Wednesday, 04 February 2026
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अब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड में हुई डा. संजीव ठाकुर की नियुक्ति पर उठे सवाल

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने हमीरपुर स्थित प्रदेश के अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड में भाजपा के कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के संगठन मन्त्री डा. संजीव ठाकुर को बतौर सदस्य नियुक्ति दी है। डा. ठाकुर आरएसएस के एक प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्ता हैं। ग्वालियर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के एक सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। संघ के प्रति अपने समर्पण के कारण ही डा. ठाकुर ने एक दिन भी सरकारी नौकरी नही की है और इसी कारण से पार्टी ने उन्हे कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के संगठन मन्त्री का दायित्व दिया था। भाजपा में संगठन मन्त्री और अध्यक्ष के पदों की अहमियत एक बराबर रहती है। संगठन मन्त्री पद का कितना प्रभाव होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जयराम सरकार को सबसे पहले चारों संसदीय क्षेत्रों के संगठन मन्त्रीयों संजीव कटवाल, पुरूषोत्तम गुलेरिया, शिशु धर्मा और अब डा. संजीव ठाकुर को ताजपोशीयां देनी पड़ी है जबकि अन्य कार्यकर्ताओं के लिये तो यह कह दिया कि अभी ऐसी नियुक्तियों की कोई शीघ्रता नही है।
हर राजनीतिक पार्टी सत्ता में आने पर अपने कार्यकर्ताओं को विभिन्न अदारों में ताजपोशीयां देती हैं और इसमें किसी को कोई एतराज भी नहीं रहता है केवल अपनी पार्टी के अन्दर ही कार्यकर्ताओं में ऐसी ताजपोशी के लिये दौड़ रहती है। इसलिये जब संजीव कटवाल, पुरूषोत्तम गुलेरिया, शिशु धर्मा, धर्मानी और जमवाल तथा डा. पुंडीर की नियुक्ति हुई तो कहीं से भी नियम प्रक्रिया और राजनीतिक नैतिकता को नजरअन्दाज किये जाने के कोई आक्षेप नही उठे लेकिन जब डा. रचना गुप्ता की लोकसेवा आयेाग में नियुक्ति हुई तब पहली बार सरकार के फैसले पर उंगलियां उठीं और अब वैसी ही स्थिति डा. संजीव ठाकुर को इस बोर्ड का सदस्य नियुक्त किये जाने पर उठ खड़ी हुई है। डा. ठाकुर की नियुक्ति को लेकर सरकार की नीयत और नीति पर सवाल क्यों उठ रहे हैं इसके लिये बोर्ड के कार्य और इस नियुक्ति के साथ जो कुछ और घटा उस पर नजर डालना आवश्यक है। स्मरणीय है कि अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के जिम्मे क्लास थ्री और क्लास फेार के कर्मचारियों की भर्ती करना है। इस चयन की एक लम्बी प्रक्रिया रहती है इसलिये अलग बोर्ड का गठन किया गया था। परीक्षा से लेकर साक्षात्कार तक काफी काम रहता था लेकिन अब केन्द्र सरकार ने इन पदों की भर्ती के लिये परीक्षा और साक्षात्कार दोनो को ही समाप्त कर दिया है। अब यह चयन प्रार्थी की शैक्षणिक योग्यता की मैरिट के आधार पर ही होगा और इस तरह ऐसे