शिमला/शैल। जब सत्ता की ताकत के बल पर स्थापित नियमों/कानूनो की खुली उल्लंघना हो जाये। अदालत के फैसलों पर अमल न किया जाये। सत्ता ही सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाये और उसके लिये लोक लाज त्याग कर जनहितों की परिभाषा अपने स्वार्थो के मुताबिक होनी शुरू हो जाये तो ऐसी स्थिति को अराजकता का नाम दिया जाता है। वीरभद्र सरकार ने जिस तरह से अवैध निमार्णो को नियमित करने के लिये ग्राम एंवम नियोजन अधिनियम में संशोधन किया है और प्रदेश में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामलों पर प्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए इस सारी स्थिति को एकदम अराजकता की संज्ञा दी है। किसी भी सरकार और उसके प्रशासन पर इससे गंभीर आक्षेप और कुछ नहीं हो सकता है।
इस बढ़ती अराजकता का एक और उदाहरण प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा एक याचिका CWP 2336 of 2009 पर अप्रैल 2013 में दिया गया फैलसा है। इस फैसले में उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा कान्ट्रैक्ट के आधार पर की गयी नियुक्तियों के लिये 2008 और 2009 में लायी गयी नियमितिकरण की पालिसी को संविधान की धारा 14 व 16 तथा धारा 309 के तहत बनाये गये नियमों का खुला उल्लघंन करार देते हुए इसे तुरन्त प्रभाव से रद्द कर दिया है। लेकिन सरकार ने इस फैसले को अगूंठा दिखाते हुए जून 2014 में कान्ट्रैक्ट आधार पर रखे गये कुछ काॅलिज प्रवक्ताओं के नियमितिकरण के आदेश जारी कर दिये जबकि यह उक्त याचिका भी काॅलिज प्रवक्ताओें की ओर से ही दायर हुई थी। जब नियमितिकरण के आदेशों पर इन प्रवक्ताओं ने फिर विभाग का ध्यान आकर्षित किया तब इन आदेशों को वापिस लिया गया। अदालत का फैसला सरकार की पूरी पाॅलिसी पर है किसी एक विभाग पर नही। लेकिन इस फैसलेे के बाद पाॅलिसी को वापिस लेने की बजाये इसके तहत नियमितिकरण की प्रक्रिया अब भी जारी है। अदालत ने कांट्रैक्ट की नियुक्तियोें को चोर दरवाजे से अपनों को भर्ती करने की नीति करार दिया है।
प्रदेश में रोजगार का सबसे बड़ा साधन सरकारी नौकरी ही है। सरकारी नौकरी में कैसे भर्तीयां की जाती रही है इसका सबसे बड़ा खुलासा चिटों पर की गई भर्तीयों की जांच के लिये बनी हर्ष गुप्ता और अवय शुक्ला कमेटीयों की रिपोर्ट से सामने आ चुका है। लेकिन इस प्रकरण पर कैसे विजिलैन्स ने अदालत के सामने सारा मामला रखा और कैसे अदालत ने भी उसे आंख बन्द करके स्वीकार कर लिया अराजकता की इससे बड़ी कहानी और क्या हो सकती है। क्योंकि जिस कड़ाई से अदालत ने इस प्रकरण का संज्ञान लिया था उस तर्ज पर सोलन बागवानी विश्वविद्यालय के एक मामले में उच्च न्यायालय का फैसला भी आया है। लेकिन बाद में अन्य मामलों पर अदालत का रूख भी बदल गया जो आज तक जन चर्चा का विषय है। चिटों पर भर्ती मामले के बाद हमीरपुर अधीनस्थ सेवा चनय बोर्ड द्वारा की गयी नियुक्तियों का मामलों सामने है। लेकिन इन मामलों का सरकार और प्रशासन की सेहत पर कोई असर नही पड़ा है। चनय में पारदर्शिता लाने की बजाये आज भी एक प्रकार से चिटों पर भर्ती जैसा ही चलन जारी है। भारत सरकार ने क्लास फोर और क्लास थ्री श्रेणी के कर्मचारियों की भर्ती के लिये साक्षात्कार का माध्यम समाप्त कर दिया है अब इन पदों के लिये सीधे शैक्षणिक योग्यता को ही आधार रखा गया है। लेकिन वीरभद्र सरकार केन्द्र सरकार की इस पाॅलिसी को अपनाने के लिये तैयार नही है। मन्त्रीमण्डल हर बार इस पर फैसला टाल देता है। क्योंकि इस पाॅलिसी के बाद अपनों के लिये चोर दरवाजा बन्द हो जायेगा।
