शिमला/शैल। कोरोना के कारण लगे लाकडाऊन के बाद अब इसके अनलाक का भी पांचवा चरण चल रहा है। लेकिन प्रदेश राजस्व विभाग अभी भी इससे बाहर नहीं निकल पा रहा है। इसके कारण लोगों के सैंकड़ों भूमि सम्बन्धी मामले फिल्ड में लंबित पडे़ हुए हैं।
आठ महीने गुजरने के बाद भी लोगों को हिमाचल प्रदेश में भूमि रिकार्ड के म्यूटेशन का इंतजार है। इस समय शिमला ग्रामीण के तहत ही 500 से अधिक म्यूटेशन कार्यवाही लंबित पडी हैं। फाइलें धूल खा रही हैं क्योंकि कोविड महामारी के कारण राजस्व अधिकारी इस प्रक्रिया का संचालन करने के लिए मैदान में नहीं जा रहे हैं, जिससे स्थानीय ग्रामीणों में हड़कंप मच गया है।
इसके बारे में बात करते हुए, घनाहट्टी निवासी सोहन सिंह ने कहा कि महामारी के डर से तहसीलदार और नायब-तहसीलदार इस साल मार्च से उत्परिवर्तन प्रक्रिया का संचालन नहीं कर रहे हैं। जानबूझकर देरी के कारण मामलों की संख्या अंतिम निपटान के लिए लंबित है।
राज्य के अन्य उपखंडों में भी उत्परिवर्तन की इसी तरह की स्थिति है क्योंकि लोग रिकार्ड के उत्परिवर्तन के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं। सिंह ने कहा कि पटवारी म्यूटेशन की तारीख की घोषणा करने में असमर्थता जता रहे हैं क्योंकि लंबे समय से वरिष्ठ राजस्व अधिकारी खेतों में नहीं आ रहे हैं। हमें जल्द ही म्यूटेशन प्रक्रिया की आवश्यकता है, लेकिन यह मुद्दा अधिकारियों के पास लंबित है।
उन्होंने कहा, ‘लोगों ने संबंधित प्राधिकरण के साथ म्यूटेशन फीस जमा की है और निष्पादित करने का आदेश विभिन्न मामलों में वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों द्वारा पहले ही पारित कर दिया गया है।
ग्राम पंचायत शानन के एक अन्य निवासी रूप राम वर्मा ने कहा कि पटवारी ने म्यूटेशन कार्यवाही दर्ज करने के लिए अपना काम पूरा कर लिया है, लेकिन नायब तहसीलदार और तहसीलदार रैंक के राजस्व अधिकारियों द्वारा इसे स्वीकार किया जाना बाकी है। आम तौर पर पटवारी राजस्व रिकार्ड में म्यूटेशन पेपर में प्रवेश करता है, कानूनगो (पटवारी से वरिष्ठ) प्रविष्टियों का सत्यापन करता है और नायब तहसीलदार और तहसीलदार के रजिस्टर से मेल खाता है या रूटीन फैशन में कार्यवाही को देखता है।
स्थानीय निवासियों ने तर्क दिया कि महामारी के दौरान अतिरिक्त सावधानी दिखाने के लिए राजस्व प्राधिकरण का रवैया स्वीकार्य नहीं है। जब अदालत ने नियमित रूप से फैशन में काम करना शुरू किया और लोग कोविड प्रोटोकाॅल के बाद अपने कर्तव्य में भाग ले रहे हैं, तब म्यूटेशन कार्यवाही भी किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएगी जिससे सामाजिक संतुलन बना रहे। उन्होंने कहा कि अब पशु चिकित्सा विभाग, स्वास्थ्य, शिक्षा, आईपीएच और सार्वजनिक कार्य भी नियमित काम के लिए दूरदराज के गांवों का दौरा कर रहे हैं। ‘लेकिन राजस्व अधिकारियों की सनक और कल्पना उनके लोगों को अपने राजस्व कार्यों को पूरा करने के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के लिए मजबूर कर रही है।
