Thursday, 05 February 2026
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सरकार के वितीय प्रबन्घन पर उठने लगे सवाल

2021-22 में 50,192 करोड़ का बजट पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ का कर्ज लिया जायेगा
इस वर्ष करों और गैर करों से 7938.14 करोड़ ही मिलेंगे
केन्द्रीय करों का हिस्सा भी 22672 करोड़ ही रहने की संभावना है
30,000 करोड़ की आय से 50,000 करोड का खर्च कैसे होगा
25 करोड़ की लागत से बने होटल सिराज को प्राइवेट सेक्टर को देने की चर्चा

 शिमला/शैल। जयराम सरकार इस माह दो हजार करोड़ का ऋण लेने जा रही है। इसके लिए भारत सरकार से वांच्छित अनुमति ले ली गया है। इसमें कुछ पैसा प्रतिभूतियों की नीलामी से जुटाया जा रहा है। इसके लिए 18 नवम्बर को आरबीआई को लिखे पत्र में कहा गया है कि सरकार को यह कर्ज विकास कार्यों में निवेश के लिये चाहिये। परंतु इस संद्धर्भ छपे समाचारों में यह कहा गया कि सरकार को वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए पैसा चाहिये। सरकार के वित्तीय प्रबंधन के लिए एफआरबीएम अधिनियम पारित है। इस अधिनियम के अनुसार सरकार अपने प्रतिबद्ध खर्चे पूरा करने के लिए कर्ज नहीं ले सकती। कर्ज केवल जन विकासात्मक कार्यों के लिए लिया जा सकता है जिनसे नियमित रूप से राजस्व आय होगी। एफआरबीएम की धारा सात में इसका स्पष्ट उल्लेख है और इसकी खुलकर अवहेलना हो रही है। ऐसा इसलिये है क्योंकि इसी अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि किसी भी आर्थिक फैसले के लिए कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी का लाभ उठाकर अफसरशाही केवल कर्ज लेकर घी पीने के सिद्धांत पर चल रही है।

स्मरणीय है कि जब मुख्यमंत्री जयराम ने अपना पहला बजट भाषण नौ मार्च 2018 को सदन में पड़ा था तब यह कहा था कि सरकार को 46385 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। यह भी कहा था कि पूर्व सरकार ने 18000 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज ले रखा है। आज यदि कर्ज पर नजर डाली जाये तो यह आंकड़ा इस इसी वित्तीय वर्ष के अंत तक 70,000 करोड़ से भी पार चला जायेगा यह स्थिति बनी हुई है। प्रदेश का कर्ज भार जितना बढ़ता जायेगा उसका सीधा असर रोजगार और महंगाई पर पड़ेगा। इसलिए आज जनता के सामने यह रखा जाना चाहिये कि यह कर्ज कौन से विकास कार्यों पर खर्च हो रहा है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 2021-22 के लिए 50192 करोड़ के कुल खर्च का बजट सदन में रखा है। इस कुल खर्च में सरकार के पास कर राजस्व से 5184.49 करोड़ और गैर कर राजस्व से 2753.65 मिलेगा अर्थात करों से कुल 7938.14 करोड़ मिलेगा। इस वर्ष की वार्षिक योजना 9405 करोड़ की है जिसमें 90% केंद्र से मिलेगा और 10% अपने साधनों से जुटाना पड़ेगा। केंद्रीय करों में हिस्से के तहत पिछले वर्ष 22672 करोड़ मिलने का अनुमान था। कोरोना के कारण केंद्र और राज्य सरकारों सभी के राजस्व पर असर पड़ा है। उसके चलते यह माना जा सकता है कि इस बार भी केंद्रीय हिस्से के रूप में 22672 करोड़ तो मिल ही जायेंगा। इस तरह प्रदेश की कुल आय 30610.14 करोड़ रहेगी। लेकिन इस तीस हजार करोड़ की आय के मुकाबले सरकार का कुल खर्च 50,000 करोड़ का है। इसका सीधा अर्थ है कि यह खर्च पूरा करने के लिए सरकार को बीस हजार करोड़ लेना पड़ेगा।
इस वस्तु स्थिति में सरकार से यह सवाल करना आवश्यक हो जाता है कि वह यह बीस हजार करोड़ का निवेश कहां कर रही है और उससे कितना राजस्व सरकार को कितने समय में मिलेगा? यह जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि सरकार जिस तरह से दो मंजिला मकानों में लिफ्ट लगा रही है और शिमला में ही कर्ज के पैसे से 50 लाख में शौचालय और 35 लाख में वर्षाशालिका का निर्माण करती रही तो आम आदमी ऐसे खर्च को विकास के स्थान पर कर्ज लेकर घी पीने की ही संज्ञा देगा। क्योंकि जब एशियन विकास बैंक के पैसे से सरकार होटल बनाकर उसे पहले ही दिन से चलाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को दे देगी तो उसके वित्तीय प्रबंधन पर तो सवाल उठेंगे ही। चर्चा है कि मण्डी के जंजैहली में सरकार ने एशियन विकास बैंक के वित्तपोषण से 25 करोड़ की लागत से होटल सिराज का निर्माण किया है। लेकिन इस होटल को एचपीटीडीसी द्वारा चलाने के बजाये प्राइवेट सेक्टर को दिया जा रहा है। इस निर्णय से सरकार को नियमित आय हो सकती है यदि एचपीटीडीसी इसे स्वयं चलाये तो। ऐसा कई और जगह भी हो रहा है जिसकी चर्चा आने वाले दिनों में की जाएगी।

