Wednesday, 04 February 2026
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क्या पर्यवेक्षक संगठन के नाम पर सरकार की रिपोर्ट तैयार करेंगे?

  • सरकार बनने के बाद व्यवहारिक तौर पर संगठन सरकार की ही परफॉरमैनस जनता के सामने रखता है

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस की पिछले दिनों प्रदेश, जिला और ब्लॉक स्तर की सारी इकाइयां भंग कर दी गई थी। अब इसकी जगह नई इकाइयां गठित होनी है। प्रदेश अध्यक्षा अभी इस पुनर्गठन की दिशा में बढ़ने ही लगी थी कि हिमाचल प्रभारी राजीव शुक्ला ने इस पुनर्गठन के लिए कुछ पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिये। संयोगवश यह सब पर्यवेक्षक हिमाचल से बाहर के हैं। यह लोग अपने-अपने क्षेत्र का दौरा करने वहां लोगों से फीडबैक लेने में कितना समय लगाते हैं और कब अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं इस सब को ध्यान में रखते हुये यह तय है कि इस पुनर्गठन में समय लगेगा। संगठन के पुनर्गठन के लिये इस तरह से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति पहली बार हिमाचल में देखने को मिल रही है। लेकिन इस कदम के साथ ही कांग्रेस के अन्दर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं। कुछ हलकों में इस कदम को प्रदेश अध्यक्षा पर अंकुश लगाने का प्रयास माना जा रहा है। इसी के साथ कुछ हलकों में इसे मंत्रिमण्डल में फेर बदल के संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है। यह तय है कि इन पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट का परिणाम बहुत दूरगामी होगा। इसलिये इस पूरी प्रक्रिया का निष्पक्ष आकलन करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि कांग्रेस सत्ता में है।
प्रदेश संगठन की इकाई प्रदेश अध्यक्षता की सिफारिश पर भंग की गयी है। स्मरणीय है कि प्रदेश अध्यक्षा काफी समय से निष्क्रिय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारी को हटाने की बात करती रही है। यह भी शिकायतें रही हैं कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को सरकार में उचित मान सम्मान नहीं दिया जा रहा है। हाईकमान तक यह शिकायतें पहुंची और एक समन्वय समिति गठित की गयी जो व्यवहार में प्रभावी नहीं हो पायी। विपक्ष लगातार सरकार को गारंटीयों के मुद्दे पर घेरता रहा है। इसी सब का परिणाम हुआ कि प्रदेश के चारों लोकसभा सीटें कांग्रेस हार गयी। राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के छः विधायक पार्टी छोड़कर चले गये। प्रदेश का सह प्रभारी तक पार्टी छोड़ गया था। लेकिन हाईकमान इस सब को समझ नहीं पायी। परन्तु अब जिस तरह से सरकार के कुछ फैसले विवादित हुये और स्पष्टीकरण जारी करने की नौबत आयी। प्रधानमंत्री ने हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह हिमाचल को चुनावी मुद्दा बनाया। समोसा जांच राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय समाचार बन गया। पहली बार इस तरह की विवादित छवि प्रदेश की देश भर में प्रचारित हुई।
यह एक स्थापित सच है की सरकार बनने के बाद उसकी कार्य प्रणाली और परफॉरमैन्स से ही पार्टी और सरकार का आदमी आकलन करता है। कांग्रेस चुनाव में दस गारंटीयां देकर सत्ता में आयी थी। यह गारंटीयां देते हुये इन पर कोई ‘‘किन्तु परन्तु’’ नहीं लगाये गये थे। इन गारंटीयों की व्यवहारिक स्थिति क्या है उसको आम आदमी नेताओं के भाषणों से हटकर जानता है। प्रदेश से बाहर नेता क्या बोल रहे हैं और प्रदेश के अन्दर की स्थिति क्या है उसे प्रदेश का आम आदमी बेहतर जानता है। प्रदेश के संगठन और सरकार में कैसे रिश्ते हैं इसकी जानकारी प्रदेश के लोगों को ज्यादा पता है। अभी सरकार दो वर्ष पूरे करने के अवसर पर आयोजन करने जा रही है। मुख्यमंत्री इस आयोजन का निमंत्रण केंद्रीय नेताओं को दे रहे हैं। लेकिन उन्ही का एक सहयोगी मंत्री यह कहे कि उसे ऐसे प्रस्तावित आयोजन की जानकारी मीडिया से मिल रही है तो फिर सरकार के बारे में ज्यादा कुछ बोलने को नहीं रह जाता है।
अभी जब पर्यवेक्षक संगठन के बारे में फीडबैक लेने के लिये जनता में जाएंगे तब उन्हें सरकार की परफॉरमैन्स की व्यवहारिक जानकारी मिलेगी। यह देखने को मिलेगा की कितनी महिलाओं को पन्द्रह सौ रूपये मिल रहे हैं। कितने युवाओं को व्यवहारिक तौर पर सरकार रोजगार दे पायी है। महंगाई को कितना कम कर पायी है। यह सामने आयेगा कि सरकार ने खर्च कम करने के लिये क्या-क्या किया है। जिन फैसलों के सरकार को स्पष्टीकरण जारी करने पड़े हैं उनका असली सच क्या है। प्रदेश से बाहर के पर्यवेक्षक लगाकर हाईकमान ने संगठन के नाम पर सरकार के बारे में सही जानकारी जुटाने के लिए पर्यवेक्षकों को फीडबैक लेने के लिए भेजा है। क्योंकि कोई भी संगठन केवल सरकार की परफॉरमैन्स का ही सबसे बड़ा सूत्रा होता है। ऐसे में हाईकमान ने संगठन के नाम पर सरकार की असली जानकारी जुटाने के लिये प्रदेश से बाहर के पर्यवेक्षक भेजे हैं। इसकी रिपोर्ट के बाद हाईकमान प्रदेश सरकार के बारे में ठीक व्यवहारिक और सटीक जानकारी जुटा पायेगी।

