Saturday, 21 March 2026
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सवालों के घेरे में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, संकट से उबरना चुनौती

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, दशकों से प्रदेश की उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी विश्वविद्यालय से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित अनेक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स, आईपीएस अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं। आज भी हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रमुख परीक्षाओं में इस विश्वविद्यालय के छात्रा बड़ी संख्या में सफलता हासिल करते हैं, जो इसकी शैक्षणिक परंपरा और क्षमता को दर्शाता है।
2 जून 2025 को विश्वविद्यालय की कमान नए कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने संभाली। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि विश्वविद्यालय शैक्षणिक और प्रशासनिक दृष्टि से अपने सबसे निम्न स्तर पर पहुंच चुका है और इसे ‘पाताल लोक’ से बाहर निकालना अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद कुलपति ने पहला बड़ा निर्णय लेते हुए परिसर में पांच नए सेंटर खोलने की घोषणा की।
हालांकि इससे जुड़ा एक गंभीर प्रश्न भी सामने आता है। वर्ष 2023 की कैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि विश्वविद्यालय के कई विभागों में 30 से 79 प्रतिशत तक बुनियादी उपकरणों की कमी है। जिन विभागों का जिक्र कैग की रिपोर्ट में किया गया है, वे विश्वविद्यालय के लगभग 30-35 वर्ष पुराने विभाग हैं।
इसी विषय पर जब कैग की रिपोर्ट के संदर्भ में कैग द्वारा ही हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुल सचिव से यह प्रश्न किया गया कि यदि विश्वविद्यालय के विभागों में इतनी बड़ी संख्या में बेसिक इंस्ट्रूमेंट की कमी है, तो क्या इससे छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान से वंचित नहीं होना पड़ेगा?
इस पर उनका जवाब था कि विश्वविद्यालय के पास उपकरण और इक्विपमेंट खरीदने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जब पुराने और मूलभूत विभागों में आवश्यक तकनीकी सुविधाओं और उपकरणों का अभाव है, तो क्या विश्वविद्यालय को पहले इन विभागों को सशक्त बनाना चाहिए या नए विभाग और सेंटर खोलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
स्थिति का एक और उदाहरण फोरेंसिक साइंस विभाग है, जिसे वर्ष 2021 में शुरू किया गया था। वर्तमान में यह विभाग एक सस्ती राशन की दुकान के साथ संचालित हो रहा है। यह स्थिति न केवल बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करती है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। कई पुराने विभागों में छात्रों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था तक नहीं है और प्रयोगशालाओं में आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं।
इसी बीच विश्वविद्यालय के शिक्षक और गैर-शिक्षक समुदाय की समस्याएं भी लगातार सामने आती रही हैं। पिछले वर्ष कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलने के कारण महीने में लगभग 5 से 7 दिन तक हड़ताल की स्थिति बनी रही थी। वर्तमान में भी पदोन्नति, नियुक्तियों और अन्य प्रशासनिक मांगों से जुड़ी समस्याओं के कारण समय-समय पर आंदोलन और विरोध देखने को मिलते रहे हैं।
कुलपति ने ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही। यह भी दावा किया गया कि प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जाएंगे। हालांकि दूसरी ओर आईआईटी मंडी ने 2025 में बिना किसी प्रचार के डिजास्टर मैनेजमेंट विभाग के साथ मिलकर एआई आधारित लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया, जिसे मंडी सहित हिमाचल प्रदेश के कई संवेदनशील क्षेत्रों में स्थापित किया जा रहा है। लगभग 90 प्रतिशत सटीकता वाला यह सिस्टम आपदा प्रबंधन के क्षेत्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है और इसे ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल का एक सफल उदाहरण भी माना जा रहा है।
इसके अलावा विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पिछले नौ महीनों में छात्रों या छात्र संगठनों के बीच हिंसक घटनाओं में कोई विशेष कमी देखने को नहीं मिली है। हाल ही में विधि विभाग में एक छात्र द्वारा दूसरे छात्र को चाकू मारने की घटना ने भी विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
सार्वजनिक मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना कि विश्वविद्यालय ‘पाताल लोक’ में पहुंच चुका है या इसका शैक्षणिक स्तर अत्यंत निम्न हो चुका है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसी टिप्पणियों से न केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि उन हजारों पूर्व छात्रों का भी मनोबल प्रभावित होता है जिन्होंने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न क्षेत्रों चाहे वह राजनीति हो, प्रशासनिक सेवाएं हों, न्यायिक सेवाएं हों या शिक्षा का क्षेत्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हर वर्ष प्रशासनिक सेवाओं में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रहे हैं। न्यायिक सेवाओं में भी विश्वविद्यालय के छात्र लगातार आगे आ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के परिणामों में भी बड़ी संख्या में सफल अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को ‘निम्न स्तर’ या ‘पाताल लोक’ में पहुंचा हुआ बताना वास्तव में उचित है?
अब जबकि कुलपति को पदभार संभाले लगभग नौ महीने हो चुके हैं, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पिछले नौ महीनों में विश्वविद्यालय वास्तव में ‘पाताल लोक’ से बाहर निकल पाया है, या फिर यह केवल अखबारों और घोषणाओं तक ही सीमित रह गया है? प्रदेश की जनता, छात्रा और विश्वविद्यालय समुदाय अब इस बात का उत्तर ठोस कार्यों के रूप में देखना चाहते हैं।
 