चयन में सिफारिश और पक्षपात की संभावनाओं की कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाती है। यदि किसी की मैरिट को नजरअन्दाज किया जाता है तो वह इसकी जानकरी आरटीआई में ले सकता है। केन्द्र का यह फैसला प्रदेशों पर भी लागू है। वीरभद्र सरकार इस आश्य के प्रस्ताव तीन बार मन्त्रीमण्डल की बैठकों में लायी थी। परन्तु किन्ही कारणों से यह फैसला टलता रहा। लेकिन अब सरकार ने केन्द्र में इस फैसले पर अमल करते हुए अभी कुछ दिन पहले ही कुछ साक्षात्कार रद्द किये हैं। केन्द्र के इस फैसले पर पूरी तरह अमल होना ही है और इस अमल के बाद हमीरपुर बोर्ड के पास भी कोई बड़ा काम नही बचेगा। बल्कि जो काम शेष रहेगा वह केवल प्रशासनिक स्तर का ही होगा और उसे तो संबधित विभाग अपने स्तर पर ही अच्छे से निपटा लेंगे। इसलिये अब व्यवहारिक रूप से इतने भारी -भरकम बोर्ड की कोई आवश्कता ही नही रह जाती है। लेकिन इस सरकार ने इस व्यवहारिक पक्ष की ओर ध्यान दिये बिना ही इसमें सदस्य की नियुक्ति कर दी।
इसी के साथ इस नियुक्ति से पहले यहां पर वीरभद्र सरकार के समय लगाये गये चेयरमैन प्रो. झारटा को हटाया गया। प्रो. झारटा ने इस नियुक्ति के बाद हिमाचल विश्वविद्यालय से वांच्छित छुट्टी ले रखी थी और विश्वविद्यालय प्रबन्धन ने वाकायदा उन्हे छुट्टी दे रखी थी। लेकिन अब उसी प्रबन्धन ने विश्वविद्यालय में अध्यापकों की कमी होने का तर्क देकर उनकी छुट्टी रद्द करके उन्हे वापिस बुला लिया। लेकिन प्रबन्धन ने जिस बैठक में प्रो. झारटा की छुट्टी रद्द की उसी बैठक में उसी समय प्रो. नड्डा को वैसी ही छुटटी प्रदान कर दी क्योंकि प्रो. नड्डा केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जेपी नड्डा के सगे भाई हैं। प्रो. झारटा से पहले प्रो. एसपी बंसल भी विश्वविद्यालय से ऐसी ही छुटटी पर हैं लेकिन प्रबन्धन ने उनकी छुट्टी रद्द करके उन्हे तो वापिस नही बुलाया। इस तरह डा. संजीव ठाकुर को बोर्ड में नियुक्त करने के लिये पद का प्रबन्ध किया गया। लेकिन इसपर विश्वविद्यालय की अपनी कार्यप्रणाली पर तो ऐसे सवाल उठ खडे़ हुए हैं जो कि एक शैक्षणिक संस्थान के भविष्य के लिये किसी भी गणित से सही नही ठहराये जा सकते क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रबन्धन में शीर्ष पर महामहिम राज्यपाल आते हैं और इस तरह के फैसलों की छाया सीधे उन पर पड़ती है।
इसी परिदृश्य में डा. संजीव ठाकुर की बोर्ड में हुई नियुक्ति सरकार के लिये अनचाहे ही एक ऐसा सवाल बन जाती है जिसका कोई भी जवाब नहीं हो सकता है। क्योंकि जिस संस्थान के पास आगे चलकर कोई विशेष काम रहने वाला ही नही है उसमें ऐसे नियुक्ति किये जाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। क्योंकि बोर्ड के पास पर्याप्त काम रखने का अर्थ होगा कि यह सरकार भी वीरभद्र सरकार की तरह केन्द्र के फैसले पर अमल करने से पीछे हट जाये और इन पदों की भर्तियों में परीक्षा और साक्षात्कार की व्यवस्था को बनाये रखे।

