शिमला/शैल। राजधानी स्थित इन्दिरा गांधी मैडिकल कॉलिज में तीन साल पहले 45 करोड़ के निवेश से कन्द्रे ने टर्शरी कैंसर सैन्टर खोले जाने को स्वीकृति दी थी। इसके लिये 15 करोड़ की पहली किश्त भी जारी कर दी गयी थी जो आज तक बिना खर्च किये पड़ी हुई है। यह सैन्टर तीन साल में बनकर तैयार होना था। यदि ऐसा नही हो पाता है तो यह स्वीकृति 31 मार्च 2019 को समाप्त हो जायेगी और यह 45 करोड़ लैप्स हो जायेगा। अभी 2018 का दिसम्बर चल रहा है और इस सैन्टर के नाम पर अब तक एक ईंट भी नहीं लग पायी है जब यह सैंटर स्वीकार हुआ था तब शिमला में एनजीटी की ओर से निर्माणों पर कोई प्रतिबन्ध नही था। लेकिन एनजीटी के फैसले के अनुसार ऐसे सरकारी निर्माणों को इस प्रतिबन्ध से बाहर रखा गया है जो आवश्यक और आपात सेवाओं के दायरे में आते हैं। इस तरह इस सैन्टर के निर्माण में एनजीटी के फैसले में कोई बाधा नही हैं केवल इस फैसले के तहत निर्माणों की स्वीकृति देने के लिये बनाई कमेटीयों के पास इसका प्रारूप जाना है। दुर्भाग्य है कि प्रदेश की अफसरशाही अभी तक इसके प्रारूप को इन कमेटीयों तक नही ले जा पायी है। दुर्भाग्य तो यह है कि प्रदेश की जयराम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार को 45 करोड़ से इंदिरा गांधी मेडिकल कालेज में बनने वाले टर्शरी कैंसर सेंटर का स्टेटस ही नहीं पता है। जयराम सरकार को सत्ता में आए हुए एक साल हो गया लेकिन न तो मुख्यमंत्री व न ही मंत्री की अपने विभागों पर पकड़ बनी है।
राजधानी में प्रेस क्लब शिमला की ओर से आयोजित मीट द मीडिया कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री परमार से पूछा गया कि आइजीएमसी टर्शरी कैंसर सेंटर का निर्माण जयराम सरकार एक साल के कार्यकाल में क्यों शुरू नहीं कर पाई। परमार ने कहा कि इस मामले को मंजूरी के लिए एनजीटी को भेज दिया है। उन्होंने कहा कि यह सेंटर कोर एरिया में बन रहा है ऐसे में एनजीटी की इजाज़त लेनी जरूरी है। यह पूछने पर कि एनजीटी में सरकार की ओर से दायर अर्जी सुनवाई के लिए कब लगी है उन्होंने कहा कि सुपरवाइजरी कमेटी ने छः नवंबर को इस सेंटर को हरी झंडी दे दी है।
मंत्री परमार को इस टर्शरी कैंसर सेंटर के बारे में कुछ भी पता नहीं है। यहां तक जब मंत्रा ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक की थी तो भी यह सेंटर एजेंडे में नहीं था।
जबकि सही तस्वीर यह है कि बड़ी जददोजहद के बाद इस मसले पर एनजीटी के फैसले के बाद मार्च में गठित इंप्लीमेंटेशन कमेटी की 2 नवंबर को हुई बैठक में इस मसले पर मौखिक चर्चा हुई थी। चूंकि मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और मंत्री से लेकर अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य के एजेंडे में यह महत्वपूर्ण सेंटर पिछले एक साल से है ही नहीं। ऐसे में दो नवंबर की बैठक में इस मसले को ले जाने के लिए औपचारिकताएं ही पूरी नहीं की जा सकी थी। इसके बाद तीन महीने में एक बार होने वाली सुपरवाइजरी कमेटी की बैठक 13 नवंबर को रखी गई थी। इस बैठक से पहले इस मसले को सर्कुलेशन से इंप्लीमेंटेशन कमेटी के सदस्यों को भेजा गया 13 नवंबर को सुपरवाइजरी कमेटी ने इस पांच मंजिलें सेंटर को बनाने के लिए हरी झंडी दे दी। लेकिन सिफारिश की कि स्वास्थ्य विभाग इस मसले को आखिरी मंजूरी के लिए एनजीटी के समक्ष ले जाए। लेकिन 13 नवंबर से लेकर अब तक कहीं कुछ नहीं हुआ है।
सुपरवाइजरी कमेटी की प्रोसीडिंग्ज अब निकलनी हैं। हालांकि सुपरवाइजरी कमेटी के सदस्य सचिव की ओर से मामला नगर निगम को भेजा गया है। अब यह मामला नगर निगम में लटका है। मामला आइजीएमसी तक नहीं पहुंचा है। यह मामला नगर निगम से आइजीएमसी के पास जाएगा व आइजीएमसी इसे सचिवालय अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य के पास एनजीटी के समक्ष उठाने को ले जाएगा। लेकिन अभी कुछ नहीं हुआ। आइजीएमसी के अधिकारियों ने माना कि मामला उनके पास नहीं आया है।
