Thursday, 05 February 2026
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सरकार की असफलताओं के लिए जिम्मेदार कौन -मंत्री या स्वयं मुख्यमंत्री -पार्टी में उठी चर्चा

जिनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा उनके टिकट कटने की बढ़ी संभावनाएं
सरकार की असफलता के लिए अधिकारियों पर भी होने लगा दोषारोपण
नेतृत्व पर भारी पड़ सकती है या चर्चाएं

शिमला/शैल। जयराम सरकार के इस कार्यकाल का यह अंतिम वर्ष चल रहा है। इस अंतिम वर्ष के लिए वार्षिक योजनाओं का भी आकार तय हो गया है। विधायकों से उनकी प्राथमिकताओं को लेकर बैठकें भी हो चुकी हैं। स्वाभाविक है कि आने वाला बजट चुनावी वर्ष का बजट होगा और उसमें हर वर्ग के लिए घोषणाओं का पिटारा होगा। यह घोषणायें भविष्य के लिए होती हैं और चुनाव इसी वर्ष के अंत में होने हैं तो उसके लिए आचार संहिता भी जल्द ही लागू हो जायेगी और उसी अनुपात में इन घोषणाओं के जमीन पर उतरने की जिम्मेदारी से सरकार बच जायेगी। इस परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है कि मतदाता सरकार का आकलन करने के लिए इन 4 वर्षों में की गई घोषणाओं पर हुये अमल को मानक बनाये। इसके लिए हर बजट में की घोषणाओं की सूची और सरकार की कुल आय का आंकड़ा हर समय सामने रखना होगा। क्योंकि सरकार के सारे खर्च उसकी आय और उसके द्वारा लिये गये कर्जों पर ही निर्भर करते हैं। इसमें यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है की सरकार केवल विकास कार्यों के लिए ही कर्ज ले सकती हैं। जिससे भविष्य में आय के स्थाई साधन निर्मित हो सके। प्रतिबद्ध खर्चों की पूर्ति के लिए कर्ज लेने का नियमों में कोई प्रावधान नहीं है। सरकार जो पूंजीगत प्राप्तियां बजट दस्तावेज में दिखाती है वह शुद्ध रूप से कर्ज होता है और बजट दस्तावेज में कोष्ठक में लिखा भी जाता है। इस तरह सरकार के कुल बजट का 50% से भी अधिक कर्जों पर आधारित है और इसी के कारण प्रदेश लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है। जो आने वाले समय के लिए भयानक समस्या खड़ी कर देगा। कैग रिपोर्ट यह सामने ला चुकी है कि विकास के नाम पर लिये जाने वाले कर्ज का वास्तव में एक भी पैसा विकास पर खर्च करने के लिये सरकार के पास नहीं बचा था बल्कि माईनस में चला गया था। यह स्थिति लगातार बनी हुई है। इस सरकार में इसकी गति और बढ़ गयी है क्योंकि कोरोना की आड़ में कर्ज लेने की सीमा 3% से बढ़कर 5% कर दी गयी। लेकिन इसके बावजूद यह सरकार 96 जनहित की योजनाओं पर एक पैसा तक खर्च नहीं कर पायी है। धर्मशाला सत्र के दौरान आई इस कैग रिपोर्ट पर यह सरकार अभी तक प्रदेश की जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पायी है जबकि हर समाचार पत्र में यह खबर प्रमुखता के साथ छपी है। बढ़ते कर्ज से महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ती है यह कड़वा सच है।
इस सरकार ने जब पहला बजट पेश किया था तब कर्ज जो विरासत में मिला था तब उसका करीब 46 हजार करोड सदन में बताया था जो आज बढ़कर करीब 70 हजार करोड हो गया है। ऐसे में यह सवाल बनता है कि जब 96 योजनाओं पर एक पैसा तक खर्च नहीं किया गया तो फिर यह कर्ज कहां खर्च किया। इस सत्र में यह जानकारी भी दी गयी है कि अब तक यह सरकार केवल 23000 लोगों को ही नौकरियां दे पायी है। जबकि इस दौरान सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों का आंकड़ा ही इससे अधिक है। इस दौरान सरकार द्वारा दी जाने वाली हर सेवा के दाम बढ़ाये गये इसका पता हर वर्ष बढ़े कर और गैर कर