लोकसेवा आयोग में यदि मीरा वालिया की नियुक्ति नियमों के विरूद्ध है तो रचना गुप्ता की सही कैसे?

शिमला/शैल।  भाजपा ने विधानसभा चुनावों के दौरान जब‘‘हिमाचल मांगे हिसाब’’ जारी किया था तो उसमें एक आरोप यह भी उठाया गया था कि प्रदेश लोक सेवा आयोग में मीरा वालिया की नियुक्ति नियमों के विरूद्ध है। इस नियुक्ति को लेकर एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय में उस समय आ चुकी थी। बल्कि इस याचिका में अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाये गये हैं। याचिका में सवाल इसलिये उठाये गये हैं क्योंकि पंजाब लोक सेवा आयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचे एक मामलें में 15 फरवरी 2013 को आये फैसले में स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं कि प्रदेशों में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के आधार क्या होने चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश इसलिये जारी किये हैं कि लोक सेवा आयोग राज्यों की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं के लिये पात्र उम्मीदवारों का चयन करता है। इसलिये यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि इन संस्थानों में लगने वाले अध्यक्ष/सदस्यों की नियुक्ति के आधार पूरी तरह स्पष्ट और परिभाषित हों। सर्वोच्च न्यायालय का यह 103 पृष्ठों का फैसला न्यायमूर्ति जस्टिस ए.के.पटनायक और जस्टिस मदन वी लोकुर की खण्डपीठ का है। 

इस फैसलें में परिभाषित मानकों और प्रक्रिया के आईने में प्रदेश के वर्तमान लोक सेवा आयोग का चयन और गठन एकदम इस फैसलें में तय प्रक्रिया से एकदम भिन्न है। क्योंकि यह फैसला 15 फरवरी 2013 को आ गया था और आज आयोग में अध्यक्ष से लेकर सदस्यों तक सबकी नियुक्तियां इस फैसलें के बाद हुई हैं। स्मरणीय है कि पंजाब लोक सेवा आयोग में लगाये गये अध्यक्ष की नियुक्ति को पंजाब- हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौतीे दी गयी थी तब इस नियुक्ति को उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। तब पंजाब सरकार इस फैसलें की अपील में सर्वोच्च न्यायालय गयी और इस पर 15 फरवरी 2013 को फैसला आ गया। भाजपा ने विधानसभा चुनावों के दौरान इसी फैसलें के आधार पर मीरा वालिया की नियुक्ति को नियमों के विरूद्ध करार दिया था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि मीरा वालिया की नियुक्ति नियमों के विरूद्ध थी तो फिर उसी गणित में डा. रचना गुप्ता की नियुक्ति सही कैसे हो सकती है। यही नहीं सरकार ने यह नियुक्ति करने के लिये पहले वाकायदा दो पद सदस्यों के सृजित किये और एक पर उसी दिन नियुक्ति भी कर दी। डा. रचना गुप्ता के पहले इसी आयोग में पत्राकार के. एस. तोमर अध्यक्ष रह चुके हैं। इसलिये पत्रकार तोमर की नियुक्ति हो या अब रचना गुप्ता की हो । इस पर व्यक्तिगत रूप से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती और इसी गणित में मीरा वालिया की नियुक्ति से भी आपत्ति का कोई प्रश्न नही हो सकता। यह सभी लोग अपने में योग्य हैं लेकिन इन नियुक्तियों पर सवाल तो भाजपा के हिसाब मांगने से लगे हैं। ऐसे में अब अपने ही लगाये आरोप को नज़रअन्दाज करके की गयी इस नियुक्ति पर तो भाजपा को ही हिसाब देना है।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्या रहा है इसकी जानकारी मुख्यमन्त्री को नही हो सकती यह स्वभाविक और संभव है। लेकिन इस फैसलें की जानकारी मुख्यमन्त्री कार्यालय और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को भी नही रही हो ऐसा नहीं माना जा सकता। बल्कि इस मामलें में तो प्रदेश उच्च न्यायालय में पहले से ही एक याचिका लंबित है और उसमें सरकार की ओर से जवाब भी दायर किया गया है। इसलिये यह स्वभाविक है कि जब दो पदों के सृजन का मामला मन्त्रीमण्डल के पास गया होगा तब उच्च न्यायालय में लंबित मामलें की जानकारी भी रिकार्ड पर लायी गयी होगी। ऐसे में यह एक और सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या सरकार ने तथ्यों को नज़र अन्दाज करके पदों के सृजन और फिर नियुक्ति को हरी झण्डी दी या अधिकारियों ने सही स्थिति ही सामने नही रखी। जो भी स्थिति रही हो लेकिन इस पूरे मामलें को जिस तरह से अंजाम दिया गया है उससे सरकार की अपनी ही स्थिति बुरी तरह हास्यस्पद बन गयी है।

