चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने कामकाज संभाल लिया है। जनादेश 2019 में देश की जनता ने एक बार पुनः मोदी के नेतृत्व में विश्वास करते हुए पहले भी ज्यादा समर्थन उन्हे दिया है। शायद इतने ज्यादा समर्थन की उम्मीद अधिकांश भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को भी नही होगी। प्रधानमन्त्री ने इस जीत को चुनावी कैमिस्ट्री और कार्य तथा कार्यकर्ताओं की जीत करार दिया है। विपक्ष में कांग्रेस ने
हार के कारणों का कोई खुलासा अभी तक जनता के सामने नही रखा है बल्कि अपने नेताओं को एक माह तक मीडिया में कोई भी प्रतिक्रिया देने से मना किया है। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने एक बार फिर ईवीएम मशीनां पर सन्देह जताया है। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने भी इन मशीनों पर शक जताया है। ईवीएम मशीनां पर शक जताते हुए कई विडियोज़ सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। एक विडियो में एक शशांक आनन्द ने चुनाव आयोग द्वारा रखे गये उन दस तर्कों का बुरी तरह से एक एक करके खण्डन किया है जिनके आधार पर मशीनों में किसी भी तरह की गड़बड़ करना संभव नही होने का दावा किया गया है। शंशाक आनन्द ने इसे सुनियोजित हार्डवेयर टैपरिंग करार दिया है और इसे कई आईटी विशेषज्ञों ने भी संभव ठहराया है।
विपक्ष हार के कारणों की समीक्षा में लगा है और देर सवेर उसे इस बारे में कुछ कहना भी पड़ेगा। जब कोई राजनीतिक दल इस तरह की हार को अपने संगठन कार्यकर्ताओं और नेतृत्व की हार मान लेगा तो निश्चित रूप से इसका असर उसके कार्यकर्ताओं पर पड़ेगा। जब कार्यकर्ता संगठन और नेतृत्व को कमजोर आंक लेता है तब ऐसे दलों को पुनः जीवन मिलना असंभव हो जाता है और कोई भी दल ऐसा नही चाहेगा कि उसके कार्यकर्ता उससे ना उम्मीद हो जायें। इसलिये इस हार के लिये संगठन और नेतृत्व से हटकर कारण खोजने होंगे और उन कारणों पर कार्यकर्ता को पूरे तार्किक ढंग से आश्वस्त भी करना होगा। ऐसे में अन्ततः सारा तर्क ईवीएम मशीनों पर फिर आकर थम जाता है। क्योंकि इन ईवीएम मशीनों को लेकर लम्बे अरसे से सन्देह जताया जा रहा है। जिस तरह से इसमें हार्डवेयर की टैपरिंग को लेकर अब सवाल उठे हैं उन्हें किसी भी विशेषज्ञ द्वारा झुठला पाना संभव नही होगा। क्योंकि जब 2014 के चुनावों में किये गये वायदों के मानकों पर सरकार का आकलन किया जाये तो ऐसा कुछ ठोस नजर नही आता है जिसके आधार पर इतने प्रचण्ड बहुमत को संभव माना जा सके।
प्रधानमन्त्री ने भी इस जीत को उनकी नीतियों की बजाये चुनावी कैमिस्ट्री की जीत बताया है। इस कैमिस्ट्री की अगर समीक्षा की जाये तो इसमें सबसे पहले भाजपा का आईटी सैल आता है। पार्टी के भीतर की जानकारी रखने वालों के मुताबिक देश भर में इस सैल में करीब एक लाख कर्मचारी काम कर रहा था। यह करीब एक लाख लोग कार्यकर्ता नही वरन पार्टी के कर्मचारी थे। क्योंकि आईटी सैल में वही लोग काम कर सकते हैं जिन्होंने कम्यूटर ऑप्रेशन में प्रशिक्षण लिया हो। पार्टी सूत्रों के मुताबिक इन कर्मचारियों को उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वेतन दिया जा रहा था। इस वेतन के लिये पैसा उद्योग घरानों से चन्दे के रूप में लिया गया। यह चन्दा इलैक्शन वांडस के माध्यम से आया। इसमें चन्दा देने वाले का नाम कितना चन्दा किस राजनीतिक दल को दिया गया इस सबको गोपनीय रखा गया। इसके लिये वाकायदा