राजस्व से लग जाता है। भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार अदालतों के फैसले भी लागू नहीं कर पायी है। कसौली गोलीकांड का कारण बने अवैध निर्माणों पर टीसीपी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लोगों को नामतः चिन्हित करके उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिये गये थे जिन पर आज तक अमल नहीं हुआ है। बल्कि कुछ लोगों को तो उनके वरिष्ठों को नजर अन्दाज करके पदोन्नत तक कर दिया गया है। इस तरह प्रताड़ित हुए लोग नौकरियों से त्यागपत्र देने पर मजबूर हुए हैं क्योंकि मुख्यमंत्री उन्हें इंसाफ नहीं दे पाये हैं। स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की सरकार पर रिटायर्ड और टायर्ड लोगों के हावी होने का जो आरोप भाजपा लगाती थी उसी में यह सरकार दो कदम और आगे बढ़ गयी है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपनी निष्पक्षता का सरेआम राजनेताओं से अपने रिश्तो का प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार उनके आगे मुक दर्शक बनकर बैठी हुई है। अदालतों का कितना सम्मान यह सरकार करती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आज तक लोक सेवा आयोग के सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए नियम नहीं बना पायी है।
एनजीटी के आदेशों की अनुपालन में यह सरकार किस तरह असफल रही है यह खुलासा पहले ही पाठकों के सामने रखा जा चुका है। रोचक तो यह है कि सितंबर 2018 में राजकुमार राजेंद्र सिंह बनाम एस जे वी एन एल मामले में आये फैसले पर यह सरकार आज तक अमल नहीं कर पायी है। जबकि फैसले के मुताबिक दो माह में यहां रिकवरी होनी थी। इससे कई करोड़ सरकार के खजाने में आने थे। पिछली सरकार ने जिस स्कूल वर्दी घोटाले के सप्लायरों के करोड़ों रुपयों का भुगतान बतौर जुर्माना रोक दिया था। इस सरकार ने आते ही वह सारा पैसा सप्लायर को लौटा दिया। विभाग ने इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाने की फाइल चलाई लेकिन ऊपर के निर्देशों से ऐसा नहीं हो पाया और सरकार को करोड़ों का नुकसान हो गया। जिन अधिकारियों ने खेल खेला वह आज मुख्यमंत्री के अति विश्वास्तों में शामिल हैं। दर्जनों ऐसे मामले हैं जहां सरकार को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया गया है।
ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि सरकार की असफलताओं के लिये किसे जिम्मेदार ठहराया जाये। सरकार के मंत्रियों को अधिकारियों को या स्वयं मुख्यमंत्री को। पिछले दिनों जब शिमला के बाद धर्मशाला में कार्यकारिणी की विस्तारित बैठक हुई थी और नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा उछला था तब यह चर्चा उठी थी कि आने वाले चुनाव में कई विधायकों /पूर्व विधायकों और मंत्रियों के टिकट कटेंगे। तबसे उठी यह चर्चा मीडिया के कुछ वर्गों में यह शक्ल ले रही है कि मुख्यमंत्री को असफल करने के लिये सरकार के कुछ मंत्री और संगठन के पदाधिकारी जिम्मेदार हैं। जबकि कुछ सरकार से बाहर बैठे मुख्यमंत्री के सलाहकारों को इसके लिये जिम्मेदार मान रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आने वाले दिनों में भाजपा के अंदर यह एक अहम मुद्दा होगा कि सरकार की असफलताओं के लिये किसे जिम्मेदार माना जाये। क्योंकि यह सभी मान रहे हैं कि सरकार हर मोर्चे पर असफल रही है। इस सरकार की बजटीय घोषणाओं पर ही नजर डाली जाये तो इसके अधिकांश मंत्री उनके विभागों से जुड़ी घोषणाओं पर ही कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।


