सुरेश भारद्वाज के इस ब्यान से पार्टी में बढ़ी हलचल
जयराम की धूमल और अनुराग से बैठकें चर्चा में
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर संगठन के मण्डल मिलन कार्यक्रमों के तहत जब हमीरपुर और कांगड़ा के दौरे पर आये तो पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ हुई उनकी बैठक को लेकर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में एक बार फिर चर्चाओं का दौर चल पड़ा है। इस दौर से पहले वह दिल्ली भी गये थे कुछ केंद्रीय नेताओं से मिलने। दिल्ली के दौरे में भी पहले अनुराग ठाकुर को मिले और फिर उनको साथ लेकर अन्य नेताओं से मिले। धूमल और अनुराग से जयराम का यह मिलना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पिछले दिनों हुए उपचुनाव में चारों सीटें हारने का ठीकरा जयराम से जुड़े एक वर्ग ने सीधे धूमल के सिर फोड़ा था। उपचुनाव की हार के बाद यह लगातार प्रचारित किया गया कि सरकार और संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव हो रहा है। चार-पांच मंत्रियों को बदले जाने की चर्चाएं चली। लेकिन आज तक यह चर्चाएं अमली शक्ल नहीं ले पायी। इसी बीच स्वास्थ्य मंत्री ने एक पत्रकार वार्ता बुलाई। हॉलीडे होम में रखी यह वार्ता सफल नहीं हो पायी। क्योंकि पहले पत्रकार नहीं पहुंचे और जब कुछ पत्रकार पहुंचे तब आयोजकों में से कोई नहीं था। इसके बाद शहरी विकास मंत्री ने वार्ता आयोजित कि उन्होंने अपने संबोधन में यह कहा कि 2017 में जो सरकार जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी थी वह पुराने नेतृत्व नीयत और नेता सभी को खत्म करके बनी थी।
सुरेश भारद्वाज के इस ब्यान को राजनितिक हलकों में इस तरह देखा जा रहा है कि क्या उस समय घूमल की हार प्रायोजित थी। भारद्वाज के इस ब्यान से पूरी पार्टी शिमला से लेकर दिल्ली तक हिल गयी है। स्मरणीय है कि 2017 में भाजपा ने प्रेम कुमार धूमल को नेता घोषित करके प्रदेश का चुनाव लड़ा था और सत्ता में पहुंची थी। यह सही है कि उस समय धूमल अपना चुनाव हार गये थे। उनके विश्वस्त माने जाने वाले कुछ अन्य भी चुनाव हार गये। लेकिन यह भी सच है कि यदि उस समय धूमल को नेता न घोषित किया जाता तो भाजपा सत्ता में ना आती। उस समय धूमल के हारने के बाद भी विधायकों का बहुमत उनको मुख्यमंत्री बनाना चाहता था और दो तीन लोगों ने उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश भी कर दी थी। लेकिन धूमल ने जनता के निर्णय को स्वीकार करते हुये अपने को नेता की दौड़ से किनारे कर लिया। लेकिन उसके बाद जंजैहली प्रकरण को लेकर जो कुछ घटा वह भी सबके सामने है। लेकिन इस बीच एक बार भी यह सामने नहीं आया कि धूमल की ओर से सरकार को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष में असहज करने के लिए कुछ किया गया। जयराम ठाकुर के नेतृत्व को कहीं से कोई चुनौती वाली स्थिति नहीं आयी। लेकिन मुख्यमंत्री के अपने ही गिर्द कुछ ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया जो शायद सत्ता के बहुत ज्यादा पात्र नहीं थे। यह लोग सत्ता से जुड़े लाभों को ऐसे बटोरने लगे कि आपस में ही इनके हितों में टकराव आना शुरू हो गया। यही टकराव पत्र बम्बों के रूप में उठना शुरू हुआ। इसका नजला हर किसी पर गिराना शुरू हो कर दिया। इन पत्र बम्बों को लेकर पुलिस तक मामले बनाये गये। कुछ लोगों पर निशाना साधना जारी रहा। लेकिन यह लोग इतने मदान्ध हो गये कि यह भी भूल गये कि वह अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। कुछ मामले तो ऐसे खड़े कर लिये गये जिनकी जांच से शायद मुख्यमंत्री भी नहीं बच पायेंगे।
