शिमला/शैल। उद्योग विभाग के संयुक्त निदेशक तिलक राज के रिश्वत प्रकरण में सीबीआई ने चण्डीगढ़ ट्रायल कोर्ट में चालान दायर कर दिया है। बल्कि यह चालान दायर होने के बाद ही तिलक राज को जमानत मिली और वह फिर से नौकरी पर आ गये हैं। लेकिन सीबीआई के इस चालान को आगे बढ़ाने के लिये इसमें सरकार की ओर से अभियोजन की अनुमति चाहिये जो कि अभी तक सरकार ने नहीं दी है। सेवा नियमों के मुताबिक किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरूद्ध
अपराधिक मामला चलाने के लिये अभियोजन की अनुमति अपेक्षित रहती है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय कई मामलों में यह व्यवस्था दे चुका है कि जब सरकारी कर्मचारी उस पद से हट चुका हो जिस पद पर रहते उसके खिलाफ ऐसा मामला बना था तब ऐसे मामलों में सरकार की अनुमति की आवश्यकता नही रह जाती है। तिलक राज के खिलाफ जब यह मामला बना था तब वह बद्दी में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत थे लेकिन यह कांड घटने पर सीबीआई ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया और जमानत मिलने के बाद विभाग ने उन्हे बद्दी से बदलकर शिमला मुख्यालय में तैनात कर दिया है। शिमला में उन्हे जो काम दिया गया है उसका उनके बद्दी में रहते किये गये काम से कोई संबंध नही है। काम की इस भिन्नता के चलते विभाग के अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग अभियोजन की अनुमति दे दिये जाने के पक्ष में था लेकिन कुछ लोग अनुमति के नाम पर इस मामले को लम्बा लटकाने के पक्ष में हैं और इस नीयत से इस मामले को विधि विभाग की राय के लिये भेज दिया गया है। जबकि नियमों के अनुसार इसमें अन्तिम फैसला तो उद्योग मन्त्री के स्तर पर ही होता है।
उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक विधि विभाग को मामला भेजने के लिये जो आधार बनाया गया है कि जब तिलक राज पर छापा मारा गया था उस समय सीबीआई ने उसके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नही कर रखी थी। इसी के साथ यह भी कहा गया है कि पैसे की रिकवरी भी तिलक राज से न होकर अशोक राणा से हुई है जो कि सरकारी कर्मचारी नही है। लेकिन इस मामले में जो एफआईआर सीबीआई ने दर्ज कर रखी है उसके मुताबिक 29 मई को यह मामला विधिवत रूप से दर्ज हो गया था और तिलक राज से रिकवरी 30 मई को हुई थी। रिकवरी के बाद ही अगली कारवाई शुरू हुई थी। ऐसे में विभाग का यह तर्क है कि छापेमारी से पहले एफआईआर दर्ज नही थी कोई ज्यादा पुख्ता नही लगता। एफआईआर में दर्ज विवरण के मुताबिक इसमें बद्दी के ही एक फार्मा उद्योग के सीए चन्द्र शेखर इसके शिकायत कर्ता हैं। शिकायत के मुताबिक चन्द्र शेखर ने फार्मा उद्योग की 50 लाख सब्सिडी के लिये 28 मार्च को बद्दी में संयुक्त निदेशक तिलक राज के कार्यालय में दस्तावेज सौंपे थे। दस्तावेज सौंपने के बाद चन्द्र शेखर को एक अशोक राणा से संपर्क करने के लिये कहा जाता है, इसके बाद 22 मई को उसे इस संद्धर्भ में विभाग का नोटिस मिलता है और फिर वह अशोक राणा से मिलता है तथा इस दौरान हुई बातचीत रिकार्ड कर लेता है। चन्द्रशेखर की बातचीत अशोक राणा से 19 मई और 22 मई को होती है। इसमें उससे रिश्वत मांगी जाती है। चन्द्रशेखर यह रिश्वत मांगे जाने की शिकायत सीबीआई से 27 मई को करता है और प्रमाण के तौर पर यह रिकार्डिंग पेश करता है। सीबीआई अपने तौर पर 28 और 29 मई को स्वयं इस बातचीत और रिकार्डिंग की व्यवस्था करती है। जब 29 मई को इस तरह सीबीआई की वैरीफिकेशन पूरी हो जाती है तब उसी दिन 29 को यह एफआईआर दर्ज होती है। इसके बाद 30 को यह रिश्वत कांड घट जाता है, और सीबीआई तिलक राज को गिरफ्तार कर लेती है।
