की पहचान की और उसमें से 837 को अति पिछड़े का दर्जा दिया। आयोग ने मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। लेकिन अपने ही आवरण पत्र में इन सिफारिशों को लागू न करने की बात की। तर्क था कि इससे प्रशासन का काम प्रभावित होगा। यह सुझाव दिया कि इनको मुख्यधारा में लाने के लिये आर्थिक सुधारों और कृषि सुधारों पर जोर देना होगा।
काका कालेलकर आयोग के बाद जनवरी 1979 में इसी आश्य का दूसरा आयोग बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री पी.वी.मण्डल की अध्यक्षता में गठित किया गया। इसकी रिपोर्ट 31 दिसम्बर 1980 को आयी तब मोरारजी देसाई सरकार गिर कर इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन चुकी थी। इस सरकार में इस रिपोर्ट पर कोई कारवाई नही हुई। इसके 1989 में केन्द्र में वी.पी.सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। इस सरकार ने मण्डल की सिफारिशों को सरकार की आहूति देकर लागू किया। लेकिन तभी से आरक्षण का विरोध भी चलता आ रहा है जो आज स्वर्ण आयोग की मांग तक पहुंच चुका है। मण्डल की सिफारिशों को 1992 में सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। लेकिन सर्वाेच्च न्यायालय ने मण्डल की सिफारिशों को तर्क संगत माना। इन्दिरा सहानी फैसला एक मील का पत्थर बन गया क्योंकि इस फैसले में सर्वाेच्च न्यायालय ने क्रीमी लेयर का मानक जोड़ दिया। यह कहा कि जो लोग क्रीमी लेयर में आ जायें उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। 1993 में क्रीमी लेयर में आय का मानक एक लाख रखा गया। जिसे 2004 में बढ़ाकर अढ़ाई लाख 2008 में साढ़े चार लाख और अब 2015 में आठ लाख कर दिया गया है। इसी दौरान जब सर्वाेच्च न्यायालय ने पदोन्नतियों मेें आरक्षण का लाभ न दिया जाने का फैसला दिया और इसका विरोध हुआ तब इस फैसले को मोदी सरकार ने संसद में पलट दिया। अब संविधान में संशोधन करके राज्यों को ओबीसी सूचियां बनाने का अधिकार दे दिया है। इस अधिकार के तहत जब इन सूचियों का आकार बढ़ेगा तब क्या और आरक्षण की मांग नही आयेगी। इस मांग को पूरा करने के लिये आरक्षण का प्रतिशत और बढ़ाना पड़ेगा। यह एक स्वभाविक परिणाम होगा अभी 2017 में जो रोहिणी आयोग गठित किया गया है उसकी रिपोर्ट आनी है। उसमें पिछड़े वर्गाे को भी तीन भागों में बांटा जा रहा हैं पिछड़ा, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा। इन्हें इसी 27% में समायोजित किया जायेगा और 7%, 11% और 9% में बांटा जायेगा। इसलिये अभी यह देखना रोचक होगा कि इस 127वें संविधान संशोधन और फिर रोहिणी आयोग की सिफारिशों और स्वर्ण आयोग की मांग में तालमेल कैसे बैठेगा।
पैगासस जासूसी प्रकरण पर चार देशों ने अपने अपने यहां जांच आदेशित कर दी है। भारत सरकार इस मामले को कोई गंभीर विषय ही नहीं मान रही है। संसद में पैगासस और किसान आन्दोलन को लेकर रोज़ हंगामा हो रहा है। सरकार किसान आन्दोलन को भी गंभीर मुद्दा नहीं मान रही है। इन मुद्दों पर भाजपा नेता राज्यपाल सत्य पाल मलिक पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी और बिहार के मुख्यमन्त्री एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी सरकार को राय दे चुके हैं कि पैगासस की जांच की जाये तथा किसानों की मांगो को हल्के से न लिया जाये। किसानों का मुद्दा भी सर्वोच्च न्यायालय के पास लंबित है और अब नौ याचिकायें पैगासस को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच चुकी हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार का पक्ष जानने के लिये नोटिस जारी करते हुए कहा है कि यदि सामने आ रही रिपोर्टें सही है तो यह मुद्दा बहुत गंभीर है। रिपोर्टों का सही होना पूर्व आईटी मन्त्री रविशंकर प्रसाद के इस ब्यान से ही स्पष्ट हो जाता है जब उन्होने संसद में यह कहा कि इसमें कुछ भी गैर कानूनी तरीके से नहीं हुआ है। रविशंकर प्रसाद के ब्यान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जो कुछ भी हुआ है वह सरकार के संज्ञान में रहा है। मैने पिछले लेख में आशंका व्यक्त की थी कि यदि राज्य सरकारें भी ईजरायल से यह जासूसी उपकरण खरीद ले तो किस तरह से हालात देश में बन जायेंगे। अब जब यह खुलासा सामने आ गया है कि 2019 के चुनावों के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने भी अपने अधिकारियों की एक टीम इसी आश्य से ईजरायल भेजी थी तो यह आशंका सही सिद्ध हो जाती है। महाराष्ट्र प्रकरण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर हो चुकी है।