सरकार ने इस वर्ष हजारों पदों को भरने की हरी झण्डी दे दी है। मन्त्रीमण्डल की हर बैठक में सैंकडो पद सृजित किये जा रहे है। इस सृजन से यह सवाल उठता है कि अब तक सरकार कैसे काम चला रही थी? क्या इन सारे पदों की आवश्यकता अब पड़ी। आज यह सब आने वाले विधानसभा चुनावों को सामने रखकर किया जा रहा है और इसी के लिये भारत सरकार की पाॅलिसी पर अमल नही किया जा रहा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार यह सब अपने राजनीतिक स्वार्थ को सामने रखकर कर हरी है। उसे जन सरोकारों से कोई लेना देना नही है। राजनीतिक स्वार्थों के आगे पूरा प्रशासन बौना पड़ गया है और यही अराजकता है।
शिमला। आम आदमी पार्टी की दिल्ली प्रदेश सरकार के माध्यम से ही पार्टी की छवि देश में बनेगी इसमें किसी को भी कोई सन्देह नहीं होना चाहिये। पार्टी और उसकी सरकार का जो आचरण दिल्ली में रहेगा उसी का सन्देश पूरे देश में जायेगा। इसी का प्रभाव हर प्रदेश मेे संगठन की ईकाईयां गठित करने में पडे़गा।आम आदमी पार्टी अन्ना के
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का ही प्रतिफल है इसमें भी कोई राय नहीं हो सकती। अन्ना आन्दोलन के दो ही बड़े मानक थे भ्रष्टाचार के खिलाफ पूर्ण प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत आचरण की शुचिता।
इन मानकों पर यदि पार्टी और सरकार का आकलन किया जाये तो जो परिदृश्य उभरता है उसमें संकट के संकेत स्पष्ट उभरते दिख रहे हैं। अभी तक सरकार के पांच मन्त्रियों के खिलाफ कारवाई करने की नौबत आ चुकी है। जब तोमर की डिग्री को लेकर आरोप लगे थे तो काफी समय तक उसका बचाव किया गया। लेकिन अन्त में केजरीवाल को स्वीकारना पड़ा कि तोमर ने उन्हे गुमराह किया। अब संदीप कुमार के खिलाफ एक आपत्ति जनक सी.डी. सामने आने पर उसे पद से हटाया गया है। इस पर संदीप कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया मंे कहा है कि उसे दलित होने के नाते फसाया गया है। संदीप की यह प्रतिक्रिया एकदम हल्की और रस्मी है। क्योंकि जब भी किसी दलित राजनेता के खिलाफ गंभीर आरोप आते हैं तो सबसे सुलभ प्रतिक्रिया दलित होने की ही आती है। बंगारूलक्ष्मण ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी थी। लेकिन इसमंे केजरीवाल की यह प्रतिक्रिया की संदीप के आचरण से पूरे आन्दोलन के साथ धोखा हुआ है एक महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति है। अभी तक जितने भी मंन्त्रियों और विधायकों के खिलाफ आरोप आये हैं उनके खिलाफ कारवाई करने में संकोच नहीं किया गया है यही एक सरकार की कार्यशैली का सबसे प्रभावी प्रमाण रहा है। लेकिन संगठन के स्तर पर अभी तक कोई ऐसी ही कारवाई सामने नहीं आ पायी है। यह आने वाले समय में चिन्ता और चर्चा का विषय बनेगा। इस पर यह तर्क ग्राहय नहीं होगा कि भाजपा और काग्रेंस में ऐसे ही मामलों पर क्या कारवाई हुई है। केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार को लेकर भी कारवाई करने में देरी हुई है और आज यह सारे प्रसंग एक बड़ा सवाल बनकर सामने आ खड़े हुए हैं।