क्या हमीरपुर नालागढ़ में पकड़ी गयी शराब फैक्ट्रियां अवैध थी

इस सवाल का जवाब क्यों नहीं आ रहा है
आबकारी विभाग का तंत्र क्या कर रहा था
राजनेता इन सवालों पर चुप क्यों है

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृह जिले मण्डी के सलापड में जहरीली शराब से सात लोगों की मौत हो गयी और एक दर्जन उपचाराधीन चल रहे हैं। इस घटना से प्रदेश के सियासी हल्कों में भूचाल आना स्वभाविक था। क्योंकि यह चुनावी वर्ष है और कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ आरोप पत्रा तैयार करने के लिए एक कमेटी गठित कर दी है। इस आरोप पत्रा में शराब और खनन माफिया विशेष मुद्दे रहने वाले हैं। ऐसे में जब ऐसा कांड घट जायेगा तो उस पर राजनीतिक रोटियां तो सेकी ही जायेंगी। यह स्वाभाविक और तय है इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों एक दूसरे पर आरोप दागने में व्यस्त हो गये हैं। इस व्यस्तता में यह कांड अपने अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच पायेगा और इसके असली गुनहगारों को सजा मिल पायेगी यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि जैसे ही यह कांड घटा सरकार ने तुरंत प्रभाव से एसआईटी गठित करके जांच आदेशित कर दी और 72 घटों में ही पुलिस ने इस कांड के कुछ दोषियों को दबोच लिया। एसपी मंडी और एसपी हमीरपुर ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई इसमें। इस जांच में यह सामने आया कि यह जहरीली शराब हमीरपुर में उस स्थान पर बन रही थी जो एस पी आवास से करीब डेढ़ किलोमीटर के फासले पर था। शराब की इस फैक्ट्री के संचालकों में हमीरपुर कांग्रेस के जिला महामंत्री नीरज ठाकुर और एनएसयूआई के पूर्व जिला प्रधान प्रवीण ठाकुर के नाम सामने आये हैं। इनके अतिरिक्त अलीगढ़ उत्तर प्रदेश के सनी और पुष्पेंद्र दिल्ली के सागर सैनी जम्मू कश्मीर के ए के त्रिपाठी तथा पालमपुर के गौरव मिन्हास का शामिल होना पाया गया है। इन लोगों से पूछताछ में यह सामने आया कि नालागढ़ में भी इसी तरह की फैक्ट्री चल रही है। यहां से भी सामान पकड़ा गया और लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं । इस कांड में एक दर्जन लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं।
