केन्द्र में जब से मोदी सरकार ने सत्ता संभाली है तब से लेकर अब तक करीब तीन सौ मामले देशद्रोह के दायर हुए हैं। इन मामलों में करीब पांच सौ लोगों की गिरफ्तारी हुई है। परन्तु अदालत में केवल नौ लोगों को ही दोषी करार दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने आज आजा़दी के बाद भी देशद्रोह के कानून को चलाये रखने पर हैरानी व्यक्त की है। केन्द्र सरकार से इस पर जवाब मांगा है। जब यह मामला अदालत में पहली बार सुनवायी के लिये आया तब अटार्नी जनरल ने यह कहा है कि अभी इस प्रावधान को खत्म नहीं किया जाना चाहिये। सरकार इस पर क्या जवाब देती है और अदालत का इस पर क्या फैसला आता है यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान से इस पर एक बड़ी बहस की शुरूआत अवश्य हुई है। जिन लोगों के खिलाफ देशद्रोह के मामले बनाये गये हैं उनमें अधिकांश में बुद्धिजीवि और पत्रकार रहे हैं। इन लोगों के खिलाफ यह मामले बनाये जाने का आधार प्रायः किसी भी विषय पर सरकार से भिन्न राय रखना या सरकार से तीखे सवाल पूछना रहा है। इससे यही स्पष्ट होता है कि इस सरकार में शायद वैचारिक मत भिन्नता के लिये कोई स्थान नही है। जब कोई सरकार यह मान लेती है कि जनहित को लेकर उससे बेहत्तर सोचने वाला और कोई हो ही नहीं सकता है तब जब भी मत भिन्नता का कोई सवाल सामने आ जाता है तब वह अस्वीकार्य ही नहीं बल्कि देशद्रोह करार दे दिया जाता है। सरकार से भिन्न राय रखना आज देशद्रोह बनता जा रहा है। अभी जिस तरह से ईज़रायल की ऐजैन्सी के माध्यम से पत्रकारों, जजों और विपक्ष के नेताओं की जासूसी करवाने का प्रकरण सामने आया है। उससे यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि सवाल पूछने का साहस रखने वालों से सरकार किस कदर परेशान है। अभी संसद का सत्र चल रहा है और पहले ही दिन यह जासूसी प्रकरण सामने आ गया है। संसद में इस पर किस तरह के सवाल उठते हैं और सरकार का जवाब क्या रहता है यह देखना दिलचस्प होगा।
इस समय देश में महंगाई और बेरोज़गारी दोनां अपने चरम पर रहे हैं। यह सब सरकार की नीतियों का परिणाम है। यदि सरकार की नीतियों पर सवाल न भी उठाया जाये तो क्या यह मंहगाई और बेरोज़बारी समाप्त हो जायेगी? क्या इससे सिर्फ सरकार से मत भिन्नता रखने वाले ही प्रभावित हैं और दूसरे नहीं? हर आदमी इससे प्रभावित है लेकिन सरकार से सहमति रखने वालों की प्राथमिकता हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व के इस प्रभाव के कारण यह लोग यह नही देख पा रहे हैं कि इन नीतियों का परिणाम भविष्य में क्या होगा? मंहगाई और बेरोज़गारी का एक मात्र कारण बढ़ता निजिकरण है? 1990 के दशक में निजिक्षेत्र की वकालत में सरकारी कर्मचारी पर यह आरोप लगाया गया था कि वह भ्रष्ट और कामचोर है। तब कर्मचारी और दूसरे लोग इसे समझ नही पाये थे। इसी निजीकरण का परिणाम है कि एक-एक करके लाभ कमाने वाले सरकारी अदारों को बड़े उद्योगपतियों को कोड़ियो के भाव में बेचा जा रहा है। यही नहीं इन उद्योगपतियों को लाखों करोड़ का कर्ज देकर उन्हें दिवालिया घोषित होने का प्रावधान कर दिया गया है। इस दिवालिया और एनपीए के कारण लाखों करोड़ बैकों का पैसा डूब गया है बैंकों ने इसकी भरपायी करने के लिये आम आदमी के जमा पर ब्याज घटा दिया है। सरकार अपना काम चलाने के लिये मंहगाई बढा़ रही है क्योंकि उससे टैक्स मिल रहा है। इसी के लिये तो मंहगाई और जमाखोरी पर नियन्त्रण करने के कानून को ही खत्म कर दिया गया है।
