शिमला/बलदेव शर्मा
हिमाचल प्रदेश में जल विद्युत की अपार क्षमता है और इस क्षमता का दोहन भी किया जा रहा हैै। इसी क्षमता के आधार पर प्रदेश को विद्युत राज्य प्रचारित और प्रसारित किया गया। यही प्रचार-प्रसार उद्योगपतियों के आकर्षण का केन्द्र बना। विद्युत उत्पादन में भी निजि क्षेत्र ने हिमाचल का रूख किया और आज प्रदेश में कुल उत्पादित
विद्युत- में से राज्य के बिजली बोर्ड के पास केवल 487 मैगावाट ही है और शेष सारीे संयुक्त क्षेत्र या निजि क्षेत्र के पास है। प्रदेश में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में 1990 में शान्ता के शासन काल में जेपी उद्योग समूह ने पैर रखा था। शांता सरकार ने जे पी को स्थापित करने के लिये बसपा- जिस पर बिजली बोर्ड काम कर रहा था, बोर्ड से लेकर जेपी को थमा दिया था। उस वक्त तक बोर्ड इस पर करीब 16 करोड़ खर्च कर चुका था। जे पी के साथ हुए अनुबन्ध में जेपी ने बोर्ड को यह पैसा ब्याज सहित वापिस करना था लेकिन जब जेपी ने यह पैसा नही लौटाया तो यह राहत दी गयी कि जब प्रौजैक्ट उत्पादन में आ जायेगा तब इस पैसे की वापसी होगी। 2003 से इसमें उत्पादन भी शुरू हो गया लेकिन जेपी से यह वसूली नही की गयी। इसके लिये तर्क दिया गया कि यदि यह वसूली की जायेगी तो इसका भार अन्ततः उपभोक्ता पर पडे़गा। इस तरह करीब 92 करोेड़ रूपया बट्टेे खाते में डाल दिया गया। कैग रिपोर्ट में इस पर गंभीर आपत्ति उठायी गयी है। लेकिन कोई भी सरकार जेपी से यह वसूली नहीं कर पायी है। इसी तरह जेपी ने कडछम बांगतू परियोजना में भी दो सौ मैगावाट की क्षमता अपनेे आप बढ़ा ली और सरकार को उस पर अपफ्रन्ट प्रिमियम नही मिला। कैग नेे इस पर भी सवाल उठायेे है लेकिन सरकार पर कोई असर नही हुआ है।
1990 में जब जेपी उद्योग नेे प्रदेश में विद्युत उत्पादन में पैर रखा था उस समय निजि क्षेत्र की परियोजनाओं से 12% विद्युत राॅयल्टी के रूप में फ्री लेने का फैसला शान्ता सरकार ने लिया था और इस फैसलेे की बहुत सराहना हुई थी बल्कि इसी के आधार पर यह दावे किये गये थे कि अब सरकारी खजाने मेें पैसे की कोई कमी नही रहेगी। लेकिन 12% फ्री राॅयल्टी के साथ यह भी फैसला हुआ कि शेेष बची 88% बिजली को भी बोर्ड ही खरीदेगा और उसके बाद निजि क्षेत्र की सारी परियोजनाओं के साथ विद्युत खरीद के समझौतेे साईन हुए। लेकिन यह पीपीए किस रेट पर साईन हुए है। इसको कभी सार्वजनिक नही किया गया है। इसी के साथ ट्रांसमिशन की जिम्मेदारी भी सरकार की है। ऐसेे मेें ट्रांसमिशन में हो रहे नुकसान की कीमत भी सरकार को चुकानी पड़ रही है। 12% मुफ्त रायल्टी के फैसले के साथ 88% केे लियेे पीपीए साईन करना और ट्रासमिशन की जिम्मेदारी लेना ऐसे पक्ष है जिनकेे कारण बोर्ड लगातार घाटे में चल रहा है। आज स्थिति यह हो गयी है। बोर्ड को इन परियोजनाओं से पीपीए के कारण मंहगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है और आगे सस्ती दरों पर बेचनी पड़ रही है क्योंकि अब दूसरे राज्यों ने भी पावर प्रौजैक्टस स्थापित कर लिये है बल्कि इस कारण हर वर्ष बोर्ड की बहुत