नादौन के ई डी प्रकरण में मोड आने की संभावना बढ़ी

  • बसन्त सिंह बनाम सुक्खू मामले की फाइल छापेमारी में ई डी के हाथ लगी
  • बसन्त सिंह को बतौर गवाह ई डी ने तलब किया

शिमला/शैल। ईडी ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के विधानसभा क्षेत्र से खनन व्यवसाय से जुड़े दो कारोबारियों ज्ञानचन्द और संजय धीमान को गिरफ्तार कर लिया है। पांच माह पहले ई डी और आयकर विभाग ने हमीरपुर और नादौन में छापेमारी की थी। दो माह में तीन बार ई डी ने यहां दस्तक दी थी। नादौन में चार लोगों ज्ञानचन्द, प्रभात चन्द, संजय धीमान और संजय शर्मा के यहां छापेमारी हुई थी। इस छापेमारी में ई डी को क्या कुछ मिला था इसकी कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं हुई थी। लेकिन इस छापेमारी और फिर इस गिरफ्तारी के बीच 14-9-24 को एक बसन्त सिंह ठाकुर को ई डी ने बतौर गवाह दिल्ली तलब कर लिया था। बसन्त सिंह ठाकुर ने सुक्खू के 2017 के चुनाव शपथ पत्र को चुनौती दी थी। बसन्त सिंह ने आरोप लगाया था कि इस शपथ पत्र में संपत्ति को लेकर कुछ जानकारीयों को छुपा लिया गया है। उच्च न्यायालय ने इस आरोप को गंभीरता से लिया और कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजय करोल ने इसकी जांच के आदेश देते हुये संबद्ध अधिकारियों को इसमें त्वरित कारवाई करने के निर्देश दिये। इन निर्देशों के बाद यह मामला जांच के लिये हमीरपुर पुलिस के पास पहुंच गया और नादौन की अदालत में केस चला। नादौन की अदालत में सुक्खू को इस आधार पर राहत दे दी कि इसमें किसी को भी न व्यक्तिगत लाभ हुआ है और न ही हानि। बसन्त सिंह इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में आ गये। उच्च न्यायालय की जस्टिस कैंथला की एकल पीठ ने जून में इस पर फैसला देते हुये नादौन की अदालत के फैसले को यथास्थिति बनाये रखते हुये यह भी कह दिया कि इस फैसले से केस की मेरिट प्रभावित नहीं होगी।