आज जिस तरह के संकट से देश गुजर रहा है उस पर संसद में कितनी चिन्ता और चर्चा हो सकेगी इसको लेकर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि आज की संसद तो अपराधियों और करोड़पतियों से भरी हुई है। इस समय लोकसभा में ही 83% सांसद करोड़पति है। 539 में से 430 करोड़पति है। इन्हीं 539 सांसदों में 233 के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 159 के खिलाफ तो गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं। 2014 में 542 में से 185 के खिलाफ मामले थे और 2009 में केवल 162 के खिलाफ मामले थे। जिस संसद में करोड़पतियों और अपराधियों का इतना बड़ा आंकड़ा हो वहां पर आम गरीब आदमी के हित में कैसे नीतियां बन पायेंगी यह अन्दाजा लगाया जा सकता है। मोदी ने कहा था कि वह संसद को अपराधियों से मुक्त करवायेंगे। परन्तु यह आंकड़े गवाह है कि उनके नेतृत्व में 2009 से 2014 में और फिर 2019 में यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया है। आज तो मन्त्रीमण्डल में गृह राज्य मन्त्री ग्यारह आपराधिक मामले झेलने वाला व्यक्ति बन गया है। इस परिदृश्य में अब यह आम आदमी पर निर्भर करता है कि वह इस पर क्या सोचता और करता है क्योंकि उसी के वोट से यह लोग यहां पहुंचे हैं।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन्त्रीमण्डल में उस समय फेरबदल और विस्तार किया है जब देश मंहगाई, बेरोज़गारी और महामारी से जूझ रहा है। अब मन्त्रीमण्डल की कुल संख्या 77 हो गयी है। इतने बड़े मन्त्रीमण्डल से यह सामने आ गया है कि एक समय जो यह कहा गया था कि सरकार ‘‘मिनीमम गवर्नमैन्ट और मैक्सिमम गवर्नैन्स’’ के सिन्द्धात पर चलेगी उससे प्रधानमन्त्री को समझौता करना पड़ गया है। क्योंकि पहले उससे लगभग आधे मन्त्री थे। यही नहीं प्रधानमन्त्री ने देश की जनता से वायदा किया था कि वह संसद को अपराधीयों से मुक्त करवा देंगे। अब इस वायदे से भी पीछे हटना पड़ा है और ऐसे व्यक्ति को गृह राज्य मन्त्री बनाना पड़ा जिसके अपने ही शपथ पत्र के मुताबिक उसके खिलाफ ग्याहर आपराधिक मामले अब तक लंबित हैं। बंगाल से राज्यमन्त्री बनाये गये निशीथ प्रमाणिक के खिलाफ ग्याहर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें हत्या तक का भी आरोप है। प्रमाणिक ने यह जानकारी स्वयं चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र में दी है और यह मामले अभी तक लंबित है एक न्यूज साईट ने यह खुलासा किया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ किये गये दावों और वायदों का सच भी इसी तरह का है क्योंकि जिस नारायण राणे के खिलाफ कभी स्वयं आरोप लगाये थे वह अब कैबिनेट मन्त्री है। इसलिये यह कहना कि जिन मन्त्रीयों को हटाया गया है वह नान परफारमिंग थे और जिनको लाया गया है वह जनता को मंहगाई और बेरोज़गारी से निजात दिला देंगे ऐसा मानना एकदम गलत होगा। यह सारा फेरबदल और विस्तार केवल रातनीतिक बाध्यताओं का परिणाम है। क्योंकि इसमें ए डी आर रिपोर्ट के अनुसार 42% मन्त्री ऐसे हैं जिनके खिलाफ मामले हैं। इससे यही संदेश गया है कि प्रधानमन्त्री और भाजपा सत्ता के लिये किसी भी हद तक समझौते कर सकते हैं।पांच राज्यों में चुनावों चल रहे हैं असम और बंगाल में दो चरणों का मतदान हो चुका है। इस मतदान के बाद केवल भाजपा ने यह दावा किया है कि वह दोनों राज्यों में सरकार बनाने जा रही है। बंगाल में पहले चरण के मतदान के बाद गृह मन्त्री अमितशाह ने यह दावा किया है कि भाजपा इसमें 30 में से 26 सीटें जीत रही है। दूसरे चरण के बाद भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय ने दावा किया है कि भाजपा 30 में से 30 सीटें जीत रही है। दूसरे चरण के मतदान में यह भी देखने को मिला है कि मुख्यमन्त्री ममता को एक पोलिंग बूथ पर जा कर बैठना पड़ा क्योंकि वहां लोगों को वोट देने से रोके जाने की खबरें आ रही थी। ममता ने पोलिंग बूथ से प्रदेश के राज्यपाल से इसकी शिकायत की। चुनाव आयोग से भी इसकी शिकायत की गयी। बंगाल में एक भाजपा नेता का आडियो वायरल हुआ है जिसमें वह चुनाव