तीन साल की बजट घोषणाएं जमीन पर उतारने में नाकाम रही सरकारःजयराम

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस सरकार अपने तीन साल के कार्यकाल में बजट में की गई कई अहम घोषणाओं को जमीन पर उतारने में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को चौथा बजट पेश करने से पहले पिछली तीनों बजट घोषणाओं का हिसाब प्रदेश की जनता को देना चाहिए।
जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद पहले बजट में कई बड़े वायदे किए थे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इनमें से अधिकांश योजनाएं कागजों से बाहर नहीं निकल पायी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी रैलियों की तरह ही विधानसभा में भी घोषणाएं कर रही है, जबकि बजट में की गई घोषणाओं को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी होती है।
उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले बजट में 20 हजार मेधावी छात्राओं को इलेक्ट्रिक स्कूटी खरीदने के लिए 25 हजार रुपये की सब्सिडी देने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक इस योजना का कोई उल्लेख तक नहीं किया जा रहा है। इसी तरह प्रदेश में छः ग्रीन कॉरिडोर बनाने की घोषणा भी अभी तक अमल में नहीं लायी गयी। इसके उलट सरकार ने इलेक्ट्रिक चार्जिंग पर छः रुपये प्रति यूनिट का एनवायरमेंट सैस लगा दिया है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हर विधानसभा क्षेत्र में आदर्श स्वास्थ्य संस्थान खोलने और चंबा, नाहन तथा हमीरपुर में पेट स्कैन सुविधा शुरू करने की घोषणाएं भी अब तक फाइलों में ही दबी हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों, बागवानों, खिलाड़ियों, महिलाओं और जनजातीय क्षेत्रों के लिए की गई कई छोटी-छोटी घोषणाएं भी लागू नहीं हो पायी हैं। युवाओं के लिए रोजगार और स्वावलंबन से जुड़ी योजनाएं भी कागजों तक सीमित रह गई हैं।
जयराम ठाकुर ने कहा कि सुक्खू सरकार ने तीन वर्षों में करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये का बजट प्रस्तुत किया है। इसके अलावा सरकार ने इस अवधि में 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज भी लिया है।
उन्होंने कहा कि इतने बड़े बजट और भारी कर्ज के बावजूद यदि बजट में घोषित योजनाएं तीन साल बाद भी शुरू नहीं हो पायी हैं, तो यह सरकार की नीति, नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि जब बजट में योजनाओं के लिए प्रावधान किया गया था तो उनकी शुरुआत क्यों नहीं हुई और उनके लिए आवंटित धन आखिर कहां खर्च हुआ।
इस बीच जयराम ठाकुर ने राज्य सतर्कता विभाग और एंटी करप्शन ब्यूरो को आरटीआई के दायरे से बाहर करने के फैसले पर भी कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे भ्रष्टाचार के मामलों में जवाबदेही कमजोर होगी। साथ ही प्रदेश में एंट्री टैक्स बढ़ाने के फैसले को भी उन्होंने जनविरोधी बताते हुए कहा कि इससे सीमावर्ती जिलों के लोगों और पर्यटन कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

