शिमला/शैल। इन दिनों पूरे प्रदेश में पेय जल संकट चला हुआ है। इस संकट से कितनी चुभन होती है इसे अभी 25 मई को प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री और वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल ने भी भोगा है जब उनके शिमला स्थित सरकारी आवास पर पानी खत्म हो गया और रात 11ः30 बजे नगर निगम के उप महापौर ने टैंकर भेजकर पानी का प्रबन्ध करवाया। धूूमल ने इस आपबीति को जनता के साथ सांझा नही किया है क्योंकि इससे सरकार और निगम के प्रबन्धन की पोल खुल जाती। शिमला के कई भागों में छः छः दिन तक पानी नही मिल रहा है। कनलोग क्षेत्रा में सीवरेज का पानी सप्लाई कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेते हुए संवद्ध अधिकारियों के
खिलाफ कारवाई करने के निर्देश दिये। लेकिन इन निर्देशों पर कसौली कांड में पुलिस कर्मियों के निलम्बन की तर्ज पर कारवाई न करके केवल इन्हें संवदेनशील पदों से ही हटाया गया है। इससे सरकार की चिन्ता और गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है क्योंकि इससे पूर्व सरकार ने पीलिया के लिये दोषी रहे अधिकारियों के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की भी अनुमति नही दी है।
लेकिन इससे भी बड़ी संवदेनशीलता तो नगर निगम की महापौर की सामने आयी है जो कि इतने बड़े जल संकट को नज़रअन्दाज करके चीन यात्रा पर चली गयी है। अपने साथ अपने पीए को भी ले गयी है। इस यात्रा की अनुमति सरकार द्वारा ही दी गयी है। लेकिन इसमें सरकार ने उनके पीए को भी साथ जाने की अनुमति कैसे और क्यों दे दी है इसका जवाब निगम में किसी के पास नही है। इस संकट में मेयर की यात्रा इसलिये प्रसांगिक हो जाती है क्योंकि इस समय निगम का आधा प्रशासन तो लोगों के फोन तक नही सुन रहा है। ऐसा इसलिये हो रहा है कि जब शीर्ष प्रशासन को ही शहर की जनता की चिन्ता नही है तो नीचे वालों को क्या होगी।
पानी संकट प्रदेश के दस जिलों में बहुत गंभीर हो चुका है। यह संकट पिछले एक दशक से लगातार बढ़ता जा रहा है। गर्मीयों में पानी के स्त्रोत बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर सिरमौर, बिलासपुर और शिमला में पड़ता है। सिरमौर में 29% बिलासपुर में 27% और शिमला में करीब 16% स्त्रोत सूख जाते हैं इसका प्रभाव कांगड़ा में 17% मण्डी में 14% कुल्लु 10% ऊना 8% और हमीरपुर में 5% स्त्रोतों पर पड़ता है। इसके कारण करीब 10% शहरी और 75% ग्रामीण आबादी प्रभावित होती है। यह स्टडी आईपीएच विभाग में उपलब्ध है। इसमें यह चेतावनी भी दी गयी है कि यह संकट हर वर्ष बढ़ता जायेगा और 2009 के बाद यह गंभीर होता जा रहा है। प्रदेश में इस समय करीब नौ हज़ार पेयजल योजनाएं चल रही हैं। करीब दस हज़ार प्राकृतिक स्त्रोत प्रदेश में उपलब्ध है लेकिन इन सारे स़्त्रोतों का रख-रखाव नही हो रहा है। जिन स्त्रोतों से पाईपों के माध्यम से पानी सप्लाई किया जा रहा है सरकार का रख -रखाव उन्ही तक सीमित हो कर रह गया है। ऊपर से आईपीएच और लोक निर्माण विभागों में जेई से ऊपर तो स्टाॅफ की भर्ती हो जाती है लेकिन निचले स्तर पर जिन कर्मियों ने फील्ड में काम करना होता है उनकी भर्ती नही हो रही है क्योंकि सारा काम ठेकेदारों और आऊट सोर्स के माध्यम से करवाने का चलन हो गया है।