इस बसन्त सिंह-सुक्खू मामले की फाइल ज्ञानचन्द के यहां छापेमारी के दौरान ई डी के हाथ लग गयी। जबकि ज्ञानचन्द का इस मामले के साथ कोई संबंध ही नहीं है। ई डी ने इस केस की फाइल को देखने के बाद इसके सत्यापन के लिये बसन्त सिंह को दिल्ली तलब कर लिया। इस फाइल में संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेज होने कहे जा रहे हैं। बसन्त सिंह 14-9-24 को ई डी में पेश हो आये हैं। शायद ई डी बसन्त सिंह को गवाही के लिए फिर तलब करें। बसन्त सिंह ने सुक्खू के चुनाव शपथ पत्र में जमीन संबंधी कुछ जानकारियां छुपाने का आरोप लगा रखा है। हमीरपुर के ए एस पी ने अपनी जांच रिपोर्ट में बसन्त सिंह के आरोप को प्रमाणित कर दिया है। जिस स्टोन क्रशर की ई डी ने अधवाणी में जांच और छापेमारी की है वह पहले बसन्त सिंह के गांव जरोट में ही स्थापित था। बसन्त सिंह की शिकायत पर ही जरोट से इस क्रशर को शिफ्ट करने के अदालत ने आदेश दिये थे और तब जरोट से यह अधवाणी शिफ्ट हुआ था। माना जा रहा है कि जो केस फाइल ई डी के हाथ लगी है उसमें शायद स्टोन क्रशर से जुड़ी जानकारियां भी हैं। यह केस फाइल ई डी के हाथ लगने से इस मामले में कई मोड़ आने की संभावनाएं बन गयी हैं क्योंकि यह स्टोन क्रशर भी उस जमीन पर स्थित था जो शायद सरकार के नाम सिलिंग के समय जा चुकी है और इस पर बर्तनदारों के हक सुरक्षित थे क्योंकि यहीं पर कुछ गांवों का शमशान भी है।

यह है बसन्त सिंह के नाम ई डी के सम्मन

 

 

 

 