इस तरह इन लोगों ने एक ऐसा वातावरण खड़ा कर दिया कि यह लोग निरंकुश हो गये। यह इसी निरंकुशता का परिणाम है कि उपचुनावों में चारों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। अब जिस तर्ज में शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज ने 2017 में पुराने नेतृत्व नेता और नीयत को हटाकर नया नेता लाने की बात की है उससे पार्टी के एक वर्ग में फिर से रोष पनपने की संभावनायें उभरने लग पड़ी हैं। इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि पार्टी हाईकमान इन ब्यानों और इन से उपजी स्थितियों का संज्ञान लेकर नेतृत्व के प्रश्न पर नये सिरे से विचार करने के लिये बाध्य हो जायेगा। पांच राज्यों के चुनाव के बाद नेतृत्व के सवाल के उभरने की पूरी संभावनायें बन रही हैं। क्योंकि जयराम ठाकुर को इन चुनावों के लिए हाईकमान ने उत्तराखंड भेजा था लेकिन वहां पर उनकी जनसभा में लोगों का होना जब नहीं के बराबर होकर रह गया तो उसे हाईकमान पुनःविचार के लिए बाध्य हो रहा है। अन्यथा यह माना जा रहा है कि जिस तरह से 2017 के नेतृत्व और उसकी नियत पर निशाना साधा गया है उससे पार्टी में धरूवीकरण बढ़ने की संभावना फिर बनना शुरू हो गयी है।
धर्मशाला पर्यटन निगम में वेतन देने का संकट हुआ खड़ा
शिमला/शैल। जयराम सरकार के कार्यकाल का अंतिम वर्ष चल रहा है। इसलिए यह वर्ष चुनावी वर्ष भी है। इस नाते सरकार की सारी घोषणाओं जो चुनाव घोषणा पत्र में की गयी थी और उसके बाद हर वर्ष पेश किये गये बजट प्रपत्रों में हुई उन सबका आकलन इस वर्ष में होना स्वभाविक है। इन सारी घोषणाओं को यदि एक साथ जोड़ा जाये तो इनकी संख्या कई दर्जन हो जाती है। इस चुनावी वर्ष में यह देखा जायेगा कि इन घोषणाओं की जमीनी हकीकत क्या है। सरकार के सभी विभागों के बड़े कार्यों का निष्पादन ठेकेदारों के माध्यम से करवाया जाता है। इसके लिये ठेकेदारों को ठेके दिये जाते हैं। ठेकेदारों द्वारा किये जा रहे कार्यों की जानकारी रखने के लिए सरकार ने 2018-19 के बजट भाषण में ही लोक निर्माण विभाग एवं सिंचाई तथा जन स्वास्थ्य विभागों में ूवतो डंदंहमउदमज प्दवितउंजपवद ैलेजमउ लागू करने की घोषणा की थी। इस योजना का अर्थ है कि ठेकेदारों और उसके द्वारा किये जा रहे काम के हर पक्ष की सूचना सरकार के पास उपलब्ध रहेगी।
अब जब शिमला और अन्य क्षेत्रों में भारी बर्फबारी के चलते सारे रास्ते रुक गये तो बर्फ हटाने रास्ते खोलने आदि के कार्यों के लिये इन ठेकेदारों की सेवाएं सरकार और नगर निगम को लेने की आवश्यकता पड़ी। तब यह सामने आया कि ठेकेदार तो हड़ताल पर हैं। और जब तक उनकी समस्याएं हल नहीं होंगी वह काम नहीं करेंगे। ठेकेदारों की समस्याओं में सबसे पहले यही आया कि उनकी 300 करोड़ से अधिक की पेमेंट का वर्षों से भुगतान नहीं हो रहा है। इसलिए वह काम नहीं करेंगे। ठेकेदारों