नियम बनाए गये। इस ंसंबंध में जब सर्वोच्च न्यायालय में याचिका आयी तब चुनाव आयोग और सरकार में थोड़ा मतभेद भी आया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसमें ज्यादा दखल न देते हुए यह निर्देश दिये है कि चन्दे को लेकर 31 मई तक राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग को जानकारी देनी होगी। इस जानकारी में क्या सामने आता है यह तो उससे आगे ही पता चलेगा। लेकिन जितना बड़ा तन्त्र इस चुनाव के लिये भाजपा ने खड़ा किया है उससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भाजपा को एक लोकतान्त्रिक राजनीतिक दल की बजाये एक राजनीतिक व्यवसायिक प्रतिष्ठा के तरह विकसित किया जा रहा है। भाजपा की तर्ज पर ही अन्य राजनीतिक दल भी इसी लाईन पर आ गये हैं। इस सबका अर्थ यह हो जाता है कि अब राजनीतिक लोक सेवा की बजाये एक सुनियोजित व्यवसाय बनता जा रहा है और यह व्यवसाय बनना ही कालान्तर में लोकतन्त्र और पूरे समाज के लिये घातक होगा। इसी का प्रभाव है कि इस बार संसद में दागी छवि और करोड़पति माननीयों की संख्या और बढ़ गयी है।
जब राजनीति व्यवसाय बनती जाती है तब सारे संवैधानिक संस्थान एक एक करके ध्वस्त होते चले जाते हैं। इस बार के चुनावों में चुनाव आयोग की विश्वनीयता पर जो सवाल उठे हैं उनका कोई तार्किक जवाब समाने नही आ पाया है शायद है भी नही। लेकिन चुनाव आयोग के साथ ही उच्च/शीर्ष न्यायपालिका भी लगातार सवालों में घिरती जा रही है। बीस लाख ईवीएम मशीनों के गायब होने को लेकर एक मनोरंजन राय ने मार्च 2018 में मुबंई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। याचिका आरटीआई के तहत मिली जानकारियों के आधार पर दायर हुई थी। लेकिन सुनवाई के लिये सितम्बर 2018 में आयी। इस पर 8 मार्च 2019 को चुनाव आयोग ने जवाब दायर करके कहा कि हर मशीन और वीवी पैट का अपना एक विष्शिट नम्बर होता है और यह खरीद विधि मन्त्रालय की अनुमति और नियमों के अनुसार की गयी है। जबकि जवाब का मुद्दा था कि कंपनीयों ने कितनी मशीनें सप्लाई की और आयोग में कितनी प्राप्त हुई। लेकिन इसका कोई जवाब नही दिया गया। इसके बाद 23 अप्रैल को यह मामला उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश प्रदीप नदराजोग और न्यायमूर्ति एन एम जामदार की पीठ में लगा। इस बार फिर चार सप्ताह में आयोग को जवाब देने के लिये कहा गया और अगली पेशी 17 जुलाई की लगा। इस पर मनोरंजन राय ने सर्वोच्च न्यायालय में एस एल पी दायर करके इस चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध की मांग की लेकिन वहां भी यह मामला सुनवाई के लिये नही आ पाया। ईवीएम को लेकर पूरा विपक्ष चुनाव आयोंग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सर पीटता रहा है लेकिन किसी ने भी इसे गम्भीरता से नही लिया। अब राजनितिक दल इन्ही ईवीएम मशीनों को एक बड़ा मुद्दा बनाकर जनता की अदालत में जाने की बाध्यता पर आ गये हैं। इसके परिणाम क्या होंगे कोई नही जानता लेकिन यह तय है कि जब भी जनता के विश्वास को आघात पंहुचता है तो उसके परिणाम घातक होते हैं देश जे.पी. आन्दोलन, मण्डल आन्दोलन और फिर अन्ना आन्दोलनों के परिणाम भोग चुका है और एक बार फिर हालात वही होने जा रहे हैं।