यह दिलचस्प है कि राजस्व विभाग को सीमांकन, गालदेवरी और म्यूटेशन और अन्य कार्यों का संचालन करना पड़ता है, लेकिन वे अभी भी पिछले आठ महीनों से लाकडाउन मोड में हैं, सिंह ने कहा। वर्मा ने कहा कि इसे समयबद्ध प्रक्रिया बनाने के लिए म्यूटेशन को नागरिक रजिस्टर के तहत लाया जाना चाहिए।
इस पर क्षेत्र के निवासियों ने निष्कर्ष निकाला है कि राज्य में कम्प्यूटरीकृत राजस्व प्रणाली होने के बावजूद राज्य का राजस्व विभाग अभी भी सुस्त, अपारदर्शी और लालफीताशाही शासकीय क्षेत्र है जिसे दुरूस्त किए जाने की आवश्यकता है।
तीन वर्षों में घट गये 1134 बलात्कार और 43 गैंगरेप
शिमला/शैल। जयराम सरकार का सत्ता में तीसरा वर्ष चल रहा है। दिसम्बर मे तीन वर्ष पूरे हो जायेंगे। विधानसभा के इस सत्र के पहले ही दिन नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री का एक अतारंकित प्रश्न लगा था कि गत तीन वर्षों में बलात्कार की कितनी घटनाएं हुई, इनमें से कितने गैंगरेप कहां-कहां हुए, बलात्कार के कितने मामले अदालत तक पहंुचे और कितने मामलों में अपराधियों को सज़ा हुई। अतारंकित प्रश्न था इसलिये लिखित सूचना ही आनी थी। इस सूचना के मुताबिक प्रदेश में बीते तीन वर्षों में 31-7-2020 तक 1134 मामले बलात्कार के दर्ज हुए जिनमें से 925 में चालान अदालत में दायर हुए और 30 मामलों में सज़ा हो चुकी है। गैंगरेप के 43 मामले हुए हैं। गैंगरेप के मामलों में कांगड़ा पहले स्थान पर शिमला दूसरे स्थान पर है।
यह आंकडे प्रदेश की कानून और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करते हैं क्योंकि प्रतिदिन औसतन बलात्कार की एक घटना हो रही हैं प्रदेश में मई 2017 में शिमला के ही कोटखाई में गुड़िया कांड घटा था। प्रारम्भिक जांच के पहले ही दिनों में पुलिस पर सवाल खडे हो गये थे। उच्च न्यायालय को मामले में दखल देना पड़ा और जांच सीबीआई को सौंप दी गयी। भाजपा उस समय विपक्ष मेें थी और इस मामले पर शिमला से लेकर दिल्ली तक धरने प्रदर्शन और कैण्डल मार्च आयोजित हो गये थे। दिसम्बर के विधानसभा चुनावों में यह सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बना था। लेकिन आज भाजपा सत्ता में है लेकिन गुड़िया को न्याय अब तक नही मिल पाया है। बल्कि आज भाजपा के ही शासनकाल में गैंगरेप के 43 मामले घट गये हैं। कांगड़ा के फतेहपुर में एक दलित लडकी की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गयी है। कोई बड़ी कारवाई इस मामले पर सामने नही आयी है। जिन लोगों ने गुड़िया कांड के समय सरकार और उच्च न्यायालय तक को हिलाकर रख दिया था वह सब अब चुप है। मीडिया के लिये भी यह गैंगरेप और फिर हत्या कोई बड़ी खबर नहीं है। अदालत भी अब दखल देने के लिये तैयार नही है।