ऐसे में जयराम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गलत जानकारी सार्वजनिक कर रहे हैं। असल में उन्हें इस मामले को लेकर कुछ पता ही नहीं है। हालांकि मीट द मीडिया में उन्होंने यह भरोसा जरूर दिया कि इस पैसे को लैप्स नहीं होने दिया जाएगा। अगर इस सेंटर का काम शुरू नहीं हुआ तो यह पैसा 31 मार्च 2019 को लैप्स हो जाएगा। इस सेंटर को 15 करोड़ की किश्त तीन साल पहले आ चुकी है। पहले पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने इस सेंटर को लटकाया व जयराम सरकार इसे तरजीह नहीं दे रही है। मार्च से लेकर अब तक सरकार बुहत कुछ कर सकती थी। इंप्लीमेंटेशन कमेटी व सुपरवाइजरी कमेटी से भी यह मसला मीडिया के दखल के बाद आगे बढ़ा है।
शिमला/शैल। शिमला के सांख्यिकी विभाग में तैनात एक कनिष्ठ सहायक प्रेम ठाकुर द्वारा 55 दिन के मैडिकल अवकाश के बाद विभाग को सौंपा फिटनेस प्रमाणपत्र के बाद आईजीएमसी शिमला की कार्यप्रणाली गंभीर सवालों में घिर गयी है। क्योंकि जब प्रेम ठाकुर ने यह स्वास्थ्य प्रणाम पत्र सौंपा तब विभाग में इसकी प्रमाणिकता को लेकर सवाल उठ गये। क्योंकि इसकी प्रमाणिकता को लेकर कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष और महासचिव तथा सदस्यों ने विजिलैन्स में इसकी शिकायत दर्ज करवा दी। विजिलैन्स के साथ ही अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य को भी यह शिकायत भेज दी। इस पर जब जांच शुरू हुई तक यह सामने आया कि जिस डा. राहुल गुप्ता ने यह फिटनेस जारी किया है वह आईजीएमसी में बतौर वरिष्ठ मैडिकल अधीक्षक तैनात ही नही है और इस कारण से वह यह प्रमाणपत्र जारी करने के लिये अधिकृत ही नही है। आईजीएमसी में वरिष्ठ मैडिकल अधीक्षक का अतिरिक्त कार्यभार तो न्यूरो विभाग के सजृन डा. जनक राज के पास है।
विजिलैन्स जांच में यह सवाल उठा कि प्रेम ठाकुर को जिस बीमारी के लिये स्वास्थ्य प्रमाणपत्र जारी किया है उसका संबंध तो आर्था विभाग से है जबकि प्रमाणपत्र जारी करने वाला डा. राहुल गुप्ता तो फॉरैन्सिक विभाग में सहायक प्रोफैसर है। सरकार के निर्देशों के अनुसार किसी बीमार को 14-21 दिन तक का ही रेस्ट दिया जा सकता है वह भी तब जब बीमार का ईलाज अस्पताल में वाकायदा दाखिल करके किया गया हो। लेकिन प्रेम ठाकुर तो एक दिन भी अस्पताल में दखिल नही रहे हैं। यही नही जांच के दौरान उनके पास अस्पताल की वह पर्ची भी उपलब्ध नही रही जिस पर दवाई और रेस्ट का विवरण रहा हो न ही वह उस डाक्टर को खोज पाये जिसने उन्हें देखा और रेस्ट लिखा हो। इसी दौरान यह भी सामने आया कि प्रेम ठाकुर ने 26-6-2014 को आईजीएमसी की एक पर्ची भी विभाग को सौंपी थी और इसमें उन्हें दिल का मरीज ‘‘दिखाया गया था लेकिन उस पर्ची के मुताबिक जिस डाक्टर ने उन्हें दिल का मरीज घोषित किया था वह हृदय रोग के विभागाध्यक्ष के मुताबिक विभाग में तैनात ही नही था। इस तरह प्रेम ठाकुर द्वारा दोनों बार दिये गये आईजीएमसी के स्वास्थ्य प्रमाणपत्र सन्देह के घेरे में आ गये हैं।