सारी बिजली बिकने के बिना रह रही है। इसका असर बोर्ड की अपनी परियोजनाओं पर भी रहा है बोर्ड के सारे प्रौजैक्टस में हर वर्ष हजारो घन्टो का शटडाऊन कई वर्षो से लगातार चलता है बोर्ड के सूत्रों के मुताबिक इस शटडाऊन से प्रतिदन करोड़ो का नुकासान हो रहा है लेकिन बोर्ड प्रबन्धन और सरकार इस शटडाऊन को लेकर संबधित अधिकारियों के खिलाफ कोई भी कारवाई नही कर पा रही है। जबकि निजि क्षेत्र की किसी भी परियोजना में इतने बडे स्तर पर कभी शटडाऊन सामने नही आया है। माना जा रहा है कि इस शटडाऊन के पीछे निजि क्षेत्र का दवाब है क्योंकि यदि बोर्ड के अपने प्रौजैक्टस में उत्पादन सुचारू रहता है तो प्रबन्धन को उस उत्पादन की बिक्री पहले सुनिश्चत करनी होगी जिसका असर निजि क्षेत्र पर भी पडेगा। इस सुनियोजित शटडाऊन को लेकर विजिलैन्स के पास भी पिछले करीब तीन वर्षो से शिकायत लंबित है। इस शिकायत पर सचिव पावर की ओर से जो जवाब विजिलैन्स को गया है उससे सरकार ने यह स्वीकार किया है कि इसमें लापरवाही हो रही है लेकिन इस पर न तो सरकार ओर न ही विजिलैन्स कोई कड़ी कारवाई कर पा रही है क्योंकि इसकी गहन जांच मे कई चैकाने वाले खुलासे सामने आने का डर है।
लेकिन आज इस स्थिति के कारण सरकार को बिजली से होने वाली आमदनी में हर वर्ष लगातार कमी होती जा रही है जबकि हर वर्ष सरकार बजट से पहले या बाद में बिजली के रेट बढ़ाती रही है। जबकि हर वर्ष सरकार बजट और नाॅन टैक्स के रूप के मे जो आय होे रही है। वह एक बडे खतरे का संकेत है। इस आय के आंकडे यह है।
Non Tax Revenue
वर्ष आय कुल राजस्व
का प्रतिपक्ष
12-13 637.15 46.281%
13-14 696.29 37.08 %
14-15 1121.15 54.01 %
15-16 650.00 43.13 %
16-17 700.00 41.95 %
Tax Revenue
वर्ष आय कुल राजस्व
का प्रतिपक्ष
12-13 262.62 5.68%
13-14 191.36 3.74%
14-15 332.82 5.60%
15-16 308.45 4.86%
16-17 339.30 4.54%
राज्य सरकार को अपने साधनों से टैक्स और नाॅन टैक्स के रूप मे जो राजस्व प्राप्त होता है उसमें विद्युत बड़ा स्त्रोत है इस स्त्रोत मे वर्ष 12-13 में कुल नाॅन टैक्स राजस्व का 46.28%विद्युत से मिला था जो कि 16-17 में घटाकर 41.95% रह गया है। इसी तरह का कुल टैक्स राजस्व सरकार ने समय रहते बिजली नीति में परिवर्तन न किया तो आने वाले समय में एक बड़ा संकट खड़ा हो जायेगा
शिमला/शैल
चैपाल के विधायक बलवीर वर्मा के खिलाफ नगर निगम शिमला द्वारा जारी किये प्रापर्टी टैक्स के नोटिस आने वाले विधानसभा चुनावों में एक बडा मुद्दा बन सकते है। स्मरणीय है कि बलवीर वर्मा 2012 में निर्दलीय रूप से चुनाव जीत कर आये थे और फिर कांग्रेस के सहायक सदस्य बन गये थे। इसके लिये उनके खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष के पास दल बदल कानून के तहत भाजपा की याचिका भी लंबित है। इसमें वर्मा के साथ कुछ और निर्दलीय विधायक भी शामिल है। इस याचिका पर फैसला कब आता है इसको लेकर भी राजनीतिक हल्कों में कई चर्चाएं है। लेंकिन वर्मा के मामले में सबसे गंभीर मुद्दा यह खड़ा हो गया है। कि नगर निगम शिमला 2015 से लगातार