शिमला/शैल। पिछले दिनों प्रदेश में कांगडा केन्द्रिय सहकारी बैंक के निदेशक मण्डल के लिये हुए चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। यह हार कितनी बड़ी रही है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस से बैंक के अध्यक्ष रहे सिपाहिया भी निदेशक का चुनाव हार गये हैं जबकि इसी चुनाव में भाजपा सरकार के वर्तमान मन्त्री राकेश पठानिया, सरवीण चैधरी, विक्रम ठाकुर और गोविन्द ठाकुर भी अपने-अपने जोन में भाजपा के उम्मीदवार को जीत नहीं दिला पाये हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा के पक्ष में भी कोई बड़ा माहौल नहीं था। कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक के चुनाव उस समय हुए जब किसान कृषि उपज विधेयकों के खिलाफ आन्दोलन में है। किसान आन्दोलन की बात कर चुका है और सहकारी क्षेत्र ने इस फैसले पर देशभर में अपना विरोध जताया है। इस तरह पूरे सहकारी क्षेत्र में भाजपा सरकार के खिलाफ रोष है लेकिन यह रोष होते हुए भी प्रदेश कांग्रेस इसका लाभ नही ले पायी।
कांगड़ा बैंक के इन चुनावों में भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की ओर से यह शिकायत रही है कि प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व ने इन चुनावों को गंभीरता से नहीं लिया और न ही चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को कोई सहयोग दिया। जब आधा हिमाचल इस बैंक के कार्यक्षेत्र में आता है और इसका प्रबन्धन यहां की राजनीति को प्रभावित करता है। इस परिदृश्य में बैंक के इन चुनावों में मिली हार प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर एक बड़ा असर डालेगी। क्योंकि यह बैंक प्रदेश के 30 विधानसभा क्षेत्रों और दो लोकसभा क्षेत्रों पर सीधा असर डालता है। फिर इस समय कांगड़ा में भाजपा की गुटबाजी धवाला-पवन राणा और सरवीण चैधरी प्रकरण में खुलकर सामने आ चुकी है। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और अब तक इतिहास भी यही रहा है कि जो दल यहां से दस सीटें जीत लेता है प्रदेश में सरकार उसी की बनती है। फिर इसका असर ऊना और हमीरपुर जिलों पर भी पड़ता है।
इस परिदृश्य में कांगड़ा बैंक के चुनावों में भी कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर पार्टी उम्मीदवारों को वांच्छित सहयोग न देने का आरोप लगना संगठन के भीतरी समीकरणों पर बहुत कुछ कह जाता है। बल्कि आज तक यह आरोप लगता आया है कि शिमला में बैठा नेतृत्व हमेशा कांगड़ा को कमजोर करता आया है। बल्कि कांगड़ा के अपने नेताओं पर जिले के हितों के लिये भी इकट्ठे न होने का आरोप लगता रहा है। इस समय यदि कांगड़ा से विप्लव ठाकुर, जीएसबाली, चन्द्र कुमार, सुधीर शर्मा, संजय रत्न और अजय महाजन ईमानदारी से इकट्ठे हो जायें तो उसी से प्रदेश की राजनीति बदल जाती है। क्योंकि कांगड़ा की इस एकता का सीधा प्रभाव ऊना और हमीरपुर पर पड़ता है। इस समय यदि कांग्रेस लोकसभा क्षेत्र से नेता पर सहमति बना लेती है और जिस तरह की आक्रामकता विप्लव ठाकुर ने संसद में दिखाई है यदि वही आक्रामकता प्रदेशभर में अपना ली जाये तो प्रदेश में सत्ता परिवर्तन को कोई नही रोक पायेगा। लेकिन इस समय भी जब यह आरोप लग रहे हैं कि जयराम को सबसे ज्यादा सहयोग वीरभद्र सिंह से मिल रहा है तो वहीं से कांग्रेस के भविष्य पर सवाल उठने शुरू हो जाते हैं।