पंजाब में प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष छोटेपुर के खिलाफ जिस तरह का आरोप लगा है उससे एक बड़ा विवाद खड़ा होता नज़र आ रहा है। क्योंकि मान का बचाव जिस तर्क पर किया जा रहा है वह भी अपने में कोई बड़ा पुख्ता नहीं है। क्योंकि सांसद होने के नाते जो विडियो मान ने बनाये हैं क्या यदि कोई साधारण नागरिक उसी तरह का विडियो बनाता तो क्या उसके खिलाफ कारवाई की जाती? मान ने एक स्थापित संहिता का उल्लंघन किया है भले ही इसके पीछे उनकी कोई मंशा अन्यथा नहीं रही होगी। लेकिन इस आचरण पर सार्वजनिक खेद व्यक्त करने के बजाये उसे सही ठहराने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि किसी भी स्थापित नियम/परम्परा का विरोध करके उसमें परिवर्तन लाने के लिये पहले वैचारिक धरातल तैयार करना आवश्यक है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी प्राप्त नहीं है इस नाते उसके अधिकारों की अपनी एक सीमा है। उसी सीमा को लाघंने के लिये दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिये। दिल्ली की जिस जनता ने आपको 70 में से 67 सीटों पर चुनावी विजय दिलायी है वह ऐसे आन्दोलन के लिये पूरा साथ देती। दिल्ली सरकार को पूर्ण अधिकार दिलाने के लिये जनान्दोलन का रास्ता अपनाया जाना चाहिये था। ऐसी मांग का विरोध कोई ना कर पाता। लेकिन आज अदालती लड़ाई में सारा परिदृश्य ही बदल गया है।
आज पूरे देश में संगठन खड़ा किया जाना है। देश कांग्रेस और भाजपा का विकल्प चाहता है। क्योंकि इन दलों के भीतर जिस तरह से धनबल और बाहुबल के प्रभाव के कारण विधान सभाओं से लेकर संसद तक अपराधिक मामले झेल रहे लोग माननीयों की पंक्ति में आ बैठें हैं उनसे छुटकारा पाना इनके लिये कठिन है। आम आदमी पार्टी को इस संस्कृति से बचने के लिये अभी से सावधान रहने की आवश्यकता है। पार्टी अभी संगठन के गठन की प्रक्रिया मंे चल रही है इसलिये संगठन में किसी को कोई भी जिम्मेदारी देने के लिये कुछ मानक तय करने होंगे और उनका कड़ाई से पालन करना होगा। आज संगठन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को एक पूर्णकालिक अध्यक्ष /संयोजक चाहिये। इस समय केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमन्त्राी और संगठन के राष्ट्रीय संयोजक दोनों की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। लेकिन संगठन को खड़ा करने के लिये उन्हें बड़ी भूमिका में आना होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष/ संयोजक के नाते भी सरकार पर पूरी नज़र रख सकते हैं। इस समय भी उन्होंने किसी भी विभाग की जिम्मेदारी अपने पास नहीं रखी है। ऐसे में वह दिल्ली की पूरी जिम्मेदारी सिसोदिया को सौंप सकते हैं और स्वयं राष्ट्रीय जिम्मेदारी के लिये मुक्त हो जाते हैं। इस समय संगठन में यदि तोमर और संदीप कुमार जैसे लोग अन्दर आ गये तो उन्हे आगे चलकर बाहर करना कठिन हो जायेगा।