अभी 26 जनवरी को सिंचाई एवम् जन स्वास्थ्य मन्त्री ने घोषणा की थी कि सरकार 3267 करोड़ की एक बड़ी पेयजल योजना पर काम कर रही है। मुख्यमन्त्री ने भी हरीपुरधार में घोषणा की है कि सरकार 2572 करोड़ पेयजल पर खर्च कर रही है। यदि पिछला 15 वर्षों का रिकार्ड खंगाला जाए तो आईपीएच में हजारों करोड़ की पाईपें खरीदी गयी हैं जो शायद अगले दस वर्षों के लिये पर्याप्त होंगी। हर वर्ष भारी मात्रा में पाईपे खरीदी जा रही हैं। विभाग के सूत्रों के मुताबिक जितनी पाईपें खरीदी जा चुकी हैं उनसे प्रत्येक गांव के प्राकृतिक स्त्रोत से पानी लिफ्ट करके उस गांव को दिया जा सकता था। लेकिन एक गांव के बड़़े स्त्रोत से पानी लिफ्ट करके दस बीस गांवो को पानी दे दिया जाता है और इसके कारण शेष गांव के स्त्रोत नज़रअन्दाज हो जाते हैं और बिना देखभाल के वह पानी लोप हो जाता है। इसी के साथ प्रकृति के साथ बड़ी योजनाओं के नाम पर जो छेड़छाड़ की जा रही है उसका असर पूरे पर्यावरण पर पड़ रहा है।
अभी सरकार 3267 करोड़ की जिस बड़ी पेयजल योजना पर काम कर रही है उसमें भी समान की खरीद और योजना को कार्यरूप देने में भी सारा पैसा खर्च किये जाने का प्रारूप तैयार किया गया है। योजना बन जाने के बाद उसके संचालन के फील्ड स्टाॅफ का प्रबन्धन शायद आऊट सोर्स करने पर छोड़ा जा रहा है। शिमला के लिये कोल डैम से पानी लाने की 400 करोड़ की येाजना पिछले पांच वर्षों से सरकारी तन्त्र की लालफीताशाही के कारण व्यवहारिक शक्ल नही ले पायी है। सूत्रों की माने तो कई ठेकेदारो ने इसमें रूचि दिखाई थी जो कि ऊपर के कमीशन की मांग अधिक होने के कारण सफल नही हो पायी है। इस योजना पर अभी भी गंभीरता नही दिखायी जा रही है। यदि सरकार सही में गंभीर होती तो इसमें बाधा बने तन्त्र के खिलाफ कारवाई करके इस योजना पर काम शुरू करवा सकती थी। सरकार ने शिमला के लिये एक जल निगम गठित करने की भी घोषणा की थी लेकिन यह भी अभी तक शक्ल नही ले पायी है।
यही नही शिमला केे जल संकट को लेकर तो पहली बार उच्च न्यायालय की बार कौंसिल ने कोर्ट से गैर हाजिर रह कर अपना आक्रोश प्रकट किया। वरिष्ठ नागरिकों के प्रतिनिधि मण्डल ने पानी को लेकर डीसी को ज्ञापन दिया और चेतावनी दी कि यदि यह व्यवस्था न सुधरी तो यह लोग रिज पर गांधी प्रतिमा के नीचे अनशन पर बैठेंगे। शिमला के जल संकट के लिये केवल इसके प्रबन्धन को ही दोषी माना जा रहा है। क्योंकि जो टैंकरों से पानी सप्लाई किया जा रहा है उन टैंकरों में पानी रिज के ही जन भण्डारण से भरा जा रहा है। इससे भण्डारण में नियमित सप्लाई के लिये स्तर नही बन पा रहा है। इससे आम आदमी को पानी मिल नही रहा है और टैंकरों से केवल मन्त्रीयों और शीर्ष नौकरशाही की टंकियां ही भरी जा रही है। शिमला के प्राकृतिक जल स्त्रोतों की ओर प्रशासन का कितना ध्यान है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बैमलोई के पास एक बड़ा प्राकृतिक स्त्रोत था जिसे एक संस्था टैप करके अपने उपयोग के लिये ले गयी और संवद्ध प्रशासन आॅंखे बन्द करके बैठा रहा। इसी तरह की स्थिति कई अन्य स्त्रोंतो के साथ भी हुई जिन्हें कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपने स्वार्थ के लिये बन्द करवा दिया है। ऐसा शहर के लिफ्ट एरिया और राम बाज़ार में घट चुका है।