की कुछ पेमेंट रूके होने का मुद्दा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भी एक प्रश्न के माध्यम से उठा था। इससे यह सवाल उठता है कि जब सरकार ने ठेकेदार और उनके कार्यों को लेकर एक सूचना तंत्र खड़ा करने की बात पहले ही बजट में कर दी थी तो फिर उसे ठेकेदारों की समस्याओं की जानकारी क्यों नहीं मिल पायी। लोक निर्माण विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री और सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग का प्रभार मुख्यमंत्री के बाद दूसरे सबसे ताकतवर मंत्री ठाकुर महेंद्र सिंह के पास है। सरकार कर्ज लेने के मामले में यह आरोप सह रही है कि प्रदेश को कर्ज के चक्रव्यू में फंसा दिया गया है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के समय-समय पर आये ब्यानों को सही माना जाये तो केंद्र सरकार प्रदेश को 2 लाख करोड से अधिक सहायता दे चुकी है। यह होने के बावजूद भी यदि सरकार ठेकेदारों का भुगतान न कर पाये और उन्हें हड़ताल करने की नौबत आ जाये तो सरकार के वित्तीय प्रबंधन और उसकी प्राथमिकताओं का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्मरणीय है कि एक समय सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले मंत्री ठाकुर महेंद्र सिंह की बेटी भी उसके पति का यही भुगतान न होने के लिए मण्डी में धरना दे चुकी हैं। इस धरने पर मुख्यमंत्री ने यह कहा था कि वह विभाग से यह पता करेंगे कि भुगतान क्यों रुका है।
यही नहीं धर्मशाला में पर्यटन निगम के करीब सौ कर्मचारियों को पिछले दो-तीन माह से वेतन नहीं मिल पाने की चर्चा है। निगम के पास पैसा न होने के कारण वेतन नहीं दिया जा सका है। पर्यटन निगम को सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 66.07 लाख का भुगतान नहीं किया गया है। धर्मशाला में शीत सत्र के दौरान माननीयों और अधिकारियों के आवभगत की जिम्मेदारी पर्यटन निगम को दी गयी थी। उसके एवज में यह भुगतान नहीं हो पाया है। यहां तक कि विधानसभा सचिवालय भी 3.80 लाख नहीं दे पाया है। स्मार्ट सिटी और केंद्रीय विश्वविद्यालय भी 5 लाख का भुगतान नहीं कर पाये हैं। पर्यटन निगम का अपना प्रशासन नियमों कानूनों का इतना जानकार है कि 40 करोड़ के टेंडरे की अरनैस्ट मनी बीस हजार ले रहा है। जो कि सरकार के वित्तीय नियमों का सीधा उल्लंघन है। 16 हाटेलों को लीज पर देने के मामले की सूचना पहले ही कैसे लीक हो गयी थी यह आज तक रहस्य बना हुआ है। संयोगवश पर्यटन का प्रभार भी मुख्यमंत्री के पास है। गृह विभाग में पुलिसकर्मियों के परिजनों को आंदोलन पर आना पड़ा है। एनएचएम और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी सड़कों पर आने के लिये विवश हो रहे हैं। ऐसे में चुनावी वर्ष में इन सारे मुद्दों का एक साथ उठ खड़े होना सरकार के लिए घातक माना जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से जहां कांगड़ा के विभाजन और वहां से कार्यालयों को मण्डी ले जाने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है। उसे भी राजनीतिक हलकों में गंभीरता से ले लिया जा रहा है।
जयराम भी लगे मुफ्त बिजली देने
कृषि मंत्री ने शुरू की पदयात्रा लेकिन किसानों की आय कैसे होगी दोगुनी इस पर रहे खामोश