आयोग को प्रभावित करने की बात कर रहे हैं। जब यह दूसरे चरण का मतदान हो रहा था तब प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी एक चुनावी रैली में ब्यान दे रहे थे कि ममता नन्दीग्राम से चुनाव हार गयी हैं उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली और वह अब किसी दूसरे क्षेत्र से भी चुनाव लड़ने की सोच रही हैं। प्रधानमन्त्री यह ब्यान उस समय दे रहे थे जब नन्दीग्राम में मतदान चल रहा था। क्या एक प्रधानमन्त्री को इस तरह का ब्यान देना चाहिये? यह इस चुनाव के बाद सार्वजनिक बहस के लिये एक बड़ा सवाल बनना चाहिये।
असम के पहले चरण के मतदान के बाद भी ऐसे ही दावे किये गये हैं। वहां के सारे छोटे बड़े समाचार पत्रों ने पहले पन्ने पर भाजपा के दावों के आंकड़े ऐसे छापे हैं जैसे की वह उनकी खबर हो। लेकिन वास्तव में यह खबर के रूप में भाजपा का विज्ञापन था। कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत करते हुए असम के मुख्यमन्त्री, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। चुनाव आयोग ने वहां के समाचार पत्रों को इस संबंध में पत्र भी भेजा है। यहां पर दूसरे चरण के बाद ईवीएम मशीन भाजपा उम्मीदवार की पत्नी की गाड़ी में पकड़ी गयी है। इसके लिये संबंधित चुनाव अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। एक अन्य स्थान पर ईवीएम मशीने एक ट्रक में मिलने की बात भी सामने आयी है। प्रधानमन्त्री जब इन्हीं चुनावों के दौरान जब बंग्लादेश गये थे तब वहां ब्यान दिया कि बंग्लादेश की आजा़दी में उनका भी योगदान रहा है। वह भी इसके लिये जेल गये थे। इस जेल जाने पर आप सांसद संजय सिंह ने प्रधानमन्त्री से सवाल पूछा है कि भारत तो बांग्लादेश के साथ था और युद्ध पाकिस्तान के साथ हो रहा था तो आपको किसने जेल भेजा था भारत ने या पाकिस्तान ने। स्वभाविक है कि प्रधानमन्त्री ने यह ब्यान भी इन चुनावों को सामने रख कर ही दिया है। अन्यथा शायद वह ऐसा कुछ न कहते।
इन चुनावों के लिये भाजपा का सीएए पर स्टैण्ड हर राज्य में अलग अलग हो गया है। बंगाल में मन्त्रीमण्डल की पहली बैठक में इसे लागू करने की बात करते हैं तो असम में इस पर पुनर्विचार करने की। तमिलनाडु में इसका कोई जिक्र नहीं है। भाजपा ने जब बंगाल में दो सौ सीटें जीतकर सरकार बनाने का दावा किया था तब चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर ने कहा था कि भाजपा सौ के आंकड़े से पीछे रहेगी। इस पर इण्डिया टूडे के राहुल कंवर ने किशोर से पूछा था कि भाजपा सौ से पार कैसे जा पायेगी। तब किशोर ने कहा था कि यदि केन्द्रिय बलों पर कहीं कोई हमला हो जाता है तो भाजपा सौ से पार जा सकती है। इण्डिया टूडे में किशोर का यह इन्टरव्यू करीब एक माह पहले का है। अब छत्तीसगढ़ में नक्सलीयों का केन्द्रिय बलों पर हमला हो गया है। इस हमले को प्रशांत किशोर के वक्तव्य के आईने में देखते हुए बंगाल चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है। क्योंकि इन्ही चुनावों में गृह मन्त्री अमितशाह ने यह कहा है कि बंगाल में भाजपा की हार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये एक बड़ा खतरा होगी।
इस तरह इन चुनावों में अब तक जो कुछ घट चुका है उसको सामने रखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाला समय देश के लिये बहुत कठिन होने वाला है। अभी छोटी बचतो पर ब्याज दरें कम करने का फैसला यह कहकर वापिस लिया गया कि गलती से ऐसा जारी हो गया। स्वभाविक है कि जब बड़े उद्योग घरानों को दिया हुआ कर्ज वापिस नहीं आया है तो बैंकों के पास निश्चित रूप से पैसे की कमी है। ऐसे में नया कर्ज देने के लिये यह ब्याज दरें ही कम की जायेंगी। हो सकता है कि पैन्शन में भी कटौती करने की हालत आ जाये। इस तरह इन चुनावों के साथ भविष्य के लिये जो संकेत ईवीएम से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा और छोटी बचतों पर ब्याज दरों को कम करने तक के सामने आये हैं उन्हें गंभीरता से लेना होगा। इसके प्राथमिकता के आधार पर इन मुद्दों पर एक-एक करके राष्ट्रीय बहस उठानी होगी।