एफआईआर में दर्ज इस विवरण से विभाग द्वारा अब अभियोजन की अनुमति के लिये लिया गया स्टैण्ड मेल नही खाता है। तिलक राज की गिरफ्तारी के बाद उसके कांग्रेस सरकार और पूर्व की भाजपा सरकार में शीर्ष तक उसके घनिष्ठ संबंधों की चर्चा जगजाहिर हो चुकी है। क्योंकि एफआईआर के मुताबिक ही यह रिश्वत का पैसा मुख्यमन्त्री के दिल्ली स्थित ओएसडी रघुवंशी को जाना था। अब रघुवंशी भी इस मामले में सीबीआई के एक गवाह हैं। ऐसे में अब यह मामला एक ऐसे मोड़ पर है जहां सबकी नजरें इस ओर लगी है कि क्या उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री इसमें अभियोजन की अनुमति देते है या नही? क्या सीबीआई इसमें अनुमति के बिना ही इस मामले को अंजाम तक पंहुचा पायेगी या नही।
शिमला/शैल। वीरभद्र सरकार ने मन्त्रीमण्डल की पिछली बैठक में जुब्बड़हटी एयरपोर्ट के पास विधायकों की सोसायटी को 30 बीघे ज़मीन मकान बनाने के लिये दी है। सरकार का यह फैसला जैसे ही सार्वजनिक हुआ तभी से इस पर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गयी। यहां तक कि नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल का तो यहां तक ब्यान आ गया कि न ज़मीन लेंगे और न ही लेने देंगे। इस फैसले पर यह नकारात्मक प्रतिक्रियाएं संभवतः इसलिये आयी हैं क्योंकि इससे पहले भी शिमला में दो स्थानों मैहली और हीरा नगर में सरकार ने विधायकों को ज़मीन दे रखी है।
स्मरणीय है कि विधायकों की पहली सोसायटी का पंजीकरण 9-9-86 को हिम लैजिस्लेचर भवन निर्माण सोसायटी के नाम से गठन हुआ था। उस समय इसके 123 सदस्य थे। इस सोसायटी को मैहली मेें 8 बीघे और हीरा नगर में 12 बीघेे 16 बिस्वे ज़मीन मिली हुई है। इस सोसायटी के 31.3.15 तक हुए आडिट के मुताबिक इसके पास 8.50 लाख रूपया बचत खाते मेे और 9.50 लाख रूपया एफडीआर के रूप में पूंजी है। इसका कार्यालय प्रदेश विधानसभा है। लेकिन यह सोसायटी किस तरह के काम कर रही है और इसके कार्यालय मे कितने कर्मचारी है इसकी कोई जानकारी सार्वजनिक नही है, बल्कि इसका नियमित आडिट भी नहीं है। इसके अध्यक्ष विधान सभा के उपाध्यक्ष जगत सिंह नेगी है और यह 13.8.14 को चुने गये थे।
इस सोसायटी के बाद 17.12.2004 को न्यू लैजिस्लेचर भवन निर्माण सोसायटी के नाम से एक और पंजीकरण हुआ, इसके 21 सदस्य हैं। 2004 को पंजीकृत हुई इस सोसायटी की बैठक 5.3.2011 को हुई और इसमें सतपाल सत्ती इसके अध्यक्ष और सुधीर शर्मा इसके सचिव बने है। इसके पास पूंजी के नाम पर 2011 में 3.50 लाख रूपये बैंक में है। इसका कार्यालय भी विधानसभा ही दिखाया गया है, लेकिन इसके कार्यालय में कितने कर्मचारी हैं और इसकी क्या गतिविधियां इसकी कोई जानकरी सार्वजनिक नही है। इसी के साथ यह भी उल्लेखनीय है कि 2011 से लेकर आज तक इसका कोई आडिट भी नही हुआ है। सहकारिता नियमों के मुताबिक विधायको की इन दोनो सोसायटीयों में सहकारिता नियमों की कोई अनुपालना नही हो रही है। लेकिन सहकारिता विभाग इस संद्धर्भ में इनके खिलाफ कोई भी कारवाई नही कर पा रहा है।
