जयराम सरकार प्रदेश में हुए चारों उपचुनाव हार गयी है। उपचुनाव पार्टी की नीतियों या कार्यक्रमों पर नहीं वरन् सरकार की कारगुजारीयों पर जनता की मोहर होते हैं। यह उपचुनाव सरकार के चार साल के कार्यकाल पर जनता का फैसला है जिसमें यह सामने आ गया कि जनता सरकार के कामकाज और उसकी शैली से सहमत नहीं है। शैल के पाठक जानते हैं कि हमने समय-समय पर सच जनता और सरकार के सामने रखने का पूरा प्रयास किया है। यहां तक कह दिया कि चुनाव परिणाम एक तरफा होने जा रहे हैं क्योंकि सरकार के पक्ष में कुछ नही है। यह आकलन सही सिद्ध हुआ। जब मण्डी में पिछली बार के 4 लाख से भी अधिक के अंतराल से हुई हार को पारकर कांग्रेस ने यह सीट 7490 के अन्तर से जीत ली और जुब्बल कोटखाई में भाजपा प्रत्यासी जमानत भी नहीं बचा पायी सभी बीस विधानसभा क्षेत्रों में नोटा का प्रयोग होना भी यही प्रमाणित करता है। मुख्यमंत्री ने इस हार का कारण महंगाई को बताया है लेकिन वह यह भूल गये कि इसी महंगाई के चलते हरियाणा को छोड़कर अन्य भाजपा शासित राज्यों में भाजपा ने जीत की तर्ज की है। इसलिए इस हार के कारण कुछ और हैं।
इन कारणों पर चर्चा करने के लिए 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा द्वारा उस समय की कांग्रेस सरकार के खिलाफ लगाये गये कुछ आरोपों पर नजर डालना आवश्यक होगा। उस समय की सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन के कारण प्रदेश पर कर्ज का बढ़ना, भ्रष्टाचार, रिटायर्ड और टायर्ड लोगों द्वारा सरकार चलाया जाना तथा लोक सेवा आयोग में मीरा वालिया कि नियुक्ति को नियमों के विरूध करार देना मुख्य आरोप थे। इन आरोपों को लेकर चुनाव प्रचार के दौरान एक विशेष पर्चा जारी किया गया था। सरकार बनने के बाद पहले बजट भाषण में वीरभद्र सरकार पर अठारह हजार करोड का अतिरिक्त कर्ज लेने का आरोप लगाया गया। लेकिन प्रदेश की वितिय स्थिति पर कोई श्वेत पत्र जारी नहीं किया। बल्कि वित विभाग के सचिव तक को नहीं बदला गया। लोक सेवा आयोग में नियमों के विरूद्ध नियुक्ति होने का आरोप लगाकर उन्हीं नियमों के तहत आयोग में दो पद सृजित करके एक को भर भी लिया गया। सर्वोच्च न्यायालय और प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आज तक लोक सेवा आयोग के लिए नियम नहीं बनाये गये। पूर्व सरकार पर रिटायरड और टायरड अधिकारियों द्वारा सरकार चलाने के आरोप लगाकर अपनी सरकार मे भी वही सब कुछ किया गया। आज चार वर्षों से भी कम समय में बीस हजार करोड़ से अधिक का कर्ज सरकार ले चुकी है। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सता में आर्यी सरकार ने पहले दो माह में भी हाइड्रो कॉलेज के निर्माण में दस करोड़ से अधिक का नुकसान प्रदेश का किया और जब यह सवाल विधानसभा तक भी पहुंच गया तब भी सरकार ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया। इसी तरह पिछली सरकार में जिस स्कूल वर्दी घोटाले ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था उसमें हुई जांच के बाद सप्लायरों को पांच करोड़ का जुर्माना वसूल कर लिया गया था। उस जुर्माने को आब्रिट्रेशन के कमजोर फैसले पर लौटा दिया गया। उसमें शिक्षा विभाग और शिक्षामंत्री के फाइल पर लिखित आग्रह के बावजूद उच्च न्यायालय में अपील नहीं की गयी।