इस कांड पर डीजीपी संजय कुंडू ने एक ऑनलाइन प्रेस वार्ता में यह कहा है कि यह जांच चल रही है कि इस शराब के निर्माण में इसमें पड़ने वाली सामग्री की मिक्सिंग गलत तरीके से हुई है या जो स्प्रिट इसके लिए खरीदी वह सही नहीं थी। अब तक हुई जांच में वह सब लोग पकड़े गये जिनकी इसमें किसी भी तरह की भागीदारी रही है। लेकिन अभी तक यह मूल प्रश्न अनुतरित है कि क्या यह शराब की फैक्ट्रियां अवैध रूप से ऑपरेट कर रही थी। क्योंकि यदि कोई फैक्ट्री ही अवैध रूप से चल रही है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि सरकार के रिकॉर्ड पर इसका कोई पंजीकरण वगैरा है ही नहीं। यदि ऐसा है तो यह पूरे प्रशासन पर एक गंभीर सवाल होगा। यह सवाल भी बना हुआ है कि यह फैक्ट्रियां चल कब से रही थी। यदि इन फैक्ट्रियों का पंजीकरण है और इनको शराब बनाने का लाइसेंस मिला हुआ है तो अवैधता का आरोप वही खत्म हो जाता है। इसके बाद दूसरा सवाल इनकी गुणवत्ता का आता है और गुणवत्ता जांचने के लिए पूरा तंत्र खड़ा किया हुआ है। शराब के कारखानों पर सीसीटीवी कैमरे लगे हुये हैं आने वाले हर समान की चैकिंग होती है। शराब की हर बोतल और पेटी के निरीक्षण के निर्देश हैं। और यह आबाकारी विभाग की जिम्मेदारी है। फैक्ट्री कितनी शराब बनायेगी यह पहले से तय रहता है। इस प्रकरण में आबकारी विभाग की भूमिका क्या रही है यह भी अभी तक सामने नहीं आया है। इसमें जो सामान पकड़ा गया वह कहां से खरीदा गया इसको बनाने का फार्मूला किसका था यह कोई बड़े गंभीर सवाल नहीं है। क्योंकि शराब बनाने के लिए यह स्वभाविक समान है जो कहीं से तो लिया ही जाना था। यदि यह सामान भी अवैध रूप से बेचा गया है तभी इन लोगों को भी इसमें सम्मिलित माना जायेगा अन्यथा नहीं।
इस कांड में लोगों की मौत हुई है। इसके डीजीपी के मुताबिक दो ही कारण हो सकते हैं। पहला की सामान की मिक्सिंग गलत हुई हो और दूसरा स्प्रिट सही न हो। यह दोनों बिंदु अभी जांच में चल रहे हैं। जब तक इस पर रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक मौत के कारणों का पता नहीं चलेगा। लेकिन इस पर जिस तरह से राजनीति की जा रही है उससे यह आशंका बराबर बढ़ती जा रही है कि यह प्रकरण भी राजनीतिक ब्यानबाजी के नीचे दब कर ही रह जायेगा। क्योंकि यदि यह फैक्टरीयां अवैध रूप से ही चल रही थी तो सरकार और उसका तन्त्र अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। क्योंकि उसका अर्थ होगा कि राजनेता किसी भी सरकार में कुछ भी अवैध कर सकते हैं। यदि फैक्ट्रियां अवैध नहीं है तो फिर बड़ा दोष विभाग पर आयेगा कि उसका निगरान तंत्र क्या कर रहा था। क्योंकि शराब का कारोबार करने वाला किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य हो सकता है।