अभी तक जारी नहीं हो पायी एससी एसटी ओबीसी छात्रों की छात्रवृत्ति

पढ़ाई छोड़ने की कगार पर पहुंचे सैकड़ों छात्र
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों को पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति प्रदान करती है। यह छात्रवृत्ति सरकारी और प्राइवेट तथा हिमाचल या हिमाचल से बाहर पोस्ट मैट्रिक शिक्षा ग्रहण कर रहे प्रदेश के बच्चों को दी जाती है। इस योजना के तहत पंजाब के मोहाली स्थित वी.जे.ई.एस. गु्रप शिक्षण संस्थान में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में प्रदेश के कई बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन इन छात्रों को वर्ष 2017, 2018 और 2019 से यह भुगतान नहीं किया जा रहा है। शिक्षा विभाग भुगतान न किए जाने के कारणों से इन छात्रों और इनके अभिभावकों को कोई भी संतोषजनक कारण नहीं बता रहा है। जबकि छात्रों ने इसके लिए वांच्छित सारे सत्यापित दस्तावेज समय पर विभाग को भेज रखे हैं। इस छात्रवृत्ति के सहारे ही इन वर्गों के छात्र ऐसे संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन जब उन्हें सरकार से उचित समय पर यह छात्रवृत्ति ही नहीं मिलेगी तो यह लोग पढ़ाई कैसे जारी रख पायेंगे यह एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
पिछले दिनों एससी वर्ग के लोगों ने शिमला में एक आयोजन करके यह आरोप लगाया था कि सरकार इन वर्गों के लिए आवंटित बजट का केवल 7% ही इनके लिए खर्च कर रही है इस आशय का एक ज्ञापन भी राज्यपाल को सौंपा गया है। लेकिन इसके बावजूद व्यवहारिक स्थिति यह है।
यही नहीं इन वर्गों के नेताओं के लिए भी यह सवाल बना हुआ है क्योंकि इस समय सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी एस सी समुदाय से हैं। सरकार में मंत्री भी ओबीसी समुदाय से हैं। अभी जब स्वर्ण आयोग के गठन को लेकर 300 किलोमीटर की पदयात्रा और शिमला में स्वर्ण आयोग के समर्थकों द्वारा आरक्षण की शव यात्रा निकालने का मामला गरमाया तब एस सी के नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। इसे संविधान का अपमान बताकर उच्च न्यायालय से इस आश्य की याचिका दायर करने की बात की। लेकिन इन लोगों के लिए सैकड़ों बच्चों की यह समस्या कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं रख रही है। बल्कि इससे यही संदेश जाता है कि इन वर्गों के नेताओं के लिए इनके नाम पर राजनीति करना ही प्राथमिकता है इनकी समस्याओं का हल नही।