जब सरकार के शुरु के फैसले में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई करने की बजाये उसे संरक्षण देने की नीयत और नीति सामने आ गयी तब सबके हौसले बुलंद हो गये। इससे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो गया। एक मंत्री द्वारा अपने क्षेत्र के कुछ लोगों को नौकरियां देने के लिये लिखे सिफारशी पत्र वायरल हुए। इसके बाद तो सरकार के खिलाफ ऐसे पत्रों की एक तरह से बाढ़ ही आ गयी। ऐसे पत्रों में उठाये गये मामलों की जांच करने की बजाये यह पत्र लिखने के लिये शक के आधार पर कुछ लोगों के खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज कर लिये गये ताकि विरोधियों की आवाज को दबाया जा सके। इस तरह के पत्रों को जनता के सामने रखने का साहस जब शैल ने दिखाया तो उसकी आवाज को दबाने के लिये सरकार ने विज्ञापन बंद करने से लेकर विजिलेन्स में फर्जी मामले तक बना दिये। इन्ही भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर स्वास्थ्य विभाग के निदेशक की गिरफ्तारी तक हुई। स्वास्थ्य मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष तक के पदों की बदला-बदली की गयी। यही नहीं आज भ्रष्टाचार की चर्चा यहां तक पहुंच चुकी है कि एक उपसचिव स्तर के अधिकारी का परिवार तीन पैट्रोल पम्पां का मालिक हो गया है। कई सत्ता में बैठे लोगों ने चंडीगढ़, दिल्ली, लुधियाना और अमृतसर में संपत्ति खड़ी कर रखी हैं। सरकार के अधिकांश शीर्ष पदों पर ऐसे अधिकारी तैनात हैं जिन्हें नियमानुसार संदिग्ध चरित्र की श्रेणी में होना चाहिये परंतु वह सरकार चला रहे हैं। अदालत के फैसलां पर अमल न करना और इस आशय के पत्रों का जवाब तक ना देना सरकार की नीति बन चुकी है। जिस सरकार के मंत्रीमण्डल की बैठकां की लाइव जानकारी कुछ पत्रकारों तक पहुंच जाये उस सरकार के सलाहकारां के स्तर का अन्दाजा लगाया जा सकता है। ऐसे दर्जनों प्रकरण हैं जिनके कारण मुख्यमंत्री और सरकार की छवि लगातार गिरती चली गयी। सरकार को मीडिया का एक बड़ा वर्ग हरा ही हरा दिखाता रहा और सूखा सामने रखने वालों की आवाज दबाने का प्रयास लोकसंपर्क विभाग करता रहा। जो सरकार दिवार पर लिखे हुए को पढ़ने की बजाये उस पर आंखें बंद कर ले तो उसका परिणाम चार शुन्य ही होना था।





इस संद्धर्भ में यदि जयराम सरकार की कुछ कारगुजारी पर नजर डालें तो यह मानना पड़ेगा कि या तो यह सरकार कर्ज लेकर घी पीने के मार्ग पर चल निकली है जिससे पीछे मुड़ना कठिन हो गया है या फिर इस सरकार के मित्र और अफसरशाही इसे बुरी तरह गुमराह कर रहे हैं। क्योंकि अभी उपचुनाव के दौरान ही पहले खाद्य तेलों और अब दालों के दाम बढ़ाये गये है। इस उपचुनाव के दौरान नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने मुख्यमंत्री पर यह आरोप लगाया कि उन्हें हवा में उड़ने की आदत हो गई है वह सड़क मार्ग से यात्रा ही नहीं करते। इसीलिए अपने चुनाव क्षेत्र में छः हेलीपैड बना लिए हैं। एक पंचायत से दूसरी पंचायत में हेलीकॉप्टर से ही जाते हैं। विधायक विक्रमादित्य ने इन हेलीपैडों की संख्या चौदह बताई है। सरकार इस संख्या का खंडन नहीं कर पायी है। जिन लोगों को यह जानकारी है कि मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी दो मंजिला आवास ओक ओवर में भी आने जाने के लिए लिफ्ट का निर्माण करवा लिया है वह हेलीपैडों की संख्या पर अविश्वास नहीं कर पायेंगे। इस सरकारी आवास में पहले के सारे मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वह सभी आयु में इनसे बड़े थे। यह लिफ्ट और इतने हेलीपैड बनवाने पर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि कर्ज लेकर किए गए यह निर्माण किसी भी तर्क से विकास नहीं ठहराया जा सकता। फिर कल को इन हेलीपैडां की संभाल करने के लिए पैसा कहां से आ आयेगा। क्या आगे वाले मुख्यमंत्री सिराज को इतना समय दे पायेंगे कि हर हेलीपैड पर वह हेलीकॉप्टर लेकर पहुंच जायेंगे। मुख्यमंत्री के हर बजट में ऐसी कई-कई घोषणाएं हैं जो कर्ज लेकर ही पूरी की जा सकेंगी और उनसे राजस्व में कोई आय नहीं होगी।