इस नयी सोसायटी के इस समय भी 21 ही सदस्य है और अब सरकार ने इसी 21 सदस्यों की सोसायटी को 30 बीघे जमीन दी है लेकिन इससे पहले वाली सोसायटी के कितने सदस्यों ने उनकी मिली ज़मीन मकान बना रखे हैं। क्या इन मकानों को उपयोग आवास के लिये ही हो रहा है या इसका कोई वाणिज्यिक उपयोग भी हो रहा है। इसकी कोई जानकारी सार्वजनिक नही है। इसी के साथ यह भी एक सवाल चर्चा में चल रहा है कि 2004 में नयी सोसायटी के गठन की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या दोनों सोसायटीयों के सदस्यता आदि नियमों में कोई अन्तर है और फिर 2004 में पंजीकृत हुई इस सोसायटी को अब 2017 में जमीन मांगने की क्यों आवश्यकता पड़ी, यदि सूत्रों की माने तो जब यह ज़मीन देने का प्रस्ताव तैयार हुआ और इसे विधि विभाग के परामर्श के लिये भेजा गया तो विधि विभाग ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन नही किया है। लेकिन विधि विभाग की राय को नजरअंदाज करके सरकार ने यह सौगात विधायकों को दे दी।
आज हमारे विधायकों को जहां सरकारी ज़मीन का तोहफा मिल गया वहीं पर यह लोग इस कार्यकाल में अपनी वेतन वृद्धि के मामलें में भी काफी सौभग्यशाली रहे हैं। क्योंकि 2015 तक इनका वेतन 20,000 रूपये मासिक था जो 6.2.15 को बढ़ाकर 30,000 रूपये हो गया। उसके बाद 10.5.16 को पुनः इनके वेतन में वृद्धि हुई और यह बढ़कर 55000 रूपये हो गया। इस समय हमारे विधायक सारे वेतन-भत्ते मिलाकर 2,10,000 रूपये प्रति माह प्राप्त कर रहे है। यही नही जिन निर्दलीय विधायकों ने जीतने के बाद कांग्रेस का दामन थाम लिया था और भाजपा ने इनके खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष के पास दल-बदल कानून के तहत कारवाई किये जाने की याचिका दायर की थी उसका फैसला अध्यक्ष की कृपा से इस कार्यकाल में अब तक नही आया है। भाजपा ने भी इस पर उस समय जोर देना छोड़ दिया जब इन लोगों ने भाजपा का दामन थामने के संकेत दे दिये। इस तरह भाजपा और विधानसभा अध्यक्ष की कृपा से इन निर्दलीयों का बड़ा नुकसान होने से बच गया। हमारे लोकतन्त्र की यही तो विशेषता है।
शिमला/शैल। भाजपा के संभावित चुनाव प्रत्याशीयो की सूची सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद पार्टी के अन्दर मचे घमासान को शांत करने के लिये प्रदेश पुलिस के साईबर सैल में पार्टी ने एक शिकायत भेजी है। शिकायत में कहा गया है कि किन्ही शरारती तत्वों ने उम्मीदवारो की फर्जी सूची तैयार करके सोशल मीडिया में जारी कर दी है। यह सूची जारी होने के बाद इस पर पार्टी के प्रदेश मुख्यालय से लेकर पंचकुला में हुई कोर कमेटी की बैठक तक मे इस वायरल सूची पर चर्चा हुई है। यह सूची सामने आने के बाद कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के समीकरणों में कई फेरबदल चर्चा में है। इसी सूची का प्रभाव है कि शिमला के कुसुमप्टी विधानसभा क्षेत्रा से अखिल भारतीय विद्यार्थी