उन्हें प्रापर्टी टैक्स जमा करवाने के नोटिस भेज रहा है। बल्कि टैक्स न चुकाने पर धारा 124 के तहत संपत्ति अटैच करने की कारवाई अमल में लाने की बात कही गयी है। वर्मा से निगम ने 45 लाख की वसूली करनी है वर्मा की गिनती बडे बिल्डरों में की जाती है। वीरभद्र परिवार के साथ उनके रिश्ते राजनीतिक हल्कों में चर्चा का विषय भी बने हुए है। बल्कि यह माना जा रहा है कि नगर निगम भी इन्ही रिश्तो के कारण नोटिस देने से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
इसमें सबसे रोचक तो यह है कि वर्मा ने टैक्स अदायगी में निगम को करीब 20लाख के चार अलग-अलग चैक भी जारी किये थे लेकिन निगम के सूत्रों के मुताबिक यह चैक बाऊंस हो गये हैं परन्तु इसके बाद भी निगम अगली कारवाई करने का साहस नही कर पा रहा है। यह भुगतान न होने के कारण वर्मा की वित्तिय स्थिति और उनकी नीयत को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये है। क्योंकि वर्मा ने 2016 में ही शिमला में 1.76 करोड़ में चार संपत्तियां बेची है। 11.5.2016 को रजि., संख्या 274 के तहत कुसुम्पटी कोठी में एक जीतेन्द्र पाल को 157.99 वर्ग मीटर संपत्ति 40 लाख में 17.5.2016 को रजि. संख्या 304 के तहत चंचलपाल को 33 लाख में 1.6.2016 को रजि. संख्या 352 के तहत गाजियाबाद की वन्दना सोनी को 33 लाख और 12.7.2016 को रजि. संख्या 463 के तहत रीना बन्याल को कुसुम्पटी में 70 लाख की संपत्तियां बेची है। संपत्तियों की इस बेच के बाद ही 5.11.2016 को नगर निगम ने विधायक को अन्तिम नोटिस भेजा है। लेकिन इस नोटिस के बाद भी टैक्स का भुगतान न हो पाने को लेकर कई तरह की चर्चाओं की उठना स्वाभाविक है।
स्मरणीय है कि इस बार भी वर्मा को चैपाल से सशक्त उम्मीदवार माना जा रहा है। मुख्यमन्त्राी का कांग्रेस टिकट के लिये उनकी ओर झुकाव माना जा रहा है। ऐसे में उनके राजनीतिक विरोधी उनकी स्थिति को उनके खिलाफ इस्तेमाल करने का पूरा - पूरा प्रयास करेंगे यह तय है। ऐसी स्थिति में वीरभद्र भी टिकट के लिये उनकी वकालत कैसे कर पाते है। इसको लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये है।

शिमला/बलदेव शर्मा
1983 बैच के आई ए एस अधिकारी वी सी फारखा को प्रदेश का मुख्य सचिव बना दिये जाने पर उनसे वरिष्ठ 1982 के अधिकारियों में रोष पनपना और सरकार की कारवाई को अन्याय करार देना स्वभाविक हैं क्योंकि इन वरिष्ठ अधिकारियों को बड़ी पोस्ट के लिये न कवेल नजर अन्दाज ही किया गया बल्कि इन्हें अपने कनिष्ठ के अधीन ही काम करने के लिये बाध्य किया गया। मुख्य सचिव मुख्यमन्त्री का विश्वस्त ही होना चाहिए यह सही है लेकिन इसमे यह भी उतना ही
आवश्यक है