ऐसा बहुत कम होता है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में जीत के जिस आंकड़े का अनुमान लगाया गया हो वही आंकड़ा एग्जिट पाल में भी आये और फिर परिणाम आने पर हकीकत में भी बदल जाये। इस बार ऐसा ही सामने आया है। संभव है कि जो लोग या दल चुनाव हार गये हैं वह अपनी हार के लिये एक बार फिर ई वी एम मशीनों को दोष दें। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठायें। चुनाव आयुक्तों में जिस तरह से मतभेद होने का तथ्य सामने आया है उससे निष्पक्षता पर सवाल उठने स्वभाविक हैं। विपक्ष लम्बे समय से चुनाव आयोग से ई वी एम और वी वी पैट को लेकर सवाल उठाता रहा है। विपक्ष की मांग को आयोग से लेकर सर्वाच्च न्यायालय तक सभी ने ठुकरा दिया है। लेकिन इससे जनता में सन्देह भी बना है और यही सन्देह आने वाले समय में जनाक्रोश का एक बड़ा कारण भी बन सकता है। जो परिस्थितियां इस समय बनी हुई हैं उनमें सबसे पहले चुनाव आयोग पर ही प्रश्न उठेंगे क्योंकि उसके लिये आधार और इस आधार को चुनाव परिणामों के बाद आये कुछ विडियोज़ पुख्ता भी करते हैं।
लोकतन्त्र जनता के भरोसे से चलता है और यह जनता ही है जो भरोसा टूटने पर सत्ता से बेदखल भी कर देती है। 1971 से लेकर 1980 तक के काल खण्ड में जो कुछ घटा है आज उसकी पुर्नरावृति की आशंकाएं उभरने लगी हैं। 1971 के बड़े जनादेश के बाद 1975 में देश ने आपातकाल देखा। आपातकाल के बाद सत्ता बदली लेकिन अढ़ाई कोस चलकर ही दम तोड़ा गयी थी। आपातकाल का कारण भी संवैधानिक संस्थानों पर से विश्वास का टूटना बना था। आज भी संस्थान भरोसा खोने लग गये हैं। इसलिये इस भरोसे को पुनः स्थापित करना प्राथमिकता होनी चाहिये और यह जिम्मेदारी सिर्फ प्रधानमन्त्री की बनती है। इसलिये अब जब परिणाम आ गये हैं और सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है तब सरकार को चुनाव आयोग पर उठने वाले सवालों का निराकरण करने के लिये पहल करनी होगी। चुनाव आयोग से मांग है कि ई वी एम के स्थान पर पुनः बैलेट पेपर से चुनाव करवाया जायें। इस पर जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद वी वी पैट आवश्यक कर दिया गया है तब यह मांग यहीं पूरी हो जाती है। इसके बाद कम से कम 50% वी वी पैट की पर्चीयांं का मिलान और उसकी गिनती ई वी एम से पहले करने की मांग है। सर्वोच्च न्यायालय ने 50% की मांग को इसलिये ठुकरा दिया था कि इसमें समय ज्यादा लगेगा और चुनाव परिणाम आने में देर लगेगी। इसलिये सर्वोच्च न्यायालय ने इसे केवल पांच वी वी पैट की गिनती तक सीमित कर दिया। चुनाव आयोग ने नियमों का हवाला देकर इस गिनती को मशीन की गिनती से पहले करवाने से भी इन्कार कर दिया।
इस परिदृश्य में सबसे पहले यह सवाल उठता है कि क्या जन विश्वास को पूरे तार्किक आधार पर बहाल करना प्राथमिकता होनी चाहिये या नही। इस विश्वास को बहाल करने के लिये यदि शतप्रतिशत वी वी पैट और ई वी एम मशीन के मिलान को अनिवार्य कर दिया जाये तो इसमें दो दिन का समय यदि ज्यादा भी लग जाये तो इसमें क्या फर्क पड़ जायेगा। इसके लिये पूरी चुनाव प्रक्रिया को सात चरणों तक लम्बा खीचनें की बजाये तीन से चार चरणों में ही पूरा किया जा सकता है। आज जिस ढंग से चुनाव आयोग अविश्वास का केन्द्र बन चुका है वह लोकतन्त्र के लिये किसी भी विदेशी आक्रमण से ज्यादा घातक होगा। इस समय चुनाव प्रक्रिया में तुरन्त प्रभाव से संशोधन करने की आवश्यकता है। लोकतन्त्र में चुनावों का इस कद्र मंहगा होना लोक और तन्त्र को दो अलग-अलग ईकाईयां बना रहा है। चुनाव सुधारों की एकदम प्राथमिकता के आधार पर आवश्यकता है और इसके लिये सरकार को तुरन्त पहल करनी होगी। इसके लिये आज विपक्ष को भी इन सुधारों की ही मांग प्राथमिकता पर करनी होगी।