प्रदेश उच्च न्यायालय ने इन दिनों भी प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर हो रहे अतिक्रमणों का कड़ा संज्ञान लिया है। चम्बा के एक व्यक्ति की याचिका पर उच्च न्यायालय ने प्रदेश भर में हुए अतिक्रमणों का ब्यौरा प्रशासन ने तलब किया है। उच्च न्यायालय इससे पूर्व भी ऐसे मामलों पर अपनी नाराज़गी जता चुका है। अवैध निर्माणों के बिजली, पानी के कनैक्शन काटने के आदेश दिये गये थे। उस समय प्रदेश भर में 35000 से भी अधिक ऐसे निर्माण सामने आये थे जिनमें नक्शे पास करवाना तो दूर बल्कि नक्शे संवद्ध प्रशासन को सौंपे ही नहीं गये थे। प्रदेश में अवैध निर्माणों और वनभूमि पर अवैध कब्जों के मामले अदालत से लेकर एनजीटी तक के संज्ञान में लगातार रहे हैं और इन पर कड़ी कारवाई करने के प्रशासन को निर्देश भी जारी हुए हैं लेकिन परिणाम यह रहा है कि सरकारें इन अवैधताओं को नियमित करने के लिये रिटैन्शन पॉलिसीयां लाती रहीं। जब अदालत ने इसका संज्ञान लिया तो प्लानिंग एक्ट में ही संशोधन कर दिया गया। जब यह संशोधन राज्यपाल के पास पहुंचा और उन्होंने इसे रोक लिया तब भाजपा का एक प्रतिनिधि मण्डल राज्यपाल से मिला तथा संशोधन को स्वीकार करने का आग्रह किया। इस आग्रह के बाद यह संशोधन पारित होकर अधिसिचत हो गया। फिर उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ याचिकाएं आयी और अदालत ने संशोधन को निःरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले में सरकार के दायित्वों को लेकर जो टिप्पणीयां की हैं उनसे हमारे माननीयों और प्रशासनिक तन्त्रा की कार्य प्रणाली पर जो स्वाल खड़े हुये हैं वह काफी चौकाने वाले हैं। लेकिन अन्त में यह सब एक रिकार्ड बनकर ही रह गया है। इस पर कोई अमल नहीं हुआ है। बल्कि जयराम सरकार ने इसी तरह का संशोधन सदन से पारित करवा लिया है।
अब तक की सारी सरकारें इस हमाम में बराबर की नंगी रही हैं। हद तो यह है कि प्रदेश सरकार के प्रशासन द्वारा ही तैयार की गयी रिपोर्ट पर एनजीटी का चर्चित फैसला आधारित है लेकिन वही प्रशासन अपनी ही रिपोर्ट पर अमल नहीं कर पाया है। जब कोई सरकार अवैधताओं और अतिक्रमणों को बोझ से इतनी दब जाये कि वह किसी भी अदालत तथा अपनी ही रिपोर्ट पर अमल करने से बचने के उपाय खोजने लग जाये तो ऐसी आपदाओं में जान और माल की हानि होने से कोई नहीं बचा सकता।




इसी तरह जासूसी प्रकरण में भी सरकार अपनी भूमिका से इन्कार कर रही है। सरकार और भाजपा का हर नेता केन्द्र से लेकर राज्यों तक सरकार का पक्ष रखते हुए इस प्रकरण को बाहरी ताकतों की साजिश करार दे रहा है। इस प्रकरण मे जो अब तक खुलासे सामने आये हैं उनके मुताबिक इसमें पत्रकारों, राजनेताओं, सरकारी अधिकारियो,ं उद्योगपतियां और न्यायपालिका तक के फोनटैप हुए हैं। इन लोगों की जासूसी की गयी है। इस जासूसी के लिये इजरायल की एक कम्पनी एनओएस का पैगासस स्वाईवेय इस्तेमाल हुआ है। मोदी सरकार के दो मन्त्रीयों की भी जासूसी हुई है। सरकार यह जासूसी होने से इन्कार नहीं कर रही है केवल यह कह रही है कि इसमें उसका हाथ नहीं है। भाजपा नेता पूर्व मन्त्री डा़ स्वामी ने यह कहा है कि जासूसी करने वाली कंपनी एनओएस पैसे लेकर जासूसी करती है। इजरायल का कहना है कि यह स्पाईवेयर केवल सरकारों को ही बेचा जाता है। भारत सरकार इसे देश के खिलाफ विदेशी ताकतों की साजिश करार दे रही है। ऐसे में क्या यह सवाल उठना स्वभाविक नहीं हो जाता कि जब कोई बाहरी ताकत देश के खिलाफ ऐसा षडयन्त्र कर रही है तो भारत सरकार को तुरन्त प्रभाव से इसकी जांच करनी चाहिये। लेकिन मोदी सरकार यह जांच नहीं करवाना चाहती। जब सरकार ने यह जासूसी नहीं करवाई है तो वह जांच करवाने से क्यों भाग रही है। जासूसी हुई है इससे सरकार इन्कार नहीं कर रही है। सरकार ने की नहीं है। तब क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं बन जाती है कि इस प्रकरण की जांच करे। सरकार का जांच से भागना देश और सरकार दोनों के ही हित में नहीं होगा।
आक्सीजन की कमी से हुई मौतों से इन्कार करना और इतने बड़े जासूसी प्रकरण के घट जाने पर जांच से भागना ऐसे मुद्दे आज देश के सामने आ खड़े हुए हैं जिन पर हर आदमी को अपने और अपने बच्चों के भविष्य को सामने रख कर विचार करना होगा और अपने बच्चों के भविष्य को सामने रखकर विचार करना होगा। क्योंकि ऐसे ही इन्कारों का परिणाम है मंहगाई और बेरोज़गारी।