कि एक वरिष्ठ अधिकारी को अपने से कनिष्ठ के नियन्त्रण में काम करने की भी स्थिति न खड़ी कर दी जाये जिससे की उनके आत्म सम्मान को ठेस न पहुंचे। वैसे भी प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये यह आवश्वयक भी है इससे पहले भी प्रदेश में मुख्य सचिव की तैनाती के मौके पर दो बार वरिष्ठो को नजरअन्दाज किया गया है। पहली बार रेणु साहनीधर और दूसरी बार ओपी यादव और सीपी सुजाया नजर अन्दाज हुए थे परन्तु उन्हे मुख्य सचिव के साथ ही उसके नियन्त्रण से बाहर भी कर दिया गया था और इसी कारण वह लोग अदालत तक नही गये थे। लेकिन इस बार ऐसा नही हुआ और मामला अदालत तक जा पहुंच है। अदालत ने इन अधिकारियों को अन्तरिम राहत देते हुए अपने कनिष्ठ के नियन्त्रण में काम करने की स्थिति से बाहर रखने के निर्देश देते हुए सरकार को पोस्टिंग देने के आदेश दिये थे। सरकार ने इन आदेशों पर अमल करते हुए इन्हे निर्देशित पोस्टिंग भी दे दी है। अभी इस मामले में सरकार ने विस्तृत जवाब दायर करना है और उसके बाद इसमें उठाये गये कानूनी और प्रशासनिक सवालों पर फैसला आयेगा। यह भी तय है कि फैसला आयेगा इसका प्रभाव दूरगामी होगा।
कैट में गयी इस याचिका में कहा गया है कि 31.5.2016 को फारखा को सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक बुलाये बिना ही मुख्य सचिव बना दिया गया है। यह भी कहा गया है कि फारखा 4.3.2014 को स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश के बिना ही मुख्य सचिव को वेतन मान दे दिया गया है। जबकि उस समय अतिरिक्त मुख्य सचिव के नियमित काडर के सदस्य नही थे और इस नाते मुख्य सचिव के चयन के दायरे में ही नही आते है। इसके लिये आई ए एस काडर रूल्ज 1954 और 1955 के रेगुलेशनज के प्रावधानों का हवाला दिया गया है। इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य यह दिया गया है। कि हिमाचल प्रदेश में एक मुख्य सचिव और एक अतिरिक्त मुख्यसचिव के पद काडर में स्वीकृत है और इनके समकक्ष दो ही पद अतिरिक्त मुख्यसचिव के एकक्ष काडर सृजित किये जा सकते है इस आश्य का आदेश 20.8.2007 का पारित हुआ है और इसके मुताबिक प्रदेश में चार ही अधिकारी उच्चतम वेतन मान के अधिकारी हैं लेकिन 26.5.2016 को कार्मिक विभाग ने मुख्यमन्त्री के सामने जो सूची रखी है इसमें 16 अधिकारियों को उच्चतम वेतनमान में दिखाया गया जबकि इनमें से केन्द्र की प्रति नियुक्ति में तैनात चार अधिकारी तो वास्तव में 67000-79000 के एच ए जी स्केल में हैं याचिका में रखे गये तथ्यों और तर्कोे से यह स्पष्ट हो जाता है कि जितने अधिकारियों को उच्चतम वेतन मान में रखा गया है। उन सबको मुख्य सचिव के चयन के दायरे में नही लाया जा सकता। इनके मुताबिक इस दायरे में केवल वरिष्ठतम चार ही अधिकारी आ सकते है।
प्रदेश सरकार ने इस याचिका में जो अन्तरिम जवाब दायर किया है उसमें कहा गया है कि 4.3.2014 के जिस आदेश को चुनौती दी गयी है। उसे एक वर्ष के भीतर ही चुनौती दी जा सकती थी अब नही। लेकिन यह नही कहा गया हैं कि 4.3.2014 को वह आदेश वैध था। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है। आगे चलकर अतिरिक्त मुख्य सचिवों के इतने पद सृजित करने में भी तय नियमों की अवेहलना हुई है। सरकार के अन्तरिम जवाब में यह भी कहा गया है कि दीपक सानन के जांच दर्ज होने और 19.5.2014 को उसकी सूचना प्रदेश सरकार को भी दिये जाने का भी जिक्र किया गया है सरकार ने चार्जशीट किया हुआ है। विनित चैधरी के खिलाफ 1.5.2014 को सीबीआई में प्रारम्भिक जांच दर्ज होने और 19.5.2014 का उसकी सूचना प्रदेश सरकार को दिये जाने का भी जिक्र किया गया है। इस जांच पर आगे क्या हुआ है। इस बारे में कुछ नही कहा गया है। लेकिन इस जांच को चैधरी के खिलाफ आधार बनाया गया है।