लेकिन क्या इस बार चुनाव आयोग यह भूमिका निष्पक्षता से निभा पाया है। यह सवाल चुनावों के अन्तिम चरण तक आते-आते एक बड़ा सवाल बन कर देश के सामने खड़ा हो गया है। यह स्थिति बंगाल में हुई चुनावी हिंसा के बाद एक बड़ा मुद्दा बन गयी है। चुनाव आयोग के पास आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें चुनाव प्रक्रिया के शुरू होने के साथ ही आनी शुरू हो गयी थी। लेकिन आयोग ने इन शिकायतों की ओर तब तक उचित ध्यान नही दिया जब तक सर्वोच्च न्यायालय से एक तरह की प्रताड़ना उसे नही मिल गयी। इस प्रताड़ना के बाद आयोग ने कुछ नेताओं के चुनाव प्रचार पर कुछ समय के लिये प्रतिबन्ध लगाया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा अध्यक्ष अमितशाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लेकर आयी शिकायतों पर तब तक कुछ नही किया जब तक इस संर्भ में भी सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं नही आ गयी। यह याचिकाएं आने के बाद जब शीर्ष अदालत ने इस पर तीन दिन में फैसला लेने के निर्देश दिये तब इन लोगों को क्लीनचिट मिल गयी। इस क्लीनचिट को लेकर सवाल उठे हैं जिनका कोई जवाब नही आया है।
चुनाव आयोग ईवीएम मशीनों से चुनाव करवा रहा है। ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर एक लम्बे समय से सवाल उठते आ रहे हैं। देश के कई राज्यों के उच्च न्यायालयों में इस संद्धर्भ में याचिकाएं दायर हुई है। ईवीएम जब केरल विधानसभा के 1982 के चुनावों में एक विधानसभा हल्के में इस्तेमाल हुई थी तब इस पर उच्च न्यायालय में याचिका आ गयी थी। जब यह याचिका 1984 में सर्वोच्च न्यायालय में पंहुची थी तब शीर्ष अदालत ने इसके इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। उसके बाद 1998 में जब संसद में इस पर चर्चा हुई तब ईवीएम का चुनावों में उपयोग शुरू हुआ। लेकिन इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते रहे। जब भाजपा नेता डा. स्वामी ने इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की तब सारे मामले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पास ले लिये और वीवीपैट की इसमें व्यवस्था जोड़ दी जो अब पूरी तरह लागू हुई है। लेकिन वीवीपैट को पूरी तरह प्रमाणिक बनाने के लिये जब इक्कीस राजनीतिक दलों ने इसमें 50ः मशीनों की पर्चीयों की गणना की मांग की और सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग से इस बारे में जवाब मांगा तब आयोग ने यह कह दिया कि ऐसी गणना करने से चुनाव परिणाम में छः दिन की देरी हो सकती है। शीर्ष अदालत ने भी आयोग के जवाब को मानते हुए यह याचिका खारिज कर दी। क्या इससे जन विश्वास को धक्का नही लगा है? यदि चुनाव परिणामों की गणना में छः दिन का समय लगने से जन विश्वास जीता जा सकता था तो ऐसा क्यों नही किया गया? ईवीएम पर सन्देह करने का आधार तो चुनाव आयोग स्वयं दे रहा है। इससे जो स्थिति उभरती नजर आ रही है उससे यह स्पष्ट लग रहा है कि ईवीएम फिर बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है।