शिमला/शैल। जयराम मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा और चार-पांच चेहरे इसकी चपेट में आयेंगे। यह चर्चा मीडिया के एक हिस्से में पूरी प्रमुखता से चल रही है। कहा जा रहा है कि यह सब पांच राज्यों के चुनाव के बाद होगा। यह चुनाव परिणाम दस मार्च को आयेंगे और विधानसभा का बजट सत्र इसी माह के अंतिम सप्ताह में शुरू हो जायेगा। इसका अर्थ होगा कि बजट सत्रा के दौरान कोई फेरबदल होना संभव नहीं होगा। इसी दौरान कांगड़ा जिला को तोड़कर यहां दो नये जिले बनाने की चर्चा भी चली । जिले तो अभी तक नहीं बने लेकिन कांगड़ा से कुछ विभागों के कार्यालयों को यहां से मंडी ले जाने का क्रम शुरू हो गया है। इसमें क्या-क्या घटता है यह देखना दिलचस्प होगा। हमीरपुर के कुछ चुनाव क्षेत्रों में भाजपा बनाम भाजपा शुरू हो गया है। कांगड़ा के नूरपुर से निक्का राम ने तो स्पष्ट कर दिया है कि वह टिकट न मिलने पर आजाद होकर चुनाव लड़ेंगे। कुछ लोग जिस तर्ज पर चेतन बरागटा का टिकट परिवारवाद के नाम पर कटा उसी तर्ज पर और टिकट काटे जाने की भूमिका तैयार करने लग गये हैं। इनके निशाने पर महेंद्र सिंह ठाकुर चल रहे हैं। वैसे सारे क्षेत्रों में विधायकों के अतिरिक्त दूसरे समांतर सत्ता केंद्र प्रभावी रूप से टिकट की दावेदारी के लिए तैयार हो गये हैं। पिछली बार उम्मीदवार रहे बहुत सारे लोगों के टिकट इस बार काटे जायेंगे। यह संकेत धर्मशाला में कार्यकारिणी की हुई विस्तारित बैठक के बाद से आने शुरू हो गये थे। इस तरह अगर प्रदेश भाजपा सरकार में अब तक घटे सब कुछ को इकटठे रख कर आंकलित किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री को पार्टी का एकछत्र नेता स्थापित करने के प्रयासों में लगातार लगा हुआ है। इसी वर्ग ने उपचुनाव में चार शुन्य होने को धूमल खेेमें के सिर लगाने का प्रयास किया था जिस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी है।
मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाओं के साथ ही जयराम के कुछ मंत्रियों ने अपने चुनाव क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान भी शुरू कर दिया है। संपर्क से समर्थन की कड़ी में कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर ने कई पंचायतों में पदयात्रा कर ली है और इस यात्रा के दौरान अपनी उपलब्धियों का ब्योरा लिखित में लोगों के बीच रखा है। यह दूसरी बात है कि प्रदेश का कृषि मंत्री होने के नाते अपने लोगों को यह जानकारी नहीं दे पाये हैं कि उनकी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने के लिए व्यवहारिक रूप से क्या कदम उठाये हैं।
शायद वह कुछ किसानों को सम्मान निधि दिये जाने को ही आय दोगुनी होना मान रहे हैं। वैसे तो मुख्यमंत्री ने भी विद्युत उपभोक्ताओं को बिजली बिलों में बड़ी राहत देने की घोषणा की है। उपभोक्ताओं को दी जाने वाली राहतओं की भरपाई 92 करोड़ बिजली बोर्ड को देकर करेगी। लेकिन यह ऐलान करते हुए यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कर्ज के चक्रव्यू में उलझी सरकार बिजली बोर्ड को यह 92 करोड कहां से देगी। क्या इसके लिए कर्ज लिया जायेगा या दूसरे उपभोक्ताओं की जेब पर डाका डालकर यह खैरात बांटी जायेगी।