इस समय देश ऐसे आर्थिक संकट से गुजर रहा है की जब बैंकों का एनपीए दस ट्रिलियन करोड़ हो गया तो सरकार को इसकी रिकवरी के लिए बैड बैंक बनाना पड़ा। लेकिन इस बैड बैंक को भी अभी तक 10 प्रतिश्त सफलता नहीं मिल पाई है। इसी कारण से सरकार को बैंकों में बीस हजार करोड़ डालना पड़ा है ताकि उनकी बैलेंस शीट में सुधार आ सके। आने वाले दिनों में बैंक की रिस्क मनी में और बढ़ौतरी होने की संभावना है। यह सब कूछ नोटबंदी के फैसले के बाद के परिणाम हैं। नोटबंदी के बाद ऑटोमोबाइल और रियल स्टेट सेक्टरों को जो आर्थिक पैकेज दिये गये थे उनसे कोई सुधार नहीं हुआ। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में बिना गारंटी के कर्ज दिये गये। फिर कोरोना काल के सारे आर्थिक पैकेजों में कर्ज लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इन सारे फैसलों का परिणाम है बैड बैंक की स्थापना और अब इससे वेतन और पेंशन के प्रभावित होने की संभावना है। इस आर्थिक संकट के लिए पूर्व सरकारों को जिम्मेदार ठहराना कठिन हो जायेगा। क्योंकि इससे समर्थक और विरोधी सभी एक साथ और एक सम्मान प्रभावित होंगे।







इस लखीमपुर प्रकरण से यह प्रमाणित हो गया है कि किसान आन्दोलन को किसी भी तरह की हिंसा से दबाना संभव नही होगा। 26 जनवरी को भी इसी तरह का प्रयास हुआ था। उससे पहले जिस तरह सड़क पर कीलें गाडकर रोकने का प्रयास किया गया था वह भी सारे देश ने देखा है। जो आन्दोलन जायज मुद्दों पर आधारित होते हैं और हर छोटे-बडे़ को एक समान प्रभावित करते हैं ऐसे आन्दोलन किसी भी डर से उपर हो जाते हैं। ऐसे आन्दोलन को राजनीति से प्रेरित करार देना अपने आपको धोखा देना हो जाता है। राजनीति द्वारा प्रायोजित आन्दोलन और उनके नेतृत्व का अन्तिम परिणाम अन्ना आन्दोलन जैसा होता है। नेता आन्दोलन स्थल तक आने का साहस नही कर पाता है। अन्ना और ममता के साथ यही हुआ था। इसलिये आज सरकार और उसके हर समर्थक को यह अहसास हो गया होगा कि किसानों की मांगे मानने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नही रह गया है। क्योंकि इस सरकार के सारे आर्थिक फैसले केवल कुछ अमीर लोगों को और अमीर बनाने वाले ही प्रमाणित हुए हैं। मोदी सरकार ने मई 2014 में अच्छे दिन लाने के साथ देश की सत्ता संभाली थी। लेकिन आज यह अच्छे दिन पैट्रोल सौ रूपये और रसोई गैस एक हजार रूपये से उपर हो जाने के रूप में आये हैं। 2014 में बैंक जमा पर जो ब्याज देते थे वह आज 2021 में उससे आधा रह गया है। आज भी 19 करोड़ से ज्यादा लोग रात को भूखे सोते हैं और इस सच को पूर्व केन्द्रीय मन्त्री शान्ता कुमार ने अपनी आत्म कथा में स्वीकारा है। सरकार की आर्थिकी नीतियों ने सरकार को बैड बैंक बनाने पर मजबूर कर दिया है। किसी भी सरकार के आर्थिक प्रबन्धन पर बैड बैंक के बनने से बड़ी लानत कोई नही हो सकती है।
इस परिप्रेक्ष में यदि कृषि कानूनों पर नजर डालें तो जब यह सामने आता है कि सरकार ने कीमतों और होर्डिंग पर से अपना नियन्त्रण हटा लिया है तो और भी स्पष्ट हो जाता है कि गरीब आदमी इस सरकार के ऐजैण्डों मे कहीं नही है। जो पार्टी किसी समय स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से एफ डी आई का विरोध करती थी आज उसी की सरकार रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी एफ डी आई ला चुकी है। आज सैंकड़ों विदेशी कम्पनियां देश के आर्थिक संसाधनों पर कब्जा कर चुकी हैं। कृषि में कान्ट्रैक्ट फारमिंग लाकर इस क्षेत्र को भी मल्टीनेशनल कम्पनियों को सौंपने की तैयारी की गई है। इसलिये आज इन कृषि कानूनों का विरोध करना और सरकार को इन्हें वापिस लेने पर बाध्य करना हर आदमी का नैतिक कर्तव्य बन जाता है। आर्थिकी को प्रभावित करने वाले फैसलों को राम मन्दिर, तीन तलाक, धारा 370 हटाने के फैसलों से दबाने का प्रयास आत्मघाती होगा। बढ़ती कीमतों और बढ़ती बेरोजगारी ने आम आदमी को यह समझने के मुकाम पर ला दिया है कि सरकार की इन उपलब्धियां का कीमतों के बढ़ने से कोई संबंध नही है। इसलिये सरकार को यह कानून वापिस लेने का फैसला लेने में देरी करना किसी के भी हित में नही होगा।