परिषद और आरएसएस से ताल्लुक रखने का दावा करने वाले एक एनडी शर्मा ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। रामपुर, सोलन, बिलासपुर में समीकरण बदलने की चर्चाएं सामने आ रही है। इस पार्टी द्वारा साईबर सैल का भेजी शिकायत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
लेकिन इस शिकायत पर अब तक साईबर सैल में कोई एफआईआर दर्ज नही की गयी है और न ही भाजपा यह एफआईआर दर्ज करने की मांग ही कर रही है। क्योंकि जो सूची वायरल हुई है उसमें दिल्ली में केन्द्रिय चुनाव कमेटी की बैठक में इन नामों की चर्चा होने का जिक्र दर्ज है बैठक के बाद स्वास्थ्य मन्त्री नड्डा के ईमेल से यह सूची प्रदेश अध्यक्ष सत्ती को उनकी मेल पर भेजी गयी। ऐसे में साईबर जांच की थोड़ी सी समझ रखने वाला भी यह जानता है कि इसकी जांच की शुरूआत नड्डा और सत्ती की ईमेल खंगालने से शुरू होगी। इसी के साथ केन्द्रिय चुनाव कमेटी की बैठक की जानकारी लेनी होगी इस जानकरी के साथ ही इन नेताओं की फोन काल्ज़ तक रिकार्ड कब्जे में लेना आवश्यक होगा। परन्तु अभी तक जांच में ऐसा कोई कदम उठाये जाने की कोई सूचना नही आयी है। सूत्रों की माने तो भाजपा के शीर्ष नेता भी ऐसी जांच के पक्षधर नही है। और इस शिकायत को जल्दीबाजी में उठाया गया कदम मान रहे है।
शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा ने इस बार भी 2012 की तर्ज पर मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को घेरने की रणनीति अपनाई है। यह संबित पात्रा की पत्रकार वार्ता से स्पष्ट हो गया है। लेकिन 2012 में जिस मुद्दे पर अरूण जेटली ने वीरभद्र पर निशाना साधा था संयोगवश वही मुद्दा आज भी लगभग वैसा ही खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि आयकर के सारे मामले अदालतों में लंबित चल रहे हैं। सीबीआई अपनी जांच पूरी करके चालान अदालत में दायर कर चुकी है। लेकिन उसमें अभी ट्रायल की स्टेज नही आयी है। ईडी दो अटैचमैन्ट आदेश जारी कर चुकी है आधी जांच करके आनन्द चौहान के खिलाफ चालान दायर कर चुकी है और वह एक वर्ष से अधिक समय से ईडी की हिरासत में भी चल रहा है लेकिन ईडी की जांच अभी पूरी नही हुई है और इसी कारण से अनुपूरक चालान दायर नही हो सका है।
सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिये वीरभद्र ने जो याचिका दायर की थी उसका फैसला दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस विपिन सांघी की पीठ 31 मार्च 2017 को सुना चुकी है। इस फैसले में वीरभद्र याचिका को अस्वीकार करने के साथ ही अदालत ने मुख्यमन्त्री के 2012 के चुनावों मे दायर शपथ पत्र पर भी चुनाव आयोग को गंभीर निर्देश दे चुकी है। यदि इन निर्देशों पर कारवाई हो जाती तो आज राजनीतिक परिदृश्य एकदम बदला हुआ होता। लेकिन वीरभद्र को भ्रष्टाचार पर घेरने वाली भाजपा ने एक दिन भी इस फैसले पर अपना मुंह नही खोला। संबित पात्रा से जब शैल ने पत्रकार वार्ता में इस संद्धर्भ में सवाल पूछा तो उनके पास इसका कोई जवाब नही था। यही नही जब ईडी के आनन्द चौहान और वीरभद्र को लेकर सामने आये अलग-अलग आचरण पर सवाल पूछा तो इसका भी कोई सन्तोषजनक उत्तर डा. पात्रा के पास नही था।