सरकार के अन्तरिम जबाव में उठाये गये इन सवालों का यह अधिकारी क्या जबाव देते है यह तो आने वाले समय में स्पष्ट हो पायेगा लेकिन याचिका में मुख्य सचिव के चयन के दायरे में केवल वरिष्टतम चार लोगों को ही रखने का जो पक्ष रखा गया है। उससे भविष्य के लिये एक लाईन तय हो जायेगी यह माना जा रहा हैं बहरहाल यह अंदेशा हैं कि प्रशासन के शीर्ष पर बैठे अधिकारियों में उभरा यह टकराव कंही व्यक्तिगत न हो जायेे।
शिमला/बलदेव शर्मा
बेटा अक्सर बाप की विरासत संभालता है और हर बाप बेटे को स्थापित करने का हर संभव प्रयास करता है। यह एक ऐसा स्वीकृति सच है। जिसमें अपवाद की गुंजाईश बहुत कम रहती है। इसी परम्परा को निभाते हुए वीरभद्र ने पहले विक्रमादित्य को प्रदेश युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया और अब शिमला ग्रामीण से विधायकी का एलान कर दिया है। प्रदेश की जनता और प्रशासनिक हल्कों के लिये यह ऐलान अप्रत्याशित नही है। लेकिन राजनीतिक दलों के भीतर इस ऐलान से कई
समीकरणों में कई बदलाव देखने को मिलेंगे। इस समय कांग्रेस के भीतर ही जी एस बालीे और अनिल शर्मा के बेटे विधायकी की दावेदारी जताने लायक हो चुके है। चर्चा तो यह भी है। कि विद्यास्टोक्स भी अपनी राजनीतिक अपनी बेटी को सांैपने की ईच्छा रखती है और पिछले दिनों केहर सिंह खाची के साथ हुए झगड़े की पृष्ठभूमि में भी यही ईच्छा रही है। बहुत संभव है कि वीरभद्र सिंह के इस ऐलान के बाद पार्टी के कई और नेता भी ऐसा करने का प्रयास करें। वीरभद्र के इस ऐलान पर किस तरह की प्रतिक्रियाए उभरती है यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा ।
अब जब वीरभद्र ने शिमला ग्रामीण अपने बेटे के लिये छोड़ दिया है तो यह सवाल उठना स्वभाविक है। कि वीरभद्र स्वयं कहां से चुनाव लडेंगे। मुख्यमन्त्री ने यह भी ऐलान किया है कि वो ऐसे चुनाव क्षेत्र से लडे़ंगे जंहा से कांग्रेस लगातार हारती आ रही है। इस हार के गणित में जिला शिमला में शिमला ;शहरीद्ध सोलन में अर्की और ऊना में कुटलैहड़ ऐसे चुनाव क्षेत्र है जहां से लगातार कांग्रेस हार रही है। स्मरणीय हैं कि पिछले दिनों जब सुक्खु और वीरभद्र का वाक्युद्ध फिर सार्वजनिक हुआ था तब अपरोक्ष में सुक्खु ने ही वीरभद्र को यह चुनौती दी थी कि उन्हे अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर जाकर प्रदेश के किसी अन्य भाग से चुनाव लड़ना चाहिये। इस परिदृश्य में सोलन का अर्की और ऊना का कुटलैहड ही सबसे पहले नजर में आते है। अर्की के कुनिहार में जब वीरभद्र के पिता स्व0 पदम सिंह के नाम पर जब कुनिहार पंचायत ने क्रिकेट स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव रखा था उस समय ही राजनीतिक हल्कों में यह संदेश चला गया था कि आने वाले विधानसभा चुनावों में वीरभद्र परिवार की