 

वेब पोर्टल मीडिया कर्मियों ने भी सरकार की पॉलिसी पर उठाये सवाल

चार साल से लगातार कोरे आश्वासन दिये जाने का लगाया आरोप
विधानसभा तक में नहीं दिया जा रहा जवाब
सरकारी संसाधनों को व्यक्तिगत संपत्ति मानकर किया जा रहा बंटवारा

शिमला/शैल। प्रदेश के वेब पोर्टल मीडिया कर्मियों ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को चौथी बार मीडिया पॉलिसी बनाने के लिये ज्ञापन सौंपा है। मण्डी में मीडिया सलाहकार पुरुषोत्तम गुलेरिया से मिलकर एनयूजे ने भी मीडिया कर्मियों से भेदभाव किये जाने के आरोप लगाये हैं। यह आरोप लगाया है कि पिछले 4 वर्षों में हर बार यह ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं। हर बार पॉलिसी बनाने के लिये आश्वासन दिये गये। अधिकारियों को निर्देश भी दिये गये। लेकिन हर बार परिणाम शुन्य ही रहा। इस आरोप के साथ ही एक कड़वा सच यह भी है की विधानसभा में भी हर बार यह सवाल पूछा जाता रहा है की सरकार ने किन अखबारों और अन्य प्रचार माध्यमों को कितने-कितने विज्ञापन दिये हैं। इन सवालों का हर बार एक ही जवाब आया है की सूचना एकत्रित की जा रही है। व्यवहार में यह रहा है कि जिस भी समाचार पत्र में सरकार की नीतियों पर उससे सवाल पूछने का साहस किया है उसके न केवल विज्ञापनों पर ही रोक लगाई गई है बल्कि उसके खिलाफ झूठे मामले तक खड़े किये गये हैं। जब भी इस बारे में निदेशक और सचिव लोक संपर्क से इसका कारण पूछा गया तो यह जवाब मिला कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। लोक संपर्क विभाग की यह वस्तुस्थिति है और इसके प्रभारी मंत्री ही मुख्यमंत्री हैं।
इस व्यवहारिकता से यह सवाल उठता है कि जो सरकार चार वर्षों में मीडिया को भी कोरे आश्वासनों से टरकाती आ रही है उसकी आम आदमी के लिए घोषित योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या होगी। यह भी सबके सामने है कि कुछ गिने-चुने अखबारों को उनके गिने-चुने रिपोर्टरों के माध्यम से करोड़ों के विज्ञापन भी इसी सरकार ने दिये हैं और इन रिपोर्टरों को इससे करोड़ों का कमीशन भी मिला है। यह भी स्वाभाविक है कि यह सब संबद्ध अधिकारियों और राजनीतिक सत्ता के इशारे के बिना संभव नहीं हुआ है। इससे यही प्रमाणित होता है कि सरकार में मत भिन्नता के लिये कोई स्थान नहीं है और उसको दबाने के लिये सरकारी साधनों का खुलकर दुरुपयोग किया गया है। शायद इसीलिए विधानसभा में जानकारी आज तक नहीं रखी गयी है। चर्चा है कि इसमें बड़े स्तर पर बड़ा घपला हुआ है शायद इसी सब को दबाने के लिए विभाग को आउटसोर्स करने का भी प्रयास किया जाता रहा है। यह तय है कि देर सबेर यह एक बड़ी जांच का विषय बनेगा।
इस सब से हटकर एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मुख्यमंत्री यह सब करने का साहस कैसे कर सकता है । सरकारी संसाधनों का एक तरफा बंटवारा कैसे कर सकता है। जबकि मीडिया के बड़े वर्ग पर गोदी मीडिया का टैग लगने से उसकी विश्वसनीयता शुन्य हो चुकी है। इसी का परिणाम है कि डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद उपचुनाव में चार शुन्य की शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी इसका परिणाम सामने आयेगा यह तय है। क्योंकि जनता उन रिपोर्टों पर ज्यादा विश्वास करती है जिनमें प्रमाणिक दस्तावेजों के साथ सरकार से तीखे सवाल पूछे जाते हैं। यह निश्चित है कि आने वाले दिनों में हर रोज ऐसे सवाल पूछे जाएंगे। इन सवालों का असर विधानसभा चुनाव से आगे निकलकर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा यह भी स्पष्ट है।
ऐसे में यह सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्या यह सब भाजपा संघ की नीति पर अमल करते हुए जयराम कर रहे हैं? या उन पर कुछ लोगों ने इतना कब्जा कर रखा है की विधानसभा में भी मीडिया को लेकर आये सवाल का जवाब रखने को अहमियत नहीं दे रहे हैं। पार्टी भी सरकार के इस आचरण पर पूरी तरह ख़ामोशी बनाये हुये है। उससे और भी स्पष्ट हो जाता है की इनके लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं की अनुपालन से ‘ऋण कृत्वा घृतं पीबेत’ ज्यादा अहमियत रखता है।

अवैध खनन के 250 करोड़ के बिलों का भुगतान जयराम सरकार के लिए बना चुनौती

सबसे अधिक अवैध खनन शिमला मण्डी और कांगड़ा में
अवैधता के खिलाफ अपराधिक मामले बनाये जायें उच्च न्यायालय के निर्देश