दूसरी ओर अब इस कर्ज को वसूलने की सारी जिम्मेवारी बैड बैंक की हो जाती है। बैड बैंक कर्जदार की समंपत्तियां बेचे या गांरटी देने वालां से वसूली करे यह सब बैड बैंक की अपनी कार्यशैली पर निर्भर करता है। यह सब करने के बावजूद भी यदि कुछ कर्ज की वसूली न हो पाये तो इसकी भरपाई करने की गांरटी सरकार की होती है। इस तरह बैड बैंक बैड लोन की वसूली करने का एक और मंच बन जाता है। ऐसे में जो सवाल खडें होते हैं कि जब किसी सरकार को बैड बैंक बनाने की स्थिति खडी हो जाती है तो उसका अर्थ होता है कि अधिकांश बैंक फेल होने के कगार पर पहुंच गये हैं। यह बैंक अपना काम जारी रख पाने की स्थिती में नहीं रह गये हैं। इन्हें लोगों के जमा पर ब्याज घटाने और कर्ज देने की ब्याज दर बढ़ाने की अनिवार्यता हो जाती है। बल्कि नये कारोबार के लिए यह ऋण देने की स्थिती में नहीं रह गए होते हैं। ऐसी स्थिती में ही मंहगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ती चली जाती है। इस समय देश ऐसी ही स्थिती से गुजर रहा है। यह मंहगाई और बेरोजगारी सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो जायेगी। इस स्थिति पर कैसे नियंत्रण पाया जाए इस पर विचार करने से पहले कर्ज और एन पी ए के आंकडो पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।
वर्तमान सरकार ने 2014 में सत्ता संभाली थी। उस समय केंद्र सरकार का कर्ज 53.11 लाख करोड़ था जो आज बढ़कर 150 लाख करोड़ से उपर हो गया है। उस समय बैंकों का कुल एन पी ए 2,24,542 करोड़ था जो आज बढ़कर दस खरब करोड़ हो गया है। दिसम्बर 2017 में यह एन पी ए 7,23,513 करोड़ था। यह आंकडे आर टी आई में सामने आये है। 2018 में सरकार ने एक योजना शु़रू की थी प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना। इसमें 59 मिनट में एक करोड़ का कर्ज देने की घोषणा की गयी थी। इस योजना के तहत 2019 के मध्य तक खुले मन से बैंको ने एम एस एम ई के लिये कर्ज बांटे हैं। 2019 में ही लोकसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारी बहुमत से भाजपा फिर सता में आ गयी। अब जो आर टी आई में एन पी ए की सूचना आयी है उसके मुताबिक एम एस एम ई के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में जो कर्ज दिया गया है उसी के कारण दिसम्बर 2017 का सात लाख करोड़ का एन पी ए सितंबर 2021 में ऐसोचेम की रिपोर्ट के मुताबिक दस खरब को पहुंच गया है। प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में बांटे गए ऋण के अधिकांश लाभार्थियों की तो पूरी जानकारी भी बैंकों के पास नहीं है। हर प्रदेश में ऐसे ऋण दिये गये हैं इनकी वसूली लगभग अंसभव हो गयी है। इसी वसूली के लिये बैड बैंक बनाना पडा है। इसके माध्यम से भी यह वसूली हो पायेगी यह असंभव है। यह भी तय है कि जब बैंक इस हालत तक पहुंच गये हैं तो इसका असर मंहगाई और बेरोजगारी पर पडेगा। अभी आम आदमी को यह जानकारी नहीं है कि सता में बने रहने के लिये ही प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना शुरू की गयी थी जो 2019 में ही बंद कर दी गयी अब इस एन पी ए से उभरने के लिए ही कर्ज को बेचने की योजना बैड बैंक के माध्यम से लायी गयी है। आर्थिकी की समझ रखने वालों की नजर में बैड बैंक की नौबत आना एक बडे़ खतरे का संकेत है और इसके प्रभावों से बाहर आ पाना आसान नही होगा।