Thursday, 05 February 2026
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क्या हिमाचल में भी गुजरात घटेगा-विधानसभा चुनाव फरवरी -मार्च में करवाने की अटकलें बढ़ी

नगर निगमों के बाद अब विश्व विद्यालय में हारी भाजपा
नेताओं के पत्रों पर हुए कर्मचारियों के तबादले उच्च न्यायालय ने किये रद्द
किसानों की आय दोगुणी करने का वायदा करने वाली सरकार सब्सिडी का भुगतान ही नहीं कर पायी
शिमला/शैल। प्रदेश में होने वाले चारों उपचुनाव टाल दिये गये हैं। चुनाव आयोग ने यह फैसला राज्य के मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव, डीजीपी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी से चर्चा करने के बाद लिया है ऐसा इस संद्धर्भ में आये प्रैस नोट में कहा गया है। अब यह उपचुनाव कब होंगे इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है। प्रदेश विधानसभा के लिये चुनाव अगले वर्ष दिसम्बर में कार्यकाल पूर्ण होने के बाद होंगे। इस नाते अभी भी इन चुनावों के लिये सोलह माह का समय बचा है। जबकि उपचुनावों के लिये जो स्थान खाली हुए हैं उनमें फतेहपुर के लिये फरवरी में, मण्डी लोकसभा के लिये मार्च, जुब्बल कोटखाई के लिये जून और अर्की के लिये जुलाई 2022 में क्रमशः एक वर्ष पूरा हो जायेगा। जन प्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 151 A के अनुसार उपचुनाव स्थान खाली होने के छः माह के भीतर करवा लिया जाना अनिवार्य है। यदि शेष कार्यकाल का समय ही एक वर्ष से कम बचा हो तो भारत सरकार के साथ विचार-विमर्श करके चुनाव आयोग ऐसे उपचुनाव को टाल सकता है। लेकिन विधानसभा के तीनों रिक्त स्थानों के लिये डेढ वर्ष से अधिक का समय शेष है और मण्डी लोकसभा के लिये तो तीन वर्ष से अधिक का समय रहता है। इसलिये यह स्पष्ट है कि यह सारे उपचुनाव तो करवाने ही पड़ेंगे क्योंकि एक वर्ष से अधिक समय के लिये टालने का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसा करना एक संवैधानिक संकट को न्यौता देना हो जायेगा। इस समय देशभर में तीन लोकसभा और बत्तीस विधानसभा सीटां के लिये उपचुनाव टाले गये हैं जो आगे करवाना अनिवार्य हो जायेंगे।