इस परिदृश्य में यहां बड़ा स्वाल होगा जब पार्टी में अधिकांश स्थानों पर भाजपा बनाम भाजपा का वातावरण तैयार किया जा रहा है और सबसे बड़े जिले कांगड़ा के विभाजन और वहां से कार्यालयों को बदलकर मंडी लाने की नीति पर काम हो रहा है तो क्या इसे मंडी बनाम शेष हिमाचल करने की कवायद की जा रही है। या एक ऐसा वातावरण खड़ा किया जा रहा है जिसमें ‘‘मैं हूं और रहूंगा’’ को प्रैक्टिकल शक्ल देने की योजना बनाई जा रही है। क्या कांगड़ा से कार्यालयों को मंडी ले जाने पर वहां का नेतृत्व और जनता इसे खामोश रहकर स्वीकार कर लेगी। यदि कांगड़ा में इसका खुला विरोध होना शुरू हो जाता है तो क्या वहां से भाजपा कुछ भी हासिल करने में सफल हो पायेगी। फिर अभी तक केंद्रीय विश्वविद्यालय के मुद्दे पर भी व्यवहारिक रूप से कुछ नहीं हो पाया है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के साथ ही हिमाचल के नेतृत्व का प्रश्न एक बार फिर चर्चा का विषय बनेगा। शायद इसीलिए मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलों को अब तक अमली शक्ल नहीं दे पाये हैं। उपचुनाव में चार शुन्य होने के बाद विधानसभा परिणामों को लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है। विधानसभा परिणामों का असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा यह तय है। इसलिए यह माना जा रहा है कि इन व्यवहारिक स्थितियों का संज्ञान लेकर प्रदेश नेतृत्व पर कोई फैसला लिया जायेगा। क्योंकि उपचुनाव की हार के लिए धूमल ग्रुप को जिम्मेदार ठहराने से प्रदेश भाजपा के अंदर उठा हुआ तूफान बहुत गंभीर हो चुका है।
क्या आउटसोर्स कंपनिया कमीशन का माध्यम बन कर रह गयी है
एन एच एम में 23 वर्षों से हो रहा कर्मचारियों का उत्पीड़न
आर के एस, एस एम सी कर्मियों का भविष्य भी सवालों में
आउटसोर्स में 94 लोगों को मिला 23 करोड़ का कमीशन
पिछली सरकार में तय हुआ था कि वित्त
विभाग की पूर्व अनुमति के बिना नहीं होंगी यह भर्तिया
क्या जयराम सरकार में इस आदेश का पालन हुआ है?
शिमला/शैल। हिमाचल में रोजगार देने का सबसे बड़ा अदारा सरकार है। इस समय प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों का आंकड़ा दस लाख से पार हो चुका है। इसमें प्रतिवर्ष करीब सात हजार करोड़ की बढ़ौतरी होती है। ऐसे में यह सवाल अहम होता जा रहा है कि इन लोगों को रोजगार कब और कैसे मिलेगा? इसके लिये सरकार और उसकी नीतियों पर चर्चा करना बाध्यता हो जाती है क्योंकि एक समय हिमाचल सरकारी नौकरी देने वाले राज्यों में सिक्किम के बाद दूसरा बड़ा राज्य बन गया था। इसका अनुपात बढ़ गया था। इस पर फेयर लॉज में अधिकारियों की एक बड़ी बैठक हुई थी। जिसमें दीपक सानंन कमेटी ने कुछ सुझाव दिये थे। जिसके आधार पर योजना आयोग के साथ एक एमओयू साइन किया गया था। इसके बाद कई पदों की कटौती की गई थी। लेकिन आज प्रदेश त्रिपुरा और हरियाणा के बाद तीसरा राज्य हो गया है जहां बेरोजगारी 20ः से अधिक हो गयी है। यही नहीं हिमाचल में 1996 से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत ऑपरेट हो रही आधा दर्जन से अधिक स्वास्थ्य सेवाओं में नियुक्त हुये हजारों कर्मचारी आज तक 23 वर्षों से नियमित कर्मचारी नहीं है। कई तो सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। ऐसा इसलिये हुआ की एन एच एम कोई सरकारी विभाग न होकर एक सोसाइटी मात्र है। यही स्थिति रोगी कल्याण समितियों के तहत नियुक्त हुये कर्मचारियों की है।
