Wednesday, 04 February 2026
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आऊट सोर्स के हजारों कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चितता में करोड़ों के घपले की भी आशंका

शैल/शिमला। वीरभद्र सरकार विभिन्न सरकारी विभागों /निकायों में आऊट सोर्स के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों को लेकर एक पाॅलिसी लाने की घोषणा एक लम्बे समय से करती आ रही है। बल्कि संवद्ध प्रशासन पर यह पाॅलिसी

लाने के लिये दवाब भी बनाया गया और जब इसे अधिकारियों ने उकदम नियमों के विरूद्ध करार दिया तो कुछ अधिकारियों को इसका खमियता भी भुगतना पड़ा है इस समय सरकार में करीब 35000 कर्मचारी आऊट सोर्स के माध्यम से अपनी सेवाएं दे रहें है। यह कर्मचारी एक ही कंपनी के माध्यम से रखे गये है। यह आरोप कर्मचारी नेता विनोद ठाकुर ने लगाया है। आरोप है कि इस कंपनी को सरकार 20% कमीशन दे रही है। 80% कर्मचारी को जाना है लेकिन यह 80% भी पहले इस कंपनी के खाते मे जाता है और फिर कंपनी अपने खाते से इनका भुगतान करती है इस तरह यह भी स्पष्ट नही है किे यह 80% भी कर्मचारी को वास्तव में ही मिल रहा है या नही। 
आऊट सोर्स के नाम पर प्रदेश के श्रम विभाग के पास कितनी कपनीयां पंजीकृत है और विभाग का उनपर किस तरह का कितना नियन्त्रण है इसको लेकर विभाग में कुछ भी स्पष्ट नही है। जिस कंपनी के माध्यम से हजारों कर्मचारी सरकार में अपनी सेवाएं दे रहे है। उस कंपनी का दफ्तर के नाम पर न्यू शिमला में एक छोटा सा बोर्ड टंगा है लेकिन दफ्तर में कितने कर्मचारी है इसको लेरक भी बहुत कुछ स्पष्ट नही हे क्योंकि कंपनी में फोन करने पर कोई जानकरी नही मिल पाती है इससे यह आशंका और पुख्ता हो जाती है। कि इस कंपनी के नाम पर केवल एक तरह से लेवर सप्लाई का काम किया जा रहा है। क्योंकि आज तक इस कंपनी की ओर से ने तो किसी विज्ञापन के माध्यम से या न ही किसी रोजगार कार्यालय के माध्यम से यह सामने आ पाया है कि अमुक कार्यालय या कार्य के लिये उसे अमुक योग्यता के इतने व्यक्ति चाहिये। क्योंकि यदि कंपनी ऐसी प्रक्रिया अपनाती है तो वह रोजगार कार्यालय के समकक्ष हो जाती है और सरकार के मौजूदा नियम इसकी अनुमति नही देते है इससे हटकर यदि कंपनी ऐसी नियुक्तियों के लिये आमन्त्रण देती है तो उसे अपने ही कार्यालय में या उससे संवद्ध संस्थान में नियुक्ति देनी होगी लेकिन इस कंपनी का अपना कोई ऐसा संस्थान है नही जहां पर यह किसी को नौकरी दे सके।