जब आईजीएमसी द्वारा जारी इन स्वास्थ्य प्रमाणपत्रों पर सवाल उठे तब इसको लेकर आईजीएमसी में भी एक जांच टीम गठित और इस टीम ने डा. राहुल गुप्ता को क्लीन चिट दे दी। प्रेम ठाकुर को जिस बीमारी के लिये 55 दिन का रेस्ट दिया गया है वह आर्थो से संबधित है लेकिन फिटनेस देने वाला डा. फारैन्सिक विशेषज्ञ है। आईजीएमसी के वष्शिठ मैडिकल अधीक्षक न्यूरो सर्जन है। इस नाते वह भी आर्थो के मरीज को फिटनेस देने के लिये कायदे से अधिकृत नही हो सकते। लेकिन इसके लिये आईजीएमसी में जो जांच टीम बनी उसमें एक तरह से वही डाक्टर शामिल किये गये जिनके खिलाफ प्रत्यक्षतः जांच होनी थी। यह जांच कायदे से प्रिंसिपल द्वारा की जानी चाहिये थी। वरिष्ठ मैडिकल अधीक्षक का पद पदोन्नती से भरा जाता है और इसके लिये ब्लॉक मैडिकल अफसरों की पात्रता रखी गयी है। लेकिन लम्बे अरसे से इस पद पर किसी भी विशेषज्ञ डाक्टर को अतिरिक्त कार्यभार देकर भर दिया जाता है। जबकि यह पद पूरी तरह प्रशासनिक है। आईजीएमसी में आरटीआई के तहत भी डाक्टर ही सूचना अधिकारी का काम कर रहे हैं जबकि यह काम प्रशासनिक अधिकारी या प्रिंसिपल का होना चाहिये। जब विशेषज्ञ डाक्टरों से प्रशासनिक काम लिया जायेगा तब यही होगा कि आर्थो के मरीज को फिटनेस न्यूरो सर्जन या फॉरैन्सिक मैडिसन वाले देंगे।
शिमला/शैल। भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गयी है। इसका पहला खुलासा मण्डी में हुए पहले पन्ना प्रमुखों के सम्मेलन में उस समय सामने आया जब प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती और फिर गृह मन्त्री राजनाथ सिंह ने मण्डी से मौजूदा सांसद राम स्वरूप शर्मा को यहां से पुनः प्रत्याशी बनाये जाने की घोषणा की। मण्डी के इस सम्मेलन में केन्द्रिय मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा और पंडित सुखराम शामिल नही थे और सुखराम ने इस सम्मेलन में राम स्वरूप को घोषित किये जाने पर यह कहकर सवाल उठा दिया कि सत्ती को नाम की घोषणा करने का कोई अधिकार नही है। पंडित सुखराम के इस एतराज का इतना असर हुआ कि सत्ती को सोलन में अपना यह ब्यान वापिस लेना पड़ा और साथ ही यह कहना पड़ा कि लोकसभा प्रत्याशीयों की घोषणा हाईकमान ही करेगा। मण्डी मुख्यमन्त्री जयराम का गृह जिला है। विधानसभा चुनावों में जब सुखराम परिवार को भाजपा में शामिल करके उनके बेटे अनिल शर्मा को टिकट दिया गया था तभी भाजपा मण्डी की दसों सीटों पर अपना कब्जा कर पायी थी। मण्डी में पंडित सुखराम परिवार का अपना एक प्रभाव है यह बहुत पहले से प्रमाणित हो चुका है। इसी प्रभाव के चलते सुखराम अपने पौत्र को भी सक्रिय राजनीति में उतारना चाहते हैं और इसके लिये उन्होंने लोकसभा टिकट दिये जाने की मांग रख दी है। स्मरणीय है कि उनके पौत्र ने विधानसभा चुनावों से बहुत पहले ही यह घोषित कर दिया था कि वह कांग्रेस के टिकट पर सिराज से चुनाव लड़ेंगे। इसके लिये उन्होंने कांग्रेस हाईकमान की स्वीकृति मिलने का दावा करते हुए यहां तक कह दिया कि पंडित सुखराम उनके लिये चुनाव प्रचार करेंगे।
लेकिन यह होने से पहले सुखराम परिवार भाजपा में शामिल हो गया। परन्तु इस सबसे यह स्पष्ट हो ही जाता है कि सुखराम अपने पौत्र को चुनावी राजनीति में उतारना चाहते हैं। इसके लिये लोकसभा चुनावों से ज्यादा बेहतर कोई मौका हो नही सकता। सूत्रों की माने तो सुखराम के लोग तो चुनाव प्रचार अभियान में जुट गये हैं अब यहां पर यह सवाल खड़ा होता है कि मण्डी के इस सम्मेलन में सत्ती और राजनाथ सिंह ने जो नाम की घोषणा कर दी क्या यह सब मुख्यमन्त्री की जानकारी और उनके विश्वास में लिये बिना किया जा सकता था शायद नहीं। पंडित सुखराम अपने पौत्र के अभियान मेें जुट गये हैं क्या इसकी जानकारी जयराम की सीआईडी ने उनको नही दी होगी। जबकि जंजैहली काण्ड को लेकर धूमल और जयराम सरकार के बीच जिस तरह के ब्यानों की नौबत आ गयी थी उसके बाद से तो मण्डी पर सीआईडी का ज्यादा फोकस रहा होगा। बल्कि जब मण्डी से मुख्यमन्त्री की पत्नी डाक्टर साधना ठाकुर की उम्मीदवारी की चर्चा उठी थी तब उस चर्चा को सुखराम के काऊंटर के रूप में देखा गया था। इस परिदृश्य में राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मण्डी मेें अन्ततः सुखराम के पौत्र और मुख्यमन्त्री की पत्नी दोनों में से किसी के हाथ यह टिकट लगेगा। यदि सुखराम टिकट की लड़ाई हार जाते हैं तो उसके बाद उनकी अगली रणनीति क्या होगी इस पर अभी से नज़रें लग गयी हैं।