उच्च न्यायालय के फैसले से मुख्यमंत्री के दावों पर लगे प्रश्न चिन्ह

  • कैबिनेट रैंक बांटना पड़ सकता है भारी

शिमला/शैल। प्रधानमंत्री द्वारा हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स को महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव में भी मुद्दा बनाया गया तब मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसका जवाब देते हुए आरोप लगाया है कि भाजपा प्रदेश को बदनाम कर रही है तथा प्रधानमंत्री को भी गलत सूचनाएं दी जा रही हैं। मुख्यमंत्री अपनी सरकार की स्थिति स्पष्ट करने महाराष्ट्र भी गये लेकिन इन्हीं चुनाव के मतदान से पहले एक मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा हिमाचल भवन दिल्ली को अटैच करने के आदेश जारी हो गये। उच्च न्यायालय के यह आदेश एकदम पूरे देश में चर्चा का विषय बन गये। प्रदेश की वित्तीय स्थिति ठीक होने और पांच चुनावी गारंटीयां लागू कर देने के दावों पर भी स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग गये। यहां पर यह प्रश्न उठता है कि जब प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह पैसा जमा करवाने के निर्देश बहुत पहले दे रखे थे तो उनकी अनुपालना क्यों नहीं हुई। जबकि ऐसे मामलों में अपील दायर करने के लिये भी यह शर्त रहती है कि संदर्भित पैसा अदालत की रजिस्ट्री में पहले जमा करवाना पड़ता है। अदालत के फैसले की अनुपालना न करने के लिये कौन अधिकारी जिम्मेदार है। उन्हें चिन्हित करने के निर्देश देते हुये इस रकम का ब्याज इस बीच के समय का उनसे वसूलने के आदेश भी अदालत ने दे रखे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार ऐसे अधिकारियों को चिन्हित करके उनके खिलाफ कारवाई करती है या नहीं। इस सरकार के कार्यकाल में आर्विटेशन के जो मामले हुये हैं उनमें शायद पन्द्रह सौ करोड़ की देनदारी सरकार पर आ खड़ी हुई है। सभी मामलों में अधिकारियों के स्तर पर गड़बड़ होने की आशंकाएं सामने आयी हैं। लेकिन किसी के भी खिलाफ जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं हुई है। बल्कि सर्वाेच्च न्यायालय से लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय तक कई मामलों में सरकार को भारी जुर्माने तक लगे हैं। लेकिन इन मामलों का सरकार के स्तर पर कोई गंभीर संज्ञान नहीं लिया गया। इसी दौरान सीपीएस मामले में फैसला आया है। उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को अवैध और असंवैधानिक ठहराते हुये इस आश्य के अधिनियम को भी अवैध करार दे दिया है। 1971 के जिस अधिनियम के तहत इन लोगों को संरक्षण हासिल था उसे भी रद्द कर दिया है। इस मामले में एक दर्जन भाजपा विधायकों की याचिका उच्च न्यायालय में थी। अब इस याचिका के बहाल होने के बाद सीपीएस की विधायकी भी खतरे में आ गयी है। जब याचिकाकर्ता विधायकों की ओर से यह फैसला राज्यपाल के संज्ञान में ला दिया जायेगा तब राजभवन संविधान की धारा 191 और 192 के प्रावधानों के तहत कारवाई करने के लिये बाध्य हो जायेगा। संभावना है कि यह कारवाई सर्वाेच्च न्यायालय में यह मामला सुनवाई के लिए आने तक पूरी हो जायेगी। भाजपा सीपीएस नियुक्तियों को शुरू से ही गैर जरूरी करार देती आयी है। क्योंकि एक ओर तो सरकार वित्तीय संकट के कारण अपने वेतन भत्ते निलंबित करने के लिये बाध्य हो गयी और दूसरी ओर सीपीएस पर करोड़ों खर्च कर रही है। ऐसे में उच्च न्यायालय का फैसला सीपीएस के खिलाफ आने से भाजपा का एक और आरोप प्रमाणित हो गया है। यह फैसला भी महाराष्ट्र और झारखण्ड के मतदान से पहले आया है। इससे भी अनचाहे ही प्रदेश सरकार की परफारमैन्स इन चुनावों में भी चर्चा का विषय बन गयी है। इस फैसले को लेकर भाजपा ने उन तीन कांग्रेस विधायकों को भी लाभ के पद के दायरे में परिभाषित करना शुरू कर दिया है जिन्हें सरकार ने कैबिनेट रैंक दे रखे हैं। बल्कि कैबिनेट रैंक प्राप्त और विधायक भी कल को चर्चा का विषय बन जाएंगे। क्योंकि कैबिनेट रैंक से ही यह लोग मंत्री के बराबर सुविधाओं के पात्र बन जाते हैं।

क्या कर्मचारियों की संख्या कम करके प्रदेश आत्मनिर्भर हो जायेगा ?