क्या सरकारी विभागक आऊट सोर्स के माध्यम से किसी को दफ्तर में लिपिक या सहायक आदि की नौकरी दे सकते है ऐसा कोई प्रावधान भी नियमों में नही है ऐसे में आऊट सोर्स के माध्यम से केवल अस्थायी लेवर ही सप्लाई की जा सकती है और सरकारी दफ्तर में ऐसी लेवर रखने का भी प्रावधान नहीं है। इसी कारण से 20% कमीशन के बाद का 80% भी कंपनी के खाते में ही जमा करवाना पड़ता। क्योंकि यदि सरकार के दफ्तर की ओर से कर्मचारी को सीधे 80% का भुगतान कर दिया जाये तो यह लोग सीधे सरकारी कर्मचारी हो जाते हैं इसी के साथ एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या यह कंपनी अपने रिकार्ड में इसके माध्यम से रखे गये कर्मचारियों को अपना रेगुलर कर्मचारी दिखाती है या नही। आज सरकारी कार्यालयों में इस कपंनी के माध्यम से रखे गये हजारों कर्मचारी इस उम्मीद में चल रहे है कि वह कभी नियमित हो जायेंगे। सरकार द्वारा इन कर्मचारियों को लेकर पाॅलिसी लाये जाने के वायदों से भी इन्हें यह उम्मीद बंधी थी जो कि एकदम आधारहीन थी।
आरोप है कि अभी सरकार ने आऊट सोर्स कर्मचारियों के लिये विभागों को दस करोड़ रूपये जारी किये है। इसमें से दो करोड़ तो कंपनी को सीधे कमीशन के रूप में मिल जायेंगें शेष आठ करोड़ भी कंपनी के खाते में ही जमा होंगे और इसमें से वास्तव में ही संवद्ध कर्मचारियों को कितने मिलेंगे इसकी कोई जानकारी पैसे देने वाले विभाग को नही होगी। ऐसे में हजारों कर्मचारियों का भविष्य जहां अनिश्चितता में हे वहीं पर इसमें करोड़ों का घपला होने की भी पूरी - पूरी संभावना बनी हुई है।

फिर उठी सोलन को नगर निगम बनाने की मांग - संघर्ष समिति हुई गठित सोलन

 शैल/सोलन। सोलन  हिमाचल का शिमला के बाद दूसरा बड़ा शहर है। 2011 की जनसंख्या गणना के मुताबिक शहर की आवादी उस समय 39256 जो बढकर 50,000 का आंकड़ा पा कर चुकी है। सोलन में 1950 में नगर परिषद का गठन हो गया था। 33.43 वर्ग किलो मीटर में फैले शहर को Mushroom City of india और City of RedGold के खिताब भी मिल चुके है सोलन को नगर निगम बनाने का औपचारिक प्रस्ताव नगर परिषद बहुत पहले ही पारित करके सरकार को भेज चुकी है बल्कि इस प्रस्ताव पर जिलाधीश सोलन की ओर से 4.6.15 को कुछ स्पष्टीकरण भी मांगे गये थे इन स्पष्टीकरणों का जवाब जिलाधीश और सचिव शहरी विकास विभाग को 8.7.15 को भेज दिया गया था। लेकिन सरकार की ओर से  अब तक इस पर कोई कारवाई नही की गयी है। इस प्रस्ताव में शहर के साथ लगती 11208 जनसंख्या को भी शहर में मिलाने का प्रस्ताव दिया गया था। बल्कि इस मिलाये जाने वाले क्षेत्र मे कोई कृषि योग्य भूमि भी नही आती है।
अब जब धर्मशाला को नगर निगम बना दिया गया है। तब यहां के लोग इस मांग को लेकर बहुत सक्रिय हो गये है। लोगो ने नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष कुल राकेश पंत की अध्यक्षता में 10.7.17 को एक संघर्ष समिति का भी गठन कर लिया है। संधर्ष समिति ने 15.7.17 से 28.7.17 के बीच इसके लिये एक हस्ताक्षर अभियान भी छेड़ा था। जिसमें 7000 लोग इस प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर कर चुके है। आने वाले विधानसभा चुनावों की दृष्टि से सोलन के लोगों की इस मांग का जिले की राजनीति पर गहरा प्रभाव पडे़गा यह तय है। इस समय सोलन जिले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से चार पर भाजपा का कब्जा है केवल सोलन की सीट ही कांग्रेस के पास है जहां से कर्नल धनी रा शांडिल इस समय वीरभद्र मन्त्रीण्डल में मन्त्री है सोलन की इस मांग को स्वीकार करवाना शांडिल के रजनीतिक भविष्य के लिये भी महत्वपूर्ण होगा।

भाजपा के अल्टीमेटम पर वीरभद्र का त्यागपत्र न आने पर कार्य समिति ने पारित किया निंदा प्रस्ताव