रणधीर शर्मा ने एआई समिट प्रकरण में मुख्यमंत्री की भूमिका पर उठाये सवाल

शिमला/शैल। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी एवं विधायक रणधीर शर्मा ने एआई इम्पैक्ट समिट 2026 प्रकरण को लेकर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाये हैं। प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि 20 फरवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित ‘‘एआई इम्पैक्ट समिट’’ के दौरान युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्धनग्न प्रदर्शन राष्ट्र की छवि को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य था। उन्होंने कहा कि यह आयोजन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारत सरकार की मेजबानी में हुआ अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम था, जिसमें 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे, ऐसे में इस प्रकार की घटना से देश की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
रणधीर शर्मा ने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार स्वयं मुख्यमंत्री हैं। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने आरडीजी के मुद्दे को राजनीतिक उद्देश्य से आगे बढ़ाया और विधानसभा की परंपराओं की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि 16 मार्च 2026 से प्रारंभ हुए बजट सत्र में परंपरा के अनुसार राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाना चाहिए था, किंतु सरकार ने आरडीजी के मुद्दे पर सरकारी संकल्प लाकर तीन दिन तक चर्चा करवाई और 18 फरवरी को प्रस्ताव पारित होते ही सदन स्थगित कर दिया गया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या मुख्यमंत्री या उनके मंत्रियों ने आरडीजी बहाली की मांग को लेकर प्रधानमंत्री या केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की। उनका आरोप था कि दिल्ली प्रवास के दौरान इस विषय पर कोई ठोस पहल नहीं की गई।
भाजपा नेता ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों को हिमाचल सदन में ठहराया गया, जिसकी पुष्टि स्वयं मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से की है। उन्होंने दावा किया कि कमरों की बुकिंग मुख्यमंत्री कार्यालय से हुई, जिससे इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस द्वारा मामला दर्ज करने और आरोपियों को हिरासत में लेने के बाद उन्हें हिमाचल लाया गया तथा एक दूरस्थ क्षेत्र में ठहराया गया। शर्मा के अनुसार जब दिल्ली पुलिस न्यायालय से अनुमति लेकर आरोपियों को वापस ले जा रही थी, तब हिमाचल पुलिस द्वारा उन्हें रोका गया और संबंधित पुलिस अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जो राजनीतिक दबाव में की गई कारवाई प्रतीत होती है।
रणधीर शर्मा ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि किसी केंद्रीय एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस घटनाक्रम के पीछे कौन जिम्मेदार था और मुख्यमंत्री कार्यालय की वास्तविक भूमिका क्या रही। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हाईकमान द्वारा तीन वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा के बीच मुख्यमंत्री ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया। अंत में उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश शांतिप्रिय और देशभक्त राज्य है तथा किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधि को प्रदेश की जनता स्वीकार नहीं करेगी।

क्या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु सभी विभागों में 60 वर्ष नहीं है

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार में सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। लेकिन 2001 में एक अधिसूचना के तहत इसमें बदलाव करते हुये यह कह दिया गया कि जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 10 मई 2001 को या इसके बाद नियुक्त हुये हैं या नियमित हुये हैं उनकी सेवानिवृत्ति 58 वर्ष पूरा होने पर हो जायेगी। इस अधिसूचना को एक नारो देवी ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस चुनौती पर न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने इस अधिसूचना को भेदभाव पूर्ण करार देते हुए सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत किये जाने का फैसला दिया है। 2024 में आये इस फैसले पर सुक्खू सरकार ने भी इसी आश्य के आदेश जारी कर दिये। लेकिन सरकार के यह आदेश अभी तक सारे विभागों और कार्यालयों तक नही पहुंचे हैं। ऊना में जल शक्ति विभाग में तो इन आदेशों के अनुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति हो रही है। परन्तु इसी जिले के शिक्षा विभाग में आज तक इस आश्य के कोई आदेश नहीं पहुंचे हैं। शिक्षा विभाग में यह असमजस बनी हुई है कि वह अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को किस आयु सीमा में सेवानिवृत्त करें। जल शक्ति विभाग में 60 वर्ष की आयु पर एक बेलदार को सेवानिवृत्ति किये जाने का आदेश सामने आने के बाद सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह चर्चा चल रही है कि एक ही सरकार के दो विभागों में अलग-अलग सेवानिवृत्ति नियम कैसे हो सकते हैं। 2024 में आये उच्च न्यायालय के फैसले की शिक्षा विभाग को जानकारी न होने से सरकार की कार्यप्रणाली सवालों में आ गयी है।

क्या प्रदेश वित्तीय आपात की ओर बढ़ रहा है? या राष्ट्रपति शासन लगेगा?