शिमला/शैल। देश के प्रधान न्यायधीश श्री तीरथ सिंह ठाकुर ने प्रधान मन्त्री के पन्द्रह अगस्त को लाल किले से देश के नाम आये संबोधन पर अपनी प्रतिक्रिया में यह चिन्ता व्यक्त की कि इसमें न्यायपालिका को लेकर कुछ नहीं कहा गया। पन्द्रह अगस्त के बाद प्रधान न्यायधीश दो कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिये शिमला आये। इन कार्यक्रमों में प्रधान न्यायधीश ने फिर चिन्ता व्यक्त की कि निष्पक्ष और तीव्र न्याय अभी बहुत दूर की बात है। प्रधान न्यायधीश की यह चिन्ताएं देश की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्योंकि जब आदमी व्यवस्था से लड़ते-लड़ते हार जाता है तब उसकी न्याय के लिये अन्तिम उम्मीद केवल न्यायपालिका ही रह जाती है। लेकिन अब इस अन्तिम उम्मीद के प्रति भी लोगों का भरोसा टूटने लगा है। क्योंकि उच्च न्यायपालिका में बैठे कानून के रखवालों के अपनेे आचरण पर भी प्रश्न चिन्ह लगने के कई मामले सामने आ चुके है। ऐसे परिदृश्य में जब देश का प्रधान न्यायाधीश ही निष्पक्ष और तीव्र न्याय पर सन्देह व्यक्त करंे तो निश्चित रूप से पूरी वस्तुस्थिती की गंभीरता को लेकर चिन्ता और चिन्तन की आवश्यकता आ खडी होती है।
इस समय न्यायपालिका में निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हर स्तर पर हजारों-हजार मामलें वर्षो से लंबित चले आ रहे हंै। किसी मामले का समय से अधिक वक्त तक लंबित रहना अपने में ही अन्याय बन जाता है। यह स्थिति इसलिये है क्योंकि पूरी न्यायव्यवस्था में हर स्तर पर जजों की कमी है। लोअर न्यायपालिका में जजों कि नियुक्तियों के लिये एक स्थापित प्रक्रिया चली आ रही है। लोकसेवा आयोगों के माध्यम से यह नियुक्तियां की जाती है। इसमें भी प्रदेश लोकसेवा आयोगों के स्थान पर राष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक भर्तीयां किये जाने की व्यवस्था बनाये जाने की मांग चल रही है। आई ए एस और आई पी एस सेवाओं के समान ही राष्ट्रीय न्यायिक सेवा गठन की आवश्यकता पर विचार की मांग चल रही है। लेकिन उच्च न्यायपालिका में जजों की भर्ती के लिये चल रही वर्तमान व्यवस्था को बदलने को लेकर चल रही मांग और उस पर आये सुझावांे को लेकर उच्च न्यायपालिका में टकराव की स्थिति चल रही है। इसी टकराव के कारण न्यायपालिका में जजों के रिक्त पद भरे नही जा पा रहे हैं। इस टकराव का अन्तिम परिणाम क्या होगा और उच्च न्यायपालिका में रिक्त स्थान कैसे भरे जायेंगे इसको लेकर कब स्थिति स्पष्ट हो पायेगी यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह जो व्यवस्था चल रही है उसमेें आम आदमी का भरोसा कैसे कायम रहे इसको लेकर सरकार और न्यायपालिका को तुरन्त कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि यह कदम तुरन्त न उठाये गये तो इस समय उच्च न्यायालयों में न्याय की प्रतीक बनी ‘‘आंखो पर पट्टी बंधी देवी’’ का टंगा चिन्ह महाभारत के धृतराष्ट्र और गांधारी का पर्याय बन जायेगा।
क्योंकि अभी जब प्रधान न्यायधीश शिमला थे तो दोनो कार्यक्रमों में प्रदेश के मुख्यमन्त्री उनके साथ थे। इस समय मुख्यमन्त्री सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे है। सीबीआई की छापेमारी के खिलाफ मुख्यमन्त्री प्रदेश उच्च न्यायलय में गये। इस पर प्रदेश उच्च न्यायालय से मिली राहत को जब सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय मे स्थानांतरित किये जाने का आग्रह किया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस आग्रह को स्वीकारते हुए जिस तरह की अदालत