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सहकारी क्षेत्र में दस बैंक कार्यरत हैं यह बैंक हैं हि.प्र. राज्य सहकारी बैंक, कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक, जोगिन्द्रा सहकारी बैंक, हि. प्र. राज्य सहकारी एवम् ग्रामीण विकास बैंक, कांगड़ा कृषि एवम् सहकारी बैंक, विकास बैंक, शिमला अर्बन सहकारी बैंक, परवाणु अर्बन सहकारी बैंक, मण्डी अर्बन सहकारी बैंक, बघाट अर्बन सहकारी बैंक और चम्बा अर्बन सहकारी बैंक। यह बैंक प्रदेश में सहकारिता अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं। इनमें अर्बन सहकारी बैंको को छोड़कर सबमें एमडी/प्रशासक की नियुक्ति प्रदेश सरकार करती है और इस तरह इनके प्रबन्धन में सरकार का सीधा दखल भी रहता है। इस दखल के अतिरिक्त प्रदेश का रजिस्ट्रार सहकारिता तो इन सब बैंकों का एक तरह से नियन्ता ही होता है। इनका पूरा बोर्ड एक तरह से पंजीयक को जवाब देह होता है। ऐसे में इनमें हो रहे हर कार्य के लिये इनके निदेशक मण्डल के साथ ही सरकार भी बराबर की जिम्मेदार रहती है। प्रदेश के यह सहकारी बैंक वाणिज्यक बैंकों की श्रेणी में नहीं आते हैं। इनमें केवल राज्य सहकारी बैंक को ही वाणिज्य बैंक का स्तर मिला हुआ है। यह अधिकांश में लोगों की जमा पूंजी के ही सहारे अपना कारोबार करते हैं। कुछ को नाबार्ड से भी निवेश सहायता मिलती है। यह बैंक आरटीआई के दायरे से भी बाहर हैं इसलिये इनकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और रजिस्ट्रार सहकारिता पर ही आती है और इसके तहत पंजीकृत हर संस्था को हर वर्ष अपनी आडिट रिपोर्ट रजिस्ट्रार को देनी होती है।
प्रदेश सरकार की आर्थिक स्थिति कितनी गंभीर है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता हैं कि सरकार को वित्तिय वर्ष के आरम्भ में ही 700 करोड़ ऋण लेना पड़ गया है। इस बजट में की गयी घोषणाओ को पूरा करने के लिये सरकार को ग्याहर हजार करोड़ का ऋण लेना पड़ेगा इसका खुलासा बजट दस्तावेजों से हो जाता है यह स्थिति एक गंभीर चिन्ता का विषय बन चुकी है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि सरकार इस बारे में गंभीर नही दिख रही है क्योंकि प्रदेश के सहकारी बैकों का एनपीए 938.27 करोड़ हो गया है। स्वभाविक है कि इन बैंकों से यह ऋण प्रदेश के ही लोगो ने लिया है और उसे वापिस नही किया गया। बैंको ने इस ऋण को बसूलने के लिये कोई कड़े कदम उठाने की बजाये इसे एनपीए में डालकर अपनी सीधी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता ढूंढ लिया है।