अगले वर्ष 2022 में आठ विधानसभाओं और राष्ट्रपति तथा उप राष्ट्रपति के लिये चुनाव होने हैं। चुनावों का यह सिलसिला फरवरी -मार्च 2022 से ही शुरू हो जायेगा और दिसम्बर तक चलता रहेगा। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के लिये फरवरी में चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश के परिणाम पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करते हैं। बंगाल चुनावों के बाद भाजपा के चुनावी मनोबल में कमी आई है। अभी पिछले दिनों प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को लेकर इण्डिया टूडे का एक सर्वे आया है उसमें प्रधानमन्त्री का ग्राफ 66 से लुढक कर 24% तक आ गया है। सी वोटर के सर्वे में कुछ राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनती बताई गयी है। किसान आन्दोलन पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर रहा है। सरकार इसके प्रभाव से प्रभावित हो रही है इसका ताजा उदाहरण करनाल में सामने आ गया है जहां पांच दिन बाद सरकार को सारी मांगे माननी पड़ गयी है। इसी तेजी से बदलते राजनीतिक परिदृश्य का परिणाम है कि भाजपा ने छः माह के समय में ही अपने मुख्यमन्त्री बदल दिये। उत्तराखण्ड में दो मुख्यमन्त्री बदल दिये। मुख्यमन्त्रीयों के इस बदलाव को यह रणनीति माना जा रहा है कि चुनावों से पहले मुख्यमन्त्री को बदल दो ताकि सारी प्रशासनिक नकारात्मकता मुख्यमन्त्री के साथ ही चर्चा से बाहर हो जाये।
इसी गणित में यदि हिमाचल का आकलन किया जाये तो पिछले दिनों प्रदेश की चार नगर निगमों के लिये हुए चुनावों में भाजपा दोनों में हार गयी थी। 2014 के बाद यह पहली हार है। अब विश्वविद्यालय में मिली हार से यह सामने आ गया है कि कर्मचारियों और अधिकारियों में भाजपा अपना विश्वास खो चुकी है। विश्वविद्यालय में जिस तरह पिछले दिनों हुई नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे हैं उसका परिणाम इन चुनावों में सामने आ गया है। अब तो कर्मचारियों के तबादलों में जिस तरह से भाजपा विधायक को और दूसरे नेताओं का बढ़ता दखल उच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है उस पर उच्च न्यायालय ने जिस तरह से अपनी नाराज़गी जताई है उससे सरकार को जो झटका लगा है उससे उबरने का कोई अवसर अब सरकार के पास नहीं बचा है। सेब के प्रकरण में जब से यह सामने आया है कि निजक्षेत्र के कोल्ड स्टोर मालिकों पर उत्पादकों के लिये इन स्टोरों में 20% जगह उपलब्ध रखने की शर्त तो लगा दी लेकिन उस शर्त को बागवानों के हितों में न तो कभी प्रचारित किया गया न ही उस पर अमल करवाया गया। 2022 में किसानों की आय दोगुणी करने के दावों के बीच बागवानों को यह सरकार सब्सिडी तक नहीं दे पायी है। बागवानी और कृषि मन्त्री दोनों इस पर चुप हैं इस तरह चुनावी गणित से देखते हुए सरकार के पक्ष में धरातल पर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता जिसका लाभ चुनावों में मिल सके। वैसे भी अब चौथे वर्ष में जाकर चुनाव क्षेत्रों में घोषणाएं की जा रही हैं जिनका चुनावों तक अमली शक्ल ले पाना संभव ही नहीं है। ऐसे में उपचुनावों में सफलता मिलना आसान नहीं है और इनमें असफलता का असर आम चुनावों पर पड़ना तय है। इस पदिश्य में यह माना जा रहा है कि अगले वर्ष होने वाले सारे विधान सभा चुनावों को यूपी के साथ ही फरवरी -मार्च में ही करवा लिया जाये। इस गणित में यह संभावना भी बल पकड़ रही है कि भाजपा कुछ अन्य प्रदेशों में भी गुजरात जैसे फैसले ले सकती है।

जब बैंक लोक पाल के आदेशों की भी अनुपालना न करे तो पीड़ित के पास क्या विकल्प रह जाता है

