शिमला/शैल। क्या औद्योगिक विकास हिमाचल के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का सूत्र बन सकता है? यह प्रश्न सुक्खू सरकार के दावे के बाद प्रासंगिक हो जाता है। हिमाचल में 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार शान्ता कुमार के नेतृत्व में बनी थी तब प्रदेश में औद्योगिक विकास का रास्ता अपनाया गया था। औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई और उसके बाद आज तक आने वाली हर सरकार ने उद्योगों की स्थापना और उनको बढ़ावा देने की नीति अपनायी है। हिमाचल में 1977 के बाद दो बार शान्ता कुमार मुख्यमंत्री बने दो बार ही प्रेम कुमार धूमल और एक बार जयराम ठाकुर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। करीब 20 वर्षों तक प्रदेश में संघ पोषित विचारधारा के मुख्यमंत्री रहे हैं। संघ पोषित विचारधारा उद्योगों में प्राइवेट सैक्टर की पक्षधर रही है। जो आज केंद्र सरकार के इस दिशा में आचरण से स्पष्ट हो जाता है। 1977 से आज तक करीब तीस वर्ष कांग्रेस की सरकार स्व.रामलाल ठाकुर, स्व. वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कार्यरत है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें भी निजी क्षेत्र की भागीदारी का विकल्प नहीं खोज पायी हैं। 1977 से आज तक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार ने अपनी सोच के मुताबिक सुविधा प्रदान की नीतियां अपनायी। पर्यटन को भी उद्योग का दर्जा दिया गया। शान्ता कुमार स्वयं होटल उद्योग में आये प्रोत्साहन देने के लिये सरकारी जमीन पर बने होटल यामिनी को प्राइवेट जमीन के साथ तबादले की सुविधा प्रदान की गयी। कुल मिलाकर उद्योगों के लिये सरकार ने सारे दरवाजे खोल दिये। बिजली की उपलब्धता के नाम पर उद्योगों को आमंत्रित किया गया। लेकिन इसी औद्योगीकरण से प्रदेश को हासिल क्या हुआ जो सार्वजनिक उपक्रम इन उद्योगों की सुविधा के लिये स्थापित किये गये थे उनमें से वित्त निगम जैसे कितने संस्थान लगभग खत्म हो चुके हैं। 90% सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे हैं और प्रदेश का कर्ज एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। रोजगार के नाम पर आउटसोर्स, मल्टी टास्क और मित्र योजना तक प्रदेश पहुंच गया है। आज प्रदेश नये संस्थान खोलने के नाम पर पुराने संस्थाओं को बन्द करने के कगार पर पहुंच गया है। सरकार ने जब भी कर्ज लिया है तो हमेशा विकास योजनाओं के नाम पर लिया है। विकास से परिणामतः आय होना स्वाभाविक है चाहे सरकार को हुई हो या आम आदमी को। यदि सही में विकास पर किये गये निवेश से आय हुई होती तो प्रदेश को कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लेने की स्थिति न खड़ी होती। आज कर्ज के जिस आंकड़े पर प्रदेश पहुंच चुका है उससे भविष्य लगातार प्रश्नित होता जा रहा है। आज सरकारें चुनाव जीतने के लिये समाज को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर आर्थिक प्रलोभनों के सहारे चल रही है यह भूल रही है कि जिस छोटे से वर्ग को आर्थिक सहायता प्रदान करने का भरोसा दिलाया जाता है उसकी भरपाई तो प्रदेश को करनी पड़ती है। आज समय आ गया है जब पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्रों पर यह शर्त लगानी पड़ेगी की क्या आप यह सुविधा कर्ज और शुल्क के रूप में तो नहीं वसूल करेंगे। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है यहां कृषि और बागवानी विश्वविद्यालय के शोध को यहां के गांव तक ले जाने की आवश्यकता है। क्योंकि एक बड़े औद्योगिक निवेश से जीडीपी का आंकड़ा बढ़कर सरकार के कर्ज लेने की सीमा और बढ़ जाती है परन्तु उससे आम आदमी को व्यवहारिक लाभ नहीं पहुंचता है।
शिमला/शैल।पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने शिमला में आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की राजनीति परंपरागत रूप से विकास और सहयोग पर आधारित रही है, लेकिन वर्तमान सरकार राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से काम कर रही है जिसके दूरगामी परिणाम प्रदेश हित में नहीं होंगे।
जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों, जिन्होंने सरकार का समर्थन नहीं किया, उनके खिलाफ प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस और विभागों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए किया जा रहा है जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता स्थायी नहीं होती और लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे कदमों का परिणाम अंततः सरकार को भुगतना पड़ता है।
नेता प्रतिपक्ष ने हमीरपुर के विधायक आशीष शर्मा का उदाहरण देते हुए कहा कि अवैध खनन से जुड़े मामले में पुलिस स्वयं शिकायतकर्ता बनी, जबकि संबंधित विभाग की ओर से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि जमानत से वंचित रखने के लिए गंभीर धाराएं जोड़ी गईं और विधायक को बार-बार थाने बुलाया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पूर्व कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों, तथा भाजपा नेताओं के परिवारों को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि संबंधित विभागों को निष्पक्ष एवं कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए। जयराम ठाकुर ने आपदा प्रभावित परिवारों से जुड़े मामलों में भी मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस कारवाई संवेदनशीलता के अनुरूप होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि उन अन्य विधायकों और नेताओं पर भी दबाव बनाया जा रहा है, जिन्होंने सरकार का विरोध किया या उसका साथ छोड़ दिया।