इसी तर्ज पर इस बार कांगड़ा में भी टिकट को लेकर रोचक दृश्य देखने को मिलेगा। शान्ता कुमार एक बार फिर चुनाव के लिये तैयार हैं लेकिन इस बार यहां से विद्यार्थी परिषद भी प्रबल दावेदारी कर रही है। इस समय कांगड़ा से भाजपा के प्रदेश संगठन मन्त्री पार्टी कार्यालय को कन्ट्रोल करके बैठे हैं तो यहीं से प्रदेश के संघ प्रमुख भी हैं। इस तरह कांगड़ा में चार-चार सत्ता केन्द्र हो गये हैं। संघ प्रमुख संजीवन ने सचिवालय में सरकारी बैठकों में भी शिरकत करनी शुरू कर दी है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि संघ अब सीधे तौर पर भी सरकार पर नज़र रखने लग गया है। यदि कांगड़ा में सत्ता के इन चारों केन्द्रो में एक सहमति न हो पायी तो यहां पर पार्टी की राह आसान नही होगी।
हमीरपुर में यदि उम्मीदवारी अनुराग या स्वयं धूमल में से ही किसी की होती है तो यहां पार्टी की स्थिति काफी सुखद रह सकती है। लेकिन पिछले दिनों जिस तरह से ऊना में यह प्रचार सामने आया है कि यदि सत्ती जीत गये होेते तो वह इस बार मुख्यमन्त्री होते। इसी के साथ यह भी जोड़ा जा रहा है कि हमीरपुर से सत्ती को भी हाईकमान उम्मीदवार बना सकती है। वीरभद्र ने यहां से कांग्रेस में राजेन्द्र राणा का नाम घोषित कर दिया है। वीरभद्र और जयराम के रिश्ते आम आदमी में चर्चा में हैं। फिर पिछले दिनों राजेन्द्र राणा और जयराम में हुआ संवाद भी चर्चा में आ चुका है। माना जा रहा है कि हमीरपुर का सारा सियासी गणित इन रिश्तों के गिर्द ही घूमेगा।
शिमला में भाजपा महिला उम्मीदवार की तलाश में है क्योंकि वर्तमान सांसद वीरेन्द्र कश्यप के मामले में आरोप तय होने के बाद अभियोजन पक्ष की गवाहियां चल रही हैं। कश्यप का मामला उच्च न्यायालय के निर्देशों पर ट्रायल कोर्ट में पहुंचा है। इस तर्क पर यहां से महिला उम्मीदवार की बात की जा रही है। लेकिन संयोगवश जो भी महिला चेहरे इस दौड़ में माने जा रहे हैं वह अपने-अपने क्षेत्र तक ही सीमित हैं। इस नाते यहां पर सबसे ज्यादा सशक्त उम्मीदवार एचएन कश्यप को माना जा रहा है। क्योंकि 2004 में पहला चुनाव हारने के बाद वह लगातार लोगों से संपर्क बनाये हुए हैं और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी होने का भी उन्हे लाभ है। यदि किसी भी गणित में वह नज़रअन्दाज होकर घर बैठ जाते हैं तो उनका बैठना मात्र ही पार्टी पर भारी पड़ेगा। वैसे तो वह इस बार हर हाल में चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं और उनकेे समर्थकों ने भी इसका अनुमोदन कर दिया है। पार्टी के भीतर उभर रही इन स्थितियों के परिणाम दूरगामी होंगे। इसी परिदृश्य में सरकार के पास इस एक वर्ष के कार्यकाल में कोई बड़ी उपलब्धि भी नहीं है। अभी सरकार एक वर्ष पूरा होने पर बड़ा जश्न मनाने जा रही है। इस मौके पर सभी विभाग अपनी-अपनी एक वर्ष की उपलब्धियों का ब्योरा पोस्टर छापकर जनता के सामने रखने जा रहा है। हर विभाग इस आश्य के तीस- तीस हजार पोस्टर छापेगा। इन पोस्टरों में जो कुछ दर्ज रहेगा उसकी पड़ताल जनता आसानी से कर लेगी क्योंकि आरटीआई के माध्यम से ही तथ्य जनता के सामने आ जायेंगे। अभी सरकार के उपर जो पत्र बंमों के हमले अपने ही लोगों ने किये हैं वह पहले ही जनता के सामने हैं और कल तो बड़े पैमाने पर यह जनता में चर्चा का विषय बनेंगे ही। एक वर्ष के कार्यकाल में सरकार अधिकांश में अधिकारियों के तबादलों में ही व्यस्त रही है और अन्त में जो नियुक्तियां /तबादले सामने आये हैं उनसे सरकार की कार्यशैली और नीयत दोनों पर ही गंभीर सवाल भी खड़े हो गये हैं। इस परिदृश्य में लोकसभा चुनाव जयराम सरकार के लिये कड़ी परीक्षा होने जा रहे हैं।