इस पर यह सवाल उठता है कि जब यह ऋण वापिस नही आ रहा था तब बैंक प्रबन्धन से लेकर आरसीएस तक ने क्यों कोई कड़े कदम इसे वसूलने के लिये नही उठाये। क्या ऐसा न करने के लिये कोई राजनीतिक दबाव था या स्वयं बैंको का शीर्ष प्रबन्धन भी इसमें भागीदार था। क्योंकि इतनी बडी रकम को एनपीए की जगह सीधा घपला मानकर इसकी जांच की जानी चाहिये। इसकी जांच जयराम सरकार के लिये एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि सूत्रों की माने तो बहुत ऋण बिना पात्रता के दिये गये हैं जिनमें कुछ विद्युत परियोजाओं और बड़े हाटलों को फाईनैस किया गया है जो कि वापिस नही आया है।
इस समय प्रदेश के इन दस बैंको में 938.23 करोड़ का एनपीए चल रहा है जिसमें कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक 560.60 करोड़ के साथ पहले स्थान पर स्टेट को-आॅपरेटिव बैंक 250.48 करोड़ के एनपीए के साथ दूसरे नंबर पर है। बैंकिग नियमों के मुताबिक यदि किसी बैंक का एनपीए 15% तक पंहुच जाये तो बैंक को बन्द कर देने तक की चर्चा चल पड़ती है। कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक का एनपीए 14.87% है। इसमें यदि इसके रिस्क फंडज़ को डाला जाये तो यह निश्चित रूप से बन्द कर दिये जाने के दायरे में आता है। उसी तरह राज्य सहकारी बैंक का एनपीए 4.91% है लेकिन इसके रिस्क फंडज़ 16.92% है। जिसका सीधा अर्थ है कि यह कभी भी एनपीए हो सकते हैं। इस तरह राज्य सहकारी बैंक भी खतरे के उस कगार तक पंहुच चुका है।
यह हैं एनपीए का विवरण
1. राज्य सहकारी बैंक - 250.48 करोड़ 4.91%
2. कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक - 560.60 करोड़ 14.87%
3. जोगिन्द्रा सहकारी बैंक 52.66 करोड़ 15.86%
4. हि. प्र. राज्य सहकारी कृषि एवम्
ग्रामीण विकास बैंक 84.45 करोड़ 20.80%
5. कांगड़ा कृषि एवम् ग्रामीण विकास बैंक- 29.50 करोड़ 24.60%
6. शिमला अर्बन सहकारी बैंक - 2.04 करोड़ 6.60%
7. परवाणु अर्बन सहकारी बैंक 6.06 करोड़ 3.3%
8. मण्डी अर्बन सहकारी बैंक - 1.32 करोड़ 27.98%
9. बघाट अर्बन सहकारी बैक 20.99 करोड़ 4.5%
10. चम्बा अर्बन सहकारी बैंक - 0.23 करोड़ 2.55%
शिमला/शैल। भ्रष्टाचार के प्रति सरकार कितनी गंभीर है इसका प्रमाण अभी परिवहन निगम में हुई कंडक्टरों की भर्ती के प्रकरण में भी सामने आया है। कांग्रेस शासन में तत्कालीन परिवहन मन्त्री जीएस बाली को इसके लिये भाजपा ने खूब कोसा था। इस पर हर तरह के आरोप लगाये गये थे। भाजपा ने अपने आरोप पत्र में भी इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। इसकी जांच करवाने की घोषणा की गयी थी। लेकिन भाजपा का यह आरोप कितना आधारहीन था इसका खुलासा स्वयं जयराम के अपने ही फैसले से हो जाता है। इस कंडक्टर भर्ती प्रकरण की जांच के मुद्दे को जब मंत्रीमण्डल की बैठक में अन्तिम फैसले के लिये रखा गया तब मन्त्रीमण्डल ने बाली के समय में ही हुए चयन को सही पाया और इसमें काई भी जांच करवाने से इन्कार कर दिया है।