यहां पर नजर रहेगी। उस समय यह कयास लगाये जाने लगे थे कि शायद प्रतिभा सिंह यहां से उम्मीदवार बने। अर्की में वीरभद्र पूर्व मन्त्री स्व0 हरिदास के एक बेटे को अपने साथ गले लगाये हुए है तोे इसी के साथ यहीं से डिप्टी स्पीकर रहे स्व0 धर्मपाल के बेटे की भी पीठ थपथपाते रहे है। यहीं से पूर्व मन्त्री स्व हीरा सिंह पाल के बेटे डा अमरचन्द पाल भी वीरभद्र के विश्वस्तों में रहे है यह भी यहां से चुनाव लड़ना चाहते है। इनके अतिरिक्त पिछली बार यहां से संजय अवस्थीे को और उससे पहले प्रकाश करड़ यहां से उम्मीदवार रह चुके है लेकिन इस सब मे जिस कदर के आपसी मतभेद है उसी के कारण कांग्रेस यहां से हारती रही है। फिर स्व. हरिदास ठाकुर का एक बेटा इन्दर सिंह ठाकुर पहले प0 सुखराम और अब ठाकुर कौल सिंह का विश्वस्त है। यही सारे लोग यहां से पार्टी के स्थानीय नेता और प्रमुख कार्यकर्ता है। अब डा0 मस्त राम का नाम भी इस सूची में जुड गया है। इन सारे स्थानीय लोगों को आपस में ईनामदारी से इकट्ठे करने पर ही यहां से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित की जा सकती है।
इसी तरह शिमला शहरी में भी वामपंथियों और भाजपा का अपने -अपने कट्टर वोट का एक तय आंकडा है जो कभी भी इधर उधर नही होता है। फिर अब शिमला (शहरी) में ढली से ऊपर के पहाड़ी वोट की तुलना में यहां पर ऊना के वोटर की संख्या अधिक है। शिमला (शहरी) में सूद समुदाय का भीे अपना खास प्रभाव है। शहर का अधिकांश बिजनेस समुदाय इसी सूद समुदाय से है। फिर शिमला अर्बन कांग्रेस कमेटी में वीरभद्र समर्थको और विरोधीयों में निश्चित तय मतभेद है। यहां से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिये इन सब अलग-अलग वर्गो को एक सूत्रा में बांधकर रख पाना ही सबसे बड़ी चुनौती है फिर इस बार पहली बर्फबारी में जिस तरह से यहां पर सारी आवश्यक सेवायें चरमरा गयी थी उससे सरकार की कार्यप्रणाली और विकास के सारे दावों पर ऐसा प्रश्न चिन्ह लगा है। जिसका नुकसान चुनावों में होना तय है। बल्कि इसी गणित में यदि शिमला ग्रामीण को भी आंका जाये तो वहां भी स्थितियां बहुत सुखद नहीं है। शिमला ग्रामीण में किये गये सारे विकास कार्यों का जमीनी प्रभाव क्या और कितना रहा है। इसका खुलासा पिछले लोकसभा चुनावों में सामने आ चुका है। शिमला ग्रामीण में कांगे्रस संगठन पर जिन लोगों का कब्जा है उनका जनता से दूर-दूर तक कोई तालमेल नही हैं बल्कि यहां के कांग्रेस प्रधान का नाम तो भाजपा के आरोप पत्र में भी बडी सुर्खियों में दर्ज है।
ऐसे में माना जा रहा है कि वीरभद्र ने अभी से अपनेे बेटे और अपनी सांकेतिक उम्मीदवारी घोषित करके इन चुनाव क्षेत्रों में पूरे हालात को अपनेे नियन्त्रण रखने का दांव चला दिया है। अब यहां की कमान कौन संभालता है इस पर सबकी नजर रहेगी। क्योंकि एक समय तो दबी जुबान में यहां तक चर्चा उठ गयी थी कि शिमला ग्रामीण पर हर्षमहाजन की भी नजर है। क्योंकि हर्ष महाजन ने भी शिमला ग्रामीण में परोक्ष/अपरोक्ष में कई संपत्तियों पर निवेश किया हुआ है। अब चुनावों के दौरान इस तरह के कई खुलासे सामने आने की संभावनाएं है। इस सबका चुनावी गणित पर असर पडना स्वाभाविक हैं क्योंकि यही के प्रस्तावित क्रिकेट स्टेडियम के दो किलोमीटर के दायरे में कई बडे़ नौकरशाहों और राजनेताओ ने जमीनें खरीद रखी है। यह जमीन खरीद भी चुनावों में एक बडा मुद्दा बनना तय है। वीरभद्र और उनका बेटा इन चुनौतियों से कैसे निपटते है इस पर अभी से सबकी नजरें लग गयी है।
