Thursday, 05 February 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

कुल्लू के थप्पड़ कांड के बावजूद फोरलेन मुआवजे का मुद्दा अभी तक लंबित क्यों

शिमला/शैल। इस समय हिमाचल के आठ जिलों में फोरलेन का काम चला हुआ है। इस काम में इन जिलों के लोगों की जमीने और मकान आदि फोरलेन में आ रहे हैं। सरकार इनका अधिग्रहण करके प्रभावित लोगों को मुआवजा भी दे रही है। लेकिन यह मुआवजा सर्किल रेट का सिर्फ दो गुना दिया जा रहा है जबकि यह चार’ गुणा दिया जाना चाहिये। कांग्रेस शासन के दौरान जब भाजपा विपक्ष में थी तब सदन में इसको लेकर बहुत हंगामा हुआ था। विधानसभा की कारवाई प्रभावित हुई थी। कुल्लू-मनाली-बिलासपुर फोरलेन पर तो इसके प्रभावितों ने बाकायदा इसके लिये संघर्ष कमेटी का गठन कर लिया था। ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर इसमें अग्रणी भूमिका में थे। शिमला के प्रैस क्लब में एक पत्रकार वार्ता में सरकार को कड़ी चेतावनी दी गयी थी। जब ब्रिगेडियर खुशाल सिंह मंडी लोक सभा उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी बने तब इसी मुद्दे पर उनकी अस्पष्टता चुनाव में भारी पड़ी। इसी फोरलेन प्रकरण पर कुल्लू में नितिन गडकरी के आगमन पर पुलसियों में थप्पड़ कांड तक घट चुका है।
लेकिन इस थप्पड़ कांड के बाद भी आज तक यह मुद्दा अपनी जगह खड़ा है। अब एक संस्था निष्ठा ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस संस्था का एक प्रतिनिधिमंडल ई संजीव सुन्टा की अध्यक्षता में मुख्यमंत्री से भी मिला है। मुख्यमंत्री को पत्र सौंपकर फोरलेन प्रभावितों को चार गुना मुआवजा देने की मांग की गयी है। अब जब सरकार के आठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री शिमला आ रहे हैं तब यह मांग उनके ध्यान में लाने के प्रयास किये जा रहे हैं। चुनावी वर्ष में यह मांग बहुत प्रभावी भूमिका निभायेगी क्योंकि प्रदेश के आठ जिले इससे प्रभावित हैं।



ड्रग कंट्रोलर के खिलाफ चर्चित शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं

सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सवालों में

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार का स्वास्थ्य विभाग एक लंबे अरसे से विवादों का केंद्र चला आ रहा है। विभाग को लेकर पहली चर्चा उस समय शुरू हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के नाम लिखा एक पत्र वायरल हुआ। इस पत्र के तथ्यों पर कोई जांच करने की बजाय सरकार ने इसके लेखक का पता लगाने को प्राथमिकता दी। कई लोगों पर शक किया गया। शैल भी शक के दायरे में रहा और अंततः धूमल शासन में मंत्री रहे रविन्द्र रवि के खिलाफ इस संबंध में एक मामला दर्ज कर लिया गया। इस मामले का अंतिम परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। इसके बाद सोलन से एक ऑडियो वायरल हुआ। इस पर मामला दर्ज हुआ तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी तक हुई। स्वास्थ्य मंत्री को बदलकर विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। लेकिन मामले का अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है। फिर पी.पी. किटस और सैनिटाइजर खरीद पर सवाल उठे। सैनिटाइजर खरीद पर सचिवालय के एक अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। इसका भी परिणाम आना शेष है।