अब इस भर्ती प्रकरण के बाद टायर और कुछ अन्य चीजों की खरीद घपला होने के आरोप लगे हैं। बजट सत्र में इस आशय का एक प्रश्न भी सदन में आया था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए सदन में इस मामले की जांच करवाये जाने का आश्वासन भी दिया गया था। अब इस आश्वासन के मुताबिक इसकी जांच करवाने की बात की जा रही है लेकिन कुछ जानकारो का मानना है कि जिन अधिकारियों के समय में यह घपले घटे हैं वह आज जयराम सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और उनके प्रभाव के चलते यह सरकार इस जांच को भी आगे नही बढ़ा पायेगी। क्योंकि परिवहन निगम में सारे महत्वपूर्ण फैसले तो एमडी के स्तर पर ही हो जाते हैं इसमें सचिवालय की भूमिका तो बड़ी नगण्य रह जाती है।
भ्रष्टाचार के मामले में परिवहन निगम का तो आलम ही अलग है। निगम में एक समय सारे कायदे कानूनों को नजरअन्दाज करके एक वरिष्ठ अधिकारी डी.एम शिमला अनिल सेन ने कई लोगों को लाखों रूपये का लाभ और निगम को नुकसान पहुंचाया है। जब सेन पर यह आरोप लगे तब परिवहन सचिव ने 30.8.2016 को एमडी को पत्र भेजकर इन आरोपों की जांच के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों पर एमडी ने निगम के ईडी को इसकी जांच का जिम्मा सौंपा। ईडी ने इन आरोपों की जांच करने के लिये लायकराम ड्राईवर, गोपाल दास कंडक्टर, मदन लाल और कुन्दन सिंह कंडक्टर की फाईलें तलब की। फाईलों की जांच में ईडी ने पाया कि लायक राम को 16 वर्ष बाद नियमों के विरूद्ध अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग करते हुए लाभ दिया गया। इसी तरह गोपाल दास, मदन लाल और कुन्दन सिंह को लाभ दिया गया। इसके लिये डी.एम अनिल सेन अधिकृत नही था।
ईडी ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि "The DM, Shimla Shri Anil Sen was an Appellate Autrhority and not higher to appellate authority and thus exceeded his powers in all above cases. By reviewing such order he has caused financial loss to the HRTC." ईडी मस्त राम भारद्वाज ने 14.6.2017 को एमडी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन इस रिपोर्ट में यह प्रस्ताव नही किया कि इस डीएम के खिलाफ कोई कारवाई की जाये। एमडी ने भी रिपोर्ट आने के बाद अपनी ओर से इस पर कारवाई करने के निर्देश नही दिये। जब रिपोर्ट में यह साफ कहा गया कि डी एम अनिल सेन ने अपने अधिकारियों का दुरूपयोग करते हुए निगम को लाखों का नुकसान पहुंचाया है तो उसके खिलाफ कारवाई की अनुशंसा क्यों नही की गयी इसका किसी के पास कोई जवाब नही है।


वर्ष 2002 में अवैध कब्जे नियमित करने के लिये आये थे 167339 शपथ पत्र
शिमला/शैल। प्रदेश उच्च न्यायालय ने सौ बीघा से अधिक के अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कारवाई करने के लिये एक एसआईटी का गठन किया था। इस एसआईटी ने अपनी स्टेट्स रिपोर्ट अदालत में सौंपते हुए यह जानकारी दी है कि उसने अब तक 1634 बीघा भूमि से करीब 33 हजार पेड़ काट दिये हंै। इस स्टेट्स रिपोर्ट का संज्ञान लेने के बाद अदालत ने सरकार को अतिरिक्त शपथ पत्र दायर करके और अवैध कब्जाधारियों की सूची अदालत में सौंपने के निर्देश दिये है। इससे पूर्व भी उच्च न्यायालय के अन्य मामले में अवैध कब्जा धारकों के खिलाफ मनीलाॅंड्रिंग के तहत कारवाई