शिमला/बलदेव शर्मा
धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी घोषित करने के वीरभद्र सिंह के फैसले से राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में ही नही वरनआम आदमी के बीच भी इस फैसले की व्यवहारिकता को लेकर प्रतिक्रियाओं और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। क्योंकि यह फैसला चुनावी वर्ष में लिया गया है। यदि यही फैसला सत्ता संभालने के साथ 2013 में ही ले लिया जाता तो इसके परिणाम कुछ और होते। सरकारें और राजनीतिक दल सत्ता के लिये किस
हद तक जा सकते हैं इससे आम आदमी पूरी तरह परिचित है। चुनावी वर्ष में लिये गये फैसले ही नही वरन चुनाव को सामने रखकर चुनाव घोषणा पत्र में किये गये वायदों पर कितना और कैसे अमल किया जाता है इसका उदाहरण बेरोजगारी भत्ते के रूप में सामने है। राजधानी बनाने और एक प्राईमरी स्कूल खोलने में दिन रात का अन्तर होता है। कांग्रेस सत्ता में है और वीरभद्र का पार्टी के अन्दर राजनीतिक कद उस बरगद की तरह है जिसके नीचे और कुछ नही उग पाता है। इसलिये कांग्रेस के अन्दर एक भी व्यक्ति से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह ऐसे फैसलों के गुण दोष की समीक्षा राजनीतिक स्वार्थो से ऊपर उठकर कर सकें। शीर्ष प्रशासन में जोे लोग ऐसे फैसलों के भागीदार रहे होंगे उनसे भी ऐसे अहम फैसले परद गुण दोष के आधार पर बेवाक राय की उम्मीद करना गलत होगा। क्योेंकि उनकी दुनिया भी वीरभद्र से शुरू होकर हाॅलीलाज तक समाप्त हो जाती है। उनमें से अधिकांश तो सेवानिवृति के बाद वीरभद्र की कृपा से ही पदों पर बैठे हैं और कुछ को इसी कृपा के कारण समय से पूर्व ही बड़ा फल मिल गया है। इसलिये जहां व्यक्तिगत लाभ की नीयत पर निष्पक्ष विवेक की बारीे आती है वहां अक्सर स्वार्थ का ही पलड़ा भारी रहता है। ऐसे में शीर्ष प्रशासन और कांग्रेस संगठन से प्रदेशहित में इस फैसले पर निष्पक्षता की उम्मीद करना सही नही होगा।
लेकिन इसी के साथ यह समझना भी बहुत आवश्यक है कि वीरभद्र ने यह फैसला लिया ही क्योंघ्आज वीरभद्र उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां दूसरी राजधानी बसाने और उसे व्यवहारिक तौर पर अमल में लाने जितना राजनीतिक वक्त शायद उनके पास नही है। इससे इस फैसले की आने वाले समय में होने वाली निन्दा और स्तुति का उन पर कोई फर्क ही नही पडेगा। जो भी फर्क पडेगा वह केवल कांग्रेस और प्रदेश पर ही पडेगा जिससे वीरभद्र सिंह को व्यक्तिगत तौर पर कोई बडा सरोकार शायद नही रह गया है। फिर वीरभद्र सिंह इस समय सीबीआई ईडी और आयकर के जितने मामले झेल रहे है उनका अन्तिम फैसला जब भी आयेगा वह संभवतः उनके