लेकिन इन सारे मामलों के साथ एक और गंभीर तथ्य यह घटता रहा कि हिमाचल में बनने वाली दवाओं के सैंपल फेल होने के समाचार आते रहे हैं। विधानसभा में इस आश्य के प्रश्न आये। सरकार ने जवाब में दवाइयों और निर्माता कंपनियों के नामों सहित पूरा विवरण पटल पर रखा। लेकिन इस पर कारवाई के नाम पर यही आया कि निर्माताओं को शो कॉज नोटिस जारी कर दिये गये। शो कॉज नोटिस के बाद क्या कारवाई हुई आज तक सामने नहीं आया है। जबकि सैंपल फेल होने के किस्से अब तक जारी हैं। संयोगवश विधानसभा में आये सवाल लिखित जानकारी आने तक ही सीमित रहे हैं। बद्दी देश का एक बड़ा फार्मा हब है। बड़े-बड़े दवा निर्माता यहां पर हैं। हिमाचल में बनी हुई एक दवाई के सेवन से जम्मू में कुछ बच्चों की मौत होने तक का मामला घट चुका है। इस पर एक अपराधिक मामला भी दर्ज हो चुका है। लेकिन इसका भी अंतिम परिणाम सामने नहीं आया है।
दवाई जीवन रक्षक होती है। जब उसके निर्माण में उसकी गुणवत्ता के मानकों की ही पालना नहीं होगी तो शायद इससे बड़ा और कोई अपराध नहीं हो सकता। ऐसे अपराधियों के खिलाफ यदि कारण बताओ नोटिस से आगे कारवाई न बढ़े तो क्या इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह नहीं माना जाना चाहिये। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना दवा नियंत्रक की जिम्मेदारी होती है। दवाइयों की कीमतें किस गति से बढ़ाई जा रही हैं और इसमें फार्मा कंपनियां किस तरह आचरण करती हैं इसका जिक्र पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार अपनी आत्म कथा में कर चुके हैं। नागपुर में एक एनजीओ साथी कि 40 पन्नों की रिपोर्ट में भी फार्मा कंपनियों की भूमिका को लेकर बहुत ही सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हिमाचल में दवा नियंत्रक रहे शेर सिंह का मामला भी सभी जानते हैं। दवाइयों की खरीद में किस तरह कितने कमीशन का आदान-प्रदान होता है इसका खुलासा मण्डी में हुई खरीद पर कैग रिपोर्ट में आ चुका है। जब नड्डा प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री थे तब भी इस खरीद पर लंबा चौड़ा मामला घट चुका है तब भी स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी हुई थी।
इस परिदृश्य में आज जो आठ पन्नों की एक शिकायत दवा नियन्त्रक मरवाह के खिलाफ मीडिया तक पहुंची है उस पर सरकार द्वारा अब तक कोई कारवाई न किया जाना अपने में कई सवाल खड़े कर देता है। एक एम सी जैन द्वारा प्रधानमंत्री सहित एक दर्जन अधिकारियों नेताओं को भेजी इस शिकायत में बहुत गंभीर आरोप लगाये गये हैं। इन आरोपों की सत्यता सामने आनी चाहिए। जिस एम सी जैन के नाम से यह शिकायत मीडिया तक पहुंची है वहीं पर यह शिकायत सरकार और उसकी एजेंसियों तक भी पहुंची होगी। लेकिन इस पर अब तक किसी की ओर से भी कोई प्रतिक्रिया जारी न होना कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में इस शिकायत में दर्ज तथ्यों की सत्यता पर कुछ भी न कहते हुये इसे यथास्थिति पाठकों के सामने रखना सरोकारी पत्रकारिता का धर्म हो जाता है।

यह है एम.सी. जैन की शिकायत

 

 

 






























 

    

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सिसोदिया की शिमला यात्रा के बाद भी नहीं हो पाया आप की इकाई का पूर्णगठन

शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी अभी तक प्रदेश इकाई का नये सिरे से गठन नहीं कर पायी है। केजरीवाल की यात्राओं और सत्येंद्र जैन के प्रयासों से भी इस दिशा में कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पायी है। लेकिन दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री सिसोदिया की यात्रा के बाद प्रदेश में शिक्षा की हालत एक मुद्दा अवश्य बन गयी है। सिसोदिया द्वारा उठाये गये सवालों की चपेट में पूरी जयराम सरकार आ गयी और जवाब देने पर विवश भी हो गयी है। यही नहीं सिसोदिया ने आप की घोषणाओं को पूरा करने के लिये साधन कहां से आयेंगे इसका जवाब देते हुए कहा है कि यह सब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करके हो सकता है। भ्रष्टाचार का उदाहरण देते हुये स्पष्ट जिक्र किया कि प्रदेश का एक नेता मंत्री बनने से पहले एक साधारण तीन कमरों के मकान में रहता था लेकिन मंत्री बनने के बाद जब वह अपने बेटे की शादी की दस-दस रिसैप्शन दिल्ली और शिमला के बीच दे तो तय है कि यह हैसियत भ्रष्टाचार से ही आयी है। सिसोदिया ने मंत्री का नाम लिये बगैर भाजपा के उन तीनों बड़े नेताओं पर जनता का ध्यान केंद्रित करवा दिया जिन्होंने इस दौरान अपने बेटों की शादियां की है। आप सरकार भ्रष्टाचार के प्रति कितनी गंभीर है इसका परिचय भगवंत मान ने अपने स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त और गिरफ्तार करके दे दिया है। जबकि स्वास्थ्य विभाग के सौदों में 1% कमीशन मांगे जाने की सूचना केवल मुख्यमंत्री के ही पास थी और सार्वजनिक नहीं थी। लेकिन हिमाचल में ऐसी सूचनाओं के सार्वजनिक होने के बावजूद भी किसी नेता के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई है। पंजाब की आप सरकार के इस तरह के कदमों से हिमाचल में भी आम आदमी की विश्वसनीयता बनने में एक आधार तैयार हो रहा है। लेकिन इसी कदम के साथ हिमाचल में भी भाजपा से निकलकर आप में शामिल हुये नेताओं पर चर्चा आ सकती हैं क्योंकि संघ की सक्रिय पृष्ठभूमि से निकलकर दूसरे दलों में गये नेताओं की पहली निष्ठा संघ में ही रहती है। जबकि आज की बुनियादी समस्याओं के लिये संघ की वैचारिकता ही सबसे बड़ा कारण है। 1980 में जनता पार्टी इसी दोहरी निष्ठा के कारण टूटी थी। प्रदेश की आप इकाई में सिसोदिया के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर आप के दो ग्रुपों में झगड़ा होने के वीडियो जिस तरह से वायरल हुये हैं उससे यह आशंका बराबर बन गयी है कि आने वाले दिनों में ऐसे झगड़े पार्टी के आकार लेने से पहले ही उसके लिए कोई कठिनाइयां न खड़ा कर दें। क्योंकि ऐसा झगड़ा होने की यह दूसरी घटना है। इसके लिए पार्टी में संयोजक का बनाया जाना बहुत आवश्यक हो गया है। क्योंकि प्रदेश स्तर पर भाजपा और कांग्रेस को एक साथ घेरना आवश्यक है। लेकिन अभी तक प्रदेश के नेता उसी पाठ को दोहरा रहे हैं जिसकी इबारत उन्हें दिल्ली से लिखकर दी जा रही है। इस समय सोशल मीडिया में पार्टी के लिये वह लोग पोस्टे डाल रहे हैं जो इसके लिये अधिकृत ही नहीं है। बल्कि उनकी पहली निष्ठांये आज भी भाजपा के साथ हैं। ऐसे में आप के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा आप के लिये जो भी व्यावहारिक आधार तैयार किया जा रहा है उस को आगे बढ़ाने के लिये जब तक स्थानीय स्तर पर कोई सक्षम लोग नहीं होंगे तब तक कोई ज्यादा परिणाम सामने नहीं आयेंगे। जब तक प्रदेश इकाई की पूर्ण घोषणा नहीं हो जायेगी तब तक यह आरोप लगता ही रहेगा कि कहीं पार्टी अंत में अपरोक्ष रूप में भाजपा को ही मजबूत करने का प्रयास तो नहीं कर रही है। क्योंकि अभी तक सिराज में रोड शो और रैली करने की तारीख घोषित नहीं हो पायी है।