करने के आदेश दे चुका है। लेकिन सरकार ने अवैध कब्जों को हटाने के लिये अब तक अपनी ओर से कोई कारवाई नही की है। कारवाई तो प्रदेश उच्च न्यायालय की सख्ती और इस संबंध में एसआईटी बनाये जाने के बाद शुरू हुई है। आज भी कांग्रेस और भाजपा की ओर से संगठन स्तर पर कोई आवाज नही आई है। बल्कि पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ता कुमार, वीरभद्र और प्रेम कुमार धूमल आज तक अवैध कब्जांे के प्रकरण पर खामोश बैठे हैं। वीरभद्र के कार्यकाल में तो कांग्रेस विधायकों ने अवैध कब्जों को नियमित करने के लिये वाकायदा पत्र लिखा था। ऐसे पत्र लिखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे जनप्रतिनिधि इनअ अवैधताओं के खिलाफ कभी कोई कारवाई नही चाहेंगे।
लेकिन इस प्रकरण में प्रशासन की भूमिका भी सन्देह के घेरे में ही है। क्योंकि उच्च न्यायालय सरकार से अवैध कब्जाधारकों की सूची मांग रहा है जो कि ठीक से नही दी जा रही है। इस संद्धर्भ में यह स्मरणीय है कि प्रदेश सरकार ने वर्ष 2002 में अवैध कब्जों को नियमित करने के लिये विधानसभा से एक नीति पारित करवाई थी। इस नीति के तहत अवैध कब्जाधारकों से सरकार ने वाकायदा शपथ पत्र के साथ अपना अवैध कब्जा घोषित करके उसे नियमित किये जाने का आवेदन मांगा था। उस समय सरकार की इस नीति के तहत 1,67,339 आवदेन सरकार के पास आये थे। इन आवदेनों से यह स्पष्ट हो गया था कि इतने अवैध कब्जाधारक प्रदेश में हैं। यहआवेदन सरकार के पास वाकायदा शपथ पत्रा के साथ आये थे। जब इतनी बड़ी संख्या में अवैध कब्जाधारक सामने आये तब सरकार की इस नीति को ही उच्च न्यायालय में CWP No 1028of 2012 और CWP No 1645 of 2002 के माध्यम से चुनौती दे दी गयी। इस पर अदालत ने नोटिस करते हुए यह कहा कि Reply to the application may be filed with in a period of four weeks.
In the facts and circumstances on record it is ordered that the proceedings for regularization of the encroachments on Government lands may go on, but Patta will not be issued under the impugned rules till further orders.
इस याचिका पर कोई फैसला नही आया है। लेकिन सरकार की इस नीति पर अदालत ने कभी स्वीकृति की मोहर भी नही लगायी है। जिन लोगों के सरकार के पास आवेदन आ गये थे वह तो आज भी सरकार के संज्ञान में है। इन 1,67,339 आवेदनों की जब पड़ताल हुई थी तब उसमें 80,000 अवैध कब्जे वनभूमि पर चिन्हित हुए थे। यह सारी जानकारी सरकार के रिकार्ड में आज भी उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त 1990 के शासनकाल में शान्ता कुमार एक नीति ‘‘वन लगाओ रोज़ी कमाओ’’ लाये थे। इस नीति के तहत सरकार की वनभूमि पर पेड़ उनकी देखभाल करने वाले को उन पेड़ो के अनुपात में लाभ मिलने का प्रावधान रखा गया था। ताकि लाभ की उम्मीद में पेड़ लगाने वाला उनका उचित रख-रखाव करेगा। इस नीति के तहत भी सैंकड़ों लोगों ने पेड़ लगाये थे और एक प्रकार से उस भूमि के अपने को मालिक ही मानते थे। इस योजना के तहत वन उगाने वालों की जानकारी भी वन विभाग के पास है। इस तरह