अपने ही आरोप पत्र में उलझने लगी सरकार

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने भी यह संकल्प दोहराया है कि वह भ्रष्टाचार कतई बर्दाशत नही करेगी लेकिन इसी के साथ यह भी कहा है कि पिछली सरकार द्वारा राजनीतिक कारणों से बनाये गये मामलों को वापिस भी लेगी। इन मामलों को लेकर पिछले दिनों सचिवालय मे मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सी.ओ.एस. की बैठक भी हो चुकी है और इसमें ऐसे मामलों को शीघ्र वापिस लेने पर बल भी दिया गया। लेकिन क्या विजिलैन्स में दर्ज मामलें और जो मामलें अदालत तक जा पंहुचेे हैं उन्हेे भी वापिस लिया जायेगा। इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है क्योंकि पुलिस के पास दर्ज सामान्यतः कानून और व्यवस्था से जुड़े मामलों को राजनीतिक आधार करार देकर वापिस लिया जा सकता है लेकिन क्या भ्रष्टाचार को लेकर विजिलैन्स में दर्ज मामलों को भी वापिस लिया जा सकता है। इसको लेकर स्थिति उलझी हुई है।
इस समय विजिलैन्स के पास एचपीसीए और राजीव बिन्दल के मामलें हैं और यह मामलें अदालत में भी पंहुच चुके हैं। बिन्दल के मामलें में तोे गवाहीयां चल रही हैं। उसके बाद बहस और फिर फैसलों की नौबत आ जायेगी। इस मामलें में पिछली बार धूमल सरकार के वक्त में विधानसभा अध्यक्ष से अभियोजन की अनुमति इन्कार करवा कर मामलें को खत्म करने का प्रयास किया गया था जो आगे सफल नहीं हो पाया। लेकिन एच.पी.सी.ए. मामलें में दो अधिकारियों पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक सनान और सचिव अजय शर्मा ने सरकार से यह मामलें वापिस लिये जाने का आग्रह किया हुआ है। सरकार इन आग्रहों पर विचार कर रही हैं लेकिन दोनों के मामलें में सरकार की ओर से अभियोजन की अनुमति जारी हो चुकी है। कानून के जानकारों के मुताबिक अभियोजन की अनुमति जारी हो जाने के बाद उसे वापिस लेने का कोई प्रावधान नही है। बल्कि ऐसे आग्रह पर सरकार द्वारा विचार किये जाने को भी मामलें को प्रभावित किये जाने का प्रयास करार दिया जाता है क्योंकि अदालत में मामला पंहुचने के बाद पी पी ही कानून की राय में उसका मास्टर होता है। इस परिदृश्य में सरकार इन मामलों को कैसे वापिस लेती है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है।
दूसरी ओर भाजपा का आरोप पत्र राजभवन में लंबित पड़ा है। इस आरोप पत्र पर भाजपा ने सीबीआई जांच की मांग कर रखी है। इस आरोप पत्र में भाजपा ने स्मार्ट सिटी धर्मशाला को लेकर एक गंभीर आरोप लगा रखा है। भाजपा का आरोप है कि वीरभद्र सरकार ने धर्मशाला को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने के लिये केन्द्र सरकार के पास तोड़-मरोड़ कर बल्कि अलग से गढ़कर तथ्य पेश किये हैं। जिसके आधार पर स्मार्ट सिटी का दर्जा मिला है। यही नहीं नगर निगम धर्मशाला में जो अंडर ग्रांऊड डस्टबिन लगाये गये है। उसमें भी बड़े स्तर पर घपला हुआ है। भाजपा ने धर्मशाला स्मार्ट सिटी और नगर निगम प्रकरण को लेकर जो आरोप लगाये हैं उनकी सी.बी.आई. जांच की मांग कर रखी है। धर्मशाला के विधायक एवम् सिविल सप्लाई मन्त्री किश्न कूपर के लिये यह जांच करवाया जाना प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
सूत्रों के मुताबिक अब राजभवन से आर.टी.आई. के तहत इस संद्धर्भ में हुई कारवाई की जानकारी मांगी गयी है। दूसरी ओर यह भी चर्चा चल उठी है कि धर्मशाला स्मार्ट सिटीे या नगर निगम को लेकर वीरभद्र शासन में जो भी फैसले लिये गये हैं उनमें बतौर अतिरिक्त मुख्य सचिव यू.डी. जिस अधिकारी की मुख्य भूमिका रही है वही अधिकारी इस सरकार में भी एक प्रमुख भूमिका में बैठा हुआ है। वैसे यह माना जा रहा है कि भाजपा का यह आरोप भी वैसा ही है जैसा कि लोक सेवा आयोग को लेकर रहा है लेकिन यह आरोप भी अब सरकार पर अपने ही आरोप पत्र के कारण भारी पड़ने जा रहा है।