क्या हिमाचल में आप दिल्ली से ही संचालित होगा

क्या कांग्रेस भाजपा से नाराज लोगों के आने से ही विश्वसनीयता बनेगी।
खालिस्ताान प्रकरण पर आप का दो टूक जवाब क्यों नहीं आ रहा?
मुफ्ती की घोषणाओं को पूरा करने के लिए संसाधन कहां से आयेंगे।

शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी हिमाचल में विधानसभा का चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है। इस ऐलान के बाद अरविंद केजरीवाल प्रदेश में मंडी और शाहपुर में दो सफल रोड शो रैलियां भी कर चुके हैं। मंडी की रैली के बाद आप ने दिल्ली में दावा किया था कि हिमाचल में भाजपा हाईकमान जयराम ठाकुर को हटाकर अनुराग ठाकुर को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने जा रही है। आप के इस दावे का जवाब अनुराग ठाकुर ने केजरीवाल की शाहपुर रैली से पिछली रात आप के प्रदेश संयोजक सहित तीन नेताओं को दिल्ली में नड्डा के आवास पर भाजपा में शामिल करवा दिया। आप की इस टूटन के बाद अभी तक पार्टी प्रदेश में नया संयोजक नामित नहीं कर पायी है। यहां तक की आप के प्रभारी सत्येंद्र जैन के मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र सराज में जो रोड शो करने का ऐलान कर रखा था उसकी तारीख तक अभी घोषित नहीं कर पाये हैं। जो उत्साह केजरीवाल की सफल रैलीयों के बाद आप के पक्ष में प्रदेश में बनने लगा था उसमें अचानक ब्रेक लग गयी है। जबकि मुफ्त बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देने का जो ऐजैण्डा लेकर आप चल रही है उसी ऐजैण्डे की कॉपी करते हुये जयराम ठाकुर ने भी मुफ्ती की कुछ घोषणाएं कर दी थी। तब उसके लिये भी श्रेय केजरीवाल को ही दिया गया था। लेकिन इस सबके बाद अब जब आप की गतिविधियों में एक तरह की ब्रेक लग गयी है तो उससे हिमाचल के प्रति आप की गंभीरता और ईमानदारी पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि आप ने दिल्ली में एक पत्रकारवार्ता में दावा किया था कि प्रदेश भाजपा के तीन बड़े नेता पार्टी में शामिल हो रहे हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। बल्कि प्रदेश में पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया में पोस्ट डाल कर दर्जनों कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के नाम उछालते हुये यह दावे किये थे कि यह सब लोग उनके संपर्क में चल रहे हैं और जल्दी पार्टी में शामिल होंगे। इसमें कुछ भी नहीं हो पाया है। इस समय यह आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है कि आप में कोई बड़ा नेता शामिल नही हो रहा है। जितने भी नेताओं से संपर्क साधने की खबरें आती है उन सब में यह आता है कि शामिल होने वाले नेता यह शर्त रख रहें हैं कि पहले उन्हें आप की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाये। संयोगवश इस समय कांग्रेस और भाजपा से नाराज चल रहे सभी छोटे-बड़े नेताओं में यह साहस नहीं है कि वह प्रदेश की वर्तमान समस्याओं पर कोई स्पष्ट राय रख पाये और उनके लिये अपने दलों के नेतृत्व को प्रमाणिक रूप से जिम्मेदार ठहरा सके। जनता को यह स्पष्ट कर पाये कि उनके पास प्रदेश के लिये क्या योजना है और उसे पूरा करने के लिये संसाधन कहां से आयेंगे। आम जनता यदि भाजपा कांग्रेस का विकल्प चाहती है तो उसके लिये विकल्प को विश्वसनीय भी होना पड़ेगा। आप अभी तक प्रदेश में यह विश्वसनीयता बना पाने में सफल नहीं हो पायी है और भाजपा कांग्रेस से नाराज लोगों को लाने से यह विश्वास बन भी नहीं पायेगा। क्योंकि यह आम आदमी की अवधारणा से ही एकदम विपरीत है। आप को आम आदमी की पार्टी बनने के लिये आम आदमी में से ही नेतृत्व निकालना होगा। आम आदमी पार्टी को दिल्ली से बाहर अब पंजाब में प्रमाणित करना होगा कि यह सही में आम आदमी है। चुनावी वादे को पूरा करने के लिये केंद्र की सहायता पर निर्भरता से कुछ भी पूरा करना आसान नहीं होगा। हिमाचल में आने से पहले ही शांता कुमार और विजय मनकोटिया के संपर्क में होने के दावे किये जा रहे थे जिनका कोई खंडन नहीं किया गया। जबकि इन्हीं सम्पर्कों ने जो सवाल आप से पूछे और उछालें हैं उनका जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है। खालिस्तान को लेकर जो सवाल उठाये गयेे उनमें लगातार आप को अपरोक्ष में निशाने पर लिया जा रहा है। अब तक इस संद्धर्भ में जो कुछ भी घटा है उसके लिये अपरोक्ष में आप को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। लेकिन आप की ओर से कोई जवाब नहीं आ रहा है। स्थिति यह बनती जा रही कि आप के चुप रहने से भी इन आक्षेपों से बच नहीं पा रही है। यदि और कुछ समय तक ऐसा ही चलता रहा तो पार्टी को आगे बढ़ना कठिन हो जायेगा। क्योंकि अब पार्टी के भीतर से ही यह आवाजें उठना शुरू हो गयी है कि दिल्ली से ही हिमाचल का संचालन कब तक होता रहेगा।