शिमला/शैल। जब बैंक प्रबन्धन बैकिंग लोकपाल के आदेश की भी अनुपालना करने में टालमटोल करे तब बैंक की ही मिली भगत से ही किसी निर्दोष के खिलाफ रचे गये फ्रॅाड के मामले में पीड़ित को दर- दर की ठोकरें खाने पर मज़दूर कर दिया जाये तो ऐसी व्यवस्था को क्या संज्ञा दी जाये यह सवाल ऊना की रकड़ कालोनी के निवासी और प्रदेश के साहित्यिक जगत के एक चर्चित नाम कुलदीप शर्मा के साथ हुए फ्रॅाड से अब जनता की अदालत तक पहुंच कर सारे संवद्ध पक्षों से जवाब मांग रहा है। यह सवाल उस समय और भी अहम हो जाता है जब प्रधानमंत्री और वित्त मन्त्री आये दिन लोगां को बैंक से कर्ज लेकर अपना काम चलाने की सलाह दें। बैंकों की ज्यादतीयों से पीड़ित कितने लोग आत्म हत्याएं कर चुके हैं इन आंकड़ों को शायद दोहराने की आवश्यकता नहीं है। साहित्यकार अपनी सरलता के कारण किसी की भी तकलीफ पर उसकी मद्द करने के लिये तैयार हो जाता है यह उसका स्वभाविक गुण है। इसी गुण के कारण कुलदीप शर्मा एक शाहिद हुसैन और राकेश पाल के षडयन्त्र का शिकार हो गये क्योंकि इसमें केनरा बैंक का स्थानीय प्रबन्धन भी सक्रिय भागीदारी निभा रहा था और इन सबकी नजऱ कुलदीप की संपत्ति पर थी।
इस संपत्ति को हथियाने के लिये शाहिद और राकेश पाल ने उनके उद्योग पारस होम सप्लाईन्स के नाम आया एक लाख दस हजार डालर का सप्लाई आर्डर दिखाकर इस आर्डर को पूरा करने के लिये बैंक से कर्ज लेने की जरूरत दिखायी और इस कर्ज के लिये कुलदीप से गांरटी देने की मद्द मांगी। केनरा बैंक के प्रबन्धक ने भी इस गारंटी के लिये कुलदीप को पूरी आश्वस्त किया। यह उद्योग CGTSME योजना के तहत जून 2013 में स्थापित हो चुका था और इस कर्ज की आवश्यकता दिसम्बर 2013 में आयी। इसलिये शक करने का कोई कारण सामने नहीं दिखा। कुलदीप इसके लिये तैयार हो गये और संपत्ति के पेपर बैंक को दे दिये गये। लेकिन बाद में शाहिद और राकेश पाल मे बैंक के सहयोग से पारस होम एपलाईन्स के नाम से ही एक और जाली उद्योग इ्रकाई शाहिद की पत्नी के नाम दिखाकर उसको कर्ज दे दिया और उसमें कुलदीप शर्मा की संपत्ति के पेपर प्रयोग कर लिये गये।
जब कुलदीप शर्मा को इस फर्जीवाडे का पता चला तब उन्होंने बैंक, स्थानीय प्रशासन तक से इनकी शिकायत की। पुलिस मे मामला दर्ज करवाया। पुलिस ने मैनेजर को गिरफ्तार तक कर किया लेकिन बैंक ने कुलदीप शर्मा को गांरटी से मुक्त नहीं किया। बैंक के इस आचरण के खिलाफ चण्डीगढ़ स्थित बैंकिग लोकपाल के पास मामला पहुंचा। लोकपाल ने केनरा बैंक को दोषी करार देते हुए कुलदीप को इस गांरटी से मुक्त करने के आदेश सुनाये। बैंक प्रबन्धन ने भी इन आदेशों पर लोकपाल के समक्ष लिखित में सहमति दी है। 16-3-20 को लोकपाल ने यह आदेश पारित किये हैं लेकिन आज तक बैंक प्रबन्धन इसकी अनुपालना नहीं कर रहा है। क्या अराजकता का इससे बड़ा कोई प्रमाण हो सकता है क्या बैंक प्रबन्धन इस तरह पीड़ित को कोई और हताशा का कदम उठाने के लिये बाध्य नही कर रहा है।