चुनावों की प्रक्रिया शुरू होने से लेकर अन्त तक चुनाव आयोग पर विश्वसनीयता का संकट गहराता चला गया है। जिस ढंग से बनारस में तेज बहादुर यादव का नामाकंन रद्द किया गया और उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने भी कोई हस्ताक्षेप नही किया उससे चुनाव आयोग के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा पर भी आंच आयी है। आयोग की निष्पक्षता को लेकर जो प्रश्नचिन्ह बंगाल के संद्धर्भ में लगे हैं उनके परिणाम दूरगामी होंगे। क्योंकि बंगाल में हिंसा तो पहले चरण से ही शुरू हो गयी थी जो हर चरण में जारी रही। लेकिन आयोग ने जो कदम अमितशाह प्रकरण के बाद उठाया वह पहले क्यों नही उठाया गया। प्रशासन तो चुनाव आयोग के ही नियन्त्रण में था। यदि आज गृह सचिव और एडीजीपी को हटाया जा सकता है तो यही कदम पहले भी उठाया जा सकता था। अब अमितशाह प्रकरण के बाद चुनाव प्रचार पर दो दिन पहले ही रोक लगा देने से आयोग की निष्पक्षता पर और भी गंभीर आक्षेप आ गये हैं। और जब देश में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ही खत्म हो जायेगी तब पूरे चुनाव परिणामों पर भी अपने आप ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। यह प्रश्नचिन्ह लगना सीधे सीधे अराजकता का खतरा इंगित करता है और यही सबसे घातक है। क्योंकि जब संस्थानों की विश्वसनीयता पर आंच आनी शुरू होती है तब उससे अराजकता ही पैदा होती है यह तय है।



आज पांच वर्ष सरकार चलाने के बाद इन सभी मुद्दों पर सफल उपलब्धियों के साथ मोदी और उनकी सरकार को गर्व के साथ वोट मांगने आना चाहिये था। लेकिन ऐसा हो नही पाया है। चुनाव में मोदी इन मुद्दों पर बात ही नही आने दे रहे हैं। बल्कि पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र तक में भी उनका जिक्र नही है। बल्कि उज्जवला और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का भी इस चुनाव प्रचार अभियान में कोई उल्लेख सामने नही आया है जबकि एक समय इन योजनाओं के लाभार्थीयों के आंकड़ों के आधार पर बड़े-बड़े दावे किये जा रहे थे। ऐसे बहुत सारे वायदे और दावे हैं जो 2014 की सरकार बनने से पहले और बाद में किये गये थे। कायदे से आज के चुनाव में तो इन्ही वायदों/दावों से जुड़े आंकड़े जनता की अदालत में रखे जाने चाहिये थे लेकिन इस चुनाव में मोदी और उनकी सरकार इस सबका कोई जिक्र ही नही छेड़ रही है। जिस नोटबंदी से यह दावा किया गया था कि उसके बाद देश में टैक्स अदा करने वालों का आंकड़ा बढ़ा है आज उसका भी कोई जिक्र नही किया जा रहा है क्योंकि इस आंकड़े में भी कमी आयी है। आज टैक्स अदा करने वालों की संख्या कम हुई है। इस तरह इस चर्चा से यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के पास 2014 से लेकर अब तक कुछ भी बड़ा नही है जिसके दम पर सरकार पूरे आत्मविश्वास के साथ यह दावा कर सके उसके अमुक काम से आम आदमी को सीधे लाभ हुआ हो।
इस चुनाव के शुरू में प्रधानमन्त्री ने पुलवामा और फिर बालाकोट का जिक्र उठाया लेकिन यह चर्चा भी ज्यादा देर तक नही चल पायी। इसके बाद हिन्दुत्व को मुद्दा बनाया गया प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर। इसी के साथ जब कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर के लिये बनाये गये विशेष सेना अधिकारी अधिनियम में संशोधन करने की बात की तब राष्ट्रवाद का मुद्दा उभारा गया। लेकिन अब गालियों को मुद्दा बनाकर यह आरोप लगाया कि विपक्ष उन पर जुलम कर रहा है। नितिन गडकरी ने इन छप्पन गालियों की वाकायदा सूची बनाकर जनता से आग्रह किया कि वोट देकर इस जुल्म का बदला लें। अब सैम पित्रोदा की 1984 के दंगो को लेकर आयी टिप्पणी को मुद्दा बनाकर पंजाब और दिल्ली