 शिमला/शैल।  प्रदेश भाजपा ने कोटखाई के बलात्कार और हत्या प्रकरण पर उभरे जनाक्रोश के बाद मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को 26 जुलाई तक अपने पद से त्यागपत्र देने का अल्टीमेटम दिया था। इस अल्टीमेटम पर त्यागपत्र न आने के बाद भाजपा ने प्रदेश भर में पोलिंग बूथों पर एक साथ पुतले फूंके है। इसके बाद अब प्रदेश कार्यसमीति ने निन्दा प्रस्ताव पारित किया है। भाजपा का निन्दा प्रस्ताव दो मुद्दों पर प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था और वीरभद्र के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर आया है। कार्यसमिति के प्रस्ताव के  साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पूर्व मुख्यमन्त्रीयों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल ने भी अगल-अलग पत्रकार वार्ताओं में वीरभद्र पर हमला बोलते हुए उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देने की सलाह दी है।
भाजपा नेतृत्व पिछले दो वर्षों से यह दावे करता आ रहा है कि वीरभद्र सरकार गिरने वाली है और प्रदेश में समय से पहले ही चुनाव हो जायेंगे। इस बार तो भाजपा ने वीरभद्र को त्यागपत्र देने के लिये 26 जुलाई की तारीख भी तय कर दी थी लेकिन इस बार भी पहले ही की तरह भाजपा का आकलन सफल नही हुआ है। अब जो चार माह के बाद प्रदेश विधानसभा के चुनाव ही हो जायेंगे। ऐसे में आज जनता के बीच जाने के लिये भाजपा ने फिर वीरभद्र के भ्रष्टाचार को मुद्दा  बनाने का फैसला लिया है। इसी के साथ पार्टी ने उन नेताओं को भी घर वापसी का खुला न्योता दिया है जो कभी किन्ही कारणों से संगठन से बाहर चले गये थे। इस दिशा में महेश्वर सिंह, राधा रमण शास्त्री, श्यामा शर्मा, राकेश पठानिया, खुशीराम बालनाहटा और टिक्कु ठाकुर आदि घर वापसी कर चुके हैं। अब राजन सुशान्त और महेन्द्र सोफत की वापसी की अटकलें चल पड़ी है। इसी कड़ी में अन्य दलों के नेताओं को भी भाजपा में आने का खुला आमन्त्रण दिया गया है। इस आमन्त्रण पर कांग्रेस से कोई लोग निकलकर भाजपा का दामन थामते है या नही इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में ही होगा।
लेकिन भाजपा जिस भ्रष्टाचार की बात कर रही है उसको लेकर करीब हर वर्ष एक-एक आरोपपत्र सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपती आयी है। अभी  शिमला नगर निगम चुनावों से पूर्व भी नगर निगम को लेकर ही एक आरोपपत्र राज्यपाल को सौंपा गया था। अब इस निगम की सत्ता पर भाजपा का ही कब्जा है और निगम के जिस भ्रष्टाचार को लेकर आरोप पत्र सौंपा गया था उसकी जांच करने के लिये किसी आदेश की भी आवश्यकता नही है। परन्तु इस दिशा में अब सत्ता मिलने के बाद आॅखें बन्द कर ली गयी है। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ थोड़ी सी भी ईमानदारी हो तो ऐसे मामलों पर व्यक्तिगत स्तर पर भी विजिलैन्स और अदालत में मामले दायर किये जा सकते है। लेकिन ऐसा हो नही रहा है बल्कि जब पिछली बार भाजपा सत्ता में थी तब अपने ही सौंपे आरोप पत्रों पर सरकार ने कोई कारवाई नहीं की थी। ऐसे में भ्रष्टाचार पर वीरभद्र को घेरने के लिये भाजपा के पास कोई नैतिक आधार नही रह जाता है। क्योंकि वीरभद्र के खिलाफ जिस भ्रष्टाचार की बात की जा रही है उसमें सीबीआई तो अदालत में चालान दायर कर चुकी है और उसका फैसला आने में कई वर्षों लग जायेंगे। सीबीआई के बाद ईडी में मामला चल रहा है। लेकिन उच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी ईडी की कारवाई आगे नही बढ़ रही है। ईडी की कारवाई को लेकर आम चर्चा है कि प्रदेश भाजपा ही इस कार्यवाही को आगे नही बढ़ने दे रही है। क्योंकि अगली कारवाई में गिरफ्तारी की नौबत आ सकती है और यह नौबत आने का आधार ईडी द्वारा जारी दूसरे अटैचमैन्ट आदेश के बाद होने वाली पूछताछ है लेकिन यह पूछताछ अब तक नही हुई है जबकि पहले अटैचमैन्ट आदेश के बाद ही आनन्द चैहान की गिरफ्तारी हुई थी। 26 पन्नों के दूसरे अटैचमैन्ट के साथ लगे दस्तावेजों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें भी कोई गिरफ्तारी तो अवश्य होगी। चर्चा है कि ईडी की यह कारवाई भाजपा के ही कुछ बड़े नेताओं द्वारा ही रोकी गयी है और इसके लिये पार्टी द्वारा करवाये गये एक सर्वे को आधार बनाया गया है। इस सर्वे के मुताबिक वीरभद्र के खिलाफ किसी भी बड़ी कारवाई से पब्लिक सहानुभूति बदल जायेगी और भाजपा की सरकार बनना कठिन हो जायेगा। इसी सर्वे के कारण शान्ता जैसे बड़े भी भाजपा नेता अब जनता में इतना ही कह रहे है कि वीरभद्र जमानत पर है। जबकि भाजपा के भी कई बड़े नेताओं के खिलाफ मामलें चल रहे है और वह जमानत पर है। राजीव बिन्दल के खिलाफ चल रहा मामला फैसले के कगार पर पहुंचने वाला है।
 ऐसे में भ्रष्टाचार और कानून एवम व्यवस्था के नाम पर सरकार के खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पारित करके केवल राजनीति ही की जा सकती है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि  भाजपा ने अब एक बार भी गंभीरता से वीरभद्र को सत्ता से हटाने का कोई प्रयास ही नही किया है। अब कोटखाई प्रकरण में सीबीआई के हाथ मामला जाने के बाद जनाक्रोश से लेकर सोशल मीडिया में हर तरह के  दावे करने और सन्देह व्यक्त करने वालों के तेवर भी बहुत हद तक बदल गये है। ऐसे में अब तब तक सीबीआई की फाईल रिपोर्ट इस मामलें में नही आ जाती है तक तक राजनीतिक दलों को इसमें अपनी सक्रियता को जारी रखने का कोई आधार नही रह जाता है। संभवतः इस बार भाजपा द्वारा वीरभद्र के त्यागपत्र के लिये 26 जुलाई की तारीख का अल्टीमेटम देना राजनीतिक आंकलन की एक बड़ी चूक ही करार  दी जा सकती है। जिसे अब निन्दा प्रस्ताव से कवर करने का प्रयास किया गया है।

