2021-22 में 50,192 करोड़ का बजट पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ का कर्ज लिया जायेगा
इस वर्ष करों और गैर करों से 7938.14 करोड़ ही मिलेंगे
केन्द्रीय करों का हिस्सा भी 22672 करोड़ ही रहने की संभावना है
30,000 करोड़ की आय से 50,000 करोड का खर्च कैसे होगा
25 करोड़ की लागत से बने होटल सिराज को प्राइवेट सेक्टर को देने की चर्चा
शिमला/शैल। जयराम सरकार इस माह दो हजार करोड़ का ऋण लेने जा रही है। इसके लिए भारत सरकार से वांच्छित अनुमति ले ली गया है। इसमें कुछ पैसा प्रतिभूतियों की नीलामी से जुटाया जा रहा है। इसके लिए 18 नवम्बर को आरबीआई को लिखे पत्र में कहा गया है कि सरकार को यह कर्ज विकास कार्यों में निवेश के लिये चाहिये। परंतु इस संद्धर्भ छपे समाचारों में यह कहा गया कि सरकार को वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए पैसा चाहिये। सरकार के वित्तीय प्रबंधन के लिए एफआरबीएम अधिनियम पारित है। इस अधिनियम के अनुसार सरकार अपने प्रतिबद्ध खर्चे पूरा करने के लिए कर्ज नहीं ले सकती। कर्ज केवल जन विकासात्मक कार्यों के लिए लिया जा सकता है जिनसे नियमित रूप से राजस्व आय होगी। एफआरबीएम की धारा सात में इसका स्पष्ट उल्लेख है और इसकी खुलकर अवहेलना हो रही है। ऐसा इसलिये है क्योंकि इसी अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि किसी भी आर्थिक फैसले के लिए कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी का लाभ उठाकर अफसरशाही केवल कर्ज लेकर घी पीने के सिद्धांत पर चल रही है।
स्मरणीय है कि जब मुख्यमंत्री जयराम ने अपना पहला बजट भाषण नौ मार्च 2018 को सदन में पड़ा था तब यह कहा था कि सरकार को 46385 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। यह भी कहा था कि पूर्व सरकार ने 18000 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज ले रखा है। आज यदि कर्ज पर नजर डाली जाये तो यह आंकड़ा इस इसी वित्तीय वर्ष के अंत तक 70,000 करोड़ से भी पार चला जायेगा यह स्थिति बनी हुई है। प्रदेश का कर्ज भार जितना बढ़ता जायेगा उसका सीधा असर रोजगार और महंगाई पर पड़ेगा। इसलिए आज जनता के सामने यह रखा जाना चाहिये कि यह कर्ज कौन से विकास कार्यों पर खर्च हो रहा है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 2021-22 के लिए 50192 करोड़ के कुल खर्च का बजट सदन में रखा है। इस कुल खर्च में सरकार के पास कर राजस्व से 5184.49 करोड़ और गैर कर राजस्व से 2753.65 मिलेगा अर्थात करों से कुल 7938.14 करोड़ मिलेगा। इस वर्ष की वार्षिक योजना 9405 करोड़ की है जिसमें 90% केंद्र से मिलेगा और 10% अपने साधनों से जुटाना पड़ेगा। केंद्रीय करों में हिस्से के तहत पिछले वर्ष 22672 करोड़ मिलने का अनुमान था। कोरोना के कारण केंद्र और राज्य सरकारों सभी के राजस्व पर असर पड़ा है। उसके चलते यह माना जा सकता है कि इस बार भी केंद्रीय हिस्से के रूप में 22672 करोड़ तो मिल ही जायेंगा। इस तरह प्रदेश की कुल आय 30610.14 करोड़ रहेगी। लेकिन इस तीस हजार करोड़ की आय के मुकाबले सरकार का कुल खर्च 50,000 करोड़ का है। इसका सीधा अर्थ है कि यह खर्च पूरा करने के लिए सरकार को बीस हजार करोड़ लेना पड़ेगा।
इस वस्तु स्थिति में सरकार से यह सवाल करना आवश्यक हो जाता है कि वह यह बीस हजार करोड़ का निवेश कहां कर रही है और उससे कितना राजस्व सरकार को कितने समय में मिलेगा? यह जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि सरकार जिस तरह से दो मंजिला मकानों में लिफ्ट लगा रही है और शिमला में ही कर्ज के पैसे से 50 लाख में शौचालय और 35 लाख में वर्षाशालिका का निर्माण करती रही तो आम आदमी ऐसे खर्च को विकास के स्थान पर कर्ज लेकर घी पीने की ही संज्ञा देगा। क्योंकि जब एशियन विकास बैंक के पैसे से सरकार होटल बनाकर उसे पहले ही दिन से चलाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को दे देगी तो उसके वित्तीय प्रबंधन पर तो सवाल उठेंगे ही। चर्चा है कि मण्डी के जंजैहली में सरकार ने एशियन विकास बैंक के वित्तपोषण से 25 करोड़ की लागत से होटल सिराज का निर्माण किया है। लेकिन इस होटल को एचपीटीडीसी द्वारा चलाने के बजाये प्राइवेट सेक्टर को दिया जा रहा है। इस निर्णय से सरकार को नियमित आय हो सकती है यदि एचपीटीडीसी इसे स्वयं चलाये तो। ऐसा कई और जगह भी हो रहा है जिसकी चर्चा आने वाले दिनों में की जाएगी।