  •  क्या बिजली बोर्ड को प्राइवेट सैक्टर को देने पर विचार हो रहा है ?
  • क्या राजस्व आय और व्यय बराबर करने के लिये आम आदमी पर करों का बोझ डालना आवश्यक है?
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने जब प्रदेश की बागडोर दिसम्बर 2022 में संभाली थी तब प्रदेश की जनता को यह चेतावनी दी थी कि प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं । इसी चेतावनी के साये में पिछली सरकार द्वारा अंतिम छः माह में लिये फैसले पलटते हुये सैकड़ो नए खोले संस्थान बंद कर दिये। पैट्रोल, डीजल पर वैट बढ़ाया । शहरी क्षेत्रों में पानी के रेट बढ़ाये जो अब गांव तक जा पहुचे हैं। जो 125 यूनिट बिजली मुफ्त दी जा रही थी वह सुविधा बंद कर दी गयी । कुल मिलाकर आम आदमी की जेब से जिस भी नाम से जो भी निकाला जा सकता था वह प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से निकाल दिया गया। यहां तक के टॉयलेट टैक्स और बसों में यात्रा करते समय साथ ले जा रहे सामान पर भी यदि वह 5 किलो से अधिक है तो उस पर भी किराया लगा दिया गया। जब इस पर शोर उठा तो इसमें संशोधन कर दिये गये। अब बिजली बोर्ड से 51 अभियंताओं के पद समाप्त करने के साथ ही 81 ड्राइवरो को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। बिजली बोर्ड को प्राइवेट सेक्टर के हवाले करके उसमें कर्मचारियों की संख्या आधी करने की चर्चा है। सुक्खू सरकार ने 2026 तक प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने का और 2030 तक देश का सबसे अमीर राज्य बनाने का लक्ष्य घोषित कर रखा है। कोई भी प्रदेश तब आत्मनिर्भर बनता है जब उसका राजस्व व्यय और राजस्व आय बराबर हो जाए। इस समय यदि राजस्व आय और व्यय के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2020-21 में आय व्यय में 1.19%, 2021-22 में 3.95%, 2022-23 में 4.98%, 2023-24 में 6.14% और 2024-25 में 7.44% घाटा रहने का अनुमान है। राजकोषीय घाटा इसी अवधि में 4.12%, 4.52%, 4.57%, 4.82% और 2024-25 में 4.98% रहने की संभावना है। घाटे के इन आंकड़ों को पार कर प्रदेश को बराबरी पर लाना एक बड़ी चुनौती है। राजस्व व्यय में सबसे ज्यादा खर्च वेतन पर 25.13 प्रतिशत और पैंशन पर 17.04 प्रतिशत होता है। इसके बाद ब्याज पर 10.70 प्रतिशत और ऋण अदायगी पर 9.42 प्रतिशत खर्च हो रहा है। इन खर्चों को कम करने के लिए सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम करना सबसे पहले एजेंडा है। इसी एजेंडे के तहत बिजली बोर्ड अभियंताओं के पद समाप्त किए गए हैं। स्वभाविक है कि जब यह पद समाप्त हो जाएंगे तो इसका असर नीचे कर्मचारी तक पड़ेगा। इसी योजना के तहत बिजली बोर्ड और कुछ अन्य नियमों बोर्डों को प्राइवेट सैक्टर को देने की योजना है। सरकार में नियमित भर्ती बहुत अरसे से लगभग बंद है। अब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा ली गई परीक्षाओं के परिणाम घोषित करने के आदेश पारित किए गए हैं। जब दो वर्ष पहले इस बोर्ड को भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत भंग किया गया था तब इसमें कई लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए थे। कई गिरफ्तारियां हुई थी। परंतु अभी तक अदालत से शायद एक भी मामले का फैसला नहीं आया है। किसी को भी सजा घोषित नहीं हुई है। ऐसे में क्या इन परीक्षाओं के परिणाम पहले नहीं घोषित किये जा सकते थे। क्या इन परिणामों में हुई देरी भी खर्च कम करने का ही एक प्रयोग था। आज केंद्र में कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष तक राहुल गांधी के पदयात्रा और सार्वजनिक उपक्रमों को प्राइवेट सैक्टर को देने के खिलाफ उभरे रोष के परिणाम स्वरुप पहुंची है। राहुल लगातार प्राइवेट सैक्टर की लूट के खिलाफ मुखर रहे हैं। प्रैस की स्वतंत्रता के पक्षधर है। लेकिन उनकी ही पार्टी की सरकार हिमाचल में बिजली बोर्ड जैसी उपक्रमों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की योजना पर काम कर रही है। बिजली की खरीद बेच का काम बोर्ड से ले लिया गया है। एक समय हिमाचल को इसी बोर्ड के सहारे प्रदेश को बिजली राज्य घोषित करके उद्योगों को आमंत्रित किया जाता था। आज इसी बिजली बोर्ड की बढ़ी हुई दरों के कारण उद्योग पलायन करने के कगार पर आ पहुंचे हैं। ऐसे में यह बड़ा सवाल बनता जा रहा है कि क्या कर्मचारीयों की संख्या कम करके और आम आदमी पर करों का बोझ लादकर 2026 में प्रदेश आत्मनिर्भर हो जायेगा ।