शिमला/शैल। विधानसभा के पिछले सत्र में कांग्रेस विधायक आशा कुमारी का प्रश्न था कि लोक निर्माण विभाग में उच्च न्यायालय के आदेश के कारण कई ठेकेदारों के करोड़ों रुपए के बिल भुगतान के लिये रुके हुए हैं। इसका पूरा विवरण और इनके भुगतान के लिये उठाये गये कदमों की जानकारी मांगी गयी थी। सरकार ने इसका जवाब देते हुए स्वीकार किया कि 197.98 करोड़ के बिल भुगतान के लिए रुके हुये हैं। इसमें शिमला जोन- 7252.49 लाख, मण्डी 6493.37 लाख, कांगड़ा 5094 .4 लाख, हमीरपुर 776.58 लाख और नेशनल हाईवे 181.98 लाख का विवरण भी दिया गया है। यह जवाब धर्मशाला सत्र में दिया गया था। और अब यह रकम बढ़कर शायद ढाई सौ करोड़ हो गयी है। ठेकेदारों के ये बिल रेता, रोड़ी, बजरी और पत्थरों की आपूर्ति करने के हैं।
प्रदेश में अवैध खनन के आरोप एक लंबे अरसे से लगते आ रहे हैं। यहां तक कि प्रदेश में खनन एक माफिया की शक्ल ले चुका है। प्रदेश उच्च न्यायालय इस बारे में कड़ा संज्ञान ले चुका है। और यह निर्देश 2010 में ही दे चुका है कि इस आपूर्ति के वैद्य स्त्रोत सुनिश्चित किये जायें। जबकि सरकार इन खनिजों के एकत्रीकरण के लाइसेंस देकर और अपनी रॉयल्टी लेकर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती थी। उच्च न्यायालय के 2010 के निर्देशों के बाद 2015 में इस संदर्भ में नियम बनाये गये। रोड़ी, बजरी और पत्थर ऐसे खनिज है जो सड़क, भवन, बिजली परियोजनायों आदि हर निर्माण में प्रयुक्त होते हैं। इसकी आपूर्ति या तो प्रदेश के बाहर से होती है या भीतर से ही स्थानीय स्तर पर। आपूर्ति का जो भी साधन रहे उसके लिये 2015 में बनाये नियमों की अनुपालन अनिवार्य है। नियम 33 और नियम 15 में पूरा ब्योरा दर्ज हो जाता है। लेकिन इन नियमों की अनुपालना में भी गड़बड़ी होने लगी। नूरपुर के एक दलजीत पठानिया इस मामले को उच्च न्यायालय में ले गये और उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। 16-7-20 को लगी इस रोक के खिलाफ विभाग पांच जनवरी 2021 को उच्च न्यायालय पहुंच गया और इसे हटाने का आग्रह कर दिया। उच्च न्यायालय ने इस आग्रह को मानते हुये इस शर्त पर यह रोक हटा दी कि जिन बिलों के साथ फॉर्म w और x पर वांछित जानकारियां दी गयी हैं उनके भुगतान कर दिया जायें।
उच्च न्यायालय ने इस सामग्री की हर आपूर्ति की वैधता का पता लगाने के लिए लोक निर्माण विभाग और उद्योग को एक जांच टीम बनाने के निर्देश दिये हैं। विभाग इसके लिए दो टीमें गठित कर रहा है। जांच में क्या सामने आता है यह जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा। जो भी आपूर्ति की जाती है उसकी ट्रांजिट के फॉर्म w और फॉर्म x बिल के साथ लगे होना आवश्यक है। इन फॉर्मों के बिना हर आपूर्ति अवैध स्त्रोत और अवैध खनन के दायरे में आ जायेगी। 2010 से उच्च न्यायालय इसकी अनुपालना के निर्देश दे चुका है। अनुपालना न होने पर 16 जुलाई 2020 को उच्च न्यायालय कि जस्टिस त्रिलोक चौहान और जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ की पीठ भुगतान पर रोक लगा चुकी है। लोक निर्माण विभाग इस रोक के खिलाफ उच्च न्यायालय पहुंच गया। उच्च न्यायालयों ने फार्मों की शर्त के साथ ही विभाग का आग्रह मान लिया लेकिन इसके बाद भी यह भुगतान नहीं हो पाया है क्योंकि बिलों के साथ फॉर्म नहीं है। फार्म नहीं होने का अर्थ है कि यह पूर्ति ही अवैध स्त्रोतों से है और परिणामतः अवैध खनन है। इस अवैधता के खिलाफ उच्च न्यायालय आपराधिक मामले बनाने के निर्देश दे चुका है। इस समय ऐसे सबसे ज्यादा मामले शिमला जोन में हैं दूसरे स्थान पर मण्डी और तीसरे पर कांगड़ा है। इसका अर्थ यह है कि सबसे ज्यादा अवैध खनन इन क्षेत्रों में हो रहा है। ठेकेदारों के इन बिलों का भुगतान कैसे होता है इनके खिलाफ आपराधिक मामले बनाये जाते हैं या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि यह जयराम सरकार के लिए एक कसौटी होगा।