डा. पात्रा ने वीरभद्र की शासन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि शासन को रिटायर्ड और टायरड अधिकारी चला रहे हैं। लेकिन जब इसी संद्धर्भ में उनसे पूछा कि मोदी मन्त्रीमण्डल में तो दो ऐसे रिटायर्ड नौकरशाहों को मंत्री बना दिया गया है जो संसद के किसी भी सदन के सदस्य ही नही है तो इस सवाल पर भी भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के पास कोई उत्तर नही था। इस संद्धर्भ में यदि भाजपा की इस चुनावी आक्रामकता का आंकलन किया जाये तो स्पष्ट उभरता है कि सही मायनों में भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ कतई गंभीर नही है। यदि गंभीर होती तो जनता से वायदा करती कि भ्रष्टाचार के इन आरोपों पर वह आज ही विजिलैन्स में विधिवत शिकायत दर्ज करवा कर एफआईआर दर्ज किये जाने की मांग करती और यदि विजिलैन्स मामला दर्ज न करती तो वह सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाकर इन आरोपों को अंजाम तक पहुंचाती। लेकिन भाजपा की ओर से ऐसा कोई वायदा और कारवाई सामने न आने से स्पष्ट हो जाता है कि उसे यह आरोप केवल चुनाव प्रचार के लिये चाहिये।
शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता और मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह विधानसभा चुनाव लड़ेंगे या नही लड़ेंगे? लड़ेंगे तो कहां से लड़ेंगे। इन चुनावों में पार्टी को लीड करेंगे या नही करेंगे? दन सवालों पर अब तक संशय बना हुआ है क्योंकि इस संद्धर्भ में उनके ब्यान बराबर बदलते आ रहे हैं। इस बारे में अगर कुछ स्पष्ट है तो सिर्फ इतना कि इस समय उनकी राजनीतिक प्राथमिकता सुक्खु को अध्यक्ष पद से हटवाना बन गया है। ऐसे में यह सवाल उठता जा रहा है कि यदि सुक्खु अध्यक्ष पद से नही हटते हैं तो वीरभद्र का अगला कदम क्या होगा? वीरभद्र को हाईकमान का क्या रूख रहता है? इस पर सुक्खु और वीरभद्र से असहमति रखने वाले दूसरे नेताओं का स्टैण्ड क्या होता है? यह सवाल इस प्रदेश कांग्रेस के लिये सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है जबकि भाजपा ने प्रदेश सरकार और कांग्रेस के खिलाफ पूरा हमला बोल रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह 22 को कांगड़ा में आयोजित होने जा रही हुंकार रैली में इस हमले को और भी धार देने वाले हैं। भाजपा के हमलों का जवाब देने के लिए कांग्रेस का कोई बड़ा नेता सामने आने का साहस नही जुटा पा रहा है। ऊपर से यह भ्रम भी फैला हुआ है कि कांग्रेस के कई नेता पार्टी छोड़कर कभी भी भाजपा का दामन थाम सकते हैं। क्योंकि कुछ नेताओं का आचरण ही इसके स्पष्ट संकेत दे रहा है।
इस परिदृष्य में यह आंकलन महत्वपूर्ण हो जाता है कि वीरभद्र ऐसा स्टैण्ड ले क्यों रहे है? वीरभद्र हर चुनाव में पार्टी पर अपना एक छत्र अधिकार चाहते हैं और जब ऐसा होने में कोई बाधा आती है तब वह बगावत के किसी भी हद तक चले जाते है। 1983, 1993 और 2012 में घटे घटनाक्रमों की जानकारी रखने वाले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हाईकमान को उनकी शर्ते माननी ही पड़ी है लेकिन क्या इस बार भी ऐसा हो पायेगा? क्योंकि इस समय के वीरभद्र के अपने खिलाफ जो मामले खड़े हैं यदि उनके दस्तावेजी प्रमाण चुनाव अभियान के दौरान सार्वजनिक चर्चा में आ खडे़ होते है तो वीरभद्र और पूरी पार्टी के लिये संकट खड़ा हो जायेगा। 