में टिप्पणी की थी वह सबके सामने है। ऐसी टिप्पणी के बाद भी यह मामला जांच ऐजैन्सीयों और अदालत के बीच अभी तक स्पष्ट निर्देशों तक नही पहुंच पाया है। आम आदमी में इससे ‘‘ समर्थ को नही दोष गोसाईं’’ जैसी धारणा बनना स्वाभाविक है। ऐसे परिदृश्य में जब मुख्यमन्त्री और प्रधान न्यायधीश को जनता सर्वाजनिक कार्यक्रमों में इकट्ठा देखेगी तो निश्चित रूप से उसके साथ कई और चर्चाएं भी जुड जायेंगी जिनका संदेश बहुत ज्यादा स्वस्थ नही होगा। आज इस यात्रा को लेकर ऐसे कई सवाल जन चर्चा का विषय बने हुए हंै। ऐसे ही प्रसंगों से आम आदमी का विश्वास न्यायपालिका पर से डगमगाने लग जाता है और इस विश्वास को बनाये रखना सबसे बडी आवश्कयता है। क्योंकि यदि विश्वास खण्डित हुआ तो फिर बहुत बड़ा नुकसान हो जायेगा यह तय है और तब अन्य सारी चिन्ताएं बेमानी हो जायेंगी।
शिमला/शैल। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए कहा है उनकी सरकार आक्षेपों की सरकार नहीं है बल्कि अपेक्षाओं की सरकार है क्योंकि उनकी सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है। आज यदि खाद्य पदार्थों की बढ़ती मंहगाई को नजरअन्दाज कर दिया जाये तो मोदी के दावे से सहमत होना पड़ेगा। क्योंकि कांग्रेस और दूसरे सारे क्षेत्राीय दल अभी तक लोकसभा चुनावों में मिली हार से पूरी तरह उबर नहीं पाये हैं। उनके लगाये आरोपों पर अभी जनता पूरी तरह विश्वास कर पाने को तैयार भी नही है क्योंकि यह दल अपने ही भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कोई कारवाई नहीं कर पाये है।
नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रधानमन्त्री पद का चेहरा बन चुके थे। पूरा चुनाव प्रचार अभियान उन्ही के गिर्द केन्द्रित था इसलिये लोकसभा चुनावों में मिली सफलता का पूरा श्रेय उन्ही को जाता है। उन्ही के नेतृत्व में भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देख रही है। लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद हुये विधानसभा चुनावों/उप चुनावों के परिणामों से कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना पर प्रश्न चिन्ह भी लगता जा रहा है। ऐसे में मोदी की सरकार जन अपेक्षाओं पर कैसे पूरा उतर पायेगी इसको लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये हैं। लेकिन जो बहुमत लोकसभा में सरकार को मिला हुआ है यदि उसके सहारे मोदी कुछ नया कर पाये तो वह देश के लिये एक बड़ा योगदान बन जायेगा अन्यथा वह भी प्रधान मन्त्रिायों की सूची में केवल एक नाम ही होकर रह जायेंगे।
भाजपा और मोदी कांग्रेस/यू पी ए के भ्रष्टाचार और काले धन को मुद्दा बनाकर सत्ता में आये थे यह पूरा देश जानता है। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ क्या कुछ किया गया है यह भी सबके सामने है। भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं का मूल है यह एक स्थापित कड़वा सच्च है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने भी कदम उठाये गये हैं उनके परिणाम आशानुरूप नहीं रहे हैं। ऐसे में यह समझना ज्यादा आवश्यक हो जाता है कि व्यक्ति को भ्रष्ट होने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है। यदि भ्रष्टता की आवश्यकता के आधार को ही समाप्त कर दिया जाये तो बहुत कुछ हल हो जाता है। आज संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक भ्रष्ट लोग ‘माननीय’ बन कर बैठे हुये हैं। हर चुनावों के बाद यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है।"