कोटखाई प्रकरण में रेप से लेकर हत्या तक एक घन्टे में अन्जाम दिया गया पूरे अपराध को

शिमला/शैल। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने एक पत्रकार वार्ता  में यह सनसनी खेज खुलासा किया है कि मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह की पत्नी पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने कोटखाई प्रकरण की नाबालिग पीड़िता के परिजनो से मिलकर इस कांड की सीबीआई से जांच करवाने की बजाये प्रदेश पुलिस से जांच करवाने का आग्रह करें। प्रतिभा सिंह ने साहू के इस खुलासे के जवाब में यह कहा कि जब वह पीड़िता के परिजनों से मिली थी तब उन्होने पुलिस जांच पर पूरा भरोसा जताया था और तब उन्होने इस संद्धर्भ में यह कहा था कि जब पुलिस जांच पर भरोसा है तो फिर सीबीआई जांच की आवश्यकता नही आती है। लेकिन जिस अन्दाज में साहू ने  यह बात सामने लायी है इससे पूरा संद्धर्भ ही बदल जाता है और  संद्धर्भ बदलने का यह प्रयास फिर राजनीति की गंध से भरा लगता है। क्योंकि अब जब यह मामला सीबीआई के पास चला गया है। तब  सीबीआई की रिपोर्ट आने का इन्तजार किया जाना चाहिये।
  सुषमा साहू ने पत्रकार वार्ता में पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता ने मौत से दो घन्टे पहले चावल खाये थे। रिपोर्ट के मुताबिक मौत 4 जुलाई को शाम के 4 से 5 बजे के बीच हुई है। पोस्टमार्टम 7 जुलाई को हुआ। इस पर सवाल उठाया गया है कि 4 तारीख को खाये गये चावल 7 तारीख तक यथास्थिति कैसे बने रहे। साहू के इस सवाल पर  कोई जवाबी प्रतिक्रिया नही आयी है। लेकिन यहां पर एक और गंभीर सवाल उठता है कि पुलिस जांच के मुताबिक 4 जुलाई को यह लड़की शाम 4 बजे के करीब स्कूल से निकली है और स्कूल में ही उसने खाने में चावल खाये थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मौत का समय 4 से 5 बजे का है। यदि मौत का समय और बच्ची के स्कूल से निकलने का समय सही है तो इसका अर्थ यह होता है कि स्कूल से निकलते ही बच्ची को उठा लिया गया होगा। जिस स्थान पर लाश मिली है वहां तक स्कूल से पहुंचने में करीब 20 मिनट लगते है और आबादी से यह स्थल करीब 300 मीटर है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह संभव हो सकता है कि करीब एक घन्टे के समय में छः लोग बच्ची से बलात्कार भी कर गये और इसी समय में उसकी हत्या भी कर दी गयी। क्योंकि स्कूल से निकलने के समय और हत्या के समय में केवल एक घन्टे का अन्तराल है। इतने  कम समय में और वह भी आबादी से महज तीन सौ मीटर की दूरी पर हत्या और बलात्कार का होना ज्यादा संभव नही लगता। फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सूत्रों के मुताबिक बलात्कार की केवल संभावना जताई गयी है। निश्चित तौर पर पुष्टि नही की गयी है।
इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि जब 4 जुलाई को शाम 4 से 5 बजे के बीच हत्या हो गयी तो  फिर गर्मी के मौसम में लाश से दुर्गंन्ध क्यों नही फैली? लाश की गन्ध पर तो जंगली जानवर एकदम आकर्षित होते हैं लेकिन लाश को जंगली जानवरों की ओर से कोई नुकसान नही पहुंचा है। ऐसे में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आये मौत के समय और पुलिस के मुताबिक बच्ची के स्कूल से निकलने के समय में केवल एक घन्टे का बीच का समय है जिसमें हत्या और रेप दोनों को अंजाम दे दिया गया। क्या इतने समय में यह सब संभव हो सकता है या नही अब इसका जवाब सीबीआई से ही आना है।