चरमराते शीर्ष प्रशासन पर नड्डा और अनुराग की चुप्पी क्यों

बार-बार नड्डा के प्रदेश दौरों से उठी चर्चा
नड्डा का फ्रन्ट पर आना जय राम की सफलता या मजबूरी

शिमला/शैल। इस वर्ष के अन्त में प्रदेश विधानसभा के लिये चुनाव होने हैं। भाजपा कांग्रेस और आप तीनों राजनीतिक दलों के लिये यह चुनाव अपने अपने कारणों से महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि दिल्ली और पंजाब दोनों जगह भाजपा और कांग्रेस आप से हार चुके हैं। हरियाणा में भाजपा अकेले अपने दम पर सत्ता में नहीं है। ऐसे में यदि हिमाचल भी इनके हाथ से निकल जाता है तो दोनों दलों को राष्ट्रीय स्तर पर बहुत गहरा आघात लगेगा और उसके परिणाम भी दूरगामी होंगे कांग्रेस ने प्रदेश संगठन में बदलाव करके इसमें होने वाले पलायन को रोक लिया है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा अभी ऐसा कुछ नहीं कर पायी है। जबकि उसके संगठन और सरकार में लम्बे अरसे से बदलाव की चर्चाएं चलती आ रही हैं। जब भाजपा प्रदेश में चारों उपचुनाव हार गयी थी तब नेतृत्व परिवर्तन से लेकर कुछ मंत्रियों को हटाने और कुछ के विभागों में फेरबदल किये जाने की चर्चाएं बहुत तेज हो गयी थी। लेकिन यह सब व्यवहारिक शक्ल नहीं ले पाया है। ऐसा क्यों हुआ है यह विश्लेष्कों के लिए अब तक खोज का विषय बना हुआ है। लेकिन इस पर कलम चलाने से पहले प्रदेश के शीर्ष प्रशासन पर उठते सवालों और उन पर सरकार की रहस्यमई चुप्पी सवालों में है। आज सरकार के मुख्य सचिव से लेकर उनकी नीचे के पांच अधिकारी भी सवालों में आ खड़े हुये हैं। क्योंकि दो-दो जगह सरकारी आवास लेने के अतिरिक्त विशेष वेतन का वितीय लाभ भी ले रहे हैं। नियमों के अनुसार यह गंभीर अपराध है। पूरे प्रदेश में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री इस पर चुप है। पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में करीब दो दर्जन लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। प्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें इतने बड़े स्तर पर प्रश्न पत्रों को बेचा गया है। कई तरह के नाम चर्चा में आ रहे हैं। विपक्ष मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रही है। लेकिन सरकार कोई फैसला नहीं ले पा रही है। यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर मुख्यमंत्री की क्या ऐसी मजबूरी है जो उन्हें कड़ा कदम लेने से रोक रही