में प्रदर्शन करवाये गये हैं। हिंसा कहीं भी हो उसकी निन्दा की जानी चाहिये और हिसां करने वालों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिये। लेकिन जब हम 1984 के दिल्ली के दंगो की याद करते हैं तो उसी के साथ पंजाब में एक दशक से भी अधिक समय तक चले आतंकवाद की भी याद आ जाती है। उस आतंकवाद में जिन लोगां ने अपने परिजनों को खोया है उनके जख्म भी हरे हो जाते हैं पंजाब में 1967 से जनसघं से लेकर आज तक भाजपा का अकालीयों के साथ सत्ता का गठबन्धन रहा है। लेकिन इस गठबन्धन ने आतंकवाद के दौरान हुई हत्याओं की कितनी निंदा की है इसे भी सभी जानते हैं उस दौरान पंजाब में रात के समय अन्य राज्यों की बसें तक नही चलती थी। बसों से उतार कर गैर सिखों को मारा गया है यही इतिहास का एक कड़वा सच है। बल्कि अकाली-भाजपा सरकार में जब राजोआना को फांसी देने की बात आयी थी और मुख्यमन्त्री बादल ने उस पर केन्द्र को साफ कहा था कि ऐसा करने से पंजाब के हालात बिगड़ जायेंगे। बदाल के इस वक्तव्य पर भाजपा सरकार में होकर मूक दर्शक बनकर बैठी रही थी। हमने पंजाब के आतंकवाद के जख्म सहे हैं जो आज मोदी के ब्यान के बाद ताजा हो गये हैं।
आज जब 1984 के दंगो के गुनहागारों को सज़ा की बात हो रही है तो क्या आतंकवाद के दोषीयों को भी चिन्हित करके उन्हे भी सजा नही मिलनी चाहिये? क्या 2002 के गुजरात के दंगो के लिये भी दिल्ली की तर्ज पर ही सजा नही होनी चाहिये? गुजरात दंगो को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जस्टिस हरंजीत सिंह वेदी कमेटी की रिपोर्ट पर आज तक कारवाई क्यों नही हो रही है। यह रिपोर्ट 28 दिसम्बर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में आ चुकी है। इसी तरह क्या समझौता ब्लास्ट में मारे 68 लोगों की हत्या के जिम्मेदारों को सजा नही मिलनी चाहिये?
ऐसे दर्जनो मामलें हैं जिन पर मोदी सरकार को ही देश को जवाब देना है और जवाब के लिये चुनाव से ज्यादा उपयुक्त समय और कुछ नही हो सकता। इसलिये यह सब पाठकां के सामने रखा जा रहा है।


चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कई गंभीर सवाल उठने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर नाराज़गी जताई तब जाकर आयोग ने आचार संहिता के खुले उल्लंघन के मामलों का संज्ञान लेना शुरू किया और कुछ नेताओं के चुनाव प्रचार पर कुछ कुछ समय के लिये प्रतिबन्ध भी लगाया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमितशाह के मामलों में आयी शिकायतों पर जब आयोग ने कुछ नहीं किया तब सर्वोच्च न्यायालय को इस पर भी निर्देश देने पड़े कि आयोग छः मई तक इस पर फैसला ले। इस पर आयोग कितनी कारवाई करता है और कितनी क्लीन चिट देता है और इस सब पर शीर्ष अदालत कैसे क्या संज्ञान लेती है इसका पता आगे चलेगा। ईवीएम वोटिंग मशीनों की मतदान के दौरान खराबी की कई शिकायतें आ गयी हैं। इन शिकायतों के बाद इक्कीस राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च न्यायालय से फिर गुहार लगायी है कि वीवीपैट के मिलान की संख्या बढ़ाई जाये। इस पर आयोग को नोटिस भी हो गया है। वीवीपैट की शिकायत की प्रक्रिया पर एतराज उठाते हुए एक और याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर हो चुकी है। इस पर भी आयोग से जवाब मांगा गया है।