पढ़ाई छोड़ने की कगार पर पहुंचे सैकड़ों छात्र
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों को पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति प्रदान करती है। यह छात्रवृत्ति सरकारी और प्राइवेट तथा हिमाचल या हिमाचल से बाहर पोस्ट मैट्रिक शिक्षा ग्रहण कर रहे प्रदेश के बच्चों को दी जाती है। इस योजना के तहत पंजाब के मोहाली स्थित वी.जे.ई.एस. गु्रप शिक्षण संस्थान में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में प्रदेश के कई बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन इन छात्रों को वर्ष 2017, 2018 और 2019 से यह भुगतान नहीं किया जा रहा है। शिक्षा विभाग भुगतान न किए जाने के कारणों से इन छात्रों और इनके अभिभावकों को कोई भी संतोषजनक कारण नहीं बता रहा है। जबकि छात्रों ने इसके लिए वांच्छित सारे सत्यापित दस्तावेज समय पर विभाग को भेज रखे हैं। इस छात्रवृत्ति के सहारे ही इन वर्गों के छात्र ऐसे संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन जब उन्हें सरकार से उचित समय पर यह छात्रवृत्ति ही नहीं मिलेगी तो यह लोग पढ़ाई कैसे जारी रख पायेंगे यह एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
पिछले दिनों एससी वर्ग के लोगों ने शिमला में एक आयोजन करके यह आरोप लगाया था कि सरकार इन वर्गों के लिए आवंटित बजट का केवल 7% ही इनके लिए खर्च कर रही है इस आशय का एक ज्ञापन भी राज्यपाल को सौंपा गया है। लेकिन इसके बावजूद व्यवहारिक स्थिति यह है।
यही नहीं इन वर्गों के नेताओं के लिए भी यह सवाल बना हुआ है क्योंकि इस समय सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी एस सी समुदाय से हैं। सरकार में मंत्री भी ओबीसी समुदाय से हैं। अभी जब स्वर्ण आयोग के गठन को लेकर 300 किलोमीटर की पदयात्रा और शिमला में स्वर्ण आयोग के समर्थकों द्वारा आरक्षण की शव यात्रा निकालने का मामला गरमाया तब एस सी के नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। इसे संविधान का अपमान बताकर उच्च न्यायालय से इस आश्य की याचिका दायर करने की बात की। लेकिन इन लोगों के लिए सैकड़ों बच्चों की यह समस्या कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं रख रही है। बल्कि इससे यही संदेश जाता है कि इन वर्गों के नेताओं के लिए इनके नाम पर राजनीति करना ही प्राथमिकता है इनकी समस्याओं का हल नही।
शिमला/शैल। जयराम सरकार अटल आशीर्वाद योजना के तहत नवजात शिशुओं और उनकी माताओं के लिये एक बेबी किट दे रही है। इस किट मेंं कुल 15 चीजें रखी गई हैं जो नवजात जच्चा-बच्चा दोनों के लिए उपयोगी मानी गयी है। 2019 से यह योजना लागू है। अभी कोविड कॉल में 01-04-2020 से 31-01-2021 तक 104738 किट खरीदी गयी है। इसके लिये ई- टेंडर के माध्यम से निविदायें मांगी गयी और इसमें 8 फर्मां ने भाग लिया। यह किट प्रदेश के स्वास्थय संस्थानों को दिए गए हैं। यह खरीद 1074.98 रुपए प्रति किट के हिसाब से हुई है। इस पर आम चर्चा है कि जो किट सरकार ने 1074.98 में खरीदी है उसकी बाजार में कीमत 500 से 600 के बीच है। उप चुनावों के दौरान सोलन से कांग्रेस नेता कुशल जेठी ने एक पत्रकार वार्ता में यह मुद्दा उठाया था और इस पर जांच की मांग की थी। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है।
स्मरणीय है की 24 मार्च 2020 को कोरोना के कारण पूरे देश में लाकडाउन लग गया था। उस दौरान अस्पतालों की वर्किंग भी प्रभावित हुई थी । लोगों ने अस्पताल जाना छोड़ दिया था। इस दौरान कैसे यह किट प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचे होंगे यह अपने में एक सवाल बनकर खड़ा है और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी अधिकारी इस पर कुछ भी नही कह पा रहे हैं। इसी कारण से करोड़ों की इस खरीद पर सवाल उठ रहे हैं।