शिमला/शैल। जिला शिमला के कुमारसेन क्षेत्र के भनालग महिला मण्डल में 28 जुलाई के दलित और ऊंची जाति की सदस्यों में एक विवाद खड़ा हो गया था। यह विवाद किसी समारोह में कोरोना बन्दिशो और आर्थिक साधनों की कमी के चलते स्वर्ण जाति के लोगोें को न बुलाये जाने के कारण हुआ था। समारोह में न बुलाये जाने से नाराज हुए स्वर्ण जाति के लोगों ने दलितों को महिला मण्डल से ही निकालने का फरमान सुना दिया। इस पर दोनो पक्षों मे
जुबानी जंग शुरू हो गया जो हाथापाई के मुकाम तक पहुंच गया और उसमें जातिसूचक शब्दों तक का भी प्रयोग किया गया। दलित समाज ने इसके खिलाफ स्थानीय पुलिस थाना में शिकायत भी दी लेकिन इस पर कोई कारवाई नही हुई। अन्ततः 17 सितम्बर को इन लोगों ने एसपी शिमला से भेंट कर उन्हें यह शिकायत सौंपी। शिकायत सौपनें के बाद इन सदस्यों ने मीडिया से भी बात की। शैल ने इनकी बात को स्थान दिया और पाठकों के सामने रखा जिसे 60,000 से ज्यादा पाठकों ने देखा पढ़ा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश के दलित समाज के भीतर का लावा सुलग रहा है।
भनालग प्रकरण पर जब दलित समाज की महिलाओ ने एसपी शिमला से भेंट की तब पुलिस प्रशासन हरकत
में
आया लेकिन अभी तक कोई ठोस कारवाई सामने नही आयी है। लेकिन भनालग की घटना के बाद दलितों के खिलाफ पूर्व में इसी सरकार के कार्यकाल में जो मामले घट चुके हैं वह फिर से चर्चा में आ गये हैं। इन मामलों में कर्मचन्द भाटिया द्वारा दर्ज कारवाई गयी एफआईआर से लेकर दलित नेता नरेन्द्र कुमार एडवोकेट द्वारा उठाये मामले फिर से चर्चा में आ गये हैं क्योंकि इन पर अबतक कोई प्रभावी कारवाई सामने नही आयी है। सबसे बड़ा आरोप तो यह लग रहा है कि स्कूलों में दिये जाने वाले मीड डे मील में कई स्थानों पर दलित समाज के बच्चो को स्वर्णों से अलग बैठाया जाता है। इस भेदभाव का शिकार तो दलित मन्त्री तक हो चुके हैं जब उन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं मिला था। स्कूलों में दलित और ऊंची जाति के बच्चों को अलग अलग भोजन परोसने के मामले कुल्लु, मण्डी ही नहीं बल्कि लगभग सभी जिलों में घट चुके हैं। ऐसे मामलों मे दलित उत्पीडन अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाने के लिये CRPC156 (3) के माध्यम से अदालत का भी सहारा लेना पडा है।
दलित महिलाओं के मामलो में कांगड़ा के फतेहपुर में नाबालिग लड़की के साथ हुए गैंगरेप का मामला सबसे बड़ा मामला बन गया है। इसके बाद चुराह की बिमला देवी की हत्या, दरंग की लीला देवी और उसके बेटे के साथ मारपीट सराज की उमा देवी के अपहरण का मामला ऐसे प्रकरण हैं जो सभी के लिये गंभीर चिन्ता के मामले हैं। कई स्थानों पर दलितों का स्वर्णों के मन्दिरो में प्रवेश आज भी वर्जित है। दलित और स्वर्ण एक ही रास्ते से नहीं गुजर सकते ऐसा दरंग में है और उल्लघंन करने पर देवता दलितों से बकरे की मांग करता है। स्वभाविक है कि जब इस तरह का आचरण व्यवहार होगा तो दलित समाज मेें ऐसी मानसिकता के प्रति रोष और घृणा एक साथ उभरेंगे। लेकिन हैरानी इस बात की है कि सरकार का महिला सशक्तिकरण और समाज कल्याण विभाग ऐसे मामलों का गंभीरता से संज्ञान नहीं ले रहा है जबकि वह उसके अधिकार और कर्तव्य क्षेत्र में आता है।