शिक्षा विभाग में भी एसएमसी के माध्यम से नियुक्त किये गये अध्यापकों की है। स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षण आज तक प्राइवेट हाथों में है। इसके लिये अब तक कोई नीति नहीं बन पायी है। अब इसके साथ आउट सोर्स के माध्यम से सरकार के विभिन्न विभागों में लगे हजारों कर्मचारियों की समस्या जुड़ गयी है। क्योंकि यह सारे कर्मचारी तो किसी सरकारी सोसाइटी के भी नहीं है। इन्हें तो प्राइवेट कंपनियों के माध्यम से रखा गया है। इन कंपनियों का तो पंजीकरण भी भारत सरकार के संस्थान नाईलेट के माध्यम से है। आउटसोर्स की अवधारणा के मुताबिक केवल प्रौद्योगिकी के प्रयोग से जुड़ी सेवाएं ही थोड़े समय के लिए आउटसोर्स की जा सकती हैं ताकि इसमें कितने समय में नियमित लोग ट्रेण्ड हो सके। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। कंपनी सरकार के कर्मचारियों को ट्रेनिंग देगी और उसके लिए ही कमीशन लेगी। नाईलेट में इसी आधार पर इनका पंजीकरण होता है। इस आधार पर ही आउटसोर्स की व्याख्या बदलकर इसे लागू करना बुनियाद बुनियाद से ही गलत है।
इससे हटकर इस समय जिस तरीके से इसके माध्यम से भर्तियां की जा रही हैं उसमें मैरिट और आरक्षण के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि वह तब संभव है जब कंपनी कुछ किसी तरह की नौकरियां विज्ञापित करें। कंपनी ऐसा तब कर पायेगी जब उसके पास सरकार या किसी अन्य की कोई एडवांस में निश्चित डिमाण्ड होगी। सरकार को भी ऐसा करने के लिये विज्ञप्ति जारी करके कंपनियों से आफर आमंत्रित करने होंगे। नाईलेट के भीतर की प्रक्रिया की जानकारी रखने वालों को इसकी जानकारी है। लेकिन इस समय नाईलेट से लेकर सरकार तक सब नियमों की अनदेखी कर रहे हैं।
इसीलिये सरकार आज तक आउटसोर्स के कर्मचारियों के लिए कोई पॉलिसी नहीं बना पायी है। जब पिछली सरकार के दौरान इन कर्मचारियों ने नीति बनाने की मांग रखी थी तब यह सामने आया था कि करीब 35000 कर्मचारी आउट सोर्स के माध्यम से लगे हुये हैं। तब इनके लिए भी छुट्टी आदि की व्यवस्था की गयी थी। विभागों को यह निर्देश दिए गए थे कि भविष्य में वित्त विभाग की पूर्व अनुमति के बिना आउटसोर्स से कोई भर्ती नहीं होगी। लेकिन जब जयराम सरकार में पहली बार 2020 में यह मुद्दा उठा तब सदन को बताया गया कि 31-7- 2019 तक आउट सोर्स के माध्यम से 12165 कर्मचारी भर्ती किये गये हैं। यह भी जानकारी दी गयी कि इसके लिये 94 कंपनियों को 23.09 करोड़ का कमीशन दिया गया है। लेकिन यह नहीं बताया कि इसके लिए वित्त विभाग की पूर्व अनुमति ली गयी है या नहीं। इसके बाद 2021 में भी यह मुद्दा उठा। कांग्रेस के इंद्रदत लखन पाल और मुकेश अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि सरकार ने आठ हजार भर्तियां कर ली हैं आउटसोर्स से और इनमें अकेले दो विधानसभा क्षेत्रों धर्मपुर और सिराज से ही पांच हजार भर्ती कर लिये हैं। बेरोजगारी का आलम यह है कि इस सरकार ने 1195 पटवारी भर्ती करने के लिये आवेदन आमंत्रित किये थे जिसमें