शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार अपने ही बोझ तले दम तोड़ने के कगार पर पहुंच गयी है? यह सवाल इसलिये उठ खड़ा हुआ है कि 16वें वित्त आयोग ने सत्रह राज्यों को मिल रही राजस्व घाटा अनुदान योजना को बन्द कर दिया है। संविधान की धारा 275(1) के तहत केन्द्र की ओर से राज्यों को यह अनुदान मिल रहा था। जिन राज्यों की राजस्व आय उन राज्यों के राजस्व व्यय से कम हो जाती थी उन राज्यों को सहायता देने के लिये यह अनुदान दिया जाता था। लेकिन इस अनुदान की पात्रता और आकार का आकलन वित्त आयोग के जिम्मे था। वित्त आयोग का गठन महामहिम राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है और इसकी सिफारिशें सबको मान्य होती हैं। इसकी सिफारिशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन सिफारिशों का दुरुपयोग होना शुरू हो गया। राज्यों में वित्तीय अनुशासन गायब होता चला गया। इस वस्तु स्थिति को देखते हुये वर्ष 2003 में राज्यों में वित्तीय अनुशासन और प्रबंधन को सुचारू बनाने के लिये एफआरबीएम अधिनियम लाया गया। यह रखा गया कि राज्य अपने जीडीपी के तीन प्रतिशत तक ही कर्ज ले सकते हैं। प्रतिबद्ध राजस्व व्यय के लिये कर्ज लेने का कोई प्रावधान नहीं है। कर्ज केवल पूंजीगत परिसंपत्तियां खड़ी करने के लिये ही लिया जा सकता है ताकि उनसे राजस्व मिले। लेकिन इस अनुशासन का भी राज्यों पर ज्यादा असर नहीं हुआ। जबकि 2003 में एक उच्च राज्य स्तरीय बैठक वरिष्ठ अधिकारी दीपक सानन की अध्यक्षता में हुई थी और जो पद दो वर्षों से किन्हीं कारणों से खाली चले आ रहे थे उन्हें समाप्त करने का फैसला लिया गया था। इस फैसले पर उस समय भी भाजपा और कांग्रेस में सदन में विवाद हुआ था। लेकिन यह सब होने के बाद भी प्रदेश में वित्तीय अनुशासन नहीं आया। दशकों तक उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी नहीं हुये और पलान के पैसे से नॉन पलान के खर्चे चलाये गये। जो प्रदेश 1993 तक कर्ज मुक्त था आज उसका कर्ज एक लाख करोड़ से कैसे बढ़ गया? जो कर्ज जीडीपी के 3% तक रहना चाहिए था वह आज करीब 45% तक पहुंच गया है। जबकि एफआरबीएम अधिनियम लाकर इस कर्ज को शून्य पर लाने की कवायत की गई थी। लेकिन जब चुनावी लाभ लेने के लिये वायदों की रेवड़ियां बंटनी शुरू हुई तब वित्तीय अनुशासन लाने के लिये आज राजस्व घाटा अनुदान बन्द करने पर आना पड़ा है। 15वें वित्त आयोग की जब रिपोर्ट आयी थी तो उसी में यह दर्ज था कि यह राजस्व घाटा अनुदान 31 मार्च 2026 को समाप्त हो जाएगा। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के घोड़े पर सवार सुक्खू सरकार इस सच्चाई को समझ नहीं पायी और आज हर तरह की प्रतिक्रियाएं देने के कगार पर पहुंच गयी है। पहली बार है कि प्रदेश के वित्त सचिव को अपनी प्रतिक्रिया देते हुये हर सुविधा पर कैंची चलाने की बात करनी पड़ी है। वित्त सचिव की प्रतिक्रिया आज हर जगह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गयी है। वित्त सचिव ने बिजली बोर्ड प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की बात की है। बिजली बोर्ड के कर्मचारियों में पिछले लम्बे समय से बोर्ड को निजी हाथों में सौंपने की चर्चाएं चली हुई हैं। परिवहन निगम को भी प्राइवेट हाथों में सौंपने की चर्चाएं हैं। पर्यटन निगम के होटलों को प्राइवेट क्षेत्र को देने की बात हो रही है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने को ऐसे दिखाया जा रहा है कि सरकार को सब कुछ निजी हाथों में सौंपना पड़ेगा। जबकि यह घाटा अनुदान बन्द करने के साथ ही वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं और आपदा प्रबंधन के लिये उदार रूप से धन का प्रावधान किया है। लेकिन इस पैसे को दूसरे राजस्व व्यय वेतन, पैन्शन और ब्याज की अदायगी पर खर्च नहीं किया जा सकेगा। आज सरकार को यह सार्वजनिक करना पड़ेगा कि उसकी कौन सी जन कल्याण की योजनाएं प्रभावित होने जा रही हैं। अब उसकी हर योजनाओं को आम आदमी की आवश्यकता के तराजू में तोल कर देखा जायेगा। प्रदेश में एक लाख करोड़ से अधिक के कर्ज का निवेश कहां हुआ है यह जानने का आम आदमी को पूरा हक है। अभी सरकार जनता में अपनी विश्वसनीयता के सबसे निचले पायदान पर है। इसी विश्वसनीयता के संकट के कारण सरकार पंचायत चुनाव को टालने के लिये हर संभव प्रयास में लग गयी है। क्योंकि जनता में राहुल गांधी के वोट चोरी के चुनाव आयोग पर लगाये आरोपों पर कोई जानकारी नहीं है। मनरेगा योजना में केंद्र ने जो बदलाव किये