अवैध कब्जाधारकों की अधिकृत जानकारी सरकारी रिकार्ड में मौजूद है लेकिन इस सबके बावजूद उच्च न्यायालय को अवैध कब्जाधारकों की जानकारी उपलब्ध नही करवाई जा रही है। जिन अधिकारियों की आॅंखों केे सामने यह सब हुआ हैं उसकी जानकारी भी सरकार के रिकार्ड में मौजूद है। कौन कब कहां तैनात रहा है उसकी जानकारी भी रिकार्ड में उपलब्ध रहती है। यह सारी जानकारियां रिकार्ड में उपलब्ध होने के बावजूद अदालत को उपलब्ध नही करवाई जा रही है। इसमें सरकार और प्रषासन की नीयत पर सवाल उठने स्वभाविक है।
शिमला/शैल। प्रदेश में भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 का किस तरह से दुरूपयोग हो रहा है और इसको स्वयं सरकार कैसे बढ़ावा दे रही है इसका खुलासा सरकार में ही अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे दीपक सानन द्वारा भेजी शिकायत से हो जाता है। दीपक सानन ने अपनी शिकायत में 2013 से 2017 के बीच घटे तीन मामलों का खुलासा करते हुए मन्त्रीमण्डल के सदस्यों जो बैठक में उपस्थित थे, प्रधान सचिव राजस्व, मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव, मुख्य सचिव वीसी फारखा तथा तत्कालीन मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज करके तुरन्त कारवाई करने की मांग की है। दीपक सानन ने अपनी शिकयत में स्पष्ट कहा है कि यदि सरकार कारवाई नही करेगी तो वह स्वयं इस मामले में जनहित याचिका दायर करेंगे।
शिकायत के मुताबिक सरकार ने बड़ोग के होटल कोरिन, शिमला के तेनजिन अस्पताल और चम्बा के लैण्डलीज़ मामलों में सारे नियमों/कानूनों को अंगूठा दिखाते हुए भारी भ्रष्टाचार किया है। होटल कोरिन को लेकर खुलासा किया है कि पीपी कोरिन और रेणु कोरिन ने 1979/ 1981 में बड़ोग में होटल निर्माण के लिये ज़मीन खरीदने की अनुमति धारा 118 के तहत मांगी थी। यह अनुमति की प्रार्थना 1990 तक अनुतरित रही और इसी बीच कोरिन ने वहां होटल का निर्माण कर लिया। जब धारा 118 के तहत अनुमति मिले बिना ही होटल निर्माण का मामला सामने आया तो डीसी सोलन ने इसका संज्ञान लेकर कारवाई शुरू कर दी। इस पर कोरिन ने 1993 में सब जज सोलन की अदालत में याचिका दायर कर दी। लेकिन इसमें सरकार को पार्टी नही बनाया। अदालत ने कोरिन के हक में फैसला दे दिया। जब सरकार को इसकी जानकारी मिली तो सरकार ने सीनियर सब जज के पास अपील दायर कर दी। इस पर सरकार के हक में फैसला हो गया। इसके बाद कोरिन ने जिला जज से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक दरवाजे खटखटाये लेकिन कहीं सफलता नही मिली।
इसी बीच 2004 में कोरिन ने फिर सरकार से इस खरीद की अनुमति दिये जाने का अनुरोध किया जबकि उस समय प्रदेश उच्च न्यायालय में यह मामला लंबित था और मई 2005 में इनके खिलाफ फैसला आ गया। इस तरह 2004 के अनुरोध पर भी सरकार ने कोई अनुमति नही दी और कोरिन पुनः उच्च न्यायालय चले गये और अदालत ने मई 2007 में सरकार को निर्देश दिये कि वह अपने फैसले से कोरिन को अवगत कराये। सरकार ने इस फैसले की अनुपालना करने की बजाये (क्योंकि डीसी सोलन इस ज़मीन को सरकार में वेस्ट कर