शिमला/शैल। क्या एम्टा प्रकरण फिर खुलेगा और इसके लिये जिम्मेदार अधिकारी नपेंगे। यह सवाल इन दिनों फिर से चर्चा में आ गया है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को कोल ब्लाॅक्स के आवंटन की जांच शीघ्र पूरी करने के निर्देश दिये हैं स्मरणीय है कि 2012 में कोल ब्लाॅक्स के आवंटन में भ्रष्टाचार होने के आरोप लगे थे और इस पर जांच की मांग को लेकर एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में आ गयी थी। इस याचिका पर सुवनाई के बाद कोल ब्लाॅक्स की जांच सीबीआई को सौंप दी गयी थी और नवम्बर 2012 में ही भारत सरकार ने यह आवंटन रद्द कर दिया था लेकिन 2012 से लेकर अब तक इस मामले की जांच रिपोर्ट सामने नहीं आ पायी है। बल्कि सीबीआई के निदेशक रहे रंजीत सिन्हा पर इस जांच को प्रभावित करने के आरोप लगे थे। इन्ही आरोपों के चलते सर्वोच्च न्यायालय ने रंजीत सिन्हा के खिलाफ भी जांच आदेशित कर दी थी और इसकी जिम्मेदारी निदेशक सीबीआई को दी गयी थी। लेकिन सीबीआई ने न तो अपने पूर्व निदेशक के खिलाफ ही जांच को आगे बढ़ाया और न ही कोल ब्लाॅक्स के आवंटन पर। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुये यह जांच शीघ्र पूरी करने के निर्देश दिये हैं। इन निर्देशों के परिणामस्वरूप ही यह उम्मीद बंधी है कि हिमाचल में एम्टा के माध्यम से जो थर्मल पावर लगाये जाने का एमओयू हस्ताक्षरित हुआ था और उसमें करोड़ो का निवेश भी हो गया था जबकि हकीकत में वहां पर ऐसा कुछ था ही नहीं और प्रदेश का यह पैसा कुछ अफसरशाहों की बदौलत डूब गया है। इसमें जिम्मेदार लोगों के खिलाफ गाज गिरेगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2006 में हिमाचल सरकार ने भी संयुक्त क्षेत्र में सितम्बर 2006 में एक थर्मल पावर प्लांट लगाने का फैसला लिया था। इसके लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर बोर्ड के माध्यम से निविदायें मांगी गयी। इसमें छः पार्टीयों ने आवेदन किया लेकिन प्रस्तुति पांच ने ही दी। इसमें से केवल दो को शार्ट लिस्ट किया गया और अन्त में एम्टा के साथ ज्वाइंट बैंचर हस्ताक्षरित हुआ। क्योंकि एम्टा ने पंजाब और बंगाल में थर्मल प्लांट लगाने के अनुभव का दावा किया था। इस दावे के आधार पर जनवरी -फरवरी 2007 में एम्टा के साथ एमओयू साईन हो गया और 48 महीने में इसके पूरे होने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिये निविदायें अधेासंरचना बोर्ड के माध्यम से मांगी गयी थी लेकिन एमओयू साईन होने के समय इसमें बोर्ड की जगह पावर कारपोरेशन आ गयी थी। अब प्लांट के लिये कोल ब्लाॅक चाहिये था जो कि एम्टा के पास था नहीं। इसके लिये एम्टा ने जेएस डब्लयू स्टील को अपना पार्टनर बनाया। एम्टा और पावर कारपोरेशन में 50-50% की हिस्सेदारी तय हुई थी। ऐसे में एम्टा और जे एस डब्ल्यू स्टील के मध्य कितनी हिस्सेदारी तय हुई और उसका पावर कारपोरेशन पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसको लेकर रिकार्ड में बहुत कुछ स्पष्ट नही है। एम्टा और जेएस डब्ल्यू स्टील ने मिलकर भारत सरकार से गौरांगढ़ी में कोल ब्लाक हासिल कर लिया। इसके लिये एम्टा और जेएस डब्लयू स्टील में मई 2009 में एक और सांझेदारी साईन हुई। एम्टा और जेएस डब्ल्यू स्टील को कोल ब्लाक आंवटित करवाने के लिये वीरभद्र ने एक ही दिन में विभिन्न मन्त्रालयों को पांच सिफारिशी पत्र लिखे हैं लेकिल यह सब कुछ होने के बाद नवम्बर 2012 में कोल ब्लाक्स का आंवटन ही भारत सरकार ने रद्द कर दिया।