बेबी केयर किट खरीद पर उठते सवालों का जवाब कब आयेगा

शिमला/शैल। जयराम सरकार अटल आशीर्वाद योजना के तहत नवजात शिशुओं और उनकी माताओं के लिये एक बेबी किट दे रही है। इस किट मेंं कुल 15 चीजें रखी गई हैं जो नवजात जच्चा-बच्चा दोनों के लिए उपयोगी मानी गयी है। 2019 से यह योजना लागू है। अभी कोविड कॉल में 01-04-2020 से 31-01-2021 तक 104738 किट खरीदी गयी है। इसके लिये ई- टेंडर के माध्यम से निविदायें मांगी गयी और इसमें 8 फर्मां ने भाग लिया। यह किट प्रदेश के स्वास्थय संस्थानों को दिए गए हैं। यह खरीद 1074.98 रुपए प्रति किट के हिसाब से हुई है। इस पर आम चर्चा है कि जो किट सरकार ने 1074.98 में खरीदी है उसकी बाजार में कीमत 500 से 600 के बीच है। उप चुनावों के दौरान सोलन से कांग्रेस नेता कुशल जेठी ने एक पत्रकार वार्ता में यह मुद्दा उठाया था और इस पर जांच की मांग की थी। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है।
स्मरणीय है की 24 मार्च 2020 को कोरोना के कारण पूरे देश में लाकडाउन लग गया था। उस दौरान अस्पतालों की वर्किंग भी प्रभावित हुई थी । लोगों ने अस्पताल जाना छोड़ दिया था। इस दौरान कैसे यह किट प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचे होंगे यह अपने में एक सवाल बनकर खड़ा है और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी अधिकारी इस पर कुछ भी नही कह पा रहे हैं। इसी कारण से करोड़ों की इस खरीद पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस की जनचेतना यात्रा से उठते कुछ सवाल

शिमला/शैल। प्रदेश में हुए उपचुनाव में चारों सीटें जीतने के बाद कांग्रेस ने जन चेतना यात्रा शुरू की है। प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर इस यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में जाएंगे । राठौड़ जहां भी जा रहे हैं उन्हें वहां पर कार्यकर्ताओं और जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है । यह समर्थन प्रमाणित कर रहा है जनता सही में वर्तमान सरकार से खुश नहीं है। महंगाई और बेरोजगारी ने हर आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित किया हुआ है। इन्हीं मुद्दों पर जनता को और जागरूक किया जा रहा है । इस यात्रा में स्थानीय नेताओं और संबंधित जिला के नेताओं को शामिल किया जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में इस तरह की यात्रा आवश्यक है ताकि जनता ने जो नाराजगी इन उपचुनावों में सरकार के प्रति दिखाई है उसे अगले चुनावों तक बरकरार रखा जा सके ।यह यात्रा जहां कांग्रेस की राजनीतिक आवश्यकता है वहीं पर इस यात्रा से कुछ सवाल भी उभरे हैं।
यह सही है कि इस समय महंगाई और बेरोजगारी से हर आदमी परेशान है। लेकिन कल को यदि महंगाई पर सरकार नियंत्रण कर लेती है और कुछ आवश्यक चीजों की कीमतें घटा दी जाती हैं तब भी क्या यह नाराजगी बरकरार रहेगी? इस सवाल पर यात्रा में यह नहीं बताया जा रहा है कि इस महंगाई और बेरोजगारी के मूल कारण क्या है। वह कौन सी आर्थिक नीतियां हैं जिनके कारण यह सब हो रहा है। जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि आज बैंकों का एनपीए ढाई लाख करोड़ से बढ़कर दस खरब करोड़ क्यों हो गया है । सरकार कृषि कानूनों को वापस क्यों नहीं ले रही है । इन कानूनों का दुष्प्रभाव किसान ही नहीं हर आदमी पर पड़ेगा । जनता को बुनियादी मुद्दों पर जागरूक करने की आवश्यकता है जो शायद नहीं किया जा रहा है।
इससे भी बड़ा सवाल यह है की इस यात्रा में कुलदीप राठौर के साथ प्रदेश स्तर के अन्य नेता एक टीम की शक्ल में देखने को नहीं मिल रहे हैं । इस समय कांग्रेस से यह सवाल पूछा ही जाएगा कि उसका अगला नेता कौन है। मुख्यमंत्री का संभावित चेहरा कौन होगा? यदि इस यात्रा में राठौर के साथ नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री , सी डब्लयू सी सदस्य आशा कुमारी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुक्खू और कौल सिंह ठाकुर तथा मीडिया प्रमुख की जिम्मेदारी निभा रहे हर्षवर्धन चौहान साथ होते तो इससे टीम की शक्ल में पार्टी की एकजुटता का संदेश जाता। बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में यह सवाल उछले।