एन.जी.टी. के फैसले की अनुपालना पर जयराम सरकार सवालों में

ओक ओवर और सचिवालय के निर्माणों से उठी चर्चा
एन.जी.टी. ने उच्च न्यायालय और सरकार के आवेदनो को अस्वीकारा
कैग और सरकार की अपनी रिपोर्टों पर आधारित है यह फैसला

शिमला/शैल। क्या जयराम सरकार अदालती आदेशों के अनुपालन में भी गंभीर और ईमानदार नहीं है? यह सवाल एन.जी.टी. के 16-11 -2017 को आये फैसले के संदर्भ में इन दिनों फिर चर्चा का विषय बन गया है। क्योंकि इसी वर्ष नगर निगम शिमला के चुनाव होने हैं और एन.जी.टी. के फैसले का सबसे बड़ा सरोकार भी शिमला ही रहा है। एन.जी.टी. ने अपने आदेश में शिमला में नये निर्माणों पर प्रतिबंध लगाते हुये स्पष्ट कहा है कि We hereby prohibit new construction of any kind, i.e. residential, institutional and commercial to be permitted henceforth in any part of the Core and Green/Forest area as defined under the various Notifications issued under the Interim Development Plan as well, by the State Government.

Wherever the old residential structures exist in the Core area or the Green/Forest area which are found to be unfit for human habitation and are in a seriously dilapidated condition, the Implementation Committee constituted under this judgement may permit construction/reconstruction of the building but strictly within the legally permissible structural limits of the old building and for the same/permissible legal use. The Competent Authority shall sanction the plans and/or approve the same only to that extent and no more; under any circumstances such plans must not be beyond two storeys and an attic floor and only for residential purpose.