जब भारत सरकार ने यह आवंटन नवम्बर 2012 में रद्द कर दिया तब उसके बाद दिसम्बर 2012 में ही एम्टा के निदेशक मण्डल की बैठक हुई और इस बैठक में फैसला लिया गया कि इसमें और निवेश न किया जाये। एम्टा के साथ जो एमओयू 2007 में साईन हुआ था उसके मुताबिक एम्टा को दो करोड़ की धरोहर राशी पावर कारपोरेशन में जमा करवानी थी जो कि समय पर नही हुई। जब 2012 में कोल ब्लाक का आवंटन रद्द हो गया और एम्टा के निदेशक मण्डल ने भी इसमें और निवेश न करने का फैसला ले लिया तो फिर 26 दिसम्बर 2012 को पावर कारपोरेशन ने इसमें 40 लाख का निवेश क्यो किया? यही नहीं इसके बाद 9-5-2013 को 20 लाख का और निवेश इसमें कर दिया गया। पावर कारपोरेशन के इस निवेश के बाद 26 नवम्बर 2014 को एम्टा ने फिर फैसला लिया कि जब तक विद्युत बोर्ड पावर परचेज़ का एग्रीमेंट नही करेगा तब तक इसमें निवेश नही करेंगे। अन्त में मार्च 2015 में बोर्ड ने यह एग्रीमेंट करने से मना कर दिया और इसी के साथ थर्मल प्लांट लगाने की योजना भी खत्म हो गयी।
इस पूरे प्रकरण में यह सवाल उभरते हैं कि जब निविदायें अधोसरंचना बोर्ड के नाम पर मंगवाई गयी तो फिर एमओयू के समय पावर कारपोरेशन कैसे आ गयी? जब एम्टा का चयन किया गया तब उसके अनुभव के दावों की पड़ताल क्यों नही की गयी? इसमें जेएस डब्लयू स्टील की एन्ट्री कैसे हो गयी। एम्टा से दो करोड़ क्यो नहीं लिये गये? जब एम्टा ने नवम्बर 2012 में ही इसमें कोई निवेश न करने का फैसला ले लिया था फिर दिसम्बर 2012 और मई 2013 में किसके कहने पर 60 लाख का निवेश कर दिया। एम्टा के साथ हुए एमओयू के मुताबिक यह प्लांट 2010 के अन्त तक तैयार हो जाना था। लेकिन इसके लिये जेएस डब्लयू स्टील के साथ एम्टा की हिस्सेदारी कोल ब्लाक के लिये मई 2009 मे साईन हुई? ऐसे में सवाल उठता है कि पावर कारपोरेशन का प्रबन्धन 48 माह में इस प्लांट के लग जाने के लिये समय समय पर क्या पग उठा रहा था जबकि उसके साथ एमओयू जनवरी 2007 में हो गया था। उसी दौरान पावर कारपोरेशन में एमडी डा. बाल्दी आ गय थे। यह उस समय देखा जाना चाहिये था कि एम्टा जो अनुभव के दावे कर रहा है उसकी प्रमाणिकता क्या है। एम्टा के अपने पास जब कोल ब्लाक था ही नही तोे उसे किस आधार पर चुना गया? क्योंकि जो रिकाॅर्ड अब तक सामने आया है उसके मुताबिक एम्टा के दावे भी ब्रेकल जैसे ही रहे हैं। यह करीब 2400 करोड़ का प्लांट लगना था और 2010-11 में पूरा हो जाना था। कोल ब्लाक आवंटन का विवाद 2012 में शुरू हुआ और नवम्बर 2012 में आवंटन रद्द हुए। इसलिये एम्टा जेएस डब्लयू स्टील और पावर कारपोरेशन इस विवाद का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। प्रदेश का करोड़ो का नुकसान इसमें हो चुका है और प्रदेश सरकार को अपना काम चलाने के लिये आये दिन कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में क्या जयराम सरकार इस प्रकरण में अपने स्तर पर मामला दर्ज करके जांच शुरू करवाएगी? क्योंकि यह एक संयोग है कि जयराम के प्रधान सचिव एसीएस बाल्दी को इस मामले की पूरी जानकारी है और उनसे इसकी जांच में पूरा सहयोग विजिलैन्स को मिलेगा।
शिमला/शैल। लोकसभा चुनाव अगले वर्ष मई में होंगे। इन चुनावों की तैयारियां राजनीतिक दलों ने अभी से शुरू कर दी हैं। इन तैयारियों के तहत चुनावों के लिये संभावित उम्मीदवारों को चिन्हित करना और चुनावी मुद्दों को तलाशने का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया में यह स्वभाविक है कि केन्द्र से लेकर राज्यों तक हर जगह सत्तारूढ़ सरकारों का कामकाज ही केन्द्रिय मुद्दा रहेगा क्योंकि हर राजनीतिक दल चुनावों से पहले जनता के सामने लम्बे चैड़े सपने परोसता है। जनता इन सपनों/वायदों पर भरोसा जताकर किसी दल को सत्ता सौंपती है। चुनावी वायदों के बाद हर साल बजट में भी यही सपने बेचे जाते हैं। इन सारे सपनों की व्यवहारिकता का आकलन फिर आकर चुनावों में ही होता है तब फिर