कोटखाई प्रकरण में क्यों उठे पुलिस की जांच पर सन्देह

शिमला/शैल। शिमला के कोटखाई क्षेत्र के महासू स्कूल की दसवीं की एक नाबलिग छात्रा से गैंगरेप और फिर हत्या कर दिये जाने के मामले में शुरू हुई पुलिस जांच पर उठे सवालों ने न केवल प्रदेश को हिलाकर रख दिया बल्कि देशभर में कई स्थानों पर इस बलात्कार और हत्या को लेकर लोगों में रोष देखने को मिला है। प्रदेशभर में लोगों ने खुलकर सरकार और व्यवस्था के खिलाफ इस कदर अपना रोष प्रकट किया कि उग्र भीड़ ने कोटखाई पुलिस स्टेशन को आग लगा दी। लोग मालखाने तक पहुंच गये थाने का रिकार्ड और पुलिस गाड़ियां जला दी। तीन पुलिस कर्मी भी घायल हो गये। जनता का एक ही आक्रोश था कि पुलिस इस जघन्य अपराध में रसूखदार लोगों को बचा रही है और निर्दोषों को फंसा रही है। इस कांड का चरम यह हुआ कि पुलिस की कस्टडी में ही एक कथित अभियुक्त की मौत हो गयी और इसके लिये एक अन्य सह अभियुक्त को जिम्मेदार बता दिया गया। इस अभियुक्त की मौत के बाद आई मुख्यमन्त्री की प्रतिक्रिया में भी यह स्वीकारा गया कि मृतक निर्दोष था और वह सरकारी गवाह बनने जा रहा था। मुख्यमन्त्री की प्रतिक्रिया के बाद अब मृतक सूरज की पत्नी ने भी यह ब्यान दिया है कि उसका पति निर्दोष था और उसे लालच देकर फंसाया गया था। मृतक की पत्नी ने दावा किया है कि दो व्यक्ति उसके पति के पास इस उद्देश्य से आये थे और वह उनको पहचानती है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इस महिला का सीआरपीसी की धारा 164 के तहत ब्यान भी दर्ज करवा दिया है। पुलिस की जांच पर उठे रहे सन्देह के लिये एक बार फिर पूरे प्रकरण पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।
बलात्कार और फिर हत्या की शिकार हुई छात्रा जब चार जुलाई को स्कूल से देर शाम तक घर नहीं पहुंची तब घर वालों ने उसकी तलाश शुरू की और पांच तारीख रात नौ बजे के करीब उसके मामा को सूचना दी कि उनकी लड़की घर नहीं पहुंची है। इस सूचना पर लड़की के मामा और उसके भाई ने छः तारीख को पता करना शुरू किया। सुबह 7ः30 बजे हलाईला के जगंलो की तरफ निकले तो एक कुत्ता सड़क से नीचे की ओर भागा तब नीचे खाई पर उनकी नजर पड़ी जहां पर नग्नावस्था में मृतका का शव मिला। तुरन्त इसकी सूचना कोटखाई पुलिस को दी गयी। पुलिस ने मामला दर्ज करके दीप चन्द को जांच का जिम्मा सौंप दिया और निर्देश दिये कि घटना स्थल का बारिकी से निरीक्षण करके मौके पर पाये गये तमाम भौतिक साक्ष्यों को कब्जा में लेकर एसएफएसएल जुन्गा भेजा जाये।
इस तरह छः तारीख को शव मिला और छः को ही पुलिस थाना कोटखाई में मामला दर्ज हुआ और सात तारीख को इसका पोस्टमार्टम हुआ लेकिन एसएफएसएल जुन्गा को फाॅरेन्सिक जांच के लिये 11 तारीख को भेजा गया। जबकि तब तक यह मामला अखबारों में उछल चुका था और दस तारीख को ही इसका प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान ले लिया था। यहां पर पहला सवाल उठता है कि फाॅरेन्सिक जांच के लिये मामला भेजने में इतनी देरी क्यों की गयी? क्या इस दौरान बहुत सारे भौतिक साक्ष्योें के नष्ट हो जाने की संभावना नहीं थी? बारह तारीख को इस मामले में सरकार की ओर से एसआईटी गठित की गयी। एसआईटी गठित किये जाने तक पुलिस ने इस मामले मेें किसी की भी अधिकारिक गिरफ्तारी नही की थी और न ही पुलिस की ओर से ऐसा कोई दावा किया है। जबकि इससे पहले ही चार लोगों के फोटो मुख्यमन्त्री के अधिकारिक फेसबुक पेज पर अपलोड़ हो जाते हैं। यही नही यह फोटो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो जाते है। लेकिन जब पुलिस ने अधिकारिक तौर पर लोगों की गिरफ्तारी दिखायी और वाकयदा पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी तब उस जानकारी में इन चार लोगों में से कोई भी नही होता है।