सरकार ने पिछले दिनों लोकतन्त्र के प्रहरीयों को सम्मानित किया है। लोकतन्त्र के यह वह प्रहरी हैं जिन्होंने पैंतालीस वर्ष पहले 26 जून 1975 को लगे आपातकाल का विरोध किया था। इस विरोध के लिये इन्हें जेलों मे डाल दिया गया था। इन पैंतालीस वर्षों में केन्द्र से लेकर राज्यों तक में कई बार गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं लेकिन इस सम्मान का विचार पहली बार आया है। इस नाते इसकी सराहना की जानी चाहिये क्योंकि असहमति को भी लोकतन्त्र में बराबर का स्थान हासिल है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि अहसमति स्वस्थ्य लोकतन्त्र का एक अति आवश्यक अंग है। लेकिन क्या आज जिन शासकों ने लोकतन्त्र के इन प्रहरीयों को चिन्हित और सम्मानित किया है वह असहमति को सम्मान दे रहे हैं? क्या आज असहमति के स्वरों को दबाकर उनके खिलाफ देशद्रोह के आपराधिक मामले बनाकर उनको जेलों में नहीं डाला जा रहा है। क्या आज मज़दूर से हड़ताल का अधिकार नहीं छीन लिया गया है। क्या आज पुलिस को यह अधिकार नहीं दे दिया गया है कि वह किसी को भी बिना कारण बताये गिरफ्तार कर सकती है। असहमति के स्वरों को मुखर करने के लिये कितने चिन्तक आज जेलों में है। दर्जनों पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह के मामले बना दिये गये हैं। क्या ऐसे मामलों को असहमति का भी आदर करना माना जा सकता है शायद नहीं। लेकिन आज की सत्ता में यह सबकुछ हो रहा है। उसे लगता है कि केवल उसी की सोच सही है। ऐसे में जब सरकार आपातकाल में जेल गये लोगों को लोकतन्त्र का प्रहरी करार देकर सम्मानित कर रही है तब यह सवाल पूछा जाना आवश्यक हो जाता है कि क्या आज लोकतन्त्र की परिभाषा बदल गयी है। यदि परिभाषा नहीं बदली है तो फिर आज असहमति को बराबर का स्थान क्यों नहीं दिया जा रहा है।
पैट्रोल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों पर सरकार जिस तरह से बेपरवाह चल रही है और इसके लिये पूर्व सरकारों को जिम्मेदार ठहराया गया उससे यह लगने लगा है कि यह कीमतें बढ़ना किसी निश्चित योजना का हिस्सा है। क्योंकि इन कीमतों के लिये आम आदमी अब यह कहने लगा पड़ा है कि विपक्ष भी इस बारे में कुछ नहीं कर रहा है। आम आदमी विपक्ष से यह चाहता है कि कीमतों के बढ़ने का जो विरोध वह नहीं कर पा रहा है वह काम विपक्ष करे। शायद सरकार भी विपक्ष और आम आदमी को कीमतों के विरोध में व्यस्त करके किसान आन्दोलन की ओर से ध्यान हटवाना चाहती है। क्योंकि कच्चे तेल पर केन्द्र और राज्य सरकारें जो शुल्क ले रही हैं यदि उसे आधा कर दिया जाये तो यही कीमत साठ रूपये लीटर पर आ जायेगी। इस समय कच्चे तेल की कीमत करीब तीस रूपये है जिस पर केन्द्र तेतीस और राज्य सरकारें बीस रूपये शुल्क वसूल कर रही हैं जबकि मंहगाई का एक ही कारण है कि जो लाखों करोड़ का कर्ज बड़े उद्योगपतियों का वसूल नहीं किया जा रहा है यदि वह कर्ज वापिस आ जाये तो मंहगाई भी कम हो जायेगी और सरकार को अपने सार्वजनिक उपक्रम भी बेचने नहीं पड़ेंगे। लेकिन सरकार की नीयत और नीति दोनों ही आम आदमी की बजाये बडे़ उद्योग घरानों को लाभ पहुंचाने की है। सरकार की नीतियों के परिणाम स्वरूप ही तो अदानी को फरवरी माह में आठ अरब डालर का लाभ हुआ है। कोरोना काल में आपदा का जितना लाभ अंबानी -अदानी को हुआ है उससे सरकार की नीतियों का सच सामने आ जाता है। इसी सच के सामने आने से अंबानी -अदानी किसान आन्दोलन में एक मुद्दा बन गये हैं।