से जनता को अपने प्रतिनिधियों से कुछ पूछने का मौका हालिस होता है। इस संद्धर्भ में जनता को जागरूक करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी विपक्ष की रहती है। यह जिम्मेदारी निभाते हुए कई बार विपक्ष बीच-बीच मे सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक को आरोप पत्र सौंपता है। यह आरोप पत्र जनता को जागरूक रखने में बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। इसमें मीडिया की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रहती है।
इस परिदृश्य में यदि प्रदेश की राजनीति का आकलन किया जाये तो यहां पर दो ही राजनीतिक दलों कांग्रेस और भाजपा के बीच ही लगभग सबकुछ केन्द्रित हो कर रह गया है। यहां का अधिकांश मीडिया भी सुविधा भोगी हो चुका है। उसकी प्राथमिकता भी जन सरोकारों की जगह सत्ता सरोकार होकर रह गये हैं। अन्य राजनीतिक दल भी लगभग तटस्थता की भूमिका में है क्योंकि उनके लिये अपने होने का अहसास करना ही एक बड़ा संकट हो गया है। इस वस्तुस्थिति में प्रदेश कांग्रेस पर ही सबसे अधिक जिम्मेदारी आ खड़ी होती है लेकिन क्या कांग्रेस इस जिम्मेदारी के प्रति ईमानदार सिद्ध हो पा रही है। कांग्रेस के हाथ में सबसे अधिक वक्त तक प्रदेश की सत्ता रही है। अभी तक भी भाजपा ने कांग्रेस से ही सत्ता छिनी है। कांग्रेस के वीरभद्र छः बार प्रदेश के मुख्यमन्त्री रह चुके हैं। प्रदेश में आज कोई भी दूसरा नेता किसी भी दल में ऐसा नही है जिसका राजनीतिक कद वीरभद्र के बराबर हो। लेकिन क्या वीरभद्र ने अपने ही दल में किसी को अपना उत्तराधिकारी प्रोजैक्ट करने को प्रयास किया है। आज भी वह सातवीं बार प्रदेश का मुख्यमन्त्री बनने का मोह पाले हुए हैं। उन्हे कांग्रेस के संगठन मे तो युवा नेतृत्व चाहिये लेकिन मुख्यमन्त्री बनने के लिये नहीं। आज यह सारे सवाल उठने शुरू हो गये हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में वीरभद्र की भूमिका क्या रहने वाली है। क्योंकि वह अगला लोकसभा का चुनाव नही लड़ना चाहते हैं यह वह पूरी स्पष्टता से कह चुक हैं बल्कि यहां तक कह चुके हैं कि उनके परिवार से कोई भी यह चुनाव नही लड़ेगा। इसी के साथ वह पार्टी को जीताने के लिये सक्रिय योगदान देने ओर सातवीं बार मुख्यमन्त्री होने की भी बात कह चुके हैं। राजनीतिक विश्लेष्कों की नजर में इस तरह के ब्यानों से अन्त विरोध ही झलकता है। इस तरह के अन्त विरोध के दो ही अर्थ निकलते हैं कि या तो आप अपरोक्ष में पार्टी पर दवाब बना रहे हैं कि वह आपकी शर्ते माने या फिर आप सत्तारूढ़ सरकार के दवाब में चल रहे हैं।
इस समय पार्टी अध्यक्ष सुक्खु जयराम सरकार के प्रति काफी आक्रामक दिख रहे हैं। जब उन्होने सरकार के खिलाफ आरोपपत्र लाने की बात की तो उस पर सत्ता पक्ष की ओर से काफी तीव्र प्रतिक्रियाएं आयी। सुक्खु की ही आक्रामकता को आगे बढ़ाते हुए नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने जयराम सरकार से राष्ट्रीय उच्च मार्गों और केन्द्र से विभिन्न योजनाओं के नाम पर नौ हजार करोड़ मिलने के दावों की तफसील मांग कर सरकार को और असहज कर दिया है। क्योंकि इनमें दावों के अतिरिक्त धरातल पर बहुत कुछ है ही नहीं। ऐसे में जब पार्टी अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक के नेता दोनों ही पूरी आक्रामकता में चल रहे हों तब