ऊना का एक मामला रविदास समाज को लेकर विधानसभा के इस सत्र में विधायक राकेश सिंघा एक प्रश्न के माध्यम से उठा चुके हैं। इसमें अदालत के आदेश के बावजूद इन लोगों के खिलाफ बनाये गये आपराधिक मामलों को वापिस नहीं लिया जा रहा है। यह स्वभाविक है कि जब प्रशासन इस तरह करेगा तो इस समाज में रोष और बढ़ेगा ही। सिरमौर मेे एक वकील की हत्या का प्रकरण भी अभी तक किसी मुकाम तक नहीं पहुंचा है।





प्रदेश में 261423 हैं गरीब परिवार
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कई संपन्न राजपत्रित व्यक्ति भी बी पी एल कोटे में शामिल मिले हैं और इसकी योजनाओं का लाभ उठाते हुये सस्ता राशन तक लेते रहे हैं। जैसे ही यह जानकारी सामने आई तब सारे संबद्ध विभाग इस बारे में सजग और सक्रीय हुये। ऐसे लोगों की सूची जारी हुई और इन लोगो के खिलाफ कारवाई शुरू हुई। लेकिन बी पी एल योजना के इस दुरूपयोग से पूरी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गये हैं। क्योंकि ऐसे भी कई मामले सामने आये हैं जहां सही में गरीब लोगों को बी पी एल में आने के लिये लम्बा संघर्ष भी करना पड़ा है। पिछले दिनों सरकार ने दावा किया था कि उसने एक लाख लोगों को बी पी एल से संपन्न लोगों की लाईन में लाने मे सफलता हासिल की है। इस संद्धर्भ में बी पी एल की पूरी चयन प्रक्रिया पर नजर डालना और इसके लिये तय मानकोे का आकलन करना आवश्यक हो जाता है।
बी पी एल चयन के लिये तेरह मानक तय किये गये हैं। इन सामान्य आर्थिक मानको के आधार पर परिवारों का सरक्षण किया जाता है और प्रत्येक मानक के लिये चार अंक दिये जाते हैं। यह तेरह मानक हैः
1. Size group of operational holding of land (क्रियाशील जोत की भूमि का आकार समूह)
2. Type of house (मकान का प्रकार)
3. Average availability of normal wear clothing (सामान्यतःपहनने के कपड़ों की उपलब्धता)
4. Food security (भोजन की सुनिश्चितता)
5. Sanitation (स्वच्छता)
6. Ownership of consumer durables (उपभोक्ता चिरस्थायी सामान का स्वामित्व)
7. Literacy status of the highest literate adult (उच्चतम साक्षर व्यस्क की साक्षरता की स्थिति)
8. Status of the household labour force (परिवार मजदूर बल की स्थिति)
9. Means of livelihood (आजीविका का साधन)
10. Status of Children (बच्चोें की स्थिति)
11. Type of indebtedness (ऋण की किस्म)
12. Reason for migration from household (परिवार में प्रवास का कारण)
13.Preference of assistance (सहायता की प्राथमिकता)
विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देश में यह भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि निम्न श्रेणी के परिवारों को (Exclusion Criteria) बी0पी0एल0 सूची में शामिल न किया जाएः- ऐसे परिवार जिनके पास 2 हैक्टेयर से ज्यादा असिंचित भूमि या 1 हैक्टेयर से ज्यादा सिंचित भूमि हो। ऐसे परिवार जिनके पास बडे़ आकार का पक्का घर हो। ऐसे परिवार जो आयकर देते हों। ऐसे परिवार जिनके पास चार पहिया वाहन जैसे कि कार, मोटर, जीप, टैªैैैक्टर, ट्रक और बस इत्यादि हों। ऐसे परिवार