निगमों / बोर्डाें की ताजपोशीयों में उलझे सरकार और संगठन

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने सत्ता संभालते हीे जिस तेजी के साथ प्रदेश लोक सेवा आयोग के लिये सदस्यों के दो पदों का सृजन करके एक को तुरन्त प्रभाव से भर भी दिया और दो निगमों में ताजपोशीयां भी कर दी तथा सैंकड़ो के हिसाब से प्रशासनिक अधिकारियों का फेरबदल भी कर दिया उससे लगने लगा था कि यह सरकार इसी रफ्तार से आगे भी अपने काम को अंजाम देती जायेगीं विभिन्न निगमों/बोर्डो में हर सरकार अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को राजनीतिक ताजपोशीयां देती है और इसमें किसी को कोई एत्तराज भी नहीं होता है बल्कि जितनी शीघ्रता से यह राजनीतिक ताजपोशीयां हो जाती है उसी अनुपात से कार्यकर्ता भी कामकाज मे जुट जाते है। लेकिन अब यह नियुक्तियां रूक गयी हैं बल्कि मुख्यमन्त्री को यह ब्यान देना पड़ा है कि यह नियुक्तयां करने कीे कोई शीघ्रता नहीं है। जब मुख्यमन्त्री ने यह कहा ठीक उसी दौरान यह सामने आ गया कि पालमपुर में इन्दु गोस्वामीे मुख्यमन्त्री के लिये रखे गयेे भोज के आयोजन में शामिल नही हुई। इस शामिल न होने को लेकर आयोजकों और इन्दु गोस्वामी की ओर से आये स्पष्टीकरणों से यह स्पष्ट हो गया कि पालमपुर भाजपा में सब ठीक नही चल रहा है। इन्दु गोस्वामी के प्रकरण के बाद हमीरपुर के भोरंज में एक आयोजन में सांसद अनुराग ठाकुर ‘‘गो बैक’’ केे नारे लग गये । यह नारे इस बात के लिये लगे कि इस क्षेत्र की एक पेयजल योजना लगबाल्टी का आधा पानी धर्मपुर क्षेत्र को दिया जा रहा है। धर्मपुर सिंचाई एवम् जनस्वास्थ्य मन्त्री महेन्द्र सिंह ठाकुर का क्षेत्र है और यह योजना भी आज की नहीं पुरानी है। अनुराग भी तीसरी बार सांसद बने हैं तो फिर यह विरोध प्रर्दशन आज ही क्यों हुआ?