वीरभद्र जैसे नेता का मुख्यमन्त्री को यह अभय दान देना कि अभी उनके कामकाज के आकलन का सही समय नही है। उनकी संभावित भूमिका पर कई सवाल खड़े कर जाता है। क्योंकि इस समय कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व जिस कदर मोदी और उनकी सरकार के प्रति आक्रामक है उसको प्रदेशों में भी आगे बढ़ाने की आवश्यकता है और यह जिम्मेदारी हिमाचल के संद्धर्भ में वीरभद्र पर ही सबसे पहले आती है क्योंकि वही छः बार के मुख्यमन्त्री हैं। लेकिन वीरभद्र के ब्यानों से यही झलक रहा है कि वह अभी जयराम का विरोध करने के लिये तैयार नही हो पाय रहे हैं। क्या सही में अभी जयराम के कामकाज का आकलन करना जल्दीबाजी है यदि इस पर निष्पक्षता से विचार किया जाये तो अधिकांश लोग वीरभद्र सिंह की इस धारणा से सहमत नही होंगे। क्योंकि आकलन जयराम के व्यक्तिगत- पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन का नही किया जाना है। इस दृष्टि से वह एक सरल व्यक्ति हैं लेकिन आकलन मुख्यमन्त्री का होना है क्योंकि बतौर मुख्यमन्त्री उनके एक एक फैसले का पूरे प्रदेश पर असर होगा। अभी दस माह के कार्यकाल में ही सरकार को लगभग हर माह कर्ज लेना पड़ा है। प्रदेश की वित्तिय स्थिति क्या है? वीरभद्र किस दिशा -दशा में सरकारी कोष को छोड़ कर गये हैं। इसकी जानकारी प्रदेश की जनता को देना जयराम सरकार की जिम्मेदारी थी। यदि यह स्थिति चिन्ताजनक थी तो इस पर सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नही है। बल्कि जिस अधिकारी ने धूमल- वीरभद्र दोनों के कार्यकाल में वित्त सचिव की जिम्मेदारी निभाई वह आज जयराम के प्रधान सचिव होकर और भी महत्वपूर्ण भूमिका में आ गये हैं। इससे यही प्रमाणित होता है कि विरासत में जयराम को सब कुछ सही दिशा में मिला है। ऐसे में आज जो हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है और परिवहन में किराये बढ़ाने पड़े हैं वह सब इसी सरकार के प्रबन्ध का परिणाम है। जिसे किसी भी तर्क पर जायज नही ठहराया जा सकता है। भ्रष्टाचार के प्रति सरकार की गंभीरता पर अभी से गंभीर प्रश्नचिन्ह लग चुके हैं। कुल मिला कर यह कहना गलत है कि मुख्यमन्त्री का आकलन करना अभी जल्दबाजी है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि वीरभद्र जयराम के प्रति इतने नरम होकर क्यों चल रहे हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में यह चर्चा आम हो गयी है कि केन्द्र सरकार वीरभद्र के मनीलाॅंड्रिंग मामले को उन पर अब भी दवाब बनाये हुए है। पिछले दिनों जब ईडी ने वीरभद्र के कारोबारी मित्र वक्कामुल्ला चन्द्र शेखर की इस मामले में जमानत रद्द करवाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका डाली तब से यह चर्चा जोरों पर है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ईडी के आग्रह को अस्वीकार करते हुए उल्टा यह पूछ लिया कि आप सहअभियुक्तों के प्रति तो इतने सक्रय हैं लेकिन मुख्य अभियुक्त के प्रति एकदम चुप क्यों है। इसका ईडी के पास कोई जवाब नही था और उसने यह याचिका वापिस ले ली। यदि कहीं उच्च न्यायालय इस याचिका को स्वीकार कर लेता तो फिर से अब तक वीरभद्र से पूछताछ किये जाने का दौर शुरू हो चुका होता और यदि ऐसा हो जाता तो पूरा राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जाता। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के राज कुमार, राजेन्द्र सिंह बनाम एसजेवीएनएल मामले में आये फैसले से भी स्थिति असहज हुई है। इस फैसले पर अमल जयराम सरकार को करना है और अभी तक कोई कदम नहीं उठाये गये हैं। माना जा रहा है कि इन फैसलों के परिदृश्यों में ही वीरभद्र का स्टैण्ड स्पष्ट नही हो पा रहा है।