Power Corrupts a man and absolute power Corrupts absolutely." यह कहावत इन माननीयों पर स्टीक बैठती है। क्योंकि हर चुनावों में धन बल और बाहुबल का बड़ा खेल हो गया है। बढ़ते धन बल के कारण ही हर बार चुनाव खर्च की सीमा में चुनाव आयोग बढ़ौतरी कर देता है। खर्च की जो सीमा तय है चुनावों में उससे कहीं अधिक खर्च हो रहा है। लेकिन यह खर्च पार्टी के खाते से होता है व्यक्ति के खाते से नहीं। पार्टी पर खर्च की कोई सीमा है नहीं। पार्टीयों द्वारा भरी जाने वाली आयकर रिटर्न को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया है। यहां तक कि चुनाव आचार संहिता की उल्लघंना पर भी केवल चुनाव परिणाम को ही चुनौति देने का प्रावधान है। आचार संहिता की उल्लंघन दण्ड संहिता के अन्दर अभी तक अपराध की सूची में शामिल नहीं है।
इस परिपेक्ष में यदि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इस अपार जन समर्थन के सहारे देश की चुनाव व्यवस्था को सुधारने का साहस कर पाते हैं तो वह देश को बड़ा योगदान होगा। मेरा मानना है कि यदि प्रयास किये जाये तो चुनावों को भ्रष्टाचार से एकदम मुक्त किया जा सकता है। चुनाव के भ्रष्टाचार से मुक्त होने का अर्थ है कि उसमें धन की भूमिका नही के बराबर पर लायी जा सकती है। जब धन की केन्द्रिय भूमिका नहीं रहेगी तब बाहुबलियों का संसद और विधानसभाओं में आना भी रूक जायेगा। चुनाव सुधार ऐसे ही बहुमत और ऐसे ही नेतृत्व में संभव और अपेक्षित हो सकते हैं। यदि प्रधानमन्त्री चाहें तो सुधारों की इस रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है।
शिमला। पिछले कुछ अरसे से देश के विभिन्न भागों से गोरक्षा के नाम पर कुछ गोरक्षकों की उग्रता दलित अत्याचार के रूप में सामने आयी है। यह उग्रता इतनी बढ़ गयी कि इस पर देश की संसद में बैठे दलित सासंदों को पार्टी लाईन से ऊपर उठकर दलित अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी पडी है। दलित सासंदों की इस चिन्ता का संज्ञान लेते हुए प्रधान मन्त्री नरेन्द्रमोदी ने भी बढ़ते दलित अत्याचार और फर्जी गोरक्षकों की कडे़ शब्दों में निंदा की है। लेकिन प्रधान मन्त्री की इस प्रतिक्रिया का विश्व हिन्दु परिषद ने खुले मन से पूरा समर्थन नही किया है। इसी के साथ दलित अत्याचार पर भी रोक नही लगी है। गोरक्षा के नाम पर गोरक्षकों की उग्रता के खिलाफ अपना रोष मुखर करते हुए दलित संगठनों ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने परम्परागत कार्य को छोड़ने तक का ऐलान कर दिया है। आज यह समस्या एक ऐसा रूप धारण करती जा रही है कि यदि इसका समय रहते सही हल न निकला तो इसका देश के सामाजिक सौहार्द पर गहरा असर पड़ेगा।