स्वर्णिम रथ यात्रा से पहले आया मुकेश अग्निहोत्री का जनता के नाम खुला पत्र

शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने प्रदेश की जनता के नाम एक खुला पत्र लिखकर आम आदमी का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है क्योंकि जब संसद से लेकर विधानसभा तक सरकार विपक्ष की बात सुनने को तैयार न हो। संसद में बिना बहस के बिल पास हो जाये और देश के प्रधान न्यायधीश को अपनी चिन्ता सार्वजनिक करनी पड़े तो स्पष्ट हो जाता है कि इस व्यवस्था में आम आदमी और उसके सवालों के लिये कहीं कोई मंच नहीं रह गया है। ऐसे में किसी भी संवदेनशील नेता के लिये जनता के दरबार में गुहार लगाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। क्योंकि इसी जनता को अच्छे दिन आने का सपना दिखाकर उसका विश्वास जीतकर यह सरकार सत्ता में आयी थी। सात साल सत्ता भोगने के बाद भी जो सरकार विपक्ष से ही सवाल करे क्या उससे यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि क्या उसने सत्ता संभालने पर देश की स्थिति को लेकर कोई श्वेत पत्रा इस जनता के सामने रखा था शायद नहीं। आज अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिये अपने संख्या बल की ताकत पर विपक्ष की आवाज को दबाना ज्यादा देर नहीं चलेगा।
आज जयराम सरकार अनुराग ठाकुर की जन आशीर्वाद यात्रा के बाद स्वर्णिम रथ यात्रा का आयोजन करने जा रही है। पूरे प्रशासन को इस यात्रा की तैयारी पर लगा दिया है। अनुराग ठाकुर की जन आशीर्वाद यात्रा और अब स्वर्णिम रथ यात्रा ऐसे समय में होने जा रही है जब प्रदेश की जनता को कोरोना की तीसरी लहर का डर भी बराबर परोसा जा रहा है। कोरोना के कारण प्रदेश के शैक्षणिक संस्थान पिछले वर्ष मार्च से लेकर अब तक बन्द चले आ रहे हैं। बच्चों और अध्यापकों को मोबाईल पर आश्रित कर दिया गया है। जिस मोबाईल का ऑप्रेशन पैट्रोल पम्पों पर प्रतिबन्धित है और डाक्टर इसके आन्तरिक प्रयोग से बच्चों को बचने की नसीहत देते हैं क्योंकि इससे उनकी ऑंखे प्रभावित होगी लेकिन आज सरकारी आदेश से सबको इस पर आश्रित बना दिया गया है। यदि आने वाले समय में पांच प्रतिशत भी इससे नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं तो क्या एक नयी समस्या को न्योता नहीं दिया जा रहा है। कोरोना का अभी तक कोई ईलाज सामने नहीं आया है। फिर भी लोग ठीक हो रहे हैं क्योंकि उनका अन्य बिमारियों के लिये ही उपचार किया जा रहा है। कोरोना में जितने लोगों की मोत हुई है उसमें सरकार के अपने आंकड़ो के अनुसार ही 80% से अधिक मौतें अन्य बिमारियों से हुई है। जब 24 मार्च 2020 को लाकडाऊन लगाया गया था और उसके कारण सारे अस्पताल भी खाली कर दिये गये थे तब लम्बे समय तक लोग बिना ईलाज के रहे थे। उन लोगों में से कितने कोरोना के कारण अब अपनी जान गंवा चुक हैं इसका कोई अध्ययन आंकड़ा सरकार के पास नहीं है।
कोरोना को लेकर सरकार की समझ अभी यहीं तक पहुंची है कि इसका संक्रमण शादी-ब्याह के समारोहों से फैलता है और राजनीतिक रैलियों से नहीं। यह आम आदमी के सामने आ चुका है कि कोरोना काल में बंदिशों के दौरान राजनीतिक गतिविधियां बराबर जारी रही है। अभी जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कितने लोग मास्क का प्रयोग कर रहे थे और भीड़ में सोशल डिस्टैंन्सिग की कितनी पालना हो रही थी यह सब जनता के सामने आ चुका है। अब जो रथ यात्रा प्रस्तावित है उसमें भी इसी तरह का आचरण रहेगा यह तय है। ऐसे में जब सरकार किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं है तब जनता को इस सब पर विचार करना होगा। इसी आश्य के साथ नेता प्रतिपक्ष ने प्रदेश की जनता के नाम खुला पत्र लिखकर उसका ध्यान आकर्षित किया है।

बाल यौन शोषण मामले में 636 दिन की देरी से अपील दायर करने पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया 25000 का जुर्माना

जुर्माने की रकम संवद्ध अधिकारियों से वसूलने के निर्देश

शिमला/शैल। जयराम सरकार का प्रशासन कितना संवेदनशील और जिम्मेदार है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाल यौन शोषण के एक मामले में 636 दिन बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गयी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की इस तत्परता के लिये उस पर 25000 का जुर्माना लगाते हुए निर्देश दिये हैं कि जुर्माने की यह राशि इस देरी के लिये जिम्मेदार अधिकारियों से वसूली जाये। सर्वोच्च न्यायालय में जब राज्य सरकार ने इस देरी के लिये कोरोना के प्रकोप को कारण बताया तब अदालत ने इन शब्दों में अपनी नाराज़गी व्यक्त की "To say the least, we are shocked at the  conduct of the petitioner-State and the manner of conduct the litigation in such a sensitive matter. There is not even a semblance of  explanation for delay" 