है। सरकार नेता प्रतिपक्ष को तो मंत्री स्तरीय आवास दे नहीं पायी है लेकिन अपने अफसरों को दिल्ली और शिमला में एक साथ मकान दे कर बैठी हुयी है। कर्ज में डूबी सरकार के इस तरह के आचरण का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ रहा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। देर सवेर अधिकारियों का यह मामला विजिलेंस और अदालत में पहुंचेगा ही। ऐसे में राजनीतिक पंड़ितों के लिए यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि जिस सरकार का शीर्ष प्रशासन सवालों के कटघरे में खड़ा हो भर्ती परीक्षा के पेपर बेचे जाने के प्रकरण में मामला गिरफ्तारीयों तक पहुंच जाये उस सरकार की साख अपने अंध भक्तों से हटकर आम आदमी की नजर में कहां खड़ी होगी इसका अंदाजा भले ही नेता लोग न लगा पा रहे हो लेकिन आम आदमी पूरी तरह स्पष्ट है। क्योंकि 12ः बेरोजगारी की दर के कारण प्रदेश का नाम देश के 6 राज्यों में आ चुका है। इस सबके बावजूद भी जब हाईकमान न हिल रहा हो तो निश्चित रूप से ध्यान जयराम के दिल्ली में बैठे दो वकीलों जेपी नड्डा और अनुराग ठाकुर पर जायेगा। क्योंकि नड्डा ने ही जयराम के वकील होने का दावा किया है। इस वकालत नामे पर अमल करते हुये दोनों वकील प्रदेश में किसी न किसी बहाने आने का कार्यक्रम बनाने पर विवश हो गये हैं। अब तो प्रधानमंत्री को भी लाने का जुगाड़ बैठा लिया गया है। भले ही अंतिम क्षणों में प्रधानमंत्री न आ पायें लेकिन एक बार तो आम कार्यकर्ताओं को बता ही दिया गया है कि प्रधानमंत्री सरकार से कितने खुश हैं। इस परिदृश्य में यह सवाल भी काफी रोचक हो गया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को पोस्टरों में जगह न देने और धूमल की हार के कारणों की जांच की मांग को सीधे ठुकराने के बाद नड्डा ने प्रदेश की जिम्मेदारी अपने कंधों पर कैसे ले ली है। नड्डा को फ्रन्ट पर लाकर खड़ा कर देना जयराम की सफलता है या नड्डा की मजबूरी इस पर अभी पर्दा बना हुआ है। लेकिन इस सब में अनुराग की भूमिका आने वाले दिनों में क्या रहती है यह देखना रोचक होगा। क्योंकि जिस तरह से नड्डा प्रदेश में बार-बार आकर रोड शो करने पर मजबूर होते जा रहे हैं उससे प्रदेश में जीत की जिम्मेदारी जयराम से बदलकर नड्डा पर आती जा रही है। इसमें यह देखना भी रोचक होगा कि नड्डा अन्त तक जयराम के साथ खड़े रहते हैं या कुछ कदम चलकर पांव पीछे खींच लेते हैं।



Facebook



  Search