तीन लाख आवेदन आये। लेकिन इनका परिणाम क्या हुआ सब जानते हैं। सरकार अब तक 4 वर्षों में केवल 23,000 लोगों को ही रोजगार दे पायी है। जबकि 2021-22 के बजट में ही वर्ष में 30,000 भर्तियां करने का वादा किया गया था जो पूरा नहीं हुआ है। इस समय एनएचएम, आर के एस, एस एम सी और आउटसोर्स के माध्यम से करीब एक लाख कर्मी सेवाएं दे रहे हैं। जिनका कोई भविष्य नहीं है। नियमित के बराबर वेतन तक नहीं मिल रहा है। आउटसोर्स कंपनियां केवल कमीशन खाने का साधन बनकर रह गयी हैं। चर्चा है कि महेंद्र सिंह कमेटी ने 142 कंपनियों को पत्र लिखा था जिसमें से शायद बाईस का ही जवाब आया है। इससे यह अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि एक ही व्यक्ति कई कई कंपनियां चला रहा है।
शिमला/शैल। पिछले दिनों वेब साइट्स के मीडिया कर्मियों ने मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा था और वेबसाइट के लिए पॉलिसी बनाने की मांग की थी। इन मीडिया कर्मियों का आरोप था कि पिछले 4 साल से जयराम सरकार लगातार पॉलिसी बनाने का आश्वासन देती आ रही है। लेकिन व्यवहार में कुछ नहीं हुआ है। इस ज्ञापन के बाद अब अतिरिक्त मुख्य सचिव सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से एक विज्ञप्ति जारी करके यह कहा गया है कि वित्त विभाग ने यह पॉलिसी बनाये जाने के लिये अपनी सहमति दे दी है। इस पर 15 फरवरी तक मीडिया कर्मियों से सुझाव मांगे गये हैं। यह सुझाव आने के बाद पॉलिसी का फाईनल ड्राफ्ट तैयार होगा और वर्ष के अंत तक पॉलिसी बनकर तैयार होगी। इसी बीच अतिरिक्त मुख्य सचिव सूचना एवं जनसंपर्क विभाग अभी सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उनके स्थान पर नया सचिव नियुक्त होगा और उसे भी इस मामले को समझने के लिए कुछ समय चाहिए ही होगा। उसके बाद चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी और फिर पॉलिसी बनाने का यह काम अगली सरकार के लिए छोड़ दिया जायेगा। सरकारी तंत्र की कार्यशैली को समझने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि यही होगा। हो सकता है मुख्यमंत्री को यह जानकारी ही न हो कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को कोई और ही ताकत संचालित कर रही है अन्यथा कोई भी मुख्यमंत्री ऐसे क्यों करेगा कि वह विज्ञापनों को लेकर सदन में पूछे गये सवाल का हर बार यही उत्तर दें कि सूचना एकत्रित की जा रही है। जबकि हर आदमी जानता है कि किसे करोड़ों के विज्ञापन सरकार ने दिये और किसे एक पैसे का भी विज्ञापन नहीं मिला।
इस परिदृश्य में यदि पॉलिसी के लिए सुझाव की बात की जाये तो सबसे पहले नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि सूचना एवं जनसंपर्क होता क्या है। क्या विभाग के सचिव और निदेशक का अपना कोई जनता से संपर्क होता है? क्या कभी इन लोगों ने जन से संपर्क बनाने का प्रयास किया है? शायद नही। यदि कोई संपर्क होता तो इन्हें सरकार की नीतियों की जमीनी हकीकत पता होती। यह विभाग प्रशासनिक अधिकारियों का काम नहीं है यह समझना जरूरी है। जनसंपर्क का दूसरा बड़ा हिस्सा है सूचना। यह सूचना प्राप्त करने के लिये जनता से संपर्क और संवाद चाहिये। जनता अपने भीतर की बात तब खुलकर बताती है जब उसे