2018 में प्रदूषण बोर्ड के अध्यक्ष पद के लिए आये आवेदनों पर अब तक फैसला क्यों नही

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए नये नियम
शिमला/शैल। इन दिनों प्रदूषण को लेकर दिल्ली में जो स्थिति बनी हुई है उसने पूरे देश का ही नहीं वरन पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार से केंद्र सरकार तक को इसमें कड़ी फटकार लगायी है। सर्वोच्च न्यायालय की प्रताड़ना से यह सवाल उठ रहा है कि इसका केंद्र और राज्य सरकारों पर असर कितना हो रहा है। नवम्बर 2017 में एनजीटी ने एक फैसले में शिमला और अन्य प्लानिंग क्षेत्रों में भवन निर्माण को लेकर निर्देश दिये थे कि यहां पर अढाई मंजिल से ज्यादा के निर्माण ना हो। यह भी निर्देश दिए थे कि 1978 से चली आ रही अन्तरिम योजना के स्थान पर नई और स्थायी योजना लाई जाये। लेकिन एनजीटी के इन निर्देशों का कितनी इमानदारी से पालन हुआ है इसका अन्दाजा इस दौरान बने दर्जनों बहुमंजिला भवनों से लगाया जा सकता है। पिछले दिनों कच्ची घाटी में एक आठ मंजिला भवन के गिरने के बाद कुछ दिन सक्रियता नजर आयी जो अब गायब है। बल्कि अब तो नयी योजना लायी गयी है वह एकदम एनजीटी के आदेशों को अंगूठा दिखाने जैसी है क्योंकि इसमें कोर एरिया में भी चार मंजिला निर्माणों की स्वीकृति देने की बात की गयी है। सरकार का टी सी पी विभाग यह योजना ला रहा है। इस पर जनता और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रतिक्रिया क्या होगी यह आने वाले दिनों में पता लगेगा। लेकिन इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार अदालत के फैसलों को कितनी अहमियत देती है।
स्मरणीय है कि 2017 में ही सर्वोच्च न्यायालय में एक और याचिका भी दायर हुई थी। इस याचिका में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में अध्यक्ष और सदस्य सचिवों की नियुक्तियों को लेकर कोई निश्चित नियम और योग्यता आदि ना होने का मुद्दा उठाया गया था। यह कहा गया था कि राजनीतिक नेताओं को अध्यक्ष पदों पर नियुक्तियां दी जा रही है और सदस्य सचिवों के पदों पर सरकार ऐसे अधिकारियों को नियुक्त कर रही है जो सरकार के इशारों पर नाचते हैं। इस याचिका में आग्रह किया गया था कि इन पदों पर नियुक्तियों के लिए आवश्यक योग्यता और नियम तय किये जायें। इस पर याचिका में हिमाचल का भी नाम था क्योंकि यहां एक पूर्व विधायक को अध्यक्ष लगाया गया था। इस याचिका पर फैसला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिये थे कि छः माह के भीतर यह नियम बनाये जायें और इनके भरने के लिए विज्ञापन जारी करके आवेदन आमंत्रित किए जायें। यह थे निर्देश Keeping the above in mind, we are of the view that it would be appropriate, while setting aside the judgment and order of the NGT, to direct the Executive in all the States to frame appropriate guidelines or recruitment rules within six months, considering the institutional requirements of the SPCBs and the law laid down by statute, by this Court and as per the reports of various committees and authorities and ensure that suitable professionals and experts are appointed to the SPCBs. Any damage to the environment could be permanent and irreversible or at least long-lasting. Unless corrective measures are taken at the earliest, the State Governments should not be surprised if petitions are filed against the State for the issuance of a writ of quo warranto in respect of the appointment of the Chairperson and members of the SPCBs. We make it clear that it is left open to public spirited individuals to move the appropriate High Court for the issuance of a writ of quo warranto if any person who does not meet the statutory or constitutional requirements is appointed as a Chairperson or a member of any SPCB or is presently continuing as such.
यह फैसला और निर्देश 2017 के अन्त तक जारी हुए थे। इन पर अमल 2018 में शुरू होना था। जयराम सरकार ने इन निर्देशों पर अमल करते हुए अध्यक्ष पद भरने के लिए विज्ञापन जारी करके आवेदन आमंत्रित किये थे। इस पर कई आवेदन आये हैं। लेकिन चार वर्षों में सरकार इनमें से कोई चयन नहीं कर पायी है। याचिका में यह आग्रह किया गया था कि इन पदों पर नियुक्तियां पांच-पांच वर्ष के लिये की जायें। लेकिन सरकार ने न तो यह नियम ही अब तक सार्वजनिक किये हैं और न ही आये हुये आवेदनों पर चार वर्ष में कोई फैसला लिया है। अब यह मामला फिर उच्च न्यायालय में पहुंच चुका है और माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत प्रदेशों के मुख्य सचिवों को अदालत में कोई कड़े आदेश सुनायेगी। चर्चा है कि जयराम सरकार अभी पदोन्नत हुए मुख्य अभियंता प्रवीण गुप्ता को सदस्य सचिव के पद पर तैनात करना चाहती है और उसी के लिए सारी देरी की जा रही है।

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