जयराम ठाकुर ने कांगड़ा कार्निवल के आयोजन को लेकर जारी पत्र पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह एक सरकारी अधिसूचित कार्यक्रम है, ऐसे में इसके आयोजन का खर्च आम जनता से वसूला जाना उचित नहीं है। उन्होंने पूछा कि पत्र जिला प्रशासन के बजाये किसी अन्य स्तर से क्यों जारी किया गया और उसमें आधिकारिक बैंक खाता विवरण क्यों नहीं दिया गया।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि दान या सहयोग लिया जा रहा है तो उसकी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और दाताओं को आयकर नियमों के तहत लाभ की जानकारी भी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विभाग को राजनीतिक प्रचार से दूर रहकर तथ्यात्मक और संतुलित सूचना प्रसारित करनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को संवैधानिक सीमाओं में रहते हुए कार्य करने की सलाह दी।
जयराम ठाकुर ने आपदा राहत से जुड़े मामलों में भी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आपदा के दौरान जिन परिवारों ने अपने परिजन खोए, उनके खिलाफ पुलिस कारवाई की खबरें सामने आई हैं, जो संवेदनशीलता के अभाव को दर्शाती हैं।
उन्होंने बंजार और धर्मपुर क्षेत्रों में कथित अवैध कटान और अवैध खनन के मामलों पर भी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच और कारवाई की मांग की।
जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रतिशोध आधारित राजनीति प्रदेश की संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि प्रशासनिक कारवाई पारदर्शिता, कानून सम्मत प्रक्रिया और तटस्थता के आधार पर की जाये तथा असहमति को अपराध की तरह न लिया जाये।
शिमला/शैल। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने और हिमाचल प्रदेश को ग्रीन एनर्जी स्टेट के रूप में स्थापित करने की दिशा में राज्य सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि प्रदेश सरकार ने मार्च 2026 तक राज्य की 90 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की वार्षिक ऊर्जा खपत लगभग 13 हजार मिलियन यूनिट है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार की हरित नीतियों के परिणामस्वरूप सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और आगामी दो वर्षों में 500 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया है। ‘ग्रीन पंचायत कार्यक्रम’ के तहत प्रदेश की सभी पंचायतों में 500 किलोवाट क्षमता की ग्राउंड- माउंटेड सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। पहले चरण में 24 ग्राम पंचायतों में ऐसी परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 16 पंचायतों में कार्य आरंभ हो चुका है। इस कार्यक्रम के माध्यम से 150 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इन परियोजनाओं से उत्पादित बिजली से अर्जित राजस्व का 20 प्रतिशत भाग राज्य सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों के अनाथ बच्चों और विधवाओं के कल्याण के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि ऊना जिला स्थित पेखूबेला सौर ऊर्जा परियोजना ने 15 अप्रैल 2024 को वाणिज्यिक संचालन शुरू किया, जिससे अब तक 79.03 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ और 22.91 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया गया। ऊना की अघलौर सौर परियोजना से 21 मई 2025 से बिजली उत्पादन शुरू हुआ है, जिससे अब तक 5.89 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ है। वहीं, भंजाल सौर ऊर्जा परियोजना ने 30 नवंबर 2024 को व्यावसायिक संचालन शुरू कर अब तक 8.57 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन करते हुए 3.10 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्तमान में 31 मेगावाट की संयुक्त क्षमता वाली तीन सौर ऊर्जा परियोजनाएं निष्पादन चरण में हैं, जबकि 41 मेगावाट क्षमता की चार परियोजनाओं के लिए निविदाएं आमंत्रित की गयी हैं। इसके अतिरिक्त कांगड़ा जिला के डमटाल क्षेत्र में बंजर भूमि पर 200 मेगावाट क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्रा स्थापित किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि लाहौल -स्पीति के लांगजा, हिक्किम, मुद और कोमिक जैसे दुर्गम क्षेत्रों के 148 घरों में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत सोलर ऑफ-ग्रिड सिस्टम स्थापित किए गये हैं।
मुख्यमंत्री ने बताया कि ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति के अंतर्गत 250 किलोवाट से 5 मेगावाट तक की सौर ऊर्जा परियोजनाएं आवंटित की जा रही हैं, जिनसे उत्पन्न बिजली को हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड द्वारा खरीदा जाएगा। अब तक 547 निवेशकों को लगभग 595.97 मेगावाट क्षमता की ग्राउंड-माउंटेड सौर परियोजनाएं आवंटित की जा चुकी हैं, जिनमें से 403.09 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं के लिए विद्युत खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, हिमऊर्जा द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड को 728.4 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएं आवंटित की गई हैं, जिनमें से 150.13 मेगावाट क्षमता की 120 माउंटिड सौर परियोजनाएं पहले ही आवंटित हो चुकी हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ग्रीन हाइड्रोजन, कंप्रेस्ड बायोगैस, भू-तापीय ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए भी ठोस प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि इन निरंतर पहलों के माध्यम से वर्ष 2026 तक हिमाचल प्रदेश को देश के अग्रणी ग्रीन एनर्जी राज्यों में शामिल करने की दिशा में राज्य सरकार लगातार आगे बढ़ रही है।
शिमला/शैल। मण्डी के पड्डल मैदान में हिमाचल प्रदेश सरकार के तीन वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित जन संकल्प सम्मेलन राज्य की विकास यात्रा, नीतिगत बदलावों और जनकल्याणकारी उपलब्धियों का व्यापक मंच बना। प्रदेशभर से बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने आयोजन को जनसमर्थन का प्रतीक बना दिया। सम्मेलन में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू, उप-मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री और प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल के संबोधनों में सरकार के तीन वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य के संकल्पों को विस्तार से रखा गया।