शिमला/शैल। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने पर प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है की कहीं हिमाचल वित्तीय आपात या राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं बढ़ रहा है। यह अनुदान बन्द होने पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया वित्त सचिव की इस मुद्दे पर आयी प्रस्तुति से सामने आयी। इस प्रस्तुति से प्रदेश भर में चिन्ता और चिन्तन का माहौल खड़ा हो गया। इस माहौल को देखते हुये सरकार ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति सिर्फ एक आकलन है कोई फैसला नहीं। इसके बाद सरकार ने इस पर चर्चा करने के लिये विधानसभा का एक दिन के लिये विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई जिसकी राज्यपाल ने यह कहकर अनुमति नहीं दी कि जब अभी बजट सत्र  रहा है तो एक दिन के विशेष सत्र की क्या आवश्यकता है। इसके बाद सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई इस बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने वॉकआउट कर दिया। इसके बाद विधानसभा का बजट सत्र आ गया इस सत्र में सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण में राजस्व घाटा अनुदान पर वित्त आयोग पर विशेष फोकस कर लिया। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने इस अभिभाषण के पैरा तीन से सोलह तक को यह कह कर पढ़ने से मना कर दिया कि इसमें संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं इसलिये वह इसे नहीं पढ़ेंगे। इस तरह राज्यपाल का अभिभाषण दो मिनट एक सेकंड में ही पूरा हो गया। इस तरह वित्त सचिव की प्रस्तुति से लेकर राज्यपाल के अभिभाषण तक जो घटा है और उसका आगे क्या प्रभाव हो सकता है इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि सरकार ने इस पर लम्बी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति खराब है यह चेतावनी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही दे दी थी। इस स्थिति का दोष पूर्व सरकार के कुप्रबंधन पर डालकर उसके अंतिम छः माह में लिये गये फैसलों को बदल दिया। खराब वित्तीय स्थिति के चलते सरकार कर्ज पर आश्रित होती चली गयी। जब इस सरकार ने पदभार संभाला था तब प्रदेश का कुल कर्जभार 74000 करोड़ था जो आज बढ़कर एक लाख करोड़ से उपर पहुंच गया है और अभी एरियर और महंगाई भत्ते की ही करीब चौदह हजार करोड़ की देनदारियां खड़ी हैं। विभिन्न विभागों की देनदारियां अलग से हैं। सरकार तीन वर्षों से लगातार पूर्व सरकार और केन्द्र पर दोषारोपण करती आ रही है। लेकिन आज तक पूर्व सरकार के एक भी भ्रष्टाचार के मामले को सामने लाकर उस पर कारवाई नहीं कर पायी है। संसाधन जुटाने और प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर सरकार तीन वर्षों में मुख्यमंत्री के अनुसार 26000 करोड़ से अधिक का राजस्व प्रदेश से इकट्ठा कर चुकी है। लेकिन इस सब के बावजूद सरकार स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों से भागती रही है। आने वाले पंचायत चुनाव सरकार के सारे दावों का खुलासा सामने रख देंगे। आज फील्ड में न तो सरकार के काम दिख रहे हैं और न ही कार्यकर्ता। यह स्थिति हो गयी है।
इस वस्तु स्थिति में जब राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का सच सामने आया है तो सरकार के हाथ पैर फूलने पर चर्चा आवश्यक हो जाती है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द होगा यह पिछले वित्त आयोग की रिपोर्ट में ही स्पष्ट अंकित था। यह अनुदान 31 मार्च 2026 तक ही रहेगा यह स्पष्ट था। फिर 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी 2025 में आ गयी थी तब सरकार इस पर सचेत क्यों नहीं हुई? जो अधिकारी वित्त आयोग के पास प्रदेश का पक्ष रखते रहे हैं क्या सरकार उनको जनता के साथ सांझा करेगी? राजस्व घाटा अनुदान कोई शाश्वत अधिकार नहीं है जिसे अदालत के माध्यम से बहाल करवाया जा सके। यह वित्त आयोग की सिफारिश पर किया गया एक प्रावधान है। इसलिये यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अनुदान किसी भी सूरत में बहाल नहीं होगा। इस मुद्दे पर यदि विपक्ष भी सरकार के साथ मिलकर दिल्ली में गुहार लगाने चला तो फिर भी इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। बल्कि इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े होंगे उसके संकेत जयराम ठाकुर के उस बयान से सामने आ गये हैं जिसमें वह सरकार से उस कांग्रेस नेता के बारे में पूछ रहे हैं जिसे उसके खिलाफ चल रही जांच को बन्द न करने पर पार्टी पद छोड़ने की धमकी दी है। ऐसे बहुत सारे सवाल आने वाले दिनों में और भी सामने आयेंगे। ऐसे परिदृश्य में यदि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न हो पाया तो सरकार कैसे चलेगी। पिछली देनदारियां कैसे पूरी होगी? अभी राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर सरकार के खुलासे को अपने शब्द नहीं दिये हैं। इस पर भाजपा की प्रतिक्रिया क्या रहती है और सरकार का आचरण क्या रहता है यह सब आने वाले दिनों में सामने आयेगा? क्योंकि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न होने पर सरकार के खर्चे कैसे चलेंगे यह सवाल अपनी जगह खड़ा रह जाता है। क्योंकि वित्त सचिव ने जो कुछ अपनी प्रस्तुति में कहा है वह कोई राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि एकदम कड़वा सच है। वित्त सचिव के खुलासे पर अमल करने के लिये प्रदेश में वित्तीय आपात लागू करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि वित्तीय आपात की स्थिति में भी वित्तीय लाभों पर कैंची चलाई जा सकती है। राष्ट्रपति शासन में सारी राजनीतिक नियुक्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में यदि सही में प्रदेश के वित्तीय हालत खराब हैं तो देर-सवेर प्रदेश को इन विकल्पों पर लाना ही होगा।

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