सुनने वाले पर विश्वास हो। हर पीड़ित व्यक्ति इस स्थिति में नहीं होता है कि वह प्रशासन के सामने बेबाकी से अपनी बात रख सके क्योंकि उसकी शिकायत का आधार कारण ही संबद्ध प्रशासन का व्यवहार होता है। लेकिन प्रशासन सच्चाई सुनने और झेलने को तैयार नहीं होता है। इसलिए जनप्रतिनिधियों मंत्रियों या मुख्यमंत्री के पास कभी भी सही जानकारी पहुंचती ही नहीं है। इसी में गोदी मीडिया की भूमिका आ जाती है। वह प्रशासन द्वारा परोसी गई जानकारी ही जनता की स्थिति बनाकर राजनेताओं को परोस देता है और उसी को सब अंतिम सच मानकर चल पड़ते हैं। यही कारण है कि मीडिया द्वारा सब हरा ही हरा दिखाने के बाद परिणाम भयंकर सूखे के रूप में सामने आता है। आज मीडिया ने सत्ता से सवाल पूछने की बजाये विपक्ष से सवाल करने की नीति अपना रखी है क्योंकि उसे सत्ता और उसके माध्यम से करोड़ों के विज्ञापन चाहिये। आज मीडिया जनता का पैरोकार होने के बजाय सत्ता का संदेशवाहक होकर रह गया है। यहां फिर नीति निर्माताओं को यह तय करना होगा कि वह किस का पक्षधर होकर नीति बनाना चाहते हैं जनता या सत्ता का।
आज भी जनता अपना दुख मीडिया के माध्यम से सत्ता तक पहुंचाना चाहती है। जो तीखा सवाल जनता सत्ता से सीधा नहीं पुछ पाती है वहां वह सवाल मीडिया से अपेक्षा करती है कि वह पूछे। जो मीडिया सत्ता से तीखा सवाल पूछने का साहस करता है। दस्तावेजी प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने रखता है उसे सत्ता का दुश्मन मान कर उसका गला घोंटने का प्रयास किया जाता है। लेकिन जो मीडिया सत्ता की नाराजगी से न डर कर जनता के साथ खड़ा रहता है वही जनता का विश्वसनीय बन जाता है और उसके आकलन सही प्रमाणित होते हैं। लेकिन सत्ता को वह मीडिया चाहिये जो उसके स्वर में स्वर मिलाकर तबलिगी समाज को कोरोना बम्ब करार दे। हिमाचल में सत्ता और जनता के बीच इसी गोदी मीडिया के कारण इतनी दूरी बन चुकी है जिसे पाट पाना वर्तमान सत्ता के वश में नहीं रह गया है। पहले चार नगर निगम और उसके बाद विधानसभा लोकसभा उपचुनाव में यह सामने आ भी चुका है। आज मीडिया से जुड़ा हर आदमी यह जानता है कि इसका नीति संचालन इन अधिकारियों के हाथ में है ही नहीं। यह तो उस संचालक के हाथों की कठपुतली बनकर अपनी पोस्टिंगज के जुगाड़ में लगे हुये हैं। क्योंकि कुछ को सेवानिवृत्ति के बाद भी पद चाहिये। ऐसे लोगों के हाथों यह उम्मीद करना संभव ही नहीं है कि सरकार मीडिया पॉलिसी बनाने के प्रति ईमानदार हो सकती है। क्योंकि चुनावों में प्रतिष्ठा अधिकारियों की नहीं बल्कि राजनेताओं की होती है। अन्यथा मीडिया की पहली आवश्यकता यही होती है कि उसके साथ विज्ञापनों के आवंटन में पक्षपात न हो। लघु समाचार पत्रों के लिये केंद्र ने यह नियम बना रखा है कि वह प्रिंट के साथ अपनी वेबसाइट भी अवश्य बनायें। प्रिंट के साथ सोशल मीडिया के मंचों पर भी जो नियमित रूप से उपलब्ध रहे उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिये। क्योंकि सवाल तो ज्यादा से ज्यादा प्रसार का है। चाहे वह सरकार की नीतियों का हो या उससे सवाल पूछने का। लेकिन जिस सरकार में पत्रों का जवाब देने का ही चलन न हो उससे निष्पक्ष नीति और उस पर निष्पक्ष अमल की उम्मीद कितनी की जानी चाहिये।