गाय का हिन्दु धर्म और संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। गाय दान का हिन्दु धर्म में एक ऐसा विशेष स्थान है जिससे स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग सरल और सुगम हो जाता है। स्वाभाविक है कि जिस समाज में किसी भी पशु का ऐसा केन्द्रिय स्थान होगा उसमें सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने के लिये भी यही पशु मुख्य भूमिका में ला खड़ा किया जा सकता है। यह देश कृषि प्रधान देश माना जाता है। कृषि कार्य में गाय-बैल की उपयोगिता से सभी परिचित हैं फिर गाय दूध का भी मूल स्त्रोत है और प्राय हर भूगौलिक क्षेत्र में सुगमता से उपलब्ध है। जबकि भंैस भी दूध का स्त्रोत है परन्तु क्षेत्र में उपलब्धता नही है। इसलिये एक समय तक कृषि कार्य से जुड़े हर परिवार में गाय का होना अनिवार्य था। अब जब कृषि कार्यो में बैल का स्थान टैªक्टर ने ले लिया है तो उसी अनुपात में आज हर घर में गाय नही है। लेकिन गाय का धार्मिक स्थान आज भी अपनी जगह कायम है। फिर टैªक्टर के चलन के साथ ही गाय पालन की अनिवार्यता पहले जैसी नही रह गयी है। जहंा पहले हर घर में गाय होती थी आज उसका स्थान गौशालाओं ने ले लिया है क्योंकि गाय पालने के साधनों में कमी आती जा रही है। इसलिये आज आवारा पशुओं में भी गाय और बैल की संख्या बढ़ गयी है। डेयरी फार्मो में भी गाय का स्थान भंैस लेती जा रही है। इस परिदृश्य में गाय की व्यवहारिक उपयोगिता और गोरक्षा में कमी आने के कारण गाय की रक्षा एक समस्या बनती जा रही है। क्योंकि उपयोगिता और रक्षा एक दूसरे के अभिन्न अंग है।
इसका दूसरा पक्ष है कि जब आप गाय को आवारा छोड़ रहे है तो फिर उसकी चिन्ता कौन करेगा। राजस्थान में एक सरकारी गौशाला में पांच सौ गायों का मरना इसी सत्य को प्रमाणित करता है। आज गाय की रक्षा चैरिटी से नही की जा सकती है। आज यहां एक साथ इतने पशु मर जायेंगे वहां पर उनका अन्तिम संस्कार क्या होगा? प्रत्येक मृत पशु का चमड़ा निकालना और उसका शोधन करके उसे उपयोग में लाना अपने में एक बहुत बड़ा व्यवसाय है। पहले समाज का एक वर्ग यह कार्य करता था। मृत पशु का चमड़ा और उसकी हड्डीयां तक उपयोग में लायी जाती थी। संयोगवश चमड़ा निकालने का काम दलित वर्ग करता था लेकिन इस कर्म के लिये जब उसे हेय और अछूत माना जाने लगा तो इससे समाज में विकृतियां आनी शुरू हो गयी है। आज समस्या फिर वहीं खड़ी है कि जिन्दा पशु का चाहे वह गाय है या कोई अन्य पशु उसका पालन कौन करेगा? उसे आवारा तो नही छोड़ा जायेगा? फिर पशु के मरने के बाद उसका चमडा आदि निकालने का काम कौन करेगा या फिर मृत पशु का संस्कार क्या होगा और कौन करेगा? आज यह सामाजिक व्यवस्था तय करना आवश्यक है। इस व्यवहारिक पक्ष को नंजर अन्दाज करके गौरक्षा के नाम पर समाज में बवाल तो खड़ा किया जा सकता है लेकिन उससे समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है। आदमी की मृत्यु के पश्चात उसके अनितम संस्कार की रीति नीति तय है क्या उसी तर्ज पर हर मृत पशु के संस्कार की रीति नीति उसकी मरणोपरान्त उपयोगिता के आधार पर तय होना आवश्यक है। आज के अधिकांश गोरक्षक वह लोग मिल जायेंगे जिनके अपने घरों में गाय का पालन नही होता है। यह लोग हिन्दु धर्म में गाय के स्थान की व्यवहारिकता में रक्षा करने की बजाये उसकेे नाम पर समाज में सौहार्द बिगाडने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों को कानून के मुताबिक दण्डित किया जाना चाहिये। आज किसी भी गोरक्षक से पहला सवाल ही यह पूछा जाना चाहिये की गाय का अन्तिम संस्कार क्या और कैसा होना चाहिये तथा कौन करेगा।