पक्ष में नही रहेगा यह माना जा रहा है। वीरभद्र छठी बार मुख्यमन्त्राी बन चुके हैं अब सातवीं बार वह बन पाते हैं या नही इससे ज्यादा महत्वपूर्णे उनके लिये यह हैं कि क्या उनके बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनका परिवार आगे बढ़ा पायेगा या नही। अपनी पत्नी को उन्हें सांसद तक बनवाया लेकिन वह राजनीति में स्थापित नहीं हो पायी। अब सब कुछ बेटे विक्रमादित्य पर टिका है। प्रदेश युवा कांगे्रस का अध्यक्ष बनाकर उन्हेे ट्रनिंग दी जा रही है। पिछले कुछ अरसे से वीरभद्र उन्हें अपने साथ प्रदेश भर में घुमा रहे हैं। विक्रमादित्य भी राजनीति में आक्रामक होने की कला सीख रहे हैं। पिछले कुछ अरसे में विधानसभा चुनावों के लिये टिकट आवंटन में अपनाये जाने वाले मानकों और उसमें हाईकमान की भूमिका को लेकर आये उनके वक्तव्य इसी ओर इंगित करते हैं। पार्टी के अन्दर विक्रमादित्य को कोई बड़ी चुनौती न मिले इसके लिये पहले वीरभद्र बिग्रेड और अब उसको पंजीकृत एनजीओ की शक्ल देना इस दिशा का एक बड़ा कदम है। अब इस एनजीओ की जो राज्य समिति घोषित की गयी है वह पूरी तरह एक समान्तर संगठन है। लेकिन संयोगवश विक्रमादित्य का नाम भी सीबीआई ईडी और आयकर में जुड़ता जा रहा है और वही वीरभद्र की सबसे बड़ी चिन्ता है।
सीबीआई ईडी प्रकरण में दिल्ली उच्च न्यायालय में फैसला रिजर्व चल रहा है और कभी भी घोषित हो सकता है। अगर इसमें राहत ना मिली जिसकी संभावना अधिक है तब पार्टी के अन्दर और बाहर पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल जायेगा। एक बड़ा मुद्दा चर्चा का विषय बन जायेगा। राजनीतिक दबाव बढ़ जायेगा। वीरभद्र इन सारी संभावनाओं के प्रति पूरी तरह सचेत हैं। ऐसी परिस्थितियों में उठने वाली प्रतिकूल राजनीतिक चर्चाओं का रूख बदलने के लिये एक इससे भी बडे़ मुद्दे की आवश्यकता रहेगी। राजनीतिक पंडितो के मुताबिक वीरभद्र ने अचानक धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोश्षित करके जन बहस के लियेे एक बड़ा मुद्दा इस तरह उछाला है इस मुद्दे पर विपक्ष भी बहुत सावधानी से अपनी प्रतिक्रिया देगा। कांग्रेस में हर आदमी वीरभद्र के सामने उनकी हां में हां मिलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पायेगा। अन्यथा सभी जानते हैं कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति इस तरह के फैसले की अनुमति नही देती है। धर्मशाला में एक केन्द्रिय विश्वविद्यालय के लिये जो सरकार जमीन उपलब्ध नही करवा पायी। वह राजधानी के लिये कहां से जमीन लायेगी। यह जमीन कब चिन्हित की जायेगी और कब इसके अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होगीघ् इस तरह के कार्यो के लिये वर्षो लग जाते हैं जिसका अर्थ है कि सरकार के इस कार्यकाल में यह सब हो पाना संभव नही होगा। इसके बाद इसके लिये धन का प्रावधान कहां से होगा यह सबसे बड़ा सवाल रहेगा। ऐसे में राजधानी की घोषणा का जो हथियार अपनाया गया है वह कांग्रेस को ही कितना काटता और विपक्ष को कितना यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।