इस समय पार्टी के विधायकों को लेकर यह चर्चा है कि यह लोगे मन्त्री न बनाये जाने को लेकर नाराज़ चल रहे  हैं । इनमें नरेन्द्र बरागटा और रमेश धवाला के नाम प्रमुखता से बाहर भी आ चुकें है। यही  नही  जोे प्रमुख लोग चुनाव हार गये हैं उनकोे लेकर भी यह सवाल उठ रहें है कि उनको कैसे और कहां ऐडजैस्ट किया जायेगा। क्योंकि इस समय पार्टी के अन्दर धूमल, नड्डा, शान्ता और जयराम बराबर के ध्रुव बन कर चल रहे है। विधायकों का बहुमत धूमल के साथ था यह सर्वविदित हैं इसी बहुमत के कारण केवल धूमल के ही दो लोगों को ताजपोशीयां मिल पायी है। बल्कि अब जयराम नड्डा और शान्ता को को भी बराबर साधने में लग गये है। अभी दिल्ली में नड्डा के आवास पर केन्द्र की प्रतिनियुक्ति पर तैनात हिमाचल के अधिकारियों कोे मिलना इसी कड़ी में गिना जा रहा है। यही नहीे चम्बा दौरे के लिये नड्डा को चण्ड़ीगढ़ से लेना फिर शान्ता को पालमपुर से लेना और वापिस वहीं छोड़ना तथा बीच में अमृतसर तक जाना सब कुछ इसी साधने के आईने में देखा जा रहा है। इस राजनीतिक तालमेल का बिठाये रखने के गणित मेे यह निगमों/बोर्डों की नियुक्तियां अभी और कितनी देर तक लटकी रहती है। इस पर अब सवाल तक उठने लग पड़े है। क्योंकि आने वाले समय में जहां अगलेे वर्ष लोकसभा चुनावों का सामना करना है वहीं पर यह संभावना भी बढ़ती जा रही है कि मोदी ‘‘एक देश एक चुनाव’’ की योजना पर अमल करने में सफल हो जाते है तब तो लोकसभा के साथ ही प्रदेश विधानसभा के चुनाव का भी फिर से सामना करने की नौबत आ जायेगी।
इस परिदृश्य में आज जब प्रदेश सरकार की बागडोर जयराम ठाकुर के हाथ में है तो कल को चुनावों में परिणाम देने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की हो जाती हैं लेकिन यह परिणाम देेने के लिये कार्यकर्ता भी इस उम्मीद में बैठे हैं कि विधायकों/मन्त्रीयों के बाद उन्हें भी सरकार की ओर से निगमो/बोर्डों में नियुक्तियों के माध्यम सेे सम्मान मिल जाना चाहिये। पार्टी के शीर्षे पर बैठे बड़े नेताओं के आपसी बदलते समीकरणों के कारण यदि कार्यकर्ताओं की ताजपोशीयां लम्बे समय तक लंबित रहती है। तो इसका नुकसान सरकार और संगठन को उठाना पड़ेगा स्थिति उस मोड़ तक जा पहुंची है। इसलिये अब संगठन और सरकार इनकी गुथी को सुलझाती है इस पर सबकी निगाहें लगी है।

दस माह से 2200 अंशकालिक पटवारी सहायकों को नहीं मिला वेतन- सरकार की नीति सवालों में