फेसबुक पेज पर आ चुके फोटोज में से एक की भी गिरफ्तारी न होने से लोगों में शक का दूसरा सवाल आ गया। इसके बाद लोगों में रोष भड़का और जितने मुंह उतनी बातों वाली स्थिति बन गयी। जनता के रोष के बाद एक और व्यक्ति आशीष चौहान को पुलिस ने गिरफ्तार किया लेकिन गिरफ्तारी के बाद जब अदालत में पेश किया तो उसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। क्योंकि उसके खिलाफ पुलिस रिमांड के लिये कोई पुख्ता आधार नही था। ऐसे में यहां फिर सवाल उठता है कि जब एक ही मामलें में छः लोगों को पकड़ा जाता है और उनमें से पांच का तो पुलिस रिमांड हालिस कर लिया जाता है छटे का नहीं। जब आशीष चौहान के खिलाफ एक दिन के रिमांड लायक भी आधार नही था तो फिर उसे पकड़ा ही क्यों गया? या फिर जानबूझकर उसके खिलाफ मामला ही कमजोर तैयार किया गया यह एक गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी कड़ी में संदेह का एक सवाल यह उठता है कि पुलिस ने क्राईम स्पाॅट को चिन्हित करने में चार दिन क्यों लगा दिये और इस प्रकरण में प्रयुक्त हुई गाड़ी को तुरन्त अपने कब्जे में क्यों नहीं लिया।
इसी में अब एक अभियुक्त सूरज की पुलिस कस्टडी में हत्या हो जाना और भी कई नये सवाल खड़े कर जाता है। सूरज की हत्या का आरोप राजेन्द्र उर्फ राजू पर लगाया जा रहा है कि राजू और सूरज में किसी चीज को लेेकर झगड़ा होता है और झगड़े में राजू सूरज को मार देता है। यहां यह सवाल खड़ा होता है कि जब एक अपराध के लिये छः लोगों को पकड़ा गया है तो उनमें से किसका कितना दोष है यह सारे साक्ष्यों के निरीक्षण के बाद अदालत को तय करना है। इसमें बहुत संभव है कि राजू का दोष इतना न निकलता जिसके आधार पर उसे प्राण दण्ड या आजीवन कारावास की सजा मिल ही जाती। अब सूरज की पत्नी के पत्र और ब्यान के सामने आने के बाद तो ऐसी संभावना और प्रबल हो जाती है। लेकिन अब तो सूरज की हत्या का सीधा आरोप राजू पर आ रहा है और इससे उसका गुनाह दो गुणा हो जाता है। फिर राजू को पकड़े गये लोगों में से सबसे ज्यादा समझदार माना जा रहा है। ऐसे में वह अपने सिरे सीधे तौर पर एक और गुनाह क्यों लेना चाहेगा। फिर यदि राजू और सूरज में झगड़ा हुआ तो पुलिस के लोग क्या कर रहे थे? क्या सूरज की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी नही थी? पुलिस के तर्क पर यहां भी आसानी से विश्वास कर पाना संभव नही है।
इसी सब मे सन्देह का एक और आधार सामने आ जाता है। जिन चार लोगों के फोटो फेसबुक पर आ गये और वायरल हो गये और फिर फेसबुक से हटा लिये गये उन लोगों ने भी कोटखाई पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दी है। इन लोगों ने भी फोटो वायरल किये जाने के खिलाफ जांच करने और कारवाई करने की मांग की है। इनका कहना है कि इस प्रकरण में इनके फोटो वायरल होने से लोग इन्हे अपराधी मानने लगे है। इससे इन्हे भी अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है। इन चारों ने इक्कठे एक ही शिकायत थानेे में दी है। लेकिन इनकी शिकायत किस तारीख की है इसका कोई जिक्र शिकायत पत्र पर नही है। बल्कि पुलिस थाना में जो इनकी शिकायत को प्राप्त कर रहा है। उसने भी इस पर कोई तारीख नही डाली है। इनकी शिकायत पर अभी तक पुलिस की ओर से भी कोई कारवाई सामने नही आयी है। इससे भी पुलिस जांच पर ही सवाल उठते है। इस प्रकरण में निश्चित रूप से पुलिस को पूरी स्थिति का आकलन करने में भारी चुक हुई है। प्रशासन इसका अनुमान ही नही लगा सका है कि जनता में इनता रोष फैल जायेगा और जनता के दवाब के आगे यह मामला सीबाआई को सौंपना पड़ेगा।

                                       यह है पुलिस द्वारा दर्ज एफ आई आर


                                    जिनके फोटो वायरल हुए थे उनकी शिकायत


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