2014 के लोकसभा चुनावों में जब इन मामलों की चर्चा उठी थी तो कांग्रेस को 68 में से 65 हल्को में हार का मुख देखना पड़ा था जनता भ्रष्टाचार के आरोपों पर जितने विरोध में आ जाती है उतना समर्थन वह विकास कार्यो पर नही देती है यह एक राजनीतिक सच बन चुका है और इसमें कांग्रेस की स्थिति बहुत कमजोर है यह भी स्पष्ट हो चुका है। इसके बावजूद वीरभद्र पूरी पार्टी को आॅंखे दिखा रहे हैं। जबकि चुनाव सरकार की परफारमैन्स पर लड़ा जाता है अकेले पार्टी के प्रचार अभियान के दम पर नही और इस समय सरकार की छवि माफिया राज बनती जा रही है। विकास के नाम भी जो काम ऊना के हरोली विधानसभा क्षेत्र और शिमला के शिमला ग्रामीण में हुए उनके मुकाबले में दूसरे क्षेत्रों में तो 10ः भी नहीं है। कांग्रेस के अपने ही विधायक इसकी शिकायतें करते रहे हैं। यही कारण है कि यह लोग आज खुलकर वीरभद्र के साथ खड़ेे नही हो पा रहे हैं। क्योकि इन विधायकों को नजरअन्दाज करके इनके क्षेत्रों से जिन लोगों को विभिन्न निगमो/वार्डो में ताजापोशीयां दी गयी थी वह सब आज समानान्तर सत्ता केन्द्र बनकर टिकट के दावेदार बने हुए है। इनमें से अधिकांश को ताजापोशीयां विक्रमादित्य की सिफारिश पर मिली है और वहीं विक्रमादित्य की अपनी राजनीतिक ताकत भी बने रहे हैं। इन्ही की ताकत पर विक्रमादित्य समय - समय पर चुनाव टिकटों के वितरण के लिये मानदण्ड तय करने को लेकर ब्यान देते रहे है।
ऐसे में माना जा रहा है कि वीरभद्र सिंह पर विक्रमादित्य के अधिक से अधिक समर्थकों को टिकट दिलवाने का दवाब है जबकि जिन क्षेत्रों से पार्टी के पास मौजूदा विधायक है वहां पर इन लोगों को टिकट देना आसान नही। सुक्खु बतौर कांग्रेस अध्यक्ष वर्तमान विधायकों के लिये एक मात्र सहारा रह गये हैं क्योंकि यह ब्यान आते रहे हैं कि कई वर्तमान विधायकों के टिकट भी कट सकते हैं। विक्रमादित्य के समर्थकों को टिकट तभी सुनिश्चित हो सकते हैं यदि टिकट बंटवारे पर केवल वीरभद्र सिंह का ही अधिकार रहे। अन्यथा वीरभद्र का सुक्खु से और क्या विरोध हो सकता है। शिंदे ने भी संभवतः इसी व्यवहारिकता को ध्यान में रखकर यह कहा था कि चुनाव वीरभद्र की ही लीडरशीप मे लड़े जायेंगे लेकिन सुक्खु को भी नही हटाया जायेगा लेकिन वीरभद्र इस आश्वासन से भी सन्तुष्ट नही हुए तो स्पष्ट है कि वह इस समय पार्टी की सिफारिश पर नही वरन् अपनी ईच्छा से टिकट वितरण चाहते हैं और यह तभी संभव है जब सुक्खु अध्यक्ष न रहे। माना जा रहा है कि वीरभद्र सिंह अर्की के कुनिहार में 25 तारीख को भाजपा की हुंकार रैली के जवाब में एक उससे भी बड़ी रैली आयोजित करने जा रहे है। इस रैली में वीरभद्र अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगें यदि यह रैली वीरभद्र की ईच्छा के अनुसार एक सफल रैली हो जाती है तो संभव है कि एक बार फिर हाईकमान वीरभद्र की शर्तो को मान ले। लेकिन इस रैली का सफल होना इस पर निर्भर करता है कि क्या अमितशाह की 22 की रैली में कांग्रेस का कोई नेता भाजपा में शामिल होता है या नही। अभी हर्षमहाजन ने जिस तरह से जीएस बाली और वीरभद्र में फिर से बैठकें करवाई हैं उसे इसी प्रयास के रूप मे देखा जा रहा है।