हैं प्रदेश में उनकी जानकारी शिमला में किये गये धरना प्रदर्शनों से आगे नहीं निकली है। इस समय प्रदेश सरकार को लेकर यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि सरकार ने तो परंपरा के मुताबिक हारना ही है। इस हार की आड़ में मुख्यमंत्री कांग्रेस के अन्दर भविष्य के लिये अपने समर्थकों के एक बड़े वर्ग को पोषित करने में लगे हुये हैं। इसलिये सैकड़ो के हिसाब से अपने मित्रों को ताजपोशीयां देकर नवाज रहे हैं। इसी मकसद से सबको धनी बनाने के लिये सबके मानदेय में लाखों की बढ़ौतरीयां की गयी है। इसी कारण से विधायकों के वेतन भत्तों और पैन्शनों में बढ़ौतरीयां की गयी। अन्यथा जो मुख्यमंत्री पद संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दे वह ईमानदारी से सरकारी खजाने का ऐसा दुरुपयोग नहीं कर सकता। आज कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और विधायकों को जनता का शुभचिंतक होने के नाते मुख्यमंत्री से लेकर हाईकमान तक सबको पूरी बेबाकी से प्रदेश के हालात से अवगत करवाना होगा। अन्यथा हिमाचल प्रदेश की कार्यप्रणाली राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पर भारी पड़ेगी। यह परिस्थितियां बजट सत्र और राज्यसभा में अपना प्रभाव दिखायेगी यह तय है।
शिमला/शैल। केंद्रीय बजट 2026-27 को हिमाचल प्रदेश के लिए निराशाजनक और अन्यायपूर्ण बताते हुए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि यह बजट आम लोगों, मध्यम वर्ग, किसानों, बागवानों और विशेष रूप से पहाड़ी राज्यों की जरूरतों के प्रति केंद्र सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो बढ़ती महंगाई से जूझ रहे मध्यम वर्ग को राहत दी गई है और न ही हिमाचल जैसे राज्यों की संरचनात्मक चुनौतियों को समझा गया है।
मुख्यमंत्राी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के तहत राज्यों को दिए जाने वाले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को 16वें वित्त आयोग द्वारा समाप्त करना संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है। उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 1952 से यह अनुदान राज्यों को दिया जाता रहा है और 15वें वित्त आयोग के दौरान हिमाचल प्रदेश को लगभग 37,000 करोड़ रुपये की सहायता मिली थी। इससे पहले भी अंतरिम व्यवस्था के तहत 11,431 करोड़ रुपये प्रदान किए गए थे। ऐसे में पहली बार आरडीजी को पूरी तरह समाप्त किया जाना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य की वित्तीय वास्तविकताएं मैदानी राज्यों से बिल्कुल भिन्न हैं। राज्य का 67 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वन एवं पारिस्थितिक आवरण में आता है, जिससे राजस्व अर्जन की क्षमता सीमित होती है। पर्वतीय भूगोल के कारण प्रति व्यक्ति सेवा वितरण की लागत अधिक है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से प्रदेश को 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा है। इन सभी तथ्यों की अनदेखी कर राजस्व घाटा अनुदान समाप्त करना राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा करेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आरडीजी समाप्त होने से राज्य को आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं, विकास कार्यों और सामाजिक क्षेत्र में निवेश के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ेंगे, जिससे कर्ज का बोझ भी बढ़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विस्तृत ज्ञापनों और तकनीकी प्रस्तुतियों के बावजूद केंद्र सरकार और वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश की वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया, जिससे यह आशंका गहराती है कि कांग्रेस शासित राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।
कृषि क्षेत्र पर बजट की आलोचना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए किए गए प्रावधान अपर्याप्त हैं। सेब उत्पादन, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देता है और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है, बजट में पूरी तरह उपेक्षित रहा। न तो बागवानी के लिए कोई विशेष पैकेज दिया गया और न ही विपणन, भंडारण या प्रसंस्करण के लिए कोई ठोस पहल की गई।
पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने निराशा जताई। उन्होंने कहा कि पर्यटन हिमाचल की पहचान और रोजगार का प्रमुख स्रोत है, लेकिन बजट में इसके लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। पूर्वाेत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल को इससे बाहर रखना भेदभाव को दर्शाता है। इसी तरह, भानुपल्ली-बिलासपुर और बद्दी-चंडीगढ़ जैसी महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं के लिए भी बजट में कोई आवंटन नहीं किया गया।
मुख्यमंत्री ने राज्यों की ऋण सीमा को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा 1.5 लाख करोड़ रुपये पर ही सीमित रखना और उस पर कठोर शर्तें लागू करना हिमाचल जैसे राज्यों के लिए व्यावहारिक नहीं है। साथ ही, जीएसटी मुआवजा बंद होने से राज्य को हर वर्ष भारी राजस्व नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए केंद्र ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही पूंजी निवेश की बात करे, लेकिन पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन, सड़क-रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस सहायता नहीं दिखाई देती। केंद्रीय बजट 2026-27 न तो हिमाचल को विकास का स्पष्ट मार्ग देता है और न ही न्याय की भावना को दर्शाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश और उसके लोगों के हितों के लिए इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज मजबूती से उठाती रहेगी।
शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को चरमराई हुई बताते हुए राज्य सरकार पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाये हैं। शिमला से जारी बयान में उन्होंने कहा कि केवल जुबानी दावों और कागजी योजनाओं से न तो स्वास्थ्य सेवाएं सुधर सकती हैं और न ही मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकता है। मौजूदा हालात में प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रदेशवासियों को न तो केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य योजनाओं का समुचित लाभ मिल पा रहा है और न ही राज्य सरकार अपनी योजनाओं का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन कर पा रही है। कागजों में योजनाएं जरूर चल रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मरीज इलाज के लिए भटकने को मजबूर हैं। पूरे प्रदेश में मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी बनी हुई है। डॉक्टरों, नर्सों, तकनीकी कर्मियों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के अनेक पद लंबे समय से खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार इन्हें भरने के बजाये केवल घोषणाओं और आंकड़ों तक सीमित है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अस्पतालों में न पर्याप्त डॉक्टर उपलब्ध हैं, न जरूरी उपकरण और न ही समय पर दवाइयों की आपूर्ति हो पा रही है। इससे मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जो आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
आईजीएमसी शिमला में हाल ही में हुई मारपीट की घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जयराम ठाकुर ने कहा कि यह घटना सरकार और स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर चेतावनी है। अस्पतालों में अव्यवस्था, अत्यधिक भीड़, सुरक्षा व्यवस्था की कमी, कार्यभार का दबाव और प्रशासनिक लापरवाही ऐसी घटनाओं को जन्म दे रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को इस घटना से सबक लेते हुए केवल ब्यानबाजी नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
जयराम ठाकुर ने मांग की कि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सर्वाेच्च प्राथमिकता दे, तुरंत खाली पदों को भरे, अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करे और दवाइयों व उपकरणों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करे। साथ ही उन्होंने कहा कि हिमकेयर और आयुष्मान भारत सहित केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ प्रदेशवासियों को प्रभावी और निर्बाध रूप से मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ये योजनाएं गरीब, मध्यम वर्ग और जरूरतमंद परिवारों के लिए जीवन रक्षक हैं, लेकिन वर्तमान में लापरवाही और अव्यवस्था के कारण आम जनता को इनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए मरीजों को अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और केंद्र से बजट मिलने के बावजूद कई आवश्यक दवाएं मरीजों को उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।