इस मामले में 5-12-2018 को अदालत ने अपराधी के पक्ष में फैसला देते हुए उसे छोड़ दिया था। इसके बाद प्र्रशासन ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने का फैसला लिया। यह फैसला लेने में योग्य संबद्ध प्रशासन को 636 दिन लग गये। इसमें प्रशासन की गंभीरता का इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि शीर्ष अदालत में इस देरी के लिये प्रदेश मे कोरोना होने का तर्क दिया गया। तर्क देते हुए यह भी भूल गये कि यह फैसला दिसम्बर 2018 में आ गया था और कारोना के कारण लॉकडाऊन 24 मार्च 2020 को लगा था।
ऐसा ही आचरण वन विभाग के मामले में भी सामने आया है। शिमला के कोटी रेंज में 400 से अधिक पेडों के अवैध कटान के मामले में 2018 में उच्च न्यायालय ने संबद्ध लोगों के खिलाफ मामले दर्ज करके कारवाई करने के निर्देश दिये थे जिन पर अब तक कारवाई नहीं हुई और अब उच्च न्यायालय ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए जांच अधिकारी को ही निलम्बित करने के आदेश किये हैं। ऊना में भी एक फार्मेसी की दुकान के आवंटन के मामले में हुए घपले में उच्च न्यायालय ने सी. एम.ओ. और एम एस की वित्तिय शक्तियां अगले आदेशों तक छीन ली है। इन मामलों से यह सवाल उठने लगा है कि या तो प्रशासन बेलगाम हो गया है या उस पर अत्यधिक राजनीतिक दबाव है।

प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड में नियुक्तियों को लेकर चार वर्षों में नहीं हुआ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने प्रधान सचिव के. के. पंत केन्द्रिय प्रतिनियुक्ति पर जाने के परिणामस्वरूप उनके विभाग दूसरे अधिकारियों को बांटने के साथ ही शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के विभागों में थोड़ा फरेबदल भी किया है। इस फेरबदल में पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को सौंपी है। सक्सेना के पास वित्त और कार्मिक विभागों की भी जिम्मेदारी है। सक्सेना एक योग्य अधिकारी हैं और इस नाते यह जिम्मेदारीयां उन्हें दिये जाने पर किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता। फिर जब सरकार किसी अधिकारी को कोई जिम्मेदारी सौंपती है तो वह अधिकारी उससे इन्कार नहीं कर सकता यह एक स्थापित परम्परा है। लेकिन यह सरकार को देखना है कि जो आदेश वह कर रही वह कानून की नजर मे भी सही हैं या नही। यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि प्रदूषण नियन्त्रण एक बहुत ही अहम और संवेदनशील विषय है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर हर स्तर पर चिन्ता और सरोकार व्यक्त किये जा रहे हैं। यह दोनां विषय बेहद तकनीकी बन चुके हैं। प्रदूषण पर नियन्त्रण रखने के लिये बनाये गये बोर्डों में विशेषज्ञ लोगों की नियुक्तियां की जायें और इनमें तैनात किये अध्यक्ष और सदस्य सचिव को बार-बार न बदला जाये यह नियुक्तियां कम से कम पांच वर्षां के लिये की जायें।
जब इन पदों पर नियुक्त लोगों को बार-बार बदला जाता है या विशेषज्ञ लोगों की नियुक्ति नहीं की जाती है तब इसका नुकसान कई पीढीयों तक को भुगतना पड़ता है। हिमाचल में ही पर्यावरण और प्रदूषण के मामलों में प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी तक कई बार सरकार पर नाराज़गी जता चुके है। कसौली कांड से देश भर में प्रदेश की बदनामी हो चुकी है। कसौली प्रकरण में एनजीटी ने कुछ अधिकारियों को नामतः चिन्हित करके उनके खिलाफ कड़ी कारवाई करने के निर्देश सरकार को दिये थे जिन पर आज तक अमल नहीं हुआ है। धर्मशाला के मकलोड़ गंज प्रकरण में भी कई अधिकारियों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय कारवाई किये जाने के लिये निर्देश दे चुका हैं। इस प्रकरण में शीर्ष अदालत जुर्माना तक लगा चुका है जिसे सरकारी खजाने से भरकर अधिकारियों को बचा लिया गया। अब ऊना के स्वां में रेत के लिये हुए अवैध खनन के मामले में एनजीटी प्रदूषण पर्यावरण और पुलिस तथा उद्योग विभागों को कड़ी फटकार लगा चुका है। इन विभागों के दोषी अधिकारियों को चिन्हित करके उन्हें सज़ा देने के निर्देश दे चुका है लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में दिये फैसले में स्पष्ट कहा है कि प्रदूषण नियन्त्रण बोर्डों में छः माह के भीतर अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्यिं को लेकर स्पष्ट नियम बनाये जायें। शीर्ष अदालत ने सितम्बर 2017 में याचिका संख्या 1359 वि 2017 में यह निर्देश दिये है। इन निर्देशों पर यह कहा है सर्वोच्च न्यायालय में जो आज तक नहीं हुआ है। यह कहा है सर्वोच्च न्यायालय ने  Unfortunately, not withstanding all these suggestions, recommendations and guidelines the SPCBs continue to be manned by persons who do not necessarily have the necessary expertise or professional experience to address the issues for which the SPCBs were established by law. The Tata Institute of Social Sciences in a Report published quite recently in 2013 titled “Environmental Regulatory Authorities in India: An Assessment of State Pollution Control Boards” had this to say about some of the appointments to the SPCBs:

“An analysis of data collected from State Pollution Control Boards, however, gives a contrasting picture. It has been observed that time and again across state governments have not been able to choose a qualified, impartial, and politically neutral person of high standing to this crucial regulatory post. The recent appointments of chairpersons of various State Pollution Control Boards like Karnataka (A a senior BJP leader), Himachal Pradesh (B a Congress party leader and former MLA), Uttar Pradesh (C appointed on the recommendation of SP leader X), Arunachal Pradesh (D a sitting NCP party MLA), Manipur Pollution Control Board (E a sitting MLA), Maharashtra Pollution Control Board (F a former bureaucrat) are in blatant violation of the apex court guidelines. The apex court has recommended that the appointees should be qualified in the field of environment or should have special knowledge of the subject. It is unfortunate that in a democratic set up, key enterprises and boards are headed by bureaucrats for over a decade. In this connection, it is very important for State Governments to understand that filling a key regulatory post with the primary intention to reward an ex-official through his or her appointment upon retirement, to a position for which he or she may not possess the essential overall qualifications, does not do justice to the people of their own states and also staffs working in the State Pollution Control Boards. The primary lacuna with this kind of appointment was that it did not evoke any trust in the people that decisions taken by an ex-official of the State or a former political leader, appointed to this regulatory post through what appeared to be a totally non-transparent unilateral decision. Many senior environmental scientists and other officers of various State Pollution Control Boards have expressed their concern for appointing bureaucrats and political leader as Chairpersons who they feel not able to create a favourable atmosphere and an effective work culture in the functioning of the board. It has also been argued by various environmental groups that if the government is unable to find a competent person, then it should advertise the post, as has been done recently by states like Odisha. However, State Governments have been defending their decision to appoint bureaucrats to the post of Chairperson as they believe that the vast experience of IAS officers in handling responsibilities would be easy. Another major challenge has been appointing people without having any knowledge in this field. For example, the appointment of G with maximum qualification of Class X as Chairperson of State Pollution Control Board of Sikkim was clear violation of Water Pollution and Prevention Act, 1974.”14
32. The concern really is not one of a lack of professional expertise – there is plenty of it available in the country–but the lack of dedication and willingness to take advantage of the resources available and instead benefit someone close to the powers that be. With this couldn’t-care-less attitude, the environment and public trust are the immediate casualties. It is unlikely that with such an attitude, any substantive effort can be made to tackle the issues of environment degradation and issues of pollution. Since the NGT was faced with this situation, we can appreciate its frustration at the scant regard for the law by some State Governments, but it is still necessary in such situations to exercise restraint as cautioned in State of U.P. v. Jeet S. Bisht.15
33. Keeping the above in mind, we are of the view that it would be appropriate, while setting aside the judgment and order of the NGT, to direct the Executive in all the States to frame appropriate guidelines or recruitment rules within six months, considering the institutional requirements of the SPCBs and the law laid down by statute, by this Court and as per the reports of various committees and authorities and ensure that suitable professionals and experts are appointed to the SPCBs. Any damage to the environment could be permanent and irreversible or at least long-lasting. Unless corrective measures are taken at the earliest, the State Governments should not be surprised if petitions are filed against the State for the issuance of a writ of quo warranto in respect of the appointment of the Chairperson and members of the SPCBs. We make it clear that it is left open to public spirited individuals to move the appropriate High Court for the issuance of a writ of quo warranto if any person who does not meet the statutory or constitutional requirements is appointed as a Chairperson or a member of any SPCB or is presently continuing as such.

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