आईजीएमसी के नॉन फंक्शनल ट्रामा सेंटर से ढाई करोड़ की चपतःजयराम ठाकुर

शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार में एक और घोटाला सामने आया है। यह घोटाला ट्रामा सेंटर में मैन पॉवर उपलब्ध करवाने के नाम पर हुआ। डेढ़ साल से बंद पड़ा आईजीएमसी का नव निर्मित ट्रामा सेंटर सिर्फ कागजों में चल रहा था और वहां पर अलग-अलग समय में सपोर्टिव और पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति ठेकेदार के माध्यम से कर दी गई थी। अपने चहेतों को लाभ दिलवाने के लिए सभी कायदे कानून ताक पर रख दिये गये। एक बन्द पड़े ट्रामा सेंटर में सैकड़ों कर्मचारी की नियुक्ति की गई और बिना एक भी मरीज का इलाज किये ट्रामा सेंटर के मैन पॉवर के नाम पर दो करोड़ तीस लाख का बिल सरकार पर लाद दिया गया। गौरतलब है कि मैन पॉवर के लिए आने वाले खर्च को केन्द्र सरकार द्वारा उठाया जा रहा है। यह केन्द्र द्वारा जनहित के लिए भेजे गये पैसों की खुलेआम लूट है। फाइनेंस प्रूडेंश और फाइनेंस डिसिप्लिन के नाम पर कर्मचारियों का वेतन और पेंशनधारकों की पेंशन रोकने वाले मुख्यमंत्री की नाक के नीचे इस तरह से जनहित के काम में आने वाले पैसों को अपने चहेतों में बांटा जा रहा है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि हर दिन सुक्खू सरकार के कारनामें बाहर आ रहे हैं। नया मामला लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ के साथ साथ केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये पैसे की बंदरबांट का है। केंद्र सरकार के सहयोग से बने आईजीएमसी के ट्रामा सेंटर का उद्घाटन मुख्यमंत्री ने फीता काटने और पटिका लगवाने के शौक में मुख्यमंत्री ने पिछले साल 09 मार्च को कर दिया और उसी के साथ ही मैन पॉवर की भर्ती के लिये अपने चहेते ठेकेदारों को ऑर्डर भी दे दिया। अपेक्षित मैनपॉवर को ठेकेदारों ने ट्रामा सेंटर में नियुक्ति भी दे दी लेकिन सरकार ट्रामा सेंटर को फंक्शनल करना भूल गई। बिना इलाज किये हर महीनें ठेकेदार का बिल बनता रहा। धीरे-धीरे बढ़कर यह राशि 2 करोड़ 30 लाख हो गई। जिससे भुगतान के लिए अब ठेकेदारों ने जोर लगाना शुरू कर दिया। पिछले दिनों ट्रामा सेंटर को फंक्शनल करने आये मुख्यमंत्री से भी ट्रामा सेंटर में तैनात कर्मचारियों ने मुलाकात की और वेतन न मिलने की शिकायत की। इसको लेकर कई बार प्रदर्शन भी किया जा चुका है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अस्पताल प्रशासन ने विभिन्न समय पर ट्रामा सेंटर के लिए अलग-अलग पदों पर जिसमें सपोर्टिव स्टाफ और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल है के लिए भर्तियां निकाली और आउट सोर्स के माध्यम से उन्हें भरा गया। सूचना के अधिकार के तहत हासिल किये गये डॉक्यूमेंट के आधार पर पता चलता है कि रेडियो ग्राफर, फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय ट्रॉली मैन सफाई कर्मचारी के कुल 126 पदों पर अलग-अलग समय में नियुक्तियां हुई। हैरानी की बात है कि जो ट्रॉमा सेंटर अब फंक्शनल हुआ है उसके लिए कई महीनों या साल भर पहले से ही कर्मचारियों की नियुक्ति का क्या औचित्य है।
इसके साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ट्रॉमा सेंटर को फंक्शनल करने में 19 महीने का वक्त क्यों लगाया? क्या बने बनाये प्रोजेक्ट का बार-बार फीता काटना ही व्यवस्था परिवर्तन है। जहां केन्द्र सरकार के कामों का फीता काटा जाये और केंद्र सरकार को कोसा जाये। क्योंकि जो पैसा घोटाले के माध्यम से उड़ाया जा रहा है वह भी केंद्र सरकार से आया है और जिस पैसे से ट्रामा सेंटर और कैंसर टर्शरी सेंटर बन रहा है वह भी केंद्र सरकार का है। सरकार बस फीता कटर बनकर फीता काटे जा रही है।

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