शिमला/शैल। प्रदेश में कार्यरत 2200 अंशकालिक पटवारी सहायकों को पिछले दस माह सेे वेतन नही मिला है। यह बात इन्होने शिमला में आयोजित अपने एक सम्मलेन में कही है। इस सम्मेलन में इन्होंने प्रदेश स्तरीय यूनियन का गठन करकेे सरकार से अपने लिये न्याय की मांग की है। इन लोगों ने आरोप लगाया है कि उनसे 8 घण्टे से भी ज्यादा काम लिया जाता है। पटवारी स्तर का हर कार्य इनसे करवाया जाता है। किसी भी तरह की कोई छुट्टी और मैडिकल आदि की भी सुविधा नही दी जाती है। इन्हे केवल 3000 रूपये वेतन दिया जाता है और वह भी समय पर नहीं मिलता। इन लोगों ने मांग की हैं कि इनके लिये काॅन्ट्रैक्ट पाॅलिसी बनायी जाये। 

 इन अंशकालिक पटवारी सहायकों को दस माह सेे वेतन न दिये जाने से पूर्व और वर्तमान दोनों सरकारों और पूरे प्रशासनिक तन्त्र पर कई गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। सबसे पहलेे तो यह सवाल आता है कि प्रदेश में पटवारियों की नियमित भर्ती कई बार रद्द होती रही है। इसके कारण आज एक-एक पटवारी के पास दो-दो पटवार सर्कलों की जिम्मेदारी हैं कहीं-कहीं यह दो से भी अधिक की है। मोदी सरकार ने देशभर के राजस्व रिकार्ड को 1954 से लेकर वर्तमान समय तक आधार से लिंक करने का कार्यक्रम शुरू किया है। यह काम समयबद्ध सीमा में होना है। राज्य सरकारों को इस आश्य के निर्देश बहुत पहले जारी हो चुके हैं। इस संबन्ध में प्रदेश के निदेशक लैण्ड रिकार्ड और कुछ  अन्य दिल्ली में ट्रैंनिंग भी ले चुके हैं लेकिन शायद अब इनमें से कुछ का तबादला भी हो चुका है। भारत  सरकार का कार्यक्रम में ऐसे समयबद्ध तरीके से कैसे पूरा होगा यह सवाल अलग से खड़ा रह जाता है। 

इसी के साथ यह सवाल भी सामने आता है कि प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक यह स्पष्ट निर्देश दे चुका है कि समान कार्य के लिये समान वेतन दिया जाना चाहिए। इस नाते जब इन अंशकालिकों से 8 घन्टे काम लिया जा रहा है तो फिर इन्हें वेतन के रूप में तीन हजार ही क्यों दिये जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय यह भी स्पष्ट कर चुका है कि रैगुलर नियुक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से की गयी नियुक्ति चोर दरवाजे की एंट्री है जिसे कानून जायज़ नही ठहराया जा सकता और इसके आधार पर कर्मचारियों के साथ उन्हे मिलने वाले वेतन आदि सेवा लाभों में कोई भेदभाव नही किया जा सकता। इस नाते यह अंशकालिक नियुक्तियां अपने में ही एक अलग प्रश्न हो जाती है। 

अभी सरकार ने पूर्ण राज्यत्व दिवस पर कर्मचारियों और पैन्शनरों को लाभ दिये हैं। क्या इन अंशकालिकों को भी यह लाभ मिल पायेंगे? यही नहीं इस समय वित्त विभाग के पास विभिन्न विभागों के सैंकड़ों कर्मचारियों के अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पाने के मामले लम्बेे अरसे से लंबित पड़े हैं। अब सरकार ने 500 करोड़ का कर्ज लिया है। फिर वित्त विभाग के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक वीरभद्र ने कर्मचारियों को वित्तिय लाभ देने के लिये 700 करोड़ रूपये विशेष तौर पर अलग से सुरक्षित रखे हुए थे। अब इसी पैसे से कर्मचारियों को यह लाभ दिया गया है। ऐसे में अनुकम्पा के आधार  पर नौकरी पाने के इन्तजार में जो सैंकड़ो कर्मचारी बैठे हैं क्या उन्हे यह सरकार अभी लाभ दे पायेगी या वित्त विभाग इस फैसले को अभी और लटकाये रखेगा यह सवाल भी उठने लगा है।


 

 

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