एन.जी.टी. ने यह आदेश कैग रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुये किया है। जिसमें यह कहा गया है कि हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माणों को रगुलेट करने के लिये समुचित नियम नहीं हैं। इस कारण से यहां पर भूकंप और दूसरी आपदायें घटती रहती हैं। इस संदर्भ में एन.जी.टी. ने आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के प्रावधानों और हिमाचल सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ कमेटी जिसमें प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी, हिमालयन जियोलॉजी संस्थान देहरादून, जी बी पंत संस्थान और नई दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ प्लानिंग के प्रोफेसर शामिल थे की रिपोर्ट में आयी सिफारिशो का संज्ञान लेते हुए अपना फैसला दिया है। कमेटी की रिपोर्ट और एन.जी.टी. के फैसले में यह तथ्य आये हैं कि प्रदेश में अब तक 90 भूकंप आ चुके हैं और शिमला नगर निगम द्वारा 27318 घरेलू और 4900 कमर्शियल पानी के कनेक्शन ही हैं। जबकि इसके मुकाबले में सीवरेज के सिर्फ 13752 कनेक्शन ही है। शिमला के प्रबंधन पर यहां एक बड़ा खुलासा है। पिछले कुछ अर्से से चंबा से लेकर शिमला तक लगभग प्रदेश के हर जिले में भूकंप महसूस किये गये हैं और इसे एक बड़ी आपदा के पूर्व संकेतों के रूप में देखा जा रहा है।
एन.जी.टी. का आदेश नवंबर 2017 में आया था और दिसंबर में चुनाव होने के बाद सरकार बदल गयी थी। जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बन गये थे। इस नाते एन.जी.टी. के फैसले के अनुपालन की जिम्मेदारी जयराम सरकार की हो जाती है। लेकिन क्या यह सरकार इस फैसले पर अमल कर पा रही है। क्योंकि इस फैसले के बाद कुछ निर्माण मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर हुआ है। यहां पर लिफ्ट तक लगाई गयी है। जबकि मुख्यमंत्री का आवास कोर एरिया में आता है। जिसमें निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध है। इस निर्माण की स्वीकृति नगर निगम टीसीपी और एन.जी.टी. के फैसले के तहत बनी कमेटी के द्वारा दी गयी है या नहीं इस पर प्रशासन खामोश है। जबकि 25 फरवरी 2021 को हुई कमेटी की बैठक में न्यू शिमला में प्राइमरी हेल्थ सेंटर शिमला के देहा में चुनाव आयोग का वेयरहाउस नाभा में चार मंजिला दो ब्लॉक, पुराने बस स्टैंड के पास रेलवे की जमीन पर कमर्शियल परिसर, सचिवालय में विकलांगों के लिए लिफ्ट और रैंप, मुख्यमंत्री के कार्यालय के आगन्तुकों के लिये हॉल आर्मजडेल भवन में कार पार्किंग संजौली में वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल भवन उच्च न्यायालय में कैंटीन सहायक सालिसिटर जनरल कार्यालय के पांच मंजिला भवन निर्माण के प्रस्ताव को अनुमोदित किया गया। इनमें कुछके निर्माणों को कमेटी के अनुमोदन के बाद एन.जी.टी. को भेजने की अनुशंसा की गयी थी। इन्हीं प्रस्तावों में एक प्रस्ताव स्व. नरेंद्र बरागटा के भवन में लिफ्ट लगाने का आया था और इसे भी एन.जी.टी. में ले जाने की सिफारिश की गयी थी।
एनजीटी ने सचिवालय में और ब्रागटा के घर में लिफ्ट लगाने तथा बहुमंजिला पार्किंग के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया है। बहुमंजिला पार्किंग में जितना भी निर्माण हुआ है उसकी कोई अनुमति कहीं से भी नहीं है। इसी बीच प्रदेश उच्च न्यायालय ने पुराने भवन को गिरा कर उसके स्थान पर नया निर्माण करने की अनुमति के लिए एन.जी.टी. में आवेदन किया था उच्च न्यायालय का यह आवेदन एन.जी.टी. ने 8-10-2021 को अस्वीकार कर दिया है। एनजीटी में इस फैसले में फिर स्पष्ट किया है  Wherever unauthorised structures, for which no plans were submitted for approval or NOC for development and such areas falls beyond the Core and Green/Forest area the same shall not be regularised or compounded. However, where plans have been submitted and the construction work with deviation has been completed prior to this judgement and the authorities consider it appropriate to regularise such structure beyond the sanctioned plan, in that event the same shall not be compounded or regularised without payment of environmental compensation at the rate of Rs. 5,000/- per sq. ft. in case of exclusive selfoccupied residential construction and Rs. 10,000/- per sq. ft. in commercial or residential-cum-commercial buildings. The amount so received should be utilised for sustainable development and for providing of facilities in the city of Shimla, as directed under this judgement. यह फैसला पूरे प्रदेश पर लागू है। लेकिन हर हिस्से में इसकी अनुपालना इमानदारी से नही हो रही है। शिमला में तो इस फैसले के बाद दर्जनों बहुमंजिला निर्माण बन गये हैं। जबकि इस फैसले के तहत केवल वही निर्माण नियमित किए जाने थे जो यह फैसला आने तक पूरी तरह तैयार हो चुके थे। पिछले दिनों कच्ची घाटी में गिरे आठ मंजिला निर्माण से सरकार सहित सभी संवद्ध संस्थानों की नीयत और नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। इस परिदृश्य में यह देखना रोचक होगा कि आने वाले नगर निगम शिमला के चुनावों में इस विषय पर कौन क्या पक्ष लेता है।

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