जिनकी वेतन, पैंशन, मानदेय, मजदूरी, व्यवसाय इत्यादि से नियमित मासिक आय मु0 2500/- रू0 से अधिक हो। परिवार से कोई सदस्य सरकारी नौकरी अथवा गैर सरकारी नौकरी में नियमित तौर पर या अनुबन्ध पर कार्यरत हो। विभाग द्वारा जारी अधिसूचना 13-07-2018 के संदर्भ में प्रत्येक बी0पी0एल0 परिवार के मुखिया से सादे कागज पर स्वयंसत्यापित करके उपरोक्त Exclusion Criteria पर ग्राम पंचायत में घोषणा पत्र दिये जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त हर वर्ष अप्रैल माह में होने वाली ग्राम सभा की प्रथम बैठक में ग्राम पंचायत की बी0पी0एल0 सूची की समीक्षा करने का निर्णय लिया गया है । बी0पी0एल0 में परिवारों का चयन हेतु ग्राम सभा स्वयं सक्षम है और चयन में मापदण्ड की अवहेलना के संदर्भ में विभाग के दिशा-निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है किःग्राम सभा द्वारा किये गये बी0पी0एल0 परिवारों के चयन बारे यदि कोई शिकायत अथवा आपत्ति हो तो एक माह के भीतर सम्बन्धित उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) के पास अपील दायर की जा सकती है । उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) के निर्णय से असंतुष्ट होने पर एक मास के भीतर उपायुक्त के पास आगामी अपील दायर की जा सकती है। गलत चयन से सम्बन्धित शिकायत मामलों में भी उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) जांच उपरान्त ऐसे परिवारों के नाम बी0पी0एल0 सूची से काटने के आदेश जारी कर सकते हैं। यदि किसी मामले में जारी किया गया बी0पी0एल0 प्रमाण पत्र झूठा/गलत पाया जाता है तो उस स्थिति में सम्बन्धित पंचायत सचिव/पंचायत सहायक/ पंचायत प्रधान के विरूद्ध दण्डनीय कार्रवाई की जायेगी तथा जो व्यक्ति ऐसे प्रमाण पत्र का लाभ प्राप्त करेगा उसे सेवा से बर्खास्त किया जाएगा तथा उसके विरूद्व नियमानुसार आपराधिक मामला दर्ज किया जायेगा। सरकार के यह बी पी एल के मानक लम्बे समय से चलन में हैं लेकिन इस योजना के साथ मनरेगा योजना भी चलन में है और अब इसे शहर क्षेत्रों के लिये भी बढ़ा दिया गया है। इस योजना के तहत प्रत्येक व्यक्ति के वर्ष में 120 दिन का रोजगार सुनिश्चित है। इसमें दो सौ रूपये प्रति मजदूरी मिलता है। इस तरह मनरेगा में काम करने वाले मजदूर 1000 रूपये महीने के कमा लेते हैं और हजार कमाने वाला बी पी एल मानको में नही आता। फिर हा भूमिहीन का कम से कम दस कनाल(एक एकड़) जमीन बहुत पहले ही सरकारी योजना के तहत दी जा चुकी है। इस तरह मनरेगा में काम करने मासिक आय और एक एकड़ भूमि का मालिक होने के नाते क्या बी पी एल मानको में बाहर नही हो जाते हैं। जबकि व्यवहार में वह सही में ही बहुत गरीब है। यदि दो हैक्टेयर और एक हैक्टेयर के मानक पर चला जाये तो एक हैक्टेयर 25 कनाल का होता है। हिमाचल में बहुत कम परिवार होंगे जिनके पास 25 कनाल में सिंचाई होती होगी या वह 50 कनाल भूमि के मालिक होंगे। भूमि के इन मानक के आधार पर तो प्रदेश के आधे से भी ज्यादा लोग बी पी एल परिवार में आ जायेंगे। ऐसे में इन मानकों की नये सिरे से समीक्षा की जानी चाहिये।