चुके थे) एक और अनुरोध पर कारवाई करते हुए मन्त्रीमण्डल ने 10.8.2007 को कोरिन को पिछली तारीख से ही दो लाख के जुर्माने के साथ अनुमति दे दी। जब सरकार के इस फैसले पर डीसी सोलन को अनुपालना के लिये कहा गया तो उन्होने सरकार को जबाव दिया कि यह कानून सम्मत नही हैं 2008 में विधि विभाग ने भी यहां तक कह दिया कि मन्त्रीमण्डल का 2007 का फैसला असंवैधानिक है इस पर मन्त्रीमण्डल ने 2.12.2011 को इस पर पुनःविचार किया और 2007 के फैसले को रद्द कर दिया।
इसके बाद 2013 में पुनः एक नया प्रतिवेदन कोरिन से लिया गया और राजस्व विभाग ने नये सिरे से केस तैयार किया तथा मन्त्रीमण्डल ने 4.9.2013 को इस पर अपनी मोहर लगा दी। इस फैसले की भी जब डीसी सेालन को जानकारी दी गयी तो वह पुनः सरकार के संज्ञान में लाये कि इस ज़मीन को धारा 118 के प्रावधानों के तहत बहुत पहले ही सरकार में लेकर इसका राजस्व ईन्दराज हो चुका है। डीसी की जानकरी के बाद प्रधान सचिव राजस्व ने अपने ही स्तर पर राजस्व ईन्दराज को रिव्यू करने के आदेश कर दिये जबकि वह इसके लिये अधिकृत ही नही था। इस तरह इस पूरे मामले से यह स्पष्ट हो जाता है कि सारे नियमो/ कानूनों को नज़रअन्दाज करके कोरिन को लाभ पहुंचाया गया है। जबकि वह सर्वोच्च न्यायालय तक से राहत पाने में असफल रहा है।
इसी तरह शिमला के कुसुम्पटी स्थित तेनजिन अस्पताल का मामला है इसमें तेनजिन कंपनी ने 7.6.2002 को 471.55 वर्ग मीटर ज़मीन में कंपनी का दफ्तर और एक आवासीय काॅलोनी बनाने के लिये खरीद की अनुमति मांगी। लेकिन कंपनी ने दफ्तर और कालोनी बनाने की बजाये अनुमति के बिना ही अस्पताल का निर्माण कर लिया। इसका संज्ञान लेते हुए डीसी शिमला ने धारा 118 के प्रावधानों के तहत कारवाई करते हुए इस ज़मीन को 16.1.2012 को सरकार में वैस्ट कर दिया। इस पर कंपनी ने भूउपयोग बदलने की अनुमति दिये जाने का अनुरोध कर दिया। इस अनुरोध पर निदेशक हैल्थ सेफ्टी एवम् नियमन ने अनिवार्यता प्रमाण पत्र जारी कर दिया लेकिन राजस्व विभाग ने इस पर प्रधान सचिव राजस्व ने अपने ही विभाग की टिप्पणी को नज़रअन्दाज करके मामला मन्त्रीमण्डल की बैठक में विचार के लिये लगा दिया। मन्त्रीमण्डल ने प्रधान सचिव के प्रस्ताव पर अपनी मोहर लगाकर पिछली तारीख से अनुमति प्रदान कर दी। यह भूउपयोग बदलने की अनुमति दिया जाना एकदम धारा 118 को एक तरह से अप्रभावी बनाने का प्रयास है।
ऐसे ही चम्बा के डलहौजी में मन्त्रीमण्डल ने स्टांप डयूटी में 3% की छूट देकर कुछ लोगों की लीज़ को नियमित करने का फैसला 17.7.2017 को कर दिया है। इसके वित्तिय और कानूनी पक्षों पर वित्त विभाग और विधि विभाग की राय लिये बिना ही यह फैसला ले लिया गया है। इसमें रूल्ज़ आॅफ विजनैस के प्रावधानों की अनदेख करके कुछ लोगों को लाभ पहुंचाया गया है। इस तरह पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव में इन मामलों की शिकायत करके पूूरे प्रशासन और सरकार को एक ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई की उसकी नीयत और नीति दोनों की परीक्षा होगी।
यह है दीपक सानन का पत्र