इस तरह यह जितनी भी घटनायें घटी हैं यह सब अपने स्वस्थ लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। प्रधानमन्त्री मोदी देश का सबसे बड़ा सम्मानित पद है जिस पर लोकतन्त्र की रक्षा की सबसे पहली जिम्मेदारी आती है। इस समय चुनाव चल रहे हैं। इसका परिणाम देश का भविष्य तय करेगा। इसके लिये देश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर खुले मंच से निष्पक्ष सार्वजनिक बहस होनी चाहिये थी लेकिन देश के बुनियादी सवालों पर यह बहस कहीं दूर दूर तक देखने को नही मिल रही है। पूरा चुनाव प्रचार सोशल मीडिया और टीवी चैनलों तक ही सीमित हो कर रह गया है। यह आरोप लग रहे हैं कि न्यूज चैनलों के एंकरो ने पार्टीयों के स्टार प्रचारकों की जगह ले ली है। प्रधानमन्त्री स्वयं जब चुनाव प्रचार के दौरान एक राज्य की चयनित सरकार को तोड़ने की अपरोक्ष में धमकी देंगे तो क्या उसे लोकतन्त्र के प्रति उनकी आस्था माना जायेगा या हताशा। बीएसएफ का एक बर्खास्त जवान जब देश के प्रधानमन्त्री के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाये तो क्या इसे देश में सही और स्वस्थ लोकतन्त्र होने की संज्ञा नही दी जा सकती थी? इस जवान के युवा लड़के की हत्या हुई है और उसके हत्यारे अभी तक पकड़े नही गये हैं क्या इसके लिये मोदी और उनके मुख्यमन्त्री योगी को उन हत्यारों को शीघ्र पकड़ने के निर्देश नहीं देने चाहिये थे? तेज बहादूर यादव ने खराब खाना जवानों को खिलाने की शिकायत की थी और जब उसकी शिकायत पर कोई कारवाई नही हुई तब उसने उस खाने का वीडियो जारी कर दिया। क्या खराब खाने की शिकायत करना कोई अपराध है बल्कि इस शिकायत के लिये उसके साहस की प्रशंसा की जानी चाहिये थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ उसे सज़ा देकर निकाल दिया गया। इस बर्खास्तगी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में उसकी याचिका लंबित है। जब तेज बहादूर यादव ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया और नामांकन दायर कर दिया तब यदि प्रधानमन्त्री ने उसके साहस की सराहना की होती और पीड़ा संझी की होती तो उससे प्रधानमन्त्री का ही कद बढ़ता। वह महामानव हो जाते लेकिन यहां तो यह नामांकन रद्द करवाने का आरोप अपरोक्ष में उन पर ही आ गया है। इसमें प्रधानमन्त्री का सीधा दखल था या नहीं यह नहीं कहा जा सकता लेकिन यह तो स्वभाविक है कि उनके चुनाव क्षेत्र में और कौन-कौन उनके खिलाफ चुनाव में है इसकी जानकारी उन्हें होगी ही। फिर जब इतना बड़ा यह मुद्दा बन गया तब भी प्रधानमंत्री की इस पर कोई प्रतिक्रिया न आना अपने में कई सवाल खड़े कर जाता है। यही स्थिति प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने और हार्दिक पटेल को यह अनुमति न मिलने पर है। आज राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता का मुद्दा जिसे सर्वोच्च न्यायालय 2015 में समाप्त कर चुका है उसे गृह मन्त्रालय के माध्यम से फिर उठाये जाने से प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। आज इन सारे मुद्दों को जिस तरह से उछाला गया है उससे भविष्य में लोकतन्त्र की स्थिति क्या होगी उसको लेकर सवाल उठने स्वभाविक है। क्योंकि दुनिया का कोई भी धर्म, हिंसा और अपराध का पाठ नही पढ़ाता है। अपराध और हिंसा कोई भी धर्म और जाति से नही जुड़ते है बल्कि यह व्यक्ति का अपना स्वभाव और उसकी परिस्थिति पर निर्भर करता है। जन्म से सभी एक समान ही होते है। ऐसे में हिंसा को धर्म से जोड़ने